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एक मुलाक़ात: अमर सिंह के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह से. विवाद और अमर सिंह का जैसे चोली-दामन का साथ है, ऐसा क्यों? गिरते हैं सह सवार ही मैदान-ए-जंग में. घोड़े की जो सवारी करता है वही गिरता है, जो लड़ता है वही हारता है. जो व्यक्ति विवादित नहीं है, इसका मतलब है कि वह निष्क्रिय है. क्रियाशील व्यक्ति या तो विवाद से निपटेगा या उसको निपटाएगा. चाहे संसद की बात हो, चाहे सोनिया गांधी की पार्टी में जाने की बात हो या उनके ख़िलाफ़ जाने की बात हो, मुंबई में पेज थ्री की बात हो या उत्तर प्रदेश में तपती धूप में जनसभा को संबोधित करने की बात हो, हर ज़गह अमर सिंह का एक अलग अंदाज़ देखने को मिलता है. क्या यह जानबूझकर करते हैं या प्राकृतिक है? नहीं, जानबूझकर नहीं करता. मैं न तो स्वार्थ में लिप्त हूँ, न ढोंग में. जैसे मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि मेरा दल मुझे राज्यसभा में पहुँचाएगा या नहीं. मैं अकेला सदस्य हूँ जो दोनों बार अपने राज्यसभा के नामांकन के विरुद्ध सक्रिय रहा. हालांकि इसमें मेरा अपना अलग तरह का स्वार्थ था. मैं जवाबदेही से ज़रा भयभीत रहता हूँ. सार्वजनिक जीवन में अगर परिभाषित हो गया तो आपकी बिरादरी पूछेगी कि अमर सिंह ऐसे क्यों हैं, वैसे क्यों हैं. मैं जवाबदेही के ऊहापोह से बचूँ इसलिए संसद सदस्य नहीं बनना चाहता था. जवाबदेही से भयभीत रहता हूँ... आपकी इस पंक्ति को पकड़ना चाहता हूँ. क्योंकि आप से पहले शायद भारतीय राजनीति में ऐसा कोई शख़्स नहीं आया जो इतना खुलकर राजनीति से अलग लोगों से जुड़कर रहा यानी कि जिसका पैसे और ग्लैमर की दुनिया में भी बराबर दखल रहा और जिसने इसे खुलकर स्वीकार भी किया. मैंने कहा न कि स्वार्थ नहीं है और ढोंग भी नहीं है. अगर मुझे कोई महिला अच्छी दिखती है तो मैं कहता हूँ कि आप बहुत सुंदर हैं और अगर किसी धनाढ्य से मिलकर आत्मा प्रसन्न होती है तो मैं कहता हूँ कि आप मेरे मित्र हैं. अमूमन राजनीति में लोग इन चीज़ों से बचते हैं. लोग चुनाव के ख़र्च के लिए उद्यमी से पैसा तो ले लेते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से इसे आत्मसात करने से डरते हैं. ( 'एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं. ) मैं अपनी तुलना किसी इतने बड़े आदमी से तो नहीं करना चाहूँगा लेकिन राजनीति में ऐसा करने वाला मैं अकेला हूँ यह कहना ग़लत होगा. मोहनदास करमचंद गाँधी ने खुलेआम बिड़ला और बजाज के घर पर रहना कुबूल किया. लेकिन वे रहते फ़क़ीर की तरह ही थे. देखिए, फ़क़ीर की तरह रहते थे पर रहते कहाँ थे. बिड़ला हाउस में भी रहते थे और किंग्सवे कैंप में भी रहते थे. आपने ख़ुद ही कहा है कि मैं मुंबई की पेज थ्री पार्टियों में भी रहता हूँ और तपती धूप में जनसभा को भी संबोधित करता हूँ. वैसे आपको ये मानना पड़ेगा कि मैं अपने आप को बदल रहा हूँ. मैं अब पार्टियों में नहीं जाता और न ही पार्टियाँ देता हूँ. क्योंकि मैंने देख लिया दिल्ली दिलवालों की नहीं है. यहाँ लोग आप ही का खाएंगे, आप ही का पीएंगे और बाहर निकलकर आपको ही गाली देंगे. यानी जिस पत्तल में खाते हैं उसी में छेद करते हैं. हाल के दिनों में किसी ने आपको चोट पहुँचाई है यानी किसी ने आपके दिल को दुखाया है क्या? मैं राजनीति का पुट दिए बिना बताता हूँ. मैंने जीवन के हर रंग देखे हैं. जब आपकी पतंग उड़ रही होती है तो सब साथ होते हैं और जब आपकी पतंग कट जाती है तो आपका साया भी साथ छोड़ कर जाने को ललायित रहता है. अगर आपको जीवन में एक या दो लोग भी ऐसे मिल जाएँ जो बुरे और अच्छे दोनों ही दौर में आपका साथ दें तो आप बहुत ही भाग्यशाली हैं. मेरा दिल बार-बार दुखा है. मैंने अपने कई तथाकथित चाहने वालों से बड़ी अपेक्षाएँ कीं और जब मेरा ख़राब समय आया तो बदले में मुझे उपेक्षा मिली. ऐसे कौन लोग हैं? अब उनका नाम लेना तो ठीक नहीं है. इसमें राजनेता भी हैं, संसद के मित्र भी हैं और उद्यमी भी हैं. सफलता आपको इस्तेमाल का साधन बना देती है और विफलता उपहास का. अमर जी आप बहुत ज्ञान की बातें कर रहे हैं. मेरे मन में एक सवाल जो उठ रहा है कि जीरो से हीरो तक का सफ़र अमर सिंह ने कैसे पूरा किया ? मतलब कुछ नहीं से इतना सब कुछ, कम से कम संबंधों की दुनिया में. मैं नहीं समझता कि मेरी कोई उपलब्धि रही है. विनम्रता मेरा आभूषण नहीं है और न ही रणनीति. मुझे लगता है मैं तो अभी भी अपनी ज़िंदगी जी रहा हूँ. हीरो तो वो होता है जो अपने क्षेत्र में चरम पर हो. इस लिहाज से लालकृष्ण आडवाणी हीरो हैं, शरद पवार जी हीरो है, अमिताभ जी हीरो हैं, सचिन तेंदुलकर और टीएन शेषन हीरो हैं. लेकिन लोग तो कहते हैं कि अमर सिंह के संपर्क का कोई जवाब नहीं है. लोग ग़लत कहते हैं. ये सच हैं कि मेरे नज़दीक के दो-तीन मित्र बड़े प्रभावशाली हैं. लेकिन वे सत्ता वाले लोग नहीं हैं. जैसे हमारे दोस्त अनिल अंबानी हैं, अगर ये लोग सत्ता वाले हैं तो मैं भी सत्तावान हूँ. ये सब लोग तो वक़्त के मारे लोग हैं और मैं भी उन्हीं में से एक हूँ. ये अलग बात है कि इन लोगों का अपना एक प्रखर व्यक्तित्व है. लोग अनिल अंबानी और अमिताभ बच्चन के संपर्क के चलते चर्चा करते हैं. अमिताभ बच्चन, जिन पर देश का हर दूसरा व्यक्ति जान छिड़कता है वो आप पर जान छिड़कते हैं. ऐसा क्या जादू है आप में? जादू मुझमें कुछ नहीं, उनमें है. उन्हें अपने आस-पास बटोरने के लिए बहुत बड़े-बड़े सफल लोग मिल जाएंगे लेकिन उन्होंने मुझ जैसे अदना आदमी को चुना, जिसकी पृष्ठभूमि भी बहुत ऊँचे वर्ग की नहीं है. इसलिए इस सवाल का जवाब तो आपको उन्हीं से मिलेगा. लोग तो आपको अमर सिंह बच्चन कहते हैं. अगर लोग व्यंग्य से भी ऐसा कहते हैं तो मुझे इस पर गर्व है. व्यंग्य से नहीं कहते. लोग तो आपको उनके परिवार का सदस्य मानते हैं. बिल्कुल हूँ. मैं उन्हें अपना बड़ा भाई मानता हूँ. वे कभी भी अपने संबोधन में मुझे अमर सिंह नहीं कहते बल्कि छोटे भाई अमर सिंह कहते हैं और मैं भी उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना अग्रज मानता हूँ. वे मेरे परिवार के मुखिया हैं. अमिताभ बच्चन की कौन-सी फ़िल्म और अदा आपको पसंद है? मुझे अमिताभ जी की वो फ़िल्म पसंद है जो चली ही नहीं. ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी ‘हालात’. उस फ़िल्म में उन्होंने मोहब्बत के लिए धनी पिता से बगावत की और ताँगा चलाया. ये फ़िल्म मुझे जब भी मौक़ मिलता है, आज भी देखता हूँ. अमिताभ बच्चन की किस फ़िल्म का गाना आपको बहुत पसंद आया? ‘शोले’ बहुत लोकप्रिय हुई लेकिन मुझे उसमें केवल महबूबा-महबूबा वाला गाना ही पसंद आया. ‘ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे...’ तो मुझे कभी भी गाना लगा ही नहीं, वो गद्य लगता है. अभिमान फ़िल्म के सारे गाने मुझे बहुत पसंद है. यह एक ऐसी फ़िल्म थी जो भावनात्मक रूप से और गीत-संगीत की दृष्टि से लाजवाब थी. और आपकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन हैं? मेरा ये दुर्भाग्य है कि जिनको मैं अपना पसंदीदा मानता हूँ और जिनको देख-देख कर जवान हुआ वे वृद्धा अवस्था में पहुँच चुकी हैं. सबसे पहला नाम इसमें साधना का है. उनको मैं बहुत चाहता था और उनकी सारी फ़िल्में बार-बार देखीं.
एक बार शर्मिला टैगोर जी से मुलाक़ात हुई और किसी मामूली काम के लिए उन्होंने मुझे ‘थैंक यू’ कहा तो मैंने कहा शर्मिला जी शर्मिंदा न करिए आपके बड़े एहसान हैं मुझ पर. उन्होंने पूछा ऐसा क्या किया है मैंने. मैंने कहा कि जब हम बचपन से जवानी की ओर जा रहे थे तो आपकी ‘अराधना’ बार-बार देखी और आपके गालों के गड्ढों में डूब-डूब कर जवान हुए. क्या सच में आपने ऐसा कहा था? बिल्कुल कहा था और ये मैं किसी बुरे मन से नहीं कह रहा हूँ. वो इतनी सुंदर लगती ही थीं. बहुत से लोग कहते हैं कि वो बहुत अच्छी अभिनेत्री नहीं थी लेकिन मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. आप तो बहुत रोमांटिक हैं. रोमांटिक मन से भी नहीं हूँ और मिज़ाज से भी नहीं. क्योंकि रूमानियत की जो उम्र थी वो तो संघर्ष में चली गई. रोमांटिक न होने का अफसोस है. रूमानियत की भी क्या कोई उम्र होती है अमर सिंह जी. लोग तो कहते हैं कि ये दिमागी जज़्बा है. दिमागी जज़्बा तो है लेकिन दिमाग कभी खाली हो तब न उसमें रूमानियत आएगी. आपके बड़े अच्छे मित्र हैं सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय जी, उन्होंने मुझसे एक बार कहा था आदमी की उम्र वही होती है जो वो सोचता है. ये उनकी बात है और हर आदमी के सोचने का नज़रिया अलग-अलग होता है. जब आदमी भूखा हो तो उसे भोजन की जरूरत होती है और नंगा होता है तो कपड़े की. जब ये सब चीजे़ उपलब्ध होती हैं तभी रूमानियत का ख़याल आता है. मैं कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ता था और उस ज़माने में हमारे साथ लड़कियाँ नहीं पढ़ा करती थीं. मेरी कक्षा में मैं ही एक ऐसा व्यक्ति था जो बस या ट्रॉम्ब से पहुँचता था बाक़ी सब के पास अपनी-अपनी गाड़ियाँ थीं, कम से कम मोटरसाइकिल ते थीं ही. लॉरेटो या बैथुन कॉलेज की कोई न कोई लड़कियाँ उनकी बगलगीर होती थी या उनके पीछे बैठी होती थीं. मैं तो मुश्किल से कॉलेज आने के लिए भाड़े का जुगाड़ कर पाता था. उस जमाने में किसी ने मेरी ओर पलट कर नहीं देखा.मेरा तो पूरा जीवन आपाधापी और संघर्ष में बीत गया. कॉलेज के दिनों में किसी पर तो दिल आया होगा? नहीं बिल्कुल नहीं आया. हम लोग व्यावहारिक लोग थे और मालूम था कि इश्क और मुश्क हमारे बस की बात नहीं है. पहले जब आप बॉलीवुड की पार्टियों में जाते थे तो कई अभिनेत्रियों के साथ डांस करते थो तो कभी दिल में कोई गुदगुदी हुई. हमारे बड़े भाई अमिताभ बच्चन को जब बीबीसी ने 'स्टार ऑफ़ द मिलेनियम' का अवार्ड दिया तो मैंने और अनिल अंबानी ने मिलकर उनके सम्मान में एक पार्टी दी थी. उसमें अमिताभ जी के साथ काम कर चुकीं सारी अभिनेत्रियाँ को बुलाया गया था. इससे पहले मैं बता दूँ कि जब हम लोग कलकत्ता यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे तो बॉबी फ़िल्म का गाना ‘हम तुम एक कमरे में बंद हो...’ सुनने के लिए बार-बार हॉल में पहुँच जाते थे. कई बार तो डंडे भी खाने पड़े. पार्टी में डिम्पल कपाड़िया भी आई थीं और उनके साथ डांस करते समय मैं हँस रहा था तो वे पूछ बैठी आप हँस क्यों रहे हैं, क्या मैं ख़राब दिख रही हूँ. इस पर मैंने उन्हें जवाब दिया कि मेरी ज़िदगी में फिर से बॉबी आ गई. इतना सब कुछ पाने के बाद कोई ऐसा मौक़ा जिसे लेकर आपको शर्मिंदगी महसूस हुई हो? जब मेरा फ़ोन टेप किया गया तो मुझे लगा कि हमारी निजता का उल्लंघन किया गया. कभी-कभी आप अपने मित्रों से फ़ोन पर बात करते हैं तो बहुत सी ऐसी बातें करते हैं जो नहीं करनी चाहिए. उनका अगर ग़लत जगह पर इस्तेमाल हो तो बहुत शर्म आती है. अपने लिए नहीं, अपने उन दोस्तों के लिए. मैं और मेरे प्रेम के पात्र बहुत दिनों तक गॉसिप सर्किल में चर्चा में बने रहे. ऐसे मुझे अपने ऊपर बहुत शर्म आई और ग्लानि हुई कि मैं राजनीति में हूँ लेकिन मेरे दोस्त जो गैर-राजनीतिक है, उन्हें क्यों इसकी सज़ा मिली. आपको राजनीति और फ़िल्म के अलावा और किस चीज़ का शौक है? राजनीति तो शौक नहीं है और फ़िल्म जीवन का रस है मेरे लिए. अभी भी मैं ‘सुजाता’,‘बंदिनी’ और बीआर चोपड़ा साहब की ‘वक़्त’ मौक़ा मिलने पर देखता हूँ. शम्मी साहब की भी सारी फ़िल्में देखता हूँ. 15 साल पहले मैंने अमित जी से कहा था कि मुझे शम्मी जी से मिलवाएं तो वे मुझे उनके घर लेकर गए थे. आपकी अब तक की सबसे पसंदीदा फ़िल्म कौन सी है. ‘कागज़ के फूल’. यह फ़िल्म ज़िदगी के क़रीब और यथार्थ के बहुत नज़दीक है. गुरुदत्त आपको पसंद हैं? गुरुदत्त मुझे पसंद ही नहीं है, मैं उनसे अभिभूत हूँ. उनकी हर फ़िल्में लाजवाब थीं. अगर आपको कोई एक महिला को ‘डेट’ पर ले जाने का मौक़ा दिया जाए तो वो कौन होंगी? मैं तो बहुत सम्मान और आदर के साथ शर्मिला टैगोर जी को कहूँगा कि मेरे साथ चलिए. आपको सबसे पहले किस महिला से आसक्ति (क्रश) हुई थी? अभिनेत्री माला सिन्हा पर. कौन ज़्यादा प्रिय हैं- अनिल अंबानी या अमिताभ बच्चन? निश्चित रूप से अमिताभ बच्चन ज़्यादा प्रिय हैं. इसलिए ज्यादा प्रिय हैं कि वो हमसे बड़े हैं और बड़ा होने के नाते छोटे के प्रति जो ज़िम्मेदारी होती है उसे वो बखूबी निभाते हैं. मेरे जैसे आदमी को ढोने का काम अमित जी करते हैं इसलिए उन्हें ज़्यादा प्रेम करना स्वाभाविक है. जहाँ तक अनिल का सवाल है वो मुझसे छोटे हैं और मुझसे ज्यादा सहज हैं. जीवन की आपाधापी में हम लोग कई कारणों से भावानाओं के आदान-प्रदान कंजूसी वाले हो जाते हैं लेकिन यह कंजूसी मुझे अपने और अमितजी के बीच कभी दिखाई नहीं दी और लगता नहीं कि भविष्य में भी ऐसा होगा. अपनेआप को इतने मुक्त भाव से अभिव्यक्त करना आपने कहाँ से सीखा? मैंने बचपन से ही हिंदी साहित्य के बड़े-बड़े विद्वानों की कृतियों का अध्ययन किया.चाहे वह हरिवंश राय बच्चन जी की रचनावली हो या प्रेमचंदजी का साहित्य या फिर पंत जी कविताएं हों या महादेवी वर्मा की छायावादी अभिव्यक्ति. जब आप कॉलेज या स्कूल में पढ़ते थे तो छेड़खानी में भी दिलचस्पी रखते थे? बिल्कुल नहीं. हमारे बच्चे इस तरह की छेड़खानी या विलासिता का शगल कर सकते हैं. मैं 37-38 साल की उम्र तक हवाई जहाज़ को तो छोड़ दीजिए एसी फर्स्ट क्लास में भी नहीं चढ़ा था. मुलायम सिंह से जब राजनीति की बात नहीं करते हैं तो क्या बात करते हैं? फ़िल्मों की? फ़िल्मों से उनका कोई मतलब नहीं. खाने का उन्हें कोई विशेष शौक नहीं है इसलिए राजनीति पर ही बात करनी पड़ती है. वे सज्जन सहृदय व्यक्ति हैं और उनके ऊपर अगर किसी ने पैसे भर का भी एहसान किया हो तो उसे अपना ऋण मानते हैं. आपने उनमें कुछ गीत-संगीत की रूचि पैदा की? ये मेरे वश की बात नहीं हैं. हालांकि विरोधी ये आरोप लगाते हैं कि भैंस की पीठ पर बैठने वाले पिछड़ों के नेता को अमर सिंह ने हेलीकॉप्टर में पहुँचा दिया. मुलायम सिंह बहुत सीधे-सादे और समाजवादी आंदोलन से जुड़े व्यक्ति हैं. उन्हें धरती पुत्र कहा जाता है. मैं अकेले में कहता हूँ कि आप हमारे नेता है लेकिन बोरिंग इंसान हैं और आज सार्वजनिक रूप से कहता हूँ कि वे बहुत सूखे इंसान हैं. आपने शुरू में कहा था कि आप पेज थ्री पार्टियों से अब दूर रहते हैं तो कब लौंटेंगे दोबारा? कभी नहीं. ग़ुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा, हाफ़िज ख़ुदा तुम्हारा. |
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