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रविवार, 18 मार्च, 2007 को 06:28 GMT तक के समाचार
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एक मुलाक़ात: कपिल देव के साथ
कपिल देव
कपिल देव 1983 विश्व कप में जिंमबाब्वे के ख़िलाफ़ 175 रनों की यादगार पारी खेली थी
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की जिंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं मशहूर किक्रेटर कपिल देव से, जिन्होंने भारत को अपने नेतृत्व में एकमात्र क्रिकेट विश्व कप जिताया है.

पेश हैं भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव से हुई इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश.

सबसे पहले जब आप पहली सिरीज़ खेलने पाकिस्तान गए थे, आप 18-19 साल के रहे होंगे, कैसा लग रहा था आपको?

तब इतना होश नहीं था. ज़्यादा कुछ मालूम नहीं था. वैसे भी 18-19 साल का लड़का क्या सोच सकता है. बस देश के लिए खेलने की लगन थी और इसके अलावा मन में कुछ ख़ास नहीं था.

आप कुछ नर्वस थे. क्योंकि पाकिस्तान तो भारतीय क्रिकेटरों का कब्रिस्तान बन चुका था. मेरा मतलब आप पाकिस्तान के बड़े-बड़े क्रिकेटरों से घबरा तो नहीं रहे थे?

नहीं, ऐसी बात नहीं थी. हमारे हीरो पाकिस्तानी नहीं अपने ही क्रिकेटर थे. बहुत अच्छा लग रहा था कि अपने हीरो क्रिकेटरों के साथ खेल रहा हूँ और उनके साथ ड्रेसिंग रूम में हूँ.

और उस वक़्त आपके हीरो कौन थे?

यकीनन विश्वनाथ का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक था. हालाँकि उनके बारे में ज़्यादा कुछ देखा-सुना नहीं था, लेकिन उनका नाम बहुत अच्छा था. जब उनसे मिला तो वो इंसान भी बहुत अच्छे निकले.

फिर तीसरा टेस्ट हुआ. आप बल्ला लेकर निकले और लगातार दो गेंदों पर छक्के. पूरा देश आपका दीवाना हो गया और प्रशंसकों को शायद आपका पूरा नाम कपिल देव निखंज भी तभी पता लगा. यह जोश कहाँ से आया था?

ऐसा कुछ नहीं था. मैं समझता हूँ कि ये सीनियर खिलाड़ियों की हौसलाअफ़जाई का नतीजा था. वैसे ये बात 30 साल पुरानी है और मेरी याददाश्त इतनी अच्छी नहीं है. लेकिन जब भी कोई नया खिलाड़ी टीम में आता है तो सीनियर खिलाड़ी उसकी मदद करते हैं और उसकी हौसलाअफ़जाई करते हैं.

क्योंकि कपिल देव से पहले भारत के पहले ऐसा तेज़ गेंदबाज़ नहीं था, जिसका ख़ौफ़ विपक्षी टीम पर हो. तो उस दौर में जब हर कोई बेदी, वेंकटराघवन, चंद्रशेखर बनना चाहता था, आपने तेज़ गेंदबाज़ी की क्यों सोची?

मैं समझता हूँ कि जिंदगी में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो किसी योजना से नहीं होती. किस्मत साथ थी और लोग मेरी तेज़ गेंदबाज़ी की तारीफ करते थे. तो बस मेहनत कर इसमें सुधार किया.

तो क्या आपने बचपन में ही तय कर लिया था कि आप गेंदबाज़ ही बनेंगे?

नहीं ऐसा भी नहीं है. ये जोश था कि क्रिकेट खेलना है और हिंदुस्तान के लिए खेलना है. जब स्कूल में खेलते हैं तो जहाँ फिट होते हो, वहीं खेलने लग जाते हैं.

शायद मेरी कद-काठी अच्छी थी, तो सबने मुझे तेज़ गेंदबाज़ी के लिए कहा और इस तरह सफ़र शुरू हो गया. स्कूली दिनों में सीनियर खिलाड़ी कहते थे कि मैं प्रतिभावान हूँ और इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली.

और घर वालों का समर्थन था?

घर वालों का पूरा समर्थन नहीं था तो विरोध भी नहीं था. हाँ, वो ये ज़रूर कहते थे कि थोड़ा-बहुत पढ़ लेना ताकि अपना काम खुद कर सको.

बाद में जब कपिल देव ने अपने माता-पिता और करोड़ों देशवासियों के सपने पूरे किए तो क्या कभी उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ कपिल कि तुम ज़्यादा नहीं पढ़े?

कभी इस पर चर्चा तो नहीं हुई, लेकिन खुद को महसूस होता है कि कुछ और पढ़ाई की होती तो अच्छा होता. लेकिन पलटकर देखता हूँ कि देश के लिए खेले तो बहुत खुशी होती है. वैसे भी इंसान सब कुछ तो नहीं पा सकता.

अपने शुरुआती दिनों का कोई यादगार लम्हा. मसलन फॉलोऑन बचाने के लिए 24 रन चाहिए थे और आपने एक के बाद एक चार छक्के उड़ा दिए. लोग तो अब भी मानते हैं कि कुछ चीजें तो सिर्फ कपिल ही कर सकते थे?

ऐसा नहीं है, आज के क्रिकेटर बहुत प्रतिभाशाली और अच्छे हैं. अगर आप किसी खिलाड़ी का 15 साल का कैरियर देखें तो बहुत से यादगार लम्हे होंगे. चाहे वो किरमानी हो, रोजर बिन्नी हो, गावस्कर हों, वेंगसरकर हों, मदनलाल हों या फिर मोहिंदर.

सभी से कुछ न कुछ यादें जुड़ी होंगी. जैसे बलविंदर सिंह संधू की 1983 के विश्व कप की इनस्विंगर कोई नहीं भूला, जिस पर गॉर्डन ग्रीनिज आउट हुए थे. तो जब आप खेलते हैं तो यकीनन लोगों को आपकी अच्छी चीजें याद रहती हैं.

आप बहुत विनम्रता से बात कर रहे हैं. ईमानदारी से कहें तो आज की क्रिकेट में कौन ऐसा क्रिकेटर है जो चार छक्के उड़ाकर फॉलोऑन टालेगा?

ऐसा नहीं है. आज हमसे कई गुना अच्छे क्रिकेटर हैं. सचिन हैं, सौरभ हैं, सहवाग हैं, युवराज हैं, धोनी हैं. जो मौका आने पर चार-चार क्या छह-छह छक्के लगा सकते हैं. हाँ, थोड़ी हिम्मत ज़रूर चाहिए.

आपने हिम्मत की बात की तो आपको शेर दिल क्रिकेटर माना जाता था. माइकल होल्डिंग को उनके सिर के ऊपर से छक्का मारा तो अब्दुल क़ादिर की धुनाई कर दी. यहाँ तक कि जब आप संन्यास के नजदीक थे तो आपने एलन डोनाल्ड को भी धुन दिया था?

ऐसा नहीं है. आज के बल्लेबाज़ शोएब पर भी छक्का लगा देते हैं. दुनिया के सबसे बेहतरीन स्पिनर शेन वार्न के ख़िलाफ़ राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण ने कोलकाता में जो पराक्रम दिखाया था, वो तो लाजवाब था.
ऐसी बहुत चीजें आती रहेंगी और क्रिकेट की बेहतरी के लिए होती रहनी चाहिए.

तो क्या इस बेख़ौफ बल्लेबाज़ी का राज़ ये था कि आप मुख्यतः गेंदबाज़ थे?

यकीनन ये था. बहुत से क्रिकेटर मुझसे कहते भी थे कि अगर मैं अपनी बल्लेबाज़ी पर ध्यान दूँ तो बहुत से रन बना सकता हूँ. शायद वो सही कहते होंगे. लेकिन मैने बल्लेबाज़ी को हमेशा बोनस माना और जब बोनस अच्छा मिल रहा हो तो सबको खुशी होती है.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

लेकिन लोगों की उम्मीदें बढ़ती रहती हैं. आज हम सचिन से और ज़्यादा पाना चाहते हैं. लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर पाना तो मुश्किल है, लेकिन अपने बनाए लक्ष्यों को हासिल करना ही बड़ी बात है.

तो क्या आप जब बल्लेबाज़ी करने जाते थे तो अपने आपसे खुश रहते थे?

जब तक मैदान पर रहता था तो खुश नहीं होता था, लेकिन जब कुछ रन बनाकर आउट हो जाता था तो इससे ही संतुष्ट होना पड़ता था. मेरा मानना है कि जब तक खिलाड़ी क्रीज़ पर है तो उसे संतुष्ट नहीं होना चाहिए. 'और ज़्यादा' की इच्छा होनी चाहिए.

जब तक आप क्रीज़ पर रहते थे तो लगता था कि आप पूरे मजे से खेल रहे हैं. क्या वाकई ऐसा था?

देखिए एक बात साफ है. हर खिलाड़ी सचिन या गावस्कर नहीं हो सकता. हर किसी की प्रतिभा का स्तर अलग होता है. ये बात अलग है कि मेरे खेलने का स्टाइल लोगों को पसंद आता था.

जब आप खेलने के लिए आते थे, दर्शक सिक्स-सिक्स चिल्लाने लगते थे. तो क्या आपको दबाव महसूस होता था?

बहुत बार. अगर देखा जाए तो मुझे लापरवाही भरा शॉट खेलने के कारण ही टेस्ट टीम से निकाला गया था. टीम कुछ चाहती है और आपकी शैली कुछ और है.

क्रिकेट टीम गेम है, इसलिए आपको टीम के लिए खेलना पड़ता है. कभी-कभी ऐसा होता है कि हम लोगों या टीम की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाते.

आपने टेस्ट टीम से बाहर किए जाने का जिक्र किया. इसी तरह 1987 के विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में जब आप आउट हुए थे तो लोगों ने कहा था कि आपको ऐसा शॉट नहीं खेलना चाहिए था. तो क्या आपको लगता था लोगों की आप से ये उम्मीद बेमानी है?

नहीं, इसमें लोगों का दोष नहीं है. चूँकि लोगों को उम्मीद रहती थी कि कपिल ऐसा कर सकता है. जब हम उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरते तो उन्हें निराशा होती है और उंगलियाँ उठती हैं.

तो जब आप पर उंगलियाँ उठी और आपको उस मैच की हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया तो क्या आपको नहीं लगा कि आपके साथ नाइंसाफी हुई है?

उस समय तो गुस्सा आया था. हो सकता है कि मुझे बाहर करने की कुछ लोगों की योजना भी रही हो. लेकिन चूँकि मैंने गलत शॉट खेला था इसीलिए लोगों को बोलने का मौक़ा मिला.

तब शायद मैं ऐसा नहीं सोचता था. वैसे भी गुस्सा कर कुछ मिलने वाला नहीं है. सबसे अच्छा है कि आप अपनी गलती मान लें.

तो कहना चाहिए कि आप तब बहुत ज़्यादा नहीं सोचते थे और अगर ज़्यादा सोचते तो शायद इतना अच्छा नहीं खेलते?

नहीं, ऐसा नहीं कि सोचते नहीं थे. खेल की रणनीति बनाते थे. लेकिन खिलाड़ी का अपना स्टाइल होता है. उसी स्टाइल से आपकी पहचान बनती है.

श्रीकांत और गावस्कर का स्टाइल एकदम अलग था. तो मैं बहुत ज़्यादा सोचता था या नहीं था, ये मेरा स्टाइल था. लोगों को ये पसंद आया या उन्होंने उंगलियाँ उठाई, ये उनका हक़ है.

आपने स्टाइल की बात की. वीरेंद्र सहवाग की भी अपनी शैली है. हर बॉल को मारने की कोशिश. अब जब वो फ्लॉप होने लगे हैं तो लोग उनकी आलोचना करने लगे हैं. आपको लगता है कि उन्हें अपनी शैली बदलनी चाहिए?

सहवाग शुरू से ऐसा ही खेलते हैं. जब ऐसा खिलाड़ी फ़ार्म में नहीं होता तो वो हर दूसरी गेंद पर गलत शॉट खेलता नजर आता है. सहवाग लंबे अर्से से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे हैं. मेरा मानना है कि उन्हें शॉट चुनकर खेलने चाहिए.

मैं ये नहीं कहता कि उन्हें अपनी शैली बदलनी चाहिए. लेकिन साथ ही साथ उनकी बल्लेबाज़ी में ज़िम्मेदारी नजर आनी चाहिए.

सचिन तेंदुलकर की बात होती है. वह आक्रामक बल्लेबाज़ हुआ करते थे. अब खोल में घुसते चले जा रहे हैं. वरिष्ठ खिलाड़ी होने के नाते उन्हें आप क्या सलाह देना चाहते हैं?

मेरा मानना है कि उनके जैसा खिलाड़ी वक्त और हालात के अनुसार अपनी शैली बदल सकता हैं. हालाँकि हमें भी कभी-कभी ऐसा लगता है कि सचिन गेंदबाज़ों को हावी होने का मौक़ा दे रहे हैं. सचिन जैसे बल्लेबाज़ को कोई गेंदबाज़ दबाव में लाए, ये तो हमें भी अच्छा नहीं लगता.

बहरहाल, अपने खेल के बारे में तो फ़ैसला उन्हें ही करना है. वो खोल में क्यों घुसते चले जा रहे हैं, इसका जवाब तो वही दे सकते हैं. वैसे भी सचिन कहते हैं कि वह अपने खेल को दूसरों से बेहतर समझते हैं.

गावस्कर के साथ आपके खट्टे-मिट्ठे रिश्ते रहे हैं. आपके और उनके बीच तालमेल कैसा था?

टीम में 11 खिलाड़ी होते हैं और हर किसी का अपना अलग व्यक्तित्व होता है. गावस्कर बड़े समझदार क्रिकेटर थे और हैं. लेकिन मेरे और उनके स्टाइल में ज़मीन-आसमान का अंतर था. बेशक हमारी सोच अलग थी, लेकिन लक्ष्य सिर्फ एक था, मैच जीतना.

जिस दौर में गावस्कर खेले तो उनकी सोच ये थी कि हम मैच न हारें. क्योंकि उनकी जो टीम थी, उसके लिए ये बड़ी उपलब्धि थी. 70 के दशक में भारत की स्थिति आज के बांग्लादेश और ज़िम्बाब्वे जैसी टीमों सी थी.

लेकिन जब हमारा दौर आया तो ड्रॉ मैचों की संख्या कम होने लगी और अब तो खिलाड़ियों की सोच ही बदल गई है और वो जीत के लिए खेलते हैं. तो मेरी और गावस्कर की सोच में फ़र्क था. अगर लोग इसे मुद्दा बनाते हैं तो वो बना सकते हैं.

इसी संदर्भ में कहना चाहिए कि एक दौर में दो सुपरस्टार नहीं हो सकते थे, इसलिए अमिताभ आगे निकल गए और राजेश खन्ना पीछे छूट गए. गावस्कर भारतीय क्रिकेट के सुपरस्टार थे. आप आए और लोकप्रियता के लिहाज से उन्हें पीछे छोड़ दिया?

मैं आपसे सहमत नहीं हूँ. बात ये थी कि मेरा स्टाइल लोगों को पसंद था. गावस्कर की क्रिकेट किसी तरह कम नहीं थी. मैं नहीं समझता कि हम सुपरस्टार के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे.

तो किसी तरह की ईर्ष्या या जलन नहीं थी?

ईर्ष्या का मतलब ही नहीं है. वो गेंदबाज़ या ऑलराउंडर तो थे नहीं. रही बात प्रशंसकों की तो उस पर किसी का वश नहीं है. मैं उनका बहुत सम्मान करता था और करता हूँ. ये ज़बर्दस्ती नहीं है. उनमें जो खूबियाँ थी, उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता.

सुनील गावस्कर
कपिल मानते हैं कि गावस्कर मैच हारना नहीं चाहते थे और मैं हर हाल में जीतना चाहता था

जब मैं टीम में आया तो वो काफी क्रिकेट खेल चुके थे. हमारी सोच में अंतर था. वो हारना नहीं चाहते थे और मैं जीतना चाहता था. लेकिन दोनों का लक्ष्य टीम की बेहतरी थी.

वर्ष 1983 का विश्वकप. जिम्बाब्वे से मुक़ाबला. आप कप्तान थे. चार विकेट 9 रन पर गिर चुके थे. जब आप बल्लेबाज़ी के लिए निकले तो सोचा था कि आप मैच की शक्ल बदल देंगे?

हर खिलाड़ी यही इरादा लेकर मैदान में उतरता है कि मैच की शक्ल बदल देगा, लेकिन होता नहीं है. वो वक़्त था, जब टीम मुश्किल में थी और मेरे ऊपर ज़िम्मेदारी थी और अच्छी बात ये रही कि ज़रूरत के वक़्त मैं ये पारी खेल सका. ऐसे लम्हे लोगों के दिमाग में लंबे समय तक रहते हैं.

175 रन की पारी के दौरान कभी आपने सोचा कि बहुत रन बन गए अब रफ़्तार कुछ धीमी करनी चाहिए?

जब बल्लेबाज़ क्रीज़ पर होता है तो उसके मन में हालात के हिसाब से दो ही विचार होते हैं या तो रन बनाने हैं या फिर टिके रहना है. बल्लेबाज़ का ध्यान सिर्फ़ गेंदबाज़ पर होता है.

वो स्थिति ऐसी थी कि मेरे मन में था कि मुझे आउट नहीं होना है रन बने न बने. उस मैच में रन बनाने के लिए तो मैने सात-आठ ओवर लिए होंगे. बाद में रन बन गए.

ये पारी तो भारतीय क्रिकेट की लोककथा बन गई है. क्या आपको लगता है कि ये मैच विश्व कप का टर्निंग प्वाइंट था?

नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता. विश्व कप का टर्निंग प्वाइंट वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ पहला मैच या इंग्लैंड के विरुद्ध सेमीफाइनल था.

ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच में हमें नहीं लगता था कि हम इनसे मैच हार जाएँगे. बस हमारी सोच ये थी हम उन्हें कितने विकेट या रन से हरा पाते हैं. इसमें शक नहीं कि उस मैच में हम मुश्किल में थे, लेकिन बात कुल मिलाकर मनोबल और आत्मविश्वास की थी.

और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल?

हाँ, वो मैच बहुत अहम था. दरअसल वो विकेट हमारे माफिक था. इस विकेट पर कम उछाल था और गेंद को स्पिन भी मिल रहा था. मोहिंदर और कीर्ति आज़ाद ने शानदार गेंदबाज़ी की. उन्होंने 24 ओवर में लगभग 35-40 रन देकर चार विकेट लिए थे. यशपाल ने भी अच्छी पारी खेली.

और फिर आया फाइनल. टीम की रणनीति क्या थी?

उस वक़्त हमारी टीम का मनोबल और आत्मविश्वास इतना बढ़ा हुआ था कि हम किसी भी टीम से खेलते तो हार नहीं सकते. कहा जा सकता है कि सब कुछ हमारे हक़ में जा रहा था.

उस विकेट पर 183 रन का स्कोर भी कम नहीं था. हमारे सीम गेंदबाज़ों रोजर बिन्नी, मोहिंदर अमरनाथ, मदनलाल, बलविंदर सिंह संधू ने अच्छी गेंदबाज़ी की.

जब टीम 183 रन ही बना सकी तो ड्रेसिंग रूम में बैठे खिलाड़ी क्या सोच रहे थे?

देखिए ये सब नहीं सोचा जाता. ठीक है वेस्टइंडीज की टीम अच्छी थी, लेकिन हममें जोश की कमी नहीं थी. सोच ये होनी चाहिए कि हमसे बेहतर कोई नहीं है.

मुझे याद है कि जब हम क्षेत्ररक्षण के लिए जा रहे थे तो मैने कहा था कि हम 183 रन बना चुके हैं और वेस्टइंडीज़ को अभी इतने रन बनाने हैं. हम उन्हें मुश्किल में डाल सकते हैं. मैने कहा 'चलो जवानों लड़ो' तब गावस्कर ने कहा, कभी फिसर भी बोल दिया करो. तो उन हालात में भी ऐसे मजाक चला करते थे.

जीत के बाद जश्न कैसे मनाया?

आलम ये था कि हर मोड़ पर कोई न कोई शैंपेन लिए खड़ा था. सच बताऊँ तो इतनी खुशी में शैंपेन और जश्न के माहौल में हमें खाना भी नहीं मिला. लंदन में 11 बजे रेस्त्रां बंद हो जाते हैं और हम एक-दो बजे खाना ढूँढ रहे थे. फिर ब्रेड-टोस्ट खाकर रात गुज़ारी.

और जब वापस आए तो कैसा स्वागत हुआ?

बहुत बेहतरीन और शानदार था. हमारी उम्मीदों से बढ़कर. हमने कभी ऐसा नहीं सोचा था. बस ये कहना चाहूँगा कि बेहतरीन समां था.

उसके बाद प्रदर्शन में गिरावट आई तो आपको क्या लगा?

देखा जाए तो हम अच्छे खिलाड़ी हैं. लेकिन टीम के रूप में हमें परेशानी होती है. जिस तरीके का हमारा रहन-सहन, संस्कृति है. हमारी सोच टीम वर्क पर असर डालती है. खैर ये तो दुनिया का दस्तूर है अच्छा खेलेंगे तो इज्ज़त मिलेगी और खराब खेलेंगे तो गालियाँ.

दरअसल, हम भावुक लोग हैं और यही हमारी संस्कृति है. इस परिदृश्य को बदलने में तो लंबा समय लगेगा. मैं मानता हूँ कि खिलाड़ियों को सिर पर नहीं बिठाना चाहिए पर ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि ज़रा ख़राब खेले तो उन्हें ज़मीन पर पटक दो.

चार सौ विकेट और चार हज़ार रन. आपके दौर में तीन ऑलराउंडर और भी थे. आपकी नज़र में उनमें से कौन बेहतरीन था?

मैं कहूँगा कि रिचर्ड हेडली का बतौर गेंदबाज़ मैं बहुत सम्मान करता हूँ. इमरान ख़ान ने शानदार गेंदबाज़ी के साथ-साथ टीम का नेतृत्व किया. पाकिस्तानी टीम का नेतृत्व करना आसान नहीं है, लेकिन इमरान ने इस काम को बखूबी अंज़ाम दिया. ऑलराउंडर की बात करें तो बॉथम सर्वश्रेष्ठ थे.

2007 विश्व कप की बात करें तो आपको लगता है कि भारतीय टीम 1983 का इतिहास दोहरा सकती है?

हाँ, बहुत फ़ख्र के साथ कह सकता हूँ कि इस टीम में इतिहास दोहराने का माद्दा है. कई खिलाड़ी हैं जो अपने दम पर मैच जिता सकते हैं. वीरेंदर सहवाग हैं, सचिन हैं, धोनी हैं, युवराज हैं, कुंबले हैं जो अपने दम पर मैच जिता सकते हैं.

मैं समझता हूँ कि टीम में ये होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन क्रिकेट टीम वर्क है और खिलाड़ियों को मिलजुल कर खेलना होगा.

भारतीय टीम
कपिल मानते हैं कि वर्तमान टीम 1983 का इतहास दोहराने का माद्दा रखती है

क्या आपको अब भी लगता है कि हम अब भी किसी एक खिलाड़ी पर निर्भर हैं. क्योंकि लोगों को किसी ख़ास खिलाड़ी से उम्मीद नहीं है?

ये भारतीय टीम के लिए सकारात्मक है. उम्मीद है कि अब खिलाड़ी एकजुट होकर खेलेंगे. हर खिलाड़ी को अपनी भूमिका निभानी है.
इस टीम की तुलना 1983 की टीम से नहीं कर सकते. क्योंकि वो टीम विजेता रही, इसलिए आप उसमें खामियां नहीं निकाल सकते.

मेरा मानना है कि ये टीम उससे कहीं बेहतर है. बस इसे टीम के रूप में खेलना होगा. इसमें शक नहीं है कि हम बतौर टीम वर्तमान टीम से बेहतर खेले. जीतने के लिए उन्हें एकजुट होकर खेलना ही होगा.

इस पूरे दौर में आपको बेहतरीन उपलब्धियों को लिए लोगों से खूब सम्मान मिला. पर जब मैच फिक्सिंग प्रकरण हुआ और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चला तो आपको क्या लगा?

कई ख़याल मन में आए. बहुत दुख हुआ और लगा कि डूब मरना चाहिए, गुस्सा भी आया और लगा कि आरोप लगाने वालों को गोली मार देनी चाहिए. दुख तो होता ही है कि इतने साल की मेहनत और सच्चाई की राह पर चलने के बाद लोग आप पर आरोप लगाते हैं.

लेकिन ये जिंदगी का दस्तूर है और सारी उम्र इस पर बात करने का कोई मतलब नहीं है. हाँ, लोगों को इतना ज़रूर सोचना चाहिए कि किसी की बातों में यूँ ही नहीं आना चाहिए. अपनी सूझबूझ से काम लेना चाहिए.

1983 की विश्वकप जीत के अलावा आपके क्रिकेट जीवन का और कोई यादगार लम्हा?

पंद्रह साल के क्रिकेट कैरियर में ये तो बता पाना मुश्किल होगा कि दूसरा सबसे यादगार लम्हा कौन सा था. तमाम यादें हैं मेरी कई पारियाँ, कुछ रिकार्ड, कुछ खिताब और भी बहुत कुछ.

अच्छा मैच फिक्सिंग आरोप के अलावा और कौन सा पहलू है, जिसे आप अपने कैरियर से हटा देना चाहेंगे?

जब भी टेस्ट मैच हारे तो लगा कि अगर ऐसा खेला होता तो नतीजा कुछ और होता. या फिर 1987 के विश्व कप सेमीफाइनल में वो शॉट नहीं मारा होता तो शायद हम फाइनल में होते.

तो ऐसी कई बातें हैं जो दिमाग में चलती रहती हैं. उसकी चर्चा तो की जा सकती है, लेकिन अफ़सोस करने का कोई फ़ायदा नहीं है.

आपको अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट छोड़े हुए 10-12 साल हो गए हैं, आपकी सुबह कैसे होती है?

कुछ ख़ास नहीं. मेरी सुबह भी आम लोगों की तरह ही होती है. थोड़ी बहुत चहलकद़मी करता हूँ. ऑफिस जाना इसके बाद गोल्फ कोर्स जाने की कोशिश रहती है.

तमाम चैरिटी काम हैं, उन्हें निपटाने की कोशिश करता हूँ. जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कुछ न कुछ करते रहने की इच्छा है. बस इसी में दिन निकल जाता है.

और रात सोने से पहले क्या सोचकर सोते हैं?

कुछ ख़ास नहीं. आप जैसे लोग बुला लेते हैं कि हमें इंटरव्यू दे दो. या फिर कुछ और...

आपकी बेटी ने आपके क्रिकेट का स्वर्णिम दौर नहीं देखा है, क्या रिकॉर्डेड पारियाँ देखती हैं?

बेटी आमिया दस साल की हो गई है. मेरे पास कोई वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं है. लेकिन कभी जब टेलीविज़न पर पुराने मैचों की रिकॉर्डिंग दिखाई जाती है तो देख लेती है. वैसे कभी मूड नहीं होने पर मैच हटा भी लेती है.

और बेटी का पसंदीदा क्रिकेटर कौन है?

उसे क्रिकेट में ख़ास दिलचस्पी नहीं है. कभी-कभार ही मुझसे क्रिकेट के बारे में सवाल करती है. उसके पसंदीदा क्रिकेटर भी समय-समय पर बदलते रहते हैं.

तो वो कारोबारी महिला बनेगी?

मैं नहीं जानता कि वो क्या बनेगी. हम उसे अच्छे संस्कार देना चाहते हैं. वो क्या बनना चाहती है ये अहम है न कि हमें उसे क्या बनाना हैं.

उसके कुछ अपने सपने होंगे और हम चाहेंगे कि इन सपनों को साकार करने में हम उसकी मदद कर सकें. वैसे मैं चाहता हूँ कि वो अच्छी नागरिक और अच्छी इंसान बने. उसकी अपनी जिंदगी है और उसे इसे अपने तरीके से जीने का पूरा-पूरा हक़ है.

आपको फ़िल्में पसंद हैं?

हिंदुस्तान में ऐसा कौन होगा जिसे फ़िल्में पसंद नहीं होंगी. एक दौर में स्कूल से भागकर फ़िल्में देखता था और पिटाई होती थी.

पसंदीदा स्टार कौन थे?

धर्मेंद्र अच्छे लगते थे. इसके अलावा राजेंद्र कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ. स्कूल से भागकर मैने तमाम फ़िल्में देखी हैं. ज़जीर, मुग़ले-आज़म, गाइड जैसी फ़िल्में बहुत अच्छी लगती हैं.

गाने भी पुराने पसंद हैं या नए?

आजकल के गाने भी पसंद हैं. कुछ गाने तो बेहतरीन हैं. लेकिन पुराने गाने ज़्यादा अच्छे लगते हैं. शायद इसकी वजह ये हो कि वो ज़्यादा सुने हुए हैं और दिल को भाते हैं.

अक्सर 'जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ' 'ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बी, तुझे मालूम नहीं..' जैसे गाना गुनगुनाया करते थे.

और लड़कियां भी तो बहुत लट्टू रही होंगी आप पर?

नहीं, ऐसी बात नहीं है. मैं तो लड़कियों को सीटियाँ मारा करता था, लेकिन मेरा चेहरा-मोहरा ही कुछ ऐसा था कि कभी लड़कियाँ पटी ही नहीं.

अरे छोड़िए भी कपिल साहब. पूरी पीढ़ी फिदा थी आप पर?

मैं समझता हूँ कि मुझ पर बच्चे और बूढ़े ज़्यादा फिदा थे. मेरी उम्र की लड़कियां टीम के दूसरे स्मार्ट खिलाड़ियों पर लट्टू थीं और मेरी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता था. ख़ैर मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है.

आपकी लव मैरिज हुई थी या अरेंज?

करना तो अरेंज चाहता था, लेकिन लव हो गया. मैं चाहता था कि घरवाले अपनी पसंद की लड़की चुनें और मैं उससे शादी करूँ. लेकिन रोमी से अचानक मुलाक़ात हुई. फिर उन्हें घरवालों से मिलवाया और हो गई शादी.

नए अभिनेताओं में कौन पसंदीदा स्टार हैं?

किसी एक का नाम लेना बहुत मुश्किल है. कई बेहतरीन अभिनेता हैं. शाहरुख़ खान, रित्विक रोशन, अक्षय खन्ना, अक्षय कुमार, गोविंदा, संजय दत्त जैसे अभिनेता हैं, जिनकी काबलियत और प्रतिभा को देखकर गर्व होता है कि फ़िल्म उद्योग ने कितनी तरक्की की है.

और पसंदीदा अभिनेत्री?

रानी मुखर्जी ने ‘ब्लैक’ में बेहतरीन अभिनय किया. कहना आसान है करना बहुत मुश्किल है. और भी कई अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने शानदार अभियान किया है. सुष्मिता सेन, ऐश्वर्या राय का व्यक्तित्व देखिए क्या जानदार है.

हाल ही में आपने कौन सी फ़िल्म देखी है?

मैं फ़िल्में टेलीविज़न पर ही देख पाता हूँ, थिएटर में जाने का मौक़ा तो नहीं मिलता. अभी पिछले दिनों 'रंग दे बसंती' देख रहा था. चूँकि मैं काफी भावुक हूँ. आधी फ़िल्म ही देख पाया. मन में ख़याल आता था कि आखिर ऐसा क्यूँ होता है.

टेलीविज़न पर अब भी जब कभी 'मुग़ले आज़म', 'वक्त', 'गाइड' जैसी फ़िल्में आती हैं, उन्हें ज़रूर देखता हूँ. 'पड़ोसन' भारतीय क्रिकेट टीम की फेवरिट फ़िल्म हुआ करती थी. दिन भर की थकान के बाद खिलाड़ी हंसी-मजाक वाली इस फ़िल्म का खूब लुत्फ़ उठाते थे.

'लगे रहो मुन्ना भाई' नहीं देखी आपने?

नहीं इसे नहीं देख पाया. पहला पार्ट देखा था. लेकिन इस फ़िल्म की खूब तारीफ सुनी है.

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