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एक मुलाक़ात: प्रियरंजन दासमुंशी के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी से. पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश. प्रियो दा, सबसे पहले आप बताइए कि असली प्रियरंजन दासमुंशी कैसा व्यक्ति है? जिसको लोग नहीं जानते हैं, जो संसद में नहीं दिखता है, जो इधर-उधर नहीं दिखता है, वो ख़ुद कैसा आदमी है? देखिए, मेरा न तो कोई असली व्यक्तित्व है और न कोई नकली. मैं एक मामूली इंसान हूँ. लोगों के बीच में काम करते हुए यहाँ पहुँचा हूँ. कभी गिरा, कभी चढ़ा. उतार-चढ़ाव के साथ ही मेरी ज़िंदगी का दौर शुरू हुआ. ऐसे तो मुझे लगता है कि ये पद, ये क्षमता ये सारी चीजें बिल्कुल बेकार की है. असल में लोगों का लोगों के साथ रिश्ता चाहे वो सत्ता में हो, सत्ता में न हो, चाहे किसी पद पर न हो, यही जीने का सबसे बड़ा मज़ा है. मैं इसी हिसाब से अपने जीवन को देखता हूँ. और कभी नहीं सोचता हूँ कि मैं क्या बना हूँ और क्या मैं था और क्या मैं होऊंगा. क्या बात है! आपने कहा कि आप सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं व्यक्तिगत रिश्तों को, और किसके साथ कैसी दोस्ती रही, कैसे रिश्ते रहे इसको. तो अच्छे दोस्तों में किसको मानते हैं आप? दोस्त तो मेरे कितने ही हैं लेकिन सबसे बड़ी दोस्त हैं मेरी बीवी. एक लंबी दोस्ती के बाद मेरे साथ उनकी शादी हुई. लेकिन दोस्त तो और भी बहुत हैं. दोस्ती के मामले में मैं पार्टी का विचार नहीं करता हूँ. दोस्त जो बनता है वो कैसे बनता है वह तो अलग बात है लेकिन वह दोस्ती होती है. उनके हर मामले में, उनके दुख में, कठिनाई में, उनके सुख में मैं कैसे काम आ सकता हूँ, यदि थोड़ा भी हिस्सा ले सकता हूँ तो मैं समझता हूँ कि बड़ा अच्छा काम हुआ. आजकल के समाज में हर चीज को राजनीति के दृष्टिकोण से देखा जाता है यह मुझे कभी-कभी तकलीफ़ पहुँचाता है. मैं समझता हूँ कि अच्छा इंसान हो चाहे किसी पार्टी में हो, किसी वर्ग में हो, किसी संप्रदाय में हो, उनका ख़याल करना, उनके साथ अपने रिश्ते को मज़बूत करना जीने के लिए बहुत बड़ा चीज है. आपके बारे में बहुत लोग कहते हैं कि बहुत उदारवादी हैं, बहुत खुला सोच रखने वाले व्यक्ति हैं, क्या सही बात है ये? कई बार जब आपके फ़ैसले देखते हैं तो ऐसा लगता है कि शायद नहीं है. नहीं-नहीं, लेकिन एक बात है कि उदारीकरण के मसले में मेरा एक लफ़्ज है वो ये है जो मैं एआईसीसी की मीटिंग में कहता था जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावजी के समय में वित्त मंत्री थे. मैने कहा था कि खिड़की तो खुलनी चाहिए. बाहर का जो कुछ सपोर्ट है वह अंदर आना चाहिए लेकिन 'वाइल्ड विंड' यदि अंदर में ज़्यादा घुसना शुरू करे और घर के अंदर जो मैंने पुराने दिनों से सजा के रखा उसको नष्ट कर दे और व चला जाए खिड़की के बाहर तो उस तरह का कोई उदारीकरण नहीं चाहिए. उदारीकरण चाहिए ऐसा कि बाहर का कोई आए, मुझे समझे, मुझे अपनाए. लेकिन बाहर का कोई 'वाइल्ड विंड' तूफान की तेज़ी से घुसे और जो मेरा था उसे बर्बाद करके चला जाए और मुझे उनके पराधीन बनना पड़े, यह तो ठीक नहीं हुआ. यह मेरा विचार है. खिड़की को उतना ही खोलिए, खिड़की वाली बात से ध्यान आया, इस कार्यक्रम में हम अतिथियों की पसंद के गाने भी पूछते हैं तो आप अपनी पसंद का एक गाना बताइए? कहीं मेरे सामने वाली खिड़की में वाला गाना तो पसंद नहीं है? देखिए गाने तो मुझे बहुत पसंद हैं. हर जगह जहाँ अच्छे गाने का कार्यक्रम होता है, गाना सुनने के लिए मैं इंतजार करता हूँ. स्कूल जीवन और कॉलेज जीवन को यदि जाने दें तो मैं किसी 'फंक्शन-वंक्शन' में गीत-वीत नहीं गाता हूँ यह बात सही है लेकिन गुरुदेव का गाना मुझे सबसे अधिक पसंद है. एक गाना जो हमलोग हर रोज गाते थे बांग्लादेश की आज़ादी के समय. तब मैं यूथ काँग्रेस का अध्यक्ष था. गाना है बंगाली में लेकिन मैंने अंग्रेज़ी में अनुवाद करके बर्लिन यूथ फेस्टीवल में गाया था जब बंग्लादेश के साथ भारत का एक बड़ा रिश्ता चल रहा था. उस समय उसे ईस्ट पाकिस्तान कहते थे. यह गाना भूपेन हजारिकाजी बहुत बार गाते थे और मुझे बहुत पसंद था. यह गाना मैंने ढाका जाकर बंगबंधु मुजीबुर्रहमान के सामने एक कार्यक्रम में गाया था. मैं समझता हूँ कि इस गाने का बहुत अच्छा मायने भी होता है. (गाते हैं) गंगा आमार माँ, पद्मा आमार माँ, ओ आमार दुइ चोखे दुइ जलेर धारा मेघना जमुना.. गंगा आमार माँ पद्मा आमार माँ.. क्या बात है! दासमुंशी जी आप तो बकायदा गायक हैं, आपका तो बिल्कुल वैकल्पिक करियर बन सकता है ये तो. सच में बड़ी मीठी आवाज है. खैर ये बताइए एक अच्छे गायक और अच्छे राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अभी आपने बांग्ला की बात की थी तो 'क्या आप अच्छे बंगाली हैं'? देखिए महान मराठा, महान बंगाली ये सब अपने ज़ज़्बात को पहुँचाने का एक तरीक़ा है लेकिन मैं यदि सच कहूँ तो मैं एक साफ़-सुथरा हिंदुस्तानी हूँ. मेरी शिकायत है कि गुरुदेव को जो ज़गह पूरी दुनिया में मिलनी चाहिए, उसे बंगाली-बंगाली करके हमने जबर्दस्ती बंगाल के पिंजरे में रख दिया है. मैंने शुरू से देखा कि जो बंगाल में पैदा होते हैं वे देश के लिए पहले सोचते हैं उसके बाद बंगाल के लिए सोचते हैं. यह शिकायत एक बंगाली का बंगाली होने के ख़िलाफ़ है. मैं इसलिए बंगाली होने के नाते खुश हूँ क्योंकि बंगाली होने के नाते ही मुझे एक अच्छा हिंदुस्तानी होने का मौक़ा मिला. और अब सौरव गांगुली भी बीच में थोड़े से इसलिए 'पिटे' क्योंकि वह एक बंगाली थे. उनके साथ भी ऐसा हुआ कि जो उनके पक्ष में बोल रहा है वह बंगाली का समर्थक है और जो उनके विरुद्ध बोल रहा है वह एक बंगाली के विरोध में है. सौरव के पक्ष में बंगाल में जो आवाज़ उठी, वह इसलिए कि एक दफ़ा यदि वे पीछ चले गए तो इसका यह मतलब नहीं कि उनका मंजिल पर पहुँचने का इरादा नहीं है उनको फिर से 'ट्राइ' तो करो. भारत के लिए वो शान बढ़ाएगा बंगाल के लिए नहीं. देखिए शान तो बढ़ा रहा है. मज़ा आ रहा है सौरव की वापसी पर? देखिए मैं तो कहता हूँ कि सचिन, सौरव और राहुल तीनों मेरे लिए भारतीय क्रिकेट के शुकतारा हैं, ध्रुवतारा हैं, चंद्रमा हैं. किसी को छोड़के कोई क्रिकेट को उजाला नहीं कर सकता है. इस सबसे अधिक जिनको मैं सबसे ज़्यादा महत्व देता हूँ जिनके लिए मैं कहूँगा कि उम्र में वो मुझसे कम हैं लेकिन मैं समझता हूँ कि उनसे अच्छा इंसान होना मुश्किल है जिनको कोई अहंकार नहीं है जिन्होंने उतार-चढ़ाव देखा लेकिन कभी घमंडी नहीं बने वह तो सचिन तेंदुलकर हैं. मैं समझता हूँ कि सचिन तेंदुलकर को सामने रखते हुए सभी क्रिकेट सितारों को आगे बढ़ना चाहिए. आपने एक और बड़ी दिलचस्प बात कही थी अभी बंगालियों के संदर्भ में कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को शायद उतनी जगह नहीं मिली हालाँकि नोबेल पुरस्कार जैसा सम्मान उनको मिला और एक से एक महान बंगाली हुए. लेकिन ये भी लगता है नॉन बैंगॉलीज को कि बैंगॉलीज बड़े पैरोकिअल होते हैं बड़े अपने अंदर ही देखते हैं. क्योंकि उनमें ज्यादा पढ़ने-लिखने का शौक होता है तो उस बात का थोड़ा घमंड भी करते हैं कि हम बड़े पढ़े-लिखे हैं और दूसरे लोग थोड़े कम पढ़े-लिखे हैं हमसे या थोड़े कम बौद्धिक हैं हमसे. सही है क्या ये सोच ? नहीं देखिए, मिसाल के तौर पर मैं बताऊंगा कि ये बंगालियों में नहीं है. बंगाली लोगों के साथ गैर-बंगाली लोगों का रिश्ता इतना बड़ा होता है कि एक दफ़ा जो गैर-बंगाली कोलकाता आ गया वह कभी दूसरी ज़गह जाना नहीं चाहता है. चाहे गुजराती हो, चाहे मराठी हो. वो कहते हैं कि बाहर में जब रहते थे तो मालूम पड़ता था कि ये लोग 'पैरोकिअल' हैं लेकिन जब नज़दीक में आए तो दिखता है कि ये लोग समुंद्र हैं. इसलिए मैं तो इस शिकायत को नहीं मानूंगा. बंगाली लोग जितना दूसरों की संस्कृति को अपनाने प्रयास करते हैं उतना कोई नहीं करते. मैं आपको यही कहूंगा कि 'इंटेलेक्चुअल' के बारे में आपने सही कहा. पंडित जवाहर लाल नेहरू से जब पूछा गया कि नेशनल लाइब्रेरी कहाँ बनेगा तो उन्होंने कहा कि नेशनल लाइब्रेरी की जगह तो कोलकात में ही होनी चाहिए. क्यों? क्योंकि वे लोग पढ़ाई में बहुत अच्छे हैं. इससे लोग समझते हैं कि इन लोगों को बहुत अहंकार है, ऐसा नहीं है. बल्कि देखिए सी.वी. रमण साहब जिनको नोबेल मिला वे भी कोलकाता के कॉलेज में ही पढ़ते थे. वहाँ की स्टडीज़ से आगे बढ़े. तो इसलिए ऐसा नहीं है कि पैरोकिअल दृष्टिकोण से बोलना चाहिए. लेकिन इतना मैं आपको कह सकता हूँ कि बंगाल के जो लोग शिखर पर पहुँचे उनलोगों के शिखर पर पहुँचने का एक ही रास्ता था कि मैं असल में भारतीय हूँ और भारत के लिए बोल रहा हूँ. चाहे कोई भी मुद्दा आप ले लीजिए. राजा राममोहन राय से शुरू कीजिए और गुरुदेव टैगोर पर समाप्त कीजिए; बीच में सुभाषचंद्र बोस को याद कीजिए. उन्होंने नारा जय बंग्ला नहीं दिया, जय हिन्द दिया. आखिरी एक बात और बंगाल की करेंगे कि बंगाल की जो अभिनेत्रियाँ हैं एक से एक सभी बॉलीवुड पर छायी हुई हैं. चाहे वो रानी मुखर्जी हों, काजोल हों, सुष्मिता सेन हों या थोड़ी पुरानी बात करें तो सुचित्रा सेन हों क्या 'ब्यूटी' थीं तो बंगाली ब्यूटी की क्या स्पैशियलिटी होती है क्यों इतनी ख़ूबसूरत होती हैं? देखिए, बंगाल की प्रतिभाएं बंगाल में ही सीमित नहीं रहना चाहते हैं. वे असली हिंदुस्तानी बनना चाहते हैं. यही कारण है कि टक्कर लेने के लिए भी ये होता है. कभी-कभी टक्कर से गिर भी जाते हैं वो अलग बात है लेकिन टक्कर लेने की हिम्मत उनमें है. वो पहुँच जाते हैं. कुछ महीने पहले हमारे बीच से विदा हुए ऋषिकेश मुखर्जी साहब. बहुत बड़ा काम करके गए. बॉलीवुड जिन्हें हम कभी भुला नहीं सकता वो भी बंगाल के थे, बिमल रॉय साहब. म्यूजिक डाइरेक्शन में सचिन देव बर्मन. तो ऐसे काफ़ी लोग थे. इसका कारण यही हो सकता है कि जो लोग उस समय बंगाल में फ़िल्मों में और म्यूजिक में काम कर रहे थे, जैसे कि हेमंत दा थे, मन्ना डे अभी तक हैं, इन लोगों का मानना था कि जबतक मुंबई नहीं पहुँचू तबतक मेरा कैनवास बढ़िया से 'एक्सपोज़' नहीं होगा और यह बात सही भी थी. बंगाली फ़िल्मों के सीमित दर्शक होते हैं, जब बॉम्बे पहुँचते हैं तो उनका कैनवास बहुत बड़ा हो जाता है. और सबको ये मौका मिलना चाहिए कि उनका कैनवास बड़ा हो. यही एक वजह होगी और क्या. तो अभी आपने जितने नाम लिए ऋषिकेश मुखर्जी, बिमल रॉय इनकी आपने कौन-सी फ़िल्म देखी? बिमल रॉय की तो कई फ़िल्में मैंने देखी लेकिन उनकी फ़िल्मों में जब सुनील दत्त, दिलीप कुमार या नूतन शामिल होते थे तो लगता था कि 'सोशल स्टोरी' में जान आ जाती थी. ऋषिकेश मुखर्जी की भी काफ़ी पुरानी फ़िल्में याद आती हैं. एक और बंगाली निर्देशक का नाम मैं लूंगा जिन्होंने उत्तम कुमार को लेकर हिंदी और बंगाली फ़िल्मों में काम किया वो हैं शक्ति सामंत. उनकी 'अमानुष' एक सशक्त फ़िल्म थी लेकिन अब वह काम नहीं करते हैं. ' सुजाता' मुझे बहुत अच्छी फ़िल्म लगी और शायद उसी फ़िल्म में एसडी बर्मन का संगीत भी पंच हुआ था. मेरे ख़याल से गीतों में बंगाल के हेमंत मुखर्जी और मन्ना डे का जो सफ़र रहा, वह बहुत ही यादगार रहा. और इन 'एक्ट्रेसेज' में से आपकी पसंदीदा कौन हैं- रानी, काजोल, सुष्मिता एक से एक प्रिटी वूमन... देखिए आई एंड बी मिनिस्टर कहेंगे कि इनकी एक्टिंग मुझे ज़्यादा पसंद है तो बाकी लोग तो... आई एंड बी मिनिस्टिर की बात नहीं है व्यक्तगत तौर पर प्रियरंजन दासमुंशी की बात है. नहीं सभी अच्छी अभिनेत्रियाँ हैं लेकिन यादों के हिसाब से मुझे मुंबई की फ़िल्मों में वहीदा रहमान मुझे सबसे अच्छी लगती हैं. वहीदा रहमान की कौन-सी फ़िल्म आपको पसंद है? एक नहीं हज़ारों. जाहिर है हज़ारों फ़िल्में उन्होंने नहीं की लेकिन उनका अभिनय और गंभीर संवाद को आसानी से एक्सप्रेस करना बेमिसाल है. हाल-फिलहाल की फ़िल्मों के बारे में कहा जाए तो काजोल के अभिनय की प्रशंसा करूंगा. 'फ़ना' में काजोल का अभिनय मुझे बहुत पसंद आया. यदि मैं जज होता तो मैं उन्हें पहला अवार्ड दे देता. आप गए तो थे लेकिन आपको जज नहीं बनाया उन्होंने. नहीं तो आप काजोल को अवार्ड दे देते. फ़िल्म में उनका 'एक्सप्रेशन' अदभूत था. एक आतंकवादी के साथ समय बिताना और दूसरी तरफ देश का ध्यान रखना. दोनों के बीच में उनका जुनून, विश्वास और देशप्रेम का मिश्रित भाव. मैं सोचता हूँ वह अदभूत था. अच्छा अब आपकी असली हिरोइन की तरफ लौटते हैं, जिनको आपने अपना सबसे अच्छा दोस्त बताया. आपकी पत्नी. वो भी तो बंगाली फ़िल्मों में एक्ट्रेस थीं, क्या नाम है उनका ? फ़िल्म में नहीं थी. वो थियेटर में थीं. उनका नाम दीपा है. उन्हें बंगाल की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री समेत कई पुरस्कार मिले. मेरी शादी तो उनसे बहुत देर से हुई. देर से शादी का कारण? इसका कारण था कि जब हमलोग छात्र जीवन में संघर्ष कर रहे थे तब हमने फ़ैसला किया था जितने हमारे साथी मारे जा रहे हैं जब तक उनकी बहनों की शादी नहीं करा लेंगे तब तक हम शादी नहीं करेंगे. उस समय नक्सलवाद-मार्क्सवाद काफ़ी ताकतवर था. देखते-देखते सबने शपथ तोड़ दिया लेकिन मैं मजबूर था क्योंकि मैं नेता था. मेरी माँ बहुत दुखी थीं कि मैंने शादी नहीं किया. अंतिम में वर्ष1994 में तब माँ जिंदा नहीं थीं तब दीपाजी 'फायर ऑफ द बर्ड जोन ऑफ आर्क' के बंगाली वर्जन 'आगिनेर पाखी' में काम कर रही थीं. मुझे उनका अभिनय इतना पसंद आया कि मैंने उसको दस बार देखा. उन्हें उस साल बंगाल में स्टेज की सर्वश्रेष्ठ अभिनेक्षी का अवार्ड मिला. उसी से बातचीत में रिश्ता शुरू हुआ और हो गया. मतलब कि 1994 तक तो शादी नहीं की प्रियो दा ने और की तो दस बार पहले एक थियेटर में अभिनय देखा. तो क्या हर बार आपको लगा कि यही लड़की है जिससे मुझे शादी करनी है. मुझे तो ऐसा ही लगा. तो क्या दस बार दीपाजी को देखने जाते थे आप? नहीं, अभिनय देखने गया. इतना जबर्दस्त अभिनय था कि टिकट नहीं मिलता था. कभी-कभी तो मिलता था, कभी-कभी दोस्तों से लेता था. अभिनय बहुत अच्छा लगा और मैं सोचता था कि सारा कुछ अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखकर हो रहा है तो इनकी सोच बहुत गहरी होगी. तो फिर मैंने अध्ययन किया और बातचीत भी की. उनका अभिनय देखने से पहले आप कभी मिले नहीं थे उनसे? नहीं, उससे पहले मुलाक़ात नहीं हुई थी. तो कितने बार अभिनय देखने के बाद हुई मुलाकात. तीसरी बार, चौथी बार, पाँचवीं बार? कब हुई पहली मुलाकात? जहाँ तक मुझे याद है, तीसरी बार या चौथी बार की बात है. तो आपने किसको कहा? नहीं, मैंने सीधा उनसे कहा कि हम फिर मिलेंगे. तो बुक फेयर में एक दिन मिला और मिलने के बाद विस्तार से बात की तो हो गया. तो क्या आपने पहले से सोच रखा था कि वो आएंगी बुक फेयर में तो मैं भी पहुँच जाऊंगा या..? नहीं-नहीं, अचानक मुलाक़ात हो गई. मैं भी जा रहा था दुकान से किताब लेकर वो भी जा रही थीं. तो उन्होंने मुझको बुलाया कि आप बुक फेयर में? तो मैंने भी उनसे कहा किताब लेने के लिए. मैंने पूछा आप किसलिए तो उन्होंने कहा कि देखने आए कि ड्रामा की कोई अच्छी किताब आई कि नहीं. बस हो गया. तो फिर आपने प्रपोज कब और कैसे किया ? जैसे हर कोई करता है. लेकिन थोडी़ शर्म तो आई होगी. नहीं, शर्म की कोई बात नहीं. तो कैसे बोले आप, कहाँ बोले? कॉफी हाऊस लेकर गए, रेस्त्राँ लेकेर गए, ड्राइव पर लेकर गए? नहीं मैंने ख़ुद ही उनकी माँ के पास जाकर उनसे बात की. बस हो गया.वो कला-संस्कृत से जुड़ी थीं और मैं राजनीति से लेकिन बाद में वो भी राजनीति में आ गईं. अभी विधायक बन गईं. भाषण भी अच्छा देती हैं, कभी-कभी डर लगता है कि मेरे से भी आगे निकल जाएंगी. उन दिनों कोई गाना गाते थे आप दीपाजी के बारे में सोचकर या सुनना पसंद करते थे? नहीं-नहीं, लेकिन दीपा अच्छी गायिका हैं. वो तो टैगोर के बहुत अच्छे गाने गाती हैं. उनका कोई पसंदीदा गीत. अपना पसंदीदा गीत तो मुझे बताती नहीं लेकिन वो पंडित जसराज जी की एकदम भक्त हैं. जसराज जी का कार्यक्रम जहाँ कहीं भी हो वो पहुँचने की कोशिश करती हैं. अच्छा ये बताइए खाने में किस तरह का शौक है आपको ? यदि आपको कहा जाए कि भई आज शाम आप पसंद का ऑर्डर कर सकते हैं तो आप क्या करेंगे ? मेरे पसंद का खाना वही हैं, जो आम आदमी का खाना है.ग़रीबों का और जेल में जो रहते हैं उनका भी खाना है. मेरा सबसे पसंद का खाना खिचड़ी है. खिचड़ी? दही के साथ या चटनी के साथ? किसी चीज के भी साथ. कभी आपको कोई कहे कि आप खिचड़ी से भी ज़्यादा कुछ फरमाइश कर सकते हैं तो क्या करेंगे? मछली अच्छा, चावल और मछली... बंगाली खाना. मुझे लगता है कि यह मैक्सिकन भी है. अच्छा यदि आपको ये मौका दिया जाए कि आज आपकी बिल्कुल छुट्टी है तो आप फिर कैसे समय बिताएंगे ? मैं गाना ही सुनता हूँ. इसके बाद किताब पढ़ता हूँ. मुझे बहुत शौक है पर्यावरण और रक्षा की किताबें पढ़ने का. युद्ध की कहानियाँ पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है. यदि मुझसे पूछा जाए कि मैं टेलीविज़न पर सबसे ज़्यादा क्या देखना चाहूँगा तो मैं कहूँगा इंटरनेशनल सॉकर मैच. इंटरनेशनल सॉकर मैच? वो आप थे क्या जब ज़िदान ने सिर देकर मारा था? मैं आठ वर्ष की उम्र से ही फुटबॉल के पीछे इतना दीवाना था कि कितनी ही बार पिताजी की डाँट सुननी पड़ती थी. फुटबॉल तो मेरा जुनून है. मुझे याद है कि एक बार कोलकाता में इंदिराजी की कोई मीटिंग होनी थी और उसी दिन मोहन बागान और ईस्ट बंगाल का मैच था तो मैंने ख़ुद इंदिरा जी को बताया कि अगर बैठक की तारीख़ बदले दें तो अच्छा होगा क्योंकि उस दिन खेल है. उनको ये नहीं बताया कि मैं जाना चाहता हूँ खेल देखने. बस ये कहा कि काफ़ी लोग उधर चले जाएंगे तो क्या होगा बैठक का. उस समय तो इंदिरा जी मुस्कुरा कर रह गईं पर दो दिन बाद आर.के. धवन ने फोन किया कि मैडम ने आपको बुलाया है. मैं पहुँचा तो उन्होंने कहा ठीक है मैं तारीख़ बदल रही हूँ. फुटबॉल का मैं जबर्दस्त प्रशंसक हूँ और वर्ल्ड कप के समय तो दुनिया भूल जाता हूँ. हर मैच देखने के लिए पहुँच जाता हूँ. भारतीय फुटबॉल के बारे में मुझे इतना दुख है कि हम इसका स्तर नहीं सुधार पाए. दुनिया कहाँ पहुँच गई प्रोफेशनल फुटबॉल के ज़रिए और हमारा फुटबॉल एमेच्योर है. इसमें पैसा भी हो, तकनीक भी हो, इसलिए मैंने प्रतिज्ञा ली है कि तीन साल के अंदर देश के फुटबॉल को पेशेवर बना दूँगा. जी-जान लगा के, जहाँ से भी हो साधन जुटा के इस काम को करूंगा. मेरे इसी दृढ़ निश्चय को देखते हुए फीफा के अध्यक्ष इसी साल के मार्च महीने में भारत आ रहे हैं. पूरा भारत भ्रमण करेंगे. फुटबॉल मेरा जुनून है. टीवी के स्क्रीन में यदि यह आ जाए कि आज प्रिमियर लीग है या यूरोपियन कप है तो मैं उस दिन फ़िल्म नहीं देखता हूँ. फुटबॉल मैच ही देखता हूँ. प्रीमियर लीग में आपकी पसंदीदा टीम कौन-सी है ? देखिए, मैं फुटबॉल संघ का अध्यक्ष हूँ इसलिए कहना मुश्किल है कि कौन-सी टीम पसंदीदा है है. बहुत बड़ा झंझट हो जाएगा. लेकिन दुनिया के फुटबॉल के हिसाब से ब्राजील की टीम हमेशा मेरी पसंदीदा रही है. ब्राजील में फुटबॉल धर्म की तरह है. ब्राजील वैसे भी खूबसूरत जगह है. यदि आपको घूमने का मौका दिया जाए तो कहां घूमने जाना चाहेंगे? कौन-सा मुल्क या कौन-सी जगह? मुझे तो सबसे अधिक पसंद है भारत में घूमना. जो पूरा भारत घूम ले उसका तो जन्म ही सार्थक हो जाए. आधा भारत अभी तक किसी ने नहीं देखा. भारत में आपकी पसंदीदा जगह कौन-सी है? हिमालय अच्छा ! हिमालय ? कहाँ तक गए हैं? मैंने हिमाचल से जहाँ हिमालयन रेंज शुरू होता है उसमें आधा से ज़्यादा दौरा किया है. कश्मीर घाटी तक जो आ गया है उसमें थोड़ा दौरा किया. दार्जिलिंग की भी खाक छानी है. वहाँ के गाँव-गाँव का दौरा किया है. उत्तरांचल में थोड़ा बहुत केदारनाथ, बद्रीनाथ के चारों तरफ. न जाने क्यों मुझे पहाड़ी इलाके में जाने से बहुत प्रसन्नता होती है. चिंतन के लिए. लोगों के लिए सोचने के लिए. अपने में क्या कमियाँ हैं, क्या खामियाँ हैं उसका अनुभव करने के लिए. मुझे लगता है कि हिमालय की विशालता इतनी है कि उसके सामने सब कुछ छोटा है. आपने कहा कि आपको किताबें पढ़ने का शौक है तो हिमालय से प्रेरणा लेकर कर कुछ लिखते भी हैं? कोई दो-चार लाइन कविता या कुछ? काफ़ी कविताएं मैंने यात्रा के दौरान लिखी है. सभी बेंगाली कविताएँ हैं. कोई दो-चार लाइन सुनाइए जो आपको पसंद है. कुछ दिन पहले मैंने लिखा था सद्दाम हुसैन के मौत के दिन और कोलकाता में 'इंटरनेशनल पॉयट्री कॉन्फ्रेंश' के दौरान उसे पढ़ के भी सुनाया. उसकी दो पंक्तियाँ सुनाता हूँ जो बंगाली में है. उसका अनुवाद इस प्रकार है- बचपन से ही मेरी आदत थी कि ट्रेन यदि पाँच बजे आनी हो तो मैं चार बजे ही पहुँच जाऊँ, हवाई जहाज को यदि दो बजे आना हो तो मैं एक बजे पहुँच जाऊँ. मेरी ये जल्दी इसलिए थी कि कोई छूट न जाए मुझे मालूम था कि सुबह के चार बजे मुझे फाँसी का फंदा पहनाया जाएगा लेकिन मैं तीन बजे से इंतजार कर रहा था अगर समय पर न पहुँचू तो शायद मौत न हो पाए. अफसोस की बात यह है कि सुबह उठकर पंछी का आवाज सुनना मेरी आदत बन गई थी लेकिन एक ही अफसोस है कि मेरी मौत का जो समय निर्धारित किया गया उस समय कोई पंछी आवाज नहीं दे सकती है और मेरे कोई नजदीकी रिश्तेदार भी नहीं हैं, जिनको मैं अलविदा कह सकूँ. लेकिन बचपन से ही एक बात का पक्का था कि समय यदि चार बजे हो तो एक घंटा पहले पहुँचो इसलिए समय का इंतजार न करते हुए मैं पहले ही पहुँच गया. आप तो बिल्कुल छुपे रुस्तम निकले. हमें तो मालूम ही नहीं था कि आप इतने संवेदनशील भी है. राजनीतिज्ञ होना एक बात है, होशियार होना एक बात है लेकिन इतना संवेदनशील हृदय भी रखते हैं. इसमें दीपाजी का भी हाथ है या आप शुरू से ही ऐसे ही थे. कविता के साथ मेरा रिश्ता शुरू से ही था. मैं और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव दोनों ही साहित्य के विद्यार्थी थे. विश्वविद्यालय में एक ही साथ पढ़ते थे. वो भी लिखते थे अपने ढंग से, मैं भी लिखता था अपने ढंग से. मेरी चार किताबें भी प्रकाशित हुईं. अभी मैं अपनी ही किताबों से चुनिंदा कविताओं को अंग्रेज़ी और हिंदी में अनुवाद करने की योजना बना रहा हूँ. बुद्धदेव भी अच्छे लेखक हैं? बुद्ध भी अच्छा लिखते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, काँग्रेस-मार्क्सिस्ट? चिंतन और कला के मामले में राजनीति की दीवार नहीं होती. राजनीति तो अपने आदर्श के साथ जुड़े हुए हैं. हमें देखना है कि हम उस आदर्श का पालन कर रहे हैं या नहीं. मैं केंद्रीय मंत्री हूँ लेकिन जब मैं कविता लिखता हूँ तब तो मैं मंत्री नहीं हूँ कवि हूँ, तब तो मेरी जो असली भावना है मुझे उसको विकसित करना चाहिए. शायद यही कविता यदि मैं बुश के डिनर में कहूँ तो बुश नाराज़ होकर चले जाएँ. उसके लिए कुछ अलग लिख देंगे आप. तब आप अपनी राजनीतिक टोपी भी तो पहन लेंगे? अच्छा ये बताइए रेडियो सुनते हैं आप, एफ़एम वगैरह कुछ? हाँ, रेडियो तो काफ़ी सुनते हैं. हमारा रैनबो चैनल जो है प्रसार भारती का उसको भी सुनता हूँ कोलकाता में. और रेडियो मिर्ची भी सुनता हूँ. प्राइवेट एफ़एम हमारे प्रसार भारती के एफ़एम से बड़ी तेजी से अच्छा काम कर रहे हैं. प्राइवेट एफ़एम अच्छा काम कर रहे हैं? बहुत अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए मैंने प्रसार भारती को निर्देश भी दिया कि इनके साथ मुक़ाबला करने के लिए जो-जो कमियाँ हैं उसको ठी करें. मदद मैं करूँगा लेकिन इस एफ़एम को भी बहुत जोरदार होना चाहिए. अच्छा ये बताइए शादी तो आपने 1994 में की. थोड़ी देर से. सिद्धांतों वाले आदमी थे. एक स्टैंड लिया. लेकिन सबसे पहले दिल किसको दिया था? नहीं-नहीं, मैं पहले ही इसपर बात कर चुका हूँ. नहीं-नहीं सबसे पहले कॉलेज में, स्कूल में, जवानी में एकदम 'फर्स्ट क्रश'? कॉलेज-स्कूल में कौन लड़का किस लड़की की नज़र में हीरो है और कौन लड़की किस लड़के की नज़र में हीरोइन है इस पर तो लाखों पन्ने की किताबें लिखी जा सकती है. स्कूल-कॉलेज में में यह सब होता रहता है लेकिन छुपाने की कोई बात नहीं है. मैं एक सीनियर एनसीसी कैडेट था और एक दिन एक लड़की ने मुझे एक चिट्ठी लिखी लेकिन उनके परिवार में कोई दुर्घटना हो गई और वे लोग चले गए. बाद में एक दुर्घटना में उसकी भी मौत हो गई इसलिए कोई बात ही नहीं हो पाई. आपको अच्छी लगी थीं वो. शक्ल ध्यान है उनकी? मैंने ये सोचा कि मुझे ही क्यों लिखा पत्र. क्लास खत्म होने के बाद मिला था मुझे पत्र. मैंने अगले दिन कॉलेज में जाकर पता करने की कोशिश की लेकिन वो नहीं थी. बाद में मेरे दोस्तों ने बताया कि उनके घर से कोई दुखद ख़बर आई और वो चली गईं. बाद में पता चला कि एक सड़क दुर्घटना में उसकी भी मौत हो गई. आपकी ज़िदगी का सबसे दुखद दिन? सबसे दुखद दिन नहीं मैं रात कहूँगा. मैं अपना काम कर रहा था. अगली सुबह काउंटिंग थी तो एजेंट के साथ मीटिंग कर रहा था और उसी समय ख़बर आई कि राजीव जी नहीं रहे. अंतिम मीटिंग वो मेरे क्षेत्र में ही करके गए थे. पहले तो मैंने इस ख़बर पर विश्वास नहीं किया. चारों तरफ फोन किया. मैं क्या बताऊँ तीन घंटे तक कमरे से बाहर नहीं निकल सका. मेरे घर के लोगों ने पानी देकर मुझे ठीक किया. मुझे मालूम है कि दो बजे मुझे सिद्धार्थ बाबू के घर में ले जाया गया वहाँ विस्तार से जब पता चला तो मैंने माना कि हाँ सच में ऐसा हुआ. अगले दो दिनों तक जब तक मैं अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली आया तब तक पहली बार तीन-चार बार ऐसा हुआ आस-पास क्या हो रहा है मुझे पता ही नहीं चलता था. मुझे याद है कि उस दिन जब मैं दिल्ली आया था तो ओबराय होटल में मेरे दोस्त सुब्रतो मुखर्जी ने मेरे रहने का इंतजाम कर दिया था. तो ओबराय के सर्विस ब्वाय ने कई बार धक्का देकर चाबी से मेरा कमरा खोला क्योंकि कई बार मैंने अपना सेंस खोया. वो तीन-चार दिन बड़े निराश करने वाले थे. दुनिया कुछ भी कहे मैंने इतना 'इनोसेंट' इतना इक्कीसवीं सदी के सोचवाला नहीं देखा था. जीप में जाते-जाते मजाक में कहते थे इंग्लैंड ने ऐसा किया न, हमलोगों को भी करना है प्रयोग. दुनिया में सबकुछ हो रहा है हमलोग कुछ नहीं कर रहे हैं. इसलिए उस तीन-चार दिन में जितना दुख हुआ उतना माता-पिता के देहांत पर भी नहीं हुआ था. मेरे बचपन में ही मेरे पिताजी चल बसे. लेकिन आखिरी समय में उनको देखने का मौका नहीं मिला. क्या राहुल अपने पिता की तरह हैं? राहुल तो उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं. बचपन से तो नहीं देखा उनको. लेकिन सांसद होने के तौर पर उनसे बातचीत होती है. तीन चीज उनमें बहुत अच्छी हैं राजीव जी की तरह अदब, वरिष्ठों के साथ बात करना और उनको आदर देना. दूसरी बात वे ज़ाहिर नहीं करते कि मैं सब कुछ जानता हूँ. उल्टा वे सोचते हैं कि आपकी सोच में क्या है उसका विश्लेषण करें और तीसरा बहुत खोज करते हैं कि फलाँ चीज में कौन क्या बोला, कौन क्या लिखा. ये तीन आदत तो राजीव जी ती तरह है. बाकी उनके सामने चुनौतियाँ हैं. दिल में बहुत सदमा भी है. उनका सीखने का और आगे बढ़ने का तरीका और ज़्यादा अपने को ज़ाहिर न करने का संयम तीनों बातें राजीव जी जैसी ही हैं. राहुल विज्ञान और तकनीक के बारे में बहुत आगे की सोचते हैं. मैं पिछले दो साल से देख रहा हूँ कि गांवों तक विकास क्यों नहीं पहुँचा इस बारे में वे बहुत अध्ययन और चिंतन करते रहते हैं. मैंने आपके जीवन का सबसे दुखद दिन पूछा. सबसे सुखद दिन कौन सा रहा है? मार्च, 1971 जब मैं पहली बार लोकसभा में चुनकर आया. क्योंकि मुझे टिकट जान-बूझ कर दिया गया कि यह जीतेगा नहीं. कोलकाता दक्षिण से 26 साल की उम्र में मैं जीता था. हमको बुलाकर टिकट दिया गया. तुमलोगों को लड़ने के लिए कोई यहाँ है नहीं. तुम और सुब्रतो एक विधायकी के लिए लड़ो एक संसद के लिए. आज़ादी के बाद से यहाँ से कभी पार्टी जीती नहीं. तो हमने सोचा लड़ने के लिए बोला है तो लड़ेंगे. छात्र नेता हैं. काउंटिंग एजेंट भी नहीं बनाया. मतगणना के पहले दिन होली थी. मैंने और सुब्रतो ने दिन भर होली खेली. गंगा में नहाने गए. नहाते-नहाते किसी ने कहा कि कल सुबह मतगणना है तुम्हारा कागज कहाँ है. कागज लेकर पार्टी ऑफिस पहुँचा तो पता चला कि साइन करना है. एजेंट बैठे हैं. पूछा एजेंट क्या होता है? तो पता चला कि एजेंट गिनती करता है. मैंने कहा कि गिनती तो चुनाव आयोग करता है तो पता चला कि नहीं पार्टी के लोग करते हैं. फिर पहुँचे तो जनता के बीच में बाहर खड़े रहे. कमिश्नर ने बुलाया कि आप उम्मीदवार हैं अंदर आकर बैठिए. बैठे-बैठे पता चला कि 29 हजार वोट से जीत गए हैं. अचानक क्या हो गया मैं समझ ही नहीं पाया. बाद में मैंने यह भी नहीं देखा कि क्या-कैसे जीता. यह मेरे लिए बहुत खुशी का दिन था. दुख भी हुआ और आनंद भी. दुख इसलिए कि बंगाल के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी सीपीएम के गणेश घोष, जिनको कि सभी चरण छूकर प्रणाम करते थे उनको हराया. मेरी माताजी भी उनको प्रणाम करती थीं इसलिए दुख भी हुआ. खुश इसलिए हुआ है कि विद्यार्थी आंदोलन के नेता थे. दुनिया भर के छात्रों ने मेरे लिए काम किया. कंधे से कंधा मिलाकर मुझे उठाकर मुझे पैदल चलने नहीं दिया. दो-तीन मील तक मुझे उठाकर कोलकाता घुमाया. जिस तरह एक बड़ा फुटबॉल मैच जीतने के बाद होता है. ऐसा था. भारत का आपके लिए क्या मायने हैं? भारत एक महान सभ्यता है. भारत का असली परिचय इसका संविधान इसका क़ानून नहीं, बल्कि इसकी सभ्यता है. और अंत में एक कोई बहुत जबर्दस्त अफसोस या ऐसा सपना जो पूरा होना है या होना चाहिए. अफसोस तो बहुत सी बातों का है लेकिन सबसे बड़ा ये है कि ग़रीबों के सामने नौजवानों की उम्र में समाजवाद की क्रांति का हमने जो नारा दिया था उसे वैश्वीकरण की वजह से हमलोग नें बहुत पीछे छोड़ दिया. उस तरफ वापसी का कोई रास्ता अब दिखता नहीं है? चिराग तो जलता है लेकिन अंधेरा का कितना मुक़ाबला करेगा. मुझे बहुत अफसोस है. मैं इमानदारी से मानता हूँ कि समाजवादी क्रांतिकारी क़दम के साथ जुड़ते हुए जो हमलोग आए थे वो लोग अपना योगदान सही से कर नहीं पाए. चारों तरफ से हमलोग घिर गए. इस उदारीकरण की दुनिया में ? उदारीकरण हो लेकिन ग़रीब पैर पर खड़ा हो. ग़रीब जब तक पैर पर खड़ा नहीं होगा इस उदारीकरण में लोगों का हिस्सा क्या होगा ! |
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