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एक मुलाक़ात: राम जेठमलानी के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने वकील और राजनीतिज्ञ राम जेठमलानी से जो अपनी तेज़ ज़बान और हाज़िर जवाबी के लिए भी ख़ासे मशहूर हैं. हम लोग इतने सालों से सुनते आ रहे हैं कि बहुत ही रंगीले, ऊर्जावान, ज़बर्दस्त बोलने वाले और तीव्र बुद्धि का मिलन है राम जेठमलानी.ये सच है या कोई कल्पना गढ़ी गई है? अगर मैं कहूँगा कि सच है तो ये ग़लत होगा क्योंकि अपनी तारीफ़ करना हमारी तहज़ीब के ख़िलाफ़ है. अगर कहूँगा कि झूठ है तो वे सब लोग ग़लत साबित होंगे जो ऐसा कहते हैं. इसलिए आप ख़ुद ही तय कीजिए कि ये सच है या झूठ. हाज़िर जवाबी वाली बात तो सही साबित हुई और कुछ हद तक बुद्धि वाली भी. ये बताइए कि एक अच्छे वकील के लिए हाज़िर जवाबी अधिक ज़रूरी है या विषय का ज्ञान और बुद्धि? हाज़िर जवाबी की कोई ज़रूरत नहीं. कभी-कभी तो इसका इस्तेमाल करके बात बन सकती है लेकिन कोई वकील चाहे कि वो सिर्फ़ हाज़िर जवाबी से अदालत में मुक़दमे जीत लेगा तो ये ग़लत होगा. उसे ज़ल्द ही अपनी वकालत छोड़नी पड़ जाएगी. न्यायाधीश के सामने अपनी बात एक तरीक़े से रखनी होती है. वो भगवान का रूप होता है. सिर्फ़ चालाकी भरी बातों से आप मुकदमे नहीं जीत सकते. आप को प्यार और इज़्ज़त के साथ न्यायाधीश को अपनी बात समझानी होती है. गाली-गलौज़ जैसी बातें फ़िल्मों में ही होती है. हाज़िर जवाबी से मेरा मतलब था तर्क करने और अपनी बात रखने की क्षमता. तर्क करना और अपनी बात रखने की क्षमता एलएलबी की कक्षाओं में बैठने से नहीं आती. ये तो तजुर्बे से आती है. अपनों से बड़ों के अनुभव से सीखकर आती है. कुछ लोगों के पास अपनी योग्यता और क्षमता भी होती हैं लेकिन इसके लिए अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि ये ईश्वर के आशीर्वाद से आती हैं. आपने 17 साल की उम्र में एलएलबी कर ली थी. ये भी एक बड़ी बात है. हाँ, मुझे स्कूल में चार प्रोन्नति मिली थी. पहले मुझे तीसरी कक्षा से छठी कक्षा में प्रोन्नति मिली. फ़िर मैंने 13 साल की उम्र में दसवीं पास कर ली और चार साल बाद ही मुझे वक़ालत की डिग्री मिल गई. ('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) इसका मतलब आप तो विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हुए. आप इसे विलक्षण प्रतिभा कहें लेकिन मैं तो इसे भी एक संयोग ही समझता हूँ. मेरा मानना है कि मेहनत के बिना कुछ भी नहीं मिलता और एक वकील के लिए तो ये बात और भी सही है. मैंने अपनी जवानी में 20-20 घंटे काम किया है. लोग मुझे असरदार व्यक्तित्व वाला बताते हैं तो ये गुण भी मेहनत से ही आता है. आपकी जवानी तो अभी कायम है इसका मतलब 20-20 घंटे काम भी जारी है. जो लोग ऐसा कहते हैं शायद वो मेरे दोस्त हैं. जेठमलानी साहब हम लोगों को आप अपनी पसंद का एक गाना बताएँ. मैंने अपनी परिवार की सात पीढ़ियाँ देखी हैं. उसमें कोई भी गाना गाने वाला नहीं है. मैं तो बाथरूम तक में गाना नहीं गाता लेकिन मुझे संगीत और संगीतकार अच्छे लगते हैं. मैं कोई संगीत की गहरी समझ नहीं रखता मेरे कान को जो अच्छा लगता है वही मेरे लिए अच्छा संगीत है. मैं आजकल के गाने नहीं सुनता बल्कि पुराने जमाने का संगीत सुनता हूँ. मुझे केसी डे, लता मंगेशकर, केएल सहगल, पंकज उधास और मुकेश के गाने पसंद हैं. मुकेश मेरा बहुत गहरा दोस्त था. मैं अपने पास एक आइपॉड रखता हूँ जिसमें मैं अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करके रखता हूँ और जो गाना सुनने का मन करता है उसे सुनता हूँ. एक बार मैं डिट्रॉयट गया था तो उस समय मुकेश भी वहाँ था. उसका कोई शो था. सबने 100-200 डॉलर में टिकट ली थी उनका गाना सुनने के लिए. मैं भी वहाँ बैठा था. शो शुरू ही होने वाला था कि पता चला मुकेश का देहांत हो गया. डिट्रॉयट में उसके शो में शिरक़त करने की जगह मैंने उसके अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया. एक मामले में मुकेश पकड़े गए थे तो मैंने ही छुड़ाया था. मुकेश के गाने तो आज भी मशहूर हैं. राज कपूर की कोई याद, कोई मुलाक़ात. उनका कोई ऐसा गाना जो आपको पसंद हो? मुझे आज भी उसका चेहरा याद है. उसकी बातें और आदतें याद हैं. उस समय मैं पहली कक्षा में पढ़ता था. मुझे अपने प्रोफेसरों की बातें भी याद हैं. पहली बार जब मैं बार गया था उस समय अपने सीनियर वकील से आशीर्वाद लेते समय कहीं बातें तक याद हैं लेकिन मुझे पिछले साल मिले आदमी की बातें याद नहीं. आप के दिमाग की एक बनावट होती है. उसमें अंतिम परतों में इकट्ठा हो रही बातें ज़ल्दी भूल जाती हैं और पुरानी बातें याद रहती हैं. कोर्ट की अवमानना के मामले में फँसे बिना मैं आपसे ये पूछना चाहता हूँ कि क्या ऐसा है जब आप अदालत में किसी मामले में ज़िरह करने जाते हैं तो न्यायाधीश आप से डरते हैं, आपको बहुत ध्यान से सुनते हैं. ऐसा कहना ग़लत होगा कि न्यायाधीश मुझसे डरते हैं. वो मुझसे डरते नहीं बल्कि इज़्ज़त ज़रूर करते हैं. मैं कोई ग़लत बात नहीं रखता हूँ. अगर मेरे मुक़दमे में कोई कमी है तो मैं पहले कमज़ोर पक्ष सामने रखता हूँ फिर मजबूत पक्ष रखता हूँ. वकालत में आपको अदालत के सामने पूरे सम्मान के साथ रहना चाहिए. अदालत को आप में विश्वास होना चाहिए. मैं अपनी तारीफ़ नहीं करना चाहता लेकिन मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ. मैं उन दिनों मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत कर रहा था. गजेंद्र गड़कर साहब न्यायाधीश हुआ करते थे. वो मुझे किसी भी मामले पर सुनवाई शुरू करने से पहले ही पूछते थे कि मिस्टर जेठमलानी क्या आपको लगता है कि इसमें सुनवाई होनी चाहिए. मैं हाँ कहता था तो वो मामला सुनवाई के लिए स्वीकार कर लेते थे. एक बार उन्होंने जाँच करने के लिए एक ऐसे मामला उठाया जो सुनवाई के लायक नहीं था. उन्होंने मुझसे जानना चाहा कि मेरा क्या कहना था. मैंने कहा कि सर ये मामला वैसे तो सुनवाई के लायक नहीं था लेकिन अब आप इसकी सुनवाई करें. उन्होंने पूछा क्यों. मैंने कहा सर, आपने एक ऐसा सवाल पूछा जो आपने पहले कभी भी नहीं पूछा था. अपने क़ानूनी ज्ञान के दम पर मैंने ये मामला आपके सामने रखा था. आपके पास एक मौक़ा था जो आपने खो दिया. वहाँ आपने अपनी हाज़िर जवाबी के दम पर अपने को सही साबित किया न कि मेहनत के दम पर. हाँ मैं सही साबित हुआ. मुझे अपने मुवक्किल से उसके मामले में ज़िरह करने का पैसा मिलता है न कि न्यायाधीश को अपनी राय देने का. अभी आप बता रहे थे कि आपको वो समय भी याद है जब आप सीनियर वकील के पास गए थे. उन्होंने आप को क्या सलाह दी थी? उन्होंने कहा था कि अपना मुकदमा हार भी जाओ लेकिन अपना मुवक्किल कभी भी मत खोना. मुवक्किल को ये लगना चाहिए कि आपने मेहनत से काम किया. दूसरी बात जो उन्होंने कही थी कि अदालत का जो तुम पर विश्वास है उसे कभी भी मत गँवाना. वो बहुत क़ीमती है वकील के लिए. तीसरी और सबसे बड़ी बात उन्होंने कही थी कि हो सकता है मुकदमा भी हार जाओ, मुवक्किल भी चला जाए और कोर्ट भी नाराज़ हो जाए लेकिन अपने अंतःकरण और विवेक को कभी कमज़ोर मत पड़ने देना. इस बात के लगभग 50-60 सालों बाद क्या आप ये बात ईमानदारी से कह सकते हैं कि आपने इन बातों का हमेशा पालन किया? मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह सकता हूँ कि मैंने इन बातों का पालन करने की कोशिश की लेकिन मैं ये दावा नहीं कर सकता कि मैंने इनका उलंघन नहीं किया. हालांकि मैं कोशिश करता हूँ. और यही वजह है कि आज मैं एक सफल वकील हूँ और न्यायाधीश मेरे पर विश्वास करते हैं कि ये मुझे ग़लत नहीं बोलेगा. देखिए अगर आप इन बातों का अक्षरशः पालन करते तो वकील और आदमी नहीं बल्कि देवता होते. और ये आपकी ईमानदारी ही है कि आप मान रहे हैं कि आपने अधिकतर इन बातों पर टिके रहने की कोशिश की है. हाँ, बिल्कुल. एक वकील को पहले एक बेहतरीन इंसान होना चाहिए. बेहतरीन आदमी कभी झूठ नहीं बोलता. मुवक्किल झूठ बोलता है. क्योंकि वो आपके पास एक ऐसा मामला लेकर आता है जिसमें वो पहले ही झूठ बोल चुका होता है. लेकिन आपकी कोशिश होनी चाहिए कि आपके मुवक्किल को अदालत में और झूठ न बोलना पड़े. लेकिन वक़ीलों को तो पता होता है कि उनका मुवक्किल झूठ बोल रहा है, वो अपराधी है. अब तर्क-कुतर्क करके किसी भी तरह उसे छुड़वाना है. नहीं उसके भी तरीक़े हैं. कुछ लक्ष्मण रेखा है. आप उसके बाहर नहीं जा सकते. आप जानते हैं कि आपके मुवक्किल ने हत्या की है वो अपराधी है लेकिन आपको तो उसे बचाना ही पड़ेगा. फ़र्ज़ करो कि मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने अपराध किया है. मैं अदालत से कहूँगा कि साहब मेरे मुवक्किल को सज़ा देने के लिए ये सबूत काफ़ी नहीं हैं. मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि मेरा मुवक्किल कहता है कि उसने ऐसा नहीं किया इसलिए वो निर्दोष है. ये हमारे पेशे की पाबंदी है. अगर मैं ऐसा करूँगा तो बार काउंसिल मेरे ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है. मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने ऐसा किया है तो तो उसे बचाने के लिए मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि किसी दूसरे ने अपराध किया है. आप झूठ नहीं बोल सकते बल्कि न्यायाधीश के सामने ये सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं. इस पेशे की भी अपनी सीमा है. हम अदालत की बात कर रहे हैं, भगवान की बात कर रहे हैं, विवेक की बात कर रहे हैं. जब आपको बिल्कुल मालूम होता है कि ये आदमी ग़लत है और इसमें उसे फाँसी या उम्रकैद होना ही चाहिए तो कैसा लगता है उसको छुड़वाते हुए? हमारे समाज ने क़ानून बनाया है कि सज़ा देने से पहले सबूत होना चाहिए. सबूत ऐसा होना चाहिए कि वो किसी भी ईमानदार आदमी के दिलोदिमाग पर ये विश्वास पैदा करे कि ये शख़्स गुनाहगार है. अदालत से यह कहना सही है कि इन सबूतों के आधार पर इस आदमी को सज़ा नहीं दी जा सकती क्योंकि सबूत पर्याप्त नहीं हैं. हम उन्हीं क़ानूनों का पालन करते हैं जो हमारे समाज ने निर्दोष लोगों को बचाने के लिए बनाया है. उस क़ानून को कमज़ोर करना हमारा धर्म नहीं है. उसको मजबूत बनाना हमारा धर्म है और मजबूती इसी में है कि कभी-कभी सबूत उपलब्ध न होने पर अपराधी भी छूट जाए. ये भी आपके व्यक्तित्व का एक पहलू है कि आप बहुत रोमांटिक हैं. रोमांटिक होना कोई गुनाह नहीं है और अगर गुनाह भी है तो मैं इस गुनाह को स्वीकार करता हूँ. तो पहली कक्षा वाली वो लड़की जिसका चेहरा आप याद कर रहे थे उस तरह से हर कक्षा में कितनी लड़कियों को आपने दिल दिया? वो लड़की तो 80 साल की उम्र में गुजर गई लेकिन तब तक मेरी दोस्त थी. कहते हैं कि जेठमलानी जी कि महिला दोस्तों की सूची भी देश के बड़े रसूखदार लोगों से भरी पड़ी है. कुछ ऐसे भी रसूखदार लोग इसमें शामिल हैं जिन्हें और कोई नहीं जानता. फिर मुझे अपनी प्रशंसा करनी पड़ेगी और ये उन लड़कियों के साथ बहुत अन्याय होगा अगर मैं उनका नाम बोलूँगा. लेकिन ये सच है कि मेरे अपनी बेटी से कम उम्र की लड़कियों से गहरे ताल्लुक़ात हैं जो बहुत प्यारी और ख़ूबसूरत हैं. लड़कियों से दोस्ती होने का मतलब सिर्फ़ सेक्स नहीं है. उसके बाद भी बहुत कुछ है. अब हम लोग उसके आगे आ गए हैं. जेठमलानी साहब आपके इस आकर्षक व्यक्तित्व का राज़ क्या है? मैं अच्छा वकील हूँ. ईमानदार राजनीतिज्ञ हूँ. सच बोलता हूँ. मैं बहुत ही मीठा बोलता हूँ. जब भी मैं गुस्से में बोलता हूँ तो वो मेरे धंधे से ज़ुड़ा होता है और सिर्फ़ अभिनय होता है. मुझे बहुत दुख होता है जब मैं किसी पर गुस्सा करता हूँ. मैं अपने दुश्मनों को नहीं पहचानता हूँ. मेरा दुश्मन अगर सामने आ जाए तो मैं दुश्मनी भूलकर उसकी मदद करता हूँ. ये कहना बिल्कुल ग़लत है कि सेक्स लोगों के संबंध को निर्धारित करता है. अगर मैं आपकी बातों का छोटा करके बोलूँ तो सेक्स ज़रूरी नहीं है बल्कि मीठी ज़बान, बड़ा दिल, अपने दुश्मनों को माफ़ करने की ताक़त और बुद्धिमान होना अधिक महत्वपूर्ण है. मैं आपको एक राज़ की बात बताता हूँ. एक लड़की थी उसने ब्रिटिश प्रधानमंत्री ग्लैडस्टोन के साथ खाना खाया. खाने के बाद उसको लगा कि वो दुनिया के सबसे बुद्धिमान आदमी से मिली है. कुछ दिनों बाद ही वही लड़की एक दूसरे ब्रिटिश प्रधानमंत्री डिजरैली के साथ खाने पर थी. खाने के बाद उस लड़की ने महसूस किया कि वो दुनिया की सबसे बुद्धिमान महिला है. डिजरैली ने उसे ऐसा महसूस कराया. औरतों को ऐसा महसूस करवा ले जाना एक बड़ी सफलता है. आप भी औरतों को ये महसूस करा ले जाते हैं कि ख़ूबसूरती के साथ दिमाग ज़रूरी है. हाँ, सिर्फ़ सुंदर होना ही सब कुछ नहीं है. आपका राजनीतिक जीवन बहुत उतार-चढा़व वाला रहा है. कभी तो आप राजनीति के सबसे रसूखदार लोगों के एकदम ख़ासमख़ास होते हैं तो कभी बिल्कुल अलग-थलग. ऐसा कैसे होता है? मेरी लिए सच और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी ही सबसे ऊपर रही. मैंने कोई पार्टी इसलिए नहीं पकड़ी या छोड़ी कि मुझे कोई पद या लाभ मिलेगा. मैं जनता पार्टी से जुड़ा क्योंकि मैं आपातकाल के ख़िलाफ़ था. वो भारत के इतिहास में बड़ी ख़तरनाक घटना थी. मैं याद नहीं करना चाहता कि कैसे हमारे न्यायाधीश पागल हो गए थे. वो अदालतों के न्यायाधीश ही थे जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को नीचा दिखाया. हम आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़े. हम भी कांग्रेसी थे. जो भी आज़ादी की लड़ाई के समय थे वो सब कांग्रेसी थे. उस समय कांग्रेसी ही थी. मैंने पार्टी छोड़ी नहीं थी. कांग्रेस ने अपने उसूलों को छोड़ दिया था. कांग्रेस वो पुरानी वाली पार्टी नहीं रही थी. जनता पार्टी आई तो मैं उससे जुड़ा. जनता पार्टी ने दो सालों में अपना मुँह काला कर लिया. बँटवारा हो गया बीजेपी बनी, मैं बीजेपी के साथ गया. मेरा मानना था कि इन लोगों ने पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि दूसरे लोगों ने बहाना बनाकर पार्टी तोड़ी है. उसके बाद मैं इंदिरा गांधी के तथाकथित हत्यारों के मामले में वकील बना. जिनको मौत की सज़ा होती है उनको न्यायालय सरकारी वक़ील देता है. पूछता है उनसे. उन लोगों ने कहा हमें राम जेठमलानी चाहिए. उच्च न्यायालय ने मुझसे आग्रह किया. इस आग्रह को हम आदेश समझते हैं. मैं मुफ़्त में उनकी तरफ से वकील बना और बीजेपी ने मुझे निकाल दिया. मुझे बहुत दुख हुआ. बीजेपी तो इंदिरा गांधी की मुख़ालफ़त करती थी. मैं इन तथाकथित हत्यारों का वकील क्यों न बनता. ऐसा न करना मेरे पेशे के ख़िलाफ़ था. उसके बाद से आज तक मैं किसी पार्टी से नहीं जुड़ा. मैं आज स्वतंत्र सदस्य हूँ. बीजेपी ने मुझे मंत्री बनाया क्योंकि मैंने उनके लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ी थी नहीं तो आज सब जेल में होते. आपकी आज भी कभी-कभी आलोचना होती है. आप कहते हैं कि आप जेसिका लाल वाला मुकदमा लड़ेंगे. क्यों नहीं लड़ूँगा. प्रेस वाले कौन होते हैं ये तय करने वाले कि कौन दोषी है कौन नहीं. अगर बेइंसाफ़ी हो तो बेशक़ इंसाफ़ की पुकार प्रेस करे. चाहे मैं इन सब बातों से सहमत करूँ या न करूँ लेकिन ये बात तो है कि आप में धारा के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत है. धारा के साथ बहना चरित्र की कमज़ोरी है. एक मर्द की तरह धारा के ख़िलाफ़ खड़ा होना चाहिए. क्या ये जो धारा के ख़िलाफ़ चलने की क्षमता है विपरीत सेक्स को आकर्षित करती है? कुछ लोगों के लिए ये बात सही है. आपातकाल के ख़िलाफ़ मेरे संघर्ष की वजह से बहुत सी महिलाएँ मेरी दोस्त और प्रशंसक बनी थीं. आपने बताया कि आप सिर्फ़ पुरानी फ़िल्मों और गानों में रुचि लेते हैं. ये जो नए सुंदर और प्रतिभाशाली कलाकार हैं क्या आप इन सबसे महरूम रह गए? आजकल तो अख़बारों में कई-कई पन्ने भरे रहते हैं उनके चित्रों से. तो क्या आप इनमें से किसी को नहीं जानते या मिले? मैं उनको जानते हूँ जो राज्यसभा और लोकसभा में सदस्य हैं. ऐसा नहीं है कि मैं किसी से मिलता नहीं हूँ. सामाजिक रूप से कभी-कभी मिलता हूँ. मेरे पास अब इतना समय नहीं है कि मैं जाकर इनकी फ़िल्में देखूँ. जो नए स्टार हैं जैसे शाहरुख ख़ान और गोविंदा. इनकी फ़िल्में नहीं देखी? अंतिम फ़िल्म जो मैंने देखी थी वो ऐश्वर्या राय की 'देवदास' थी. वो लड़की बहुत ही ख़ूबसूरत है. आप बहुत ही फिट दिख रहे हैं. सुबह उठकर सबसे पहले क्या करते हैं? सुबह उठकर आधे घंटे व्यायाम करता हूँ. जिसमें 15 मिनट का योग शामिल है. आठ बजे मैं तैयार हो जाता हूँ. आठ से नौ बजे तक बैडमिंटन खेलता हूँ. बैडमिंटन के बिना मेरा दिन पूरा नहीं होता. मेरे घर में मैंने बैडमिंटन कोर्ट बनाया हुआ है. मैं अपनी से एक-तिहाई कम उम्र के लोगों के साथ बैडमिंटन खेलता हूँ. नौ-साढ़े नौ बजे तक कोर्ट जाने को तैयार हो जाता हूँ. संसद में तो कुछ काम होता नहीं है. मैं दो-तीन संसदीय समितियों का सदस्य हूँ तो इनका काम मुझे बहुत व्यस्त रखता है. और शाम को थोड़ा बहुत पीने-पिलाने का कार्यक्रम हो जाता है. सभी काम ज़रूरी है. आदमी को सब कुछ थोड़ा-थोड़ा करना चाहिए. यानी जो भी करें संयम से. हाँ, संयम एक बड़ा गुण है लेकिन हमेशा नहीं. ऐसा कब नहीं करना चाहिए. अगर किसी की बीवी अपने पति के प्रति वफ़ादार नहीं है तो उसे कैसा लगेगा. अगर कोई न्यायाधीश कम ईमानदार है तो आप को वो कैसे अच्छा लग सकता है. मेरा मानना है कि प्यार और संवेदना में कोई संयम नहीं होना चाहिए. मैं धर्म का विद्यार्थी हूँ. ये मेरी ज़िदगी का एक और पहलू है. मैंने अपने लिए एक धर्म बनाया है. एक लाइन में मेरा धर्म है-जितने इंसानों को ख़ुश कर सको, ख़ुश करो. ख़ुशियाँ फैलाओ. इससे बड़ा कोई धर्म नहीं है. बाक़ी धर्म से कोई फ़ायदा नहीं है. अगर देखा जाए तो हमें धर्म से नुकसान ही है. धर्म ने बहुत खून–खराबा पैदा किया है और कुल मिलाकर ये बेकार है. | इससे जुड़ी ख़बरें एक मुलाक़ात: लालकृष्ण आडवाणी से26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात- शीला दीक्षित के साथ03 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मुलाक़ात- ख़ुर्शीद महमूद कसूरी के साथ14 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: गायत्री देवी के साथ04 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: अमजद अली ख़ान के साथ17 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: ग़ुलाम अली के साथ04 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: अमर सिंह के साथ07 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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