BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
रविवार, 04 मार्च, 2007 को 04:25 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
एक मुलाक़ात: ग़ुलाम अली के साथ
ग़ुलाम अली
ग़ुलाम अली भारतीय अभिनेताओं में दिलीप कुमार को सबसे बेहतर मानते हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं पाकिस्तान के प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली से.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश --

इतनी ज़बर्दस्त लोकप्रियता, जहाँ जाएं वहाँ चाहने वालों की भीड़ और वो भी सरहदों की बंदिशें नहीं, कैसा लगता है ?

जब अल्लाह कुछ देता है तो छप्पर फाड़ के देता है. मैं सियालकोट के एक गाँव में पैदा हुआ था. उस गाँव में आज भी सड़क नहीं पहुँची है. ख़ैर मैं तो लाहौर में बस गया हूँ और कई साल से वहाँ नहीं गया हूँ. मौक़ा ही नहीं मिला.

कहने का मतलब है कि जब ऊपर वाला मेहरबान होता है तो उसे सब कुछ मिल जाता है. सिर्फ़ हिंदुस्तान या पाकिस्तान की बात नहीं हैं. मुझे अमरीका और ब्रिटेन में भी लोगों ने सुना और लंदन के गार्डियन अख़बार ने तो कहा, ''ये आदमी भले ही अपनी ज़ुबान में गाता है, लेकिन गाता दिल से है.'' वैसे भी मौसीक़ी की कोई ज़ुबान नहीं होती. अहसास ज़रूरी है. मौसीक़ी सुर है और इसका असर हर किसी पर होता है.

कहना बहुत आसान है कि आप दिल से गाते हैं या डूब कर गाते हैं. लेकिन क्या वाकई में ऐसा होता है या इसके लिए अभ्यास की ज़रूरत होती है?

इसके लिए अभ्यास यानी रियाज़ तो ज़रूरी है ही, साथ ही संगीत का ज्ञान भी आवश्यक है. मसलन, अगर कहा है कि 'तन्हाई के लम्हे' में किस तरह का सुर होना चाहिए. या 'फूल खिलते हैं' कहा है तो सुर अलग हो जाएगा.

यही करते-करते 50 साल हो गए हैं और अब लोग कहते हैं कि आप जब ग़ज़ल गाते हैं तो बात ही कुछ और होती है.

पसंदीदा गीत?

फरीदा ख़ानुम साहिबा का गाया गीत, 'तूफां बदल है हर कोई दिलदार देखना', नूरजहाँ जी का गाया गीत 'ज़रा तो छू लो उड़ जाऊँ कहकशां की तरह' और लता का गाया गीत 'बहारों मेरा जीवन भी सँवारो' मुझे बहुत पसंद है.

आपने अपने उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली साहब से क्या ऐसा ख़ास सीखा जिसका पालन आप आज़ भी अपने जीवन और मौसीक़ी में करते हैं?

मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता.

मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं.

ये हुनर और कैसे विकसित किया जाए ?

देखिए रियाज़ और नींव का मज़बूत होना तो ज़रूरी है. लफ़्जों में कैसे उतार-चढ़ाव लाना है, यही गायक का हुनर है.

समकालिक कलाकारों में आपको कौन सबसे अच्छे लगते हैं?

सादिक अली ख़ान का शास्त्रीय अंदाज़ मुझे अच्छा लगता है. जगजीत, हरिहरन, तलत अज़ीज, अनूप जलोटा, पंकज उधास, मेहंदी हसन और सभी गायक जो सारे सुरों में गाते हैं मुझे पसंद हैं. फ़रीदा खानुम और मधुरानी भी मुझे पसंद हैं. लेकिन मधुरानी ज्यादा बाहर नहीं गाती हैं.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

आपने मेंहदी हसन का नाम लिया. सुनने वालों के नज़रिए से देखें तो आप और मेहंदी हसन दोनों ग़ज़ल गायकी में सर्वश्रेष्ठ हैं. तो दोनो में क्या कभी कोई प्रतिस्पर्धा भी रही?

मैं समझता हूँ कि जो अच्छा है उसे अच्छा कहना अल्लाह को मानना है. अगर कोई अच्छा है तो उसे अच्छा कहना ही चाहिए. वो मुझे प्यार करते हैं और मैं उन्हें.

बल्कि कहना चाहूँगा कि वो मुझसे बड़े और बेहतर हैं.उनकी आवाज़ में बहुत मिठास है. जिन गायकों का मैंने नाम लिया उन सबकी आवाज़ में मिठास है. अगर मिठास न होती तो मुझे याद न होता.

अच्छा मेंहदी हसन साहब की गाई कोई ग़ज़ल जो आपको याद हो?

उनकी बहुत अच्छी-अच्छी ग़ज़लें हैं. 'चलते हों चमन को चलिए कहतें हैं कि बहारां हैं.' यह मुझे बहुत पसंद है लेकिन आम लोगों को समझ में नहीं आती.

अच्छा अपना गाया कोई पसंदीदा गीत?

एक पागल लड़की का क़िस्सा है, 'रातों को उठ-उठकर ख़्वाबों का तसव्वुर करती थी वो, कैसी पागल लड़की थी वो' मुझे बहुत अच्छी लगती है.

अच्छा ये बताएं कि रेडियो लाहौर वाले दिन कैसे थे?

असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......

मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है.

पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे.

आपके वालिद ने आठ साल की उम्र से ही आपको गायकी का रियाज़ कराना शुरू कर दिया था, तब भी आपके मन में ये ज़ज़्बा था कि आप गा लेंगे?

जी हाँ, मैं गा लेता था. आपको बता दूँ कि मेरे वालिद ने मेरा नाम बड़े ग़ुलाम अली साहब के नाम पर ही रखा था कि शायद इसको नाम की ही बरकत हो जाए.

तो बड़े ग़ुलाम अली साहब भी आपको कहते थे कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे?

जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं.

उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है.

तो ये परंपरा आप भी बरकरार रखे हुए हैं क्या?

हाँ, कोशिश तो यही है. हालाँकि मैं खुद को उस्ताद तो नहीं कह सकता. हाँ मुझे सिखाने वाले मेरे उस्ताद ज़रूर थे, उनकी वजह से मैं चल रहा हूँ. लेकिन मुझे मानने वाले जब भी मुझसे मिलते हैं तो मैं उन्हें अपने सीखे सबक बताता रहता हूँ.दीये से दीया जलते रहना चाहिए.

आपका ग़ज़ल 'चुपके-चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है' ऐसा लगता है हर किसी की कहानी है ?

जो लोग नंगे पाँव किसी के इंतजार में खड़े रहते हैं यह उन सबकी उनकी कहानी है. कई बूढे़ लोगों को भी यह काफ़ी पसंद है, शायद बचपन के दिन याद आ जाते होंगे.

आप अपनी गजलों का संगीत भी खुद ही देते हैं, इसकी कोई ख़ास वजह?

इसके पीछे बात ये है कि गजल का संगीत या तो वो बनाए जिसे ऊर्दू अदब का पूरा ज्ञान हो. मसलन, 'वस्ल', 'हिज़्र' या 'ताहिरे लाहूती' किसी कहते हैं. जब यही नहीं पता होगा तो वह ऐसा अहसास कहाँ से लाएगा. फ़िल्मों में संगीत देना अलग बात है. वैसे संगीतकार भी वही अच्छा होगा जो लफ़्जों की अनुभूति को सामने ला सकेगा.

अच्छा आपको फ़िल्में पसंद हैं?

ख़ास नहीं. मैं फ़िल्में बहुत कम देखता हूँ. मैंने 'मुग़ले आज़म' देखी थी और अच्छी लगी. उससे भी अच्छी 'अंदाज़' लगी. इसके अलावा अमिताभ की 'बागबां' और 'शोले' भी मुझे पसंद आई.

आपका पसंदीदा भारतीय अभिनेता?

सच पूछें तो सभी दिलीप साहब के बाद हैं. संजीव कुमार और अमिताभ भी बहुत अच्छे हैं. फिर मेरे देखने का अंदाज़ भी अलग है. मैं देखता हूँ कि फ़िल्म में किसने सुर में बात की है.

दिलीप कुमार साहब से मुलाक़ात हुई आपकी?

हमारी बहुत अच्छी मुलाक़ात है. जब कभी मैं उनके घर जाता हूँ तो वहाँ मेरे कैसेट चलता है.एक बात कहूँ, वो अपने काम में इकलौते हैं.

उनकी कौन सी फ़िल्म आपको सबसे अच्छी लगी थी?

'अंदाज' मैने देखी थी.

राज कपूर, दिलीप कुमार, नरगिस वाली.

जी, राज कपूर साहब के काम का भी जवाब नहीं था. 'मेरा नाम जोकर' भी मैंने देखी थी थोड़ी सी. वह भी जबर्दस्त कलाकार थे.

अच्छा ये बताइए कि ग़ज़ल के अलावे और कौन-कौन से शौक हैं, आपको क्रिकेट में दिलचस्पी है जैसे हर किसी की रहती है?

बिल्कुल नहीं. मैं सिर्फ थोड़ी-बहुत प्रसंशा ही कर सकता हूँ, क्योंकि किसी के मेहनत को आप फ़जूल तो नहीं कह सकते हैं न.

लेकिन हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग तो पागल रहते हैं. आपको थोड़े बेवकूफ़ भी लगते हैं वो लोग जो क्रिकेट के पीछे पागल रहते हैं क्योंकि काफ़ी लोग इसे नहीं भी पसंद करते हैं.

हाँ, किसी चीज के पीछे भागना भी थोड़ा ज्यादा हो जाता है और ज्यादा तो कुछ भी अच्छा नहीं है जितना मुनासिब हो उतना ही होना चाहिए. एक तो क्रिकेट में ये बात है कि एक मैच में एक दफ़ा एक ही आदमी हीरो होता है और दूसरे मैच में वो ज़ीरो हो जाता है. इसमें उतार-चढ़ाव बहुत है.

ऐसा भारत-पाकिस्तान के बीच ही क्यों होता है कि या तो इमरान खान या सुनील गावस्कर हीरो है या एकदम ज़ीरो. बिल्कुल हटाओ इसको टीम से निकालने वाली बात होने लगती है.

जो चीजें भागने वाली होती हैं जिनमें भागा जाता है, वो इसी तरह की होती हैं. उसमें कभी उतार आ जाता है कभी चढ़ाव आ जाता है.

लेकिन कोई आपका पसंदीदा क्रिकेटर?

गावस्कर जी हैं. इमरान ख़ान, वसीम अक़रम. खैर पाकिस्तान के सारे क्रिकेट वाले तो सारे मेरे दोस्त भी हैं. हम कई दफ़ा इकट्ठे बैठे भी हैं.

कौन सा क्रिकेटर है जो सबसे ज़्यादा शौक से सुनता है?

वसीम अक़रम, सलीम मलिक बहुत अच्छे तरीक़े से गाना सुनते हैं. जावेद मियाँदाद भी. एक दिन तो बंगलौर में इकट्ठे हुए थे सारे. जैसे ही खेल ख़त्म हुआ वो सीधे भागकर मेरे प्रोग्राम में आ गए. कहा कि वे उन्हीं कपड़ों में आ गए हैं. इस तरह से सारे लोग बहुत प्यार करते हैं.

मोहम्मद रफ़ी साहब पसंद थे आपको?

बहुत अधिक. फ़िल्मी गायकों में तो वे सबसे अच्छे गायक थे. उनके जैसा लकी गायक भी मैंने बहुत कम देखा है. और वे सुर में भी थे. सुर में होना अच्छी बात है. अगर सुर में नहीं हो तो कोई भी फ़नकार चाहे कितना भी पैसे वाला क्यों नहीं हो हम उसे फ़नकार नहीं मानते.

ये जो आवाज़ इतनी मीठी और जवान बनी हुई है क्या इसके लिए कोई परहेज़ रखना होता है ?

मैं अपनी तबीयत के मुताबिक कई ऐसी चीजें हैं जो नहीं खाता हूँ. दही नहीं खाता, अचार नहीं खाता.मैं बहुत परहेज़ करता हूँ.

ऐसा आप केवल अपनी आवाज़ की खूबसूरती बनाए रखने के लिए करते हैं?

आवाज़ के लिए भी और अपने मिज़ाज के लिए भी. बचपन से ऐसा होता था कि मेरी नाक बंद हो जाती थी. ज़ुकाम और फ्लू हो जाता था. तो उससे बचने के लिए मैं नाक की साँस का योग भी करता हूँ. ठंडा दूध नहीं पीता. चाहे कितनी भी गर्मी हो बर्फ डाल के पानी नहीं पीता.

तो क्या गर्म पानी पीते हैं. देवानंद साहब तो दिन भर गर्म पानी पीते रहते हैं.

सादा पानी पीता हूँ. गर्म पानी पीना वैसे बुरी बात नहीं है. मैं चीन गया था. वहाँ तो गर्म पानी ही पीते है.

वहाँ तो चाय पीते रहते हैं. चीन के लोग तो कहते हैं कि चाय पीने से दिल की बीमारी नहीं होती.

वे ग्रीन टी पीते हैं. मेंने तो वहाँ एक दिन में सोलह-सोलह दफ़ा ग्रीन टी पी है.

अच्छा ये बताइये छुट्टियाँ बिताने के लिए आपकी सबसे पसंदीदा जगह कौन सी है?

सबसे ज्यादा सिडनी पसंद है. बहुत शांति है वहाँ. कोई शोर-शराबा नहीं है और कोई बोलता भी है तो बहुत आहिस्ते से. वहाँ का प्रशासन बहुत अच्छा है. खूबसूरत भी बहुत है. बहार की तरह का लगता है वो शहर.

सिडनी वैसे तो बहुत खूबसूरत शहर है ही लेकिन यह मैंने पहली बार सुना है कि कोई ऑस्ट्रेलियाइयों के अदब की तारीफ़ कर रहा हो.

नहीं ये सही बात है. बाकी यूरोप, अमेरिका या कनाडा जैसे मुल्कों से ज्यादा यहाँ शांति है. कनाडा में भी शांति है लेकिन ये लोग बड़े शांत हैं. यदि नशे में भी गाड़ी चलाएंगे तो कोई बोलता नहीं है. ये उनकी आदत है.

ये सही बात है कि आप पंजाबी और नेपाली में भी गाते हैं?

पंजाबी तो मेरी मातृभाषा है. मैं इसलिए बोल नहीं रहा कि आपको ये न लगे कि मुझे ऊर्दू नहीं आती.

भारत में इतने प्रशंसक हैं आपके तो भारत में अपने चाहने वालों को कोई संदेश देना हो तो क्या संदेश देना चाहेंगे?

मैं तो अपने फील्ड की ही बात करता हूँ तो भारत के अपने चाहने वालों को यही संदेश देना चाहूँगा कि अच्छी पोएट्री, अच्छी शायरी, अच्छी आवाज़, अच्छी धुनें, इनको सुनना न भूला करें. इसको इसी तरह जारी रखें.

ये जो बाकी के गाने होते हैं वो कुछ समय के लिए होते हैं. उनका भी आनंद लें. लेकिन यदि आदत बनानी है सुनने की तो इस तरह के काम को सुनते रहें.

ऐसा लग रहा है कि इस तरह की चीजों को सुनने का शौक
कुछ कम हो रहा है लोगों का?

देखिए जो शौकीन हैं वे कभी पीछे नहीं हटते. उनका शौक तो जारी रहता है. जैसे मैं हूँ तो मैं भी अपना रूप बदल के कुछ और कर सकता था. मगर मेरे लिए इसकी गुंजाइश ही नहीं है. मुझे इससे प्यार है. मैं यही करूंगा. लोग मुझसे यही सुनते हैं. तो मैं क्यों कहूँ कम है. कम तो तब कहूँ न जब मेरे चाहने वाले कम हों.

यदि आप आँख बंद करके अपनी पीछे की ज़िंदगी देखें तो आपकी ज़िदगी का सबसे यादगार पल कौन सा होगा?

बहुत बचपन की एक घटना मेरी माँ सुनाती थीं. जब मैं तीन साल का था अपने गाँव में तीसरी मंजिल से गिरा था. और नीचे गाय और भैसों को खिलाया जाने वाल चारे के ढेर पर जा गिरा. मैं तो ठीक था लेकिन मेरी माँ मुझे गिरते देखकर बेहोश हो गईं.

मेरी माँ जब तक जिंदा रहीं वो कहती रहीं कि जब भी वो वह दृश्य याद करती थीं तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे. मैं कहता था कि माँ आपके आँसुओं ने मेरी ज़िदगी बचा ली. माँ के आँसू भी बेटे के काम आते हैं.

ये तो आपकी माँ की ज़िदगी का यादगार पल हुआ. आप तीन साल के थे तो आपको उतना याद नहीं होगा. लेकिन आपकी ज़िदगी का सबसे यादगार पल जो आपके ज़ेहन में हो?

एक दफ़ा मैं जर्मनी गया तो वॉयस ऑफ जर्मनी कोलोन में मेरा इंटरव्यू था. वो थोड़ा-थोड़ा ऊर्दू में मेरा इंटरव्यू ले रहे थे. उन्होंने मेरा पूरा गायन रिकॉर्ड भी किया था. उन्होंने पूछा कि जब आप गा रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो आप ऊर्दू में नहीं जर्मन में गा रहे हों. उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई जादू है.

फिर उन्होंने पूछा कि उनके यहाँ जो गायक हैं उनके अंदाज़ के बारे में मेरी क्या राय है. मैनें कहा कि देखिए जी गाना तो मौसम के हिसाब से होता है. यहाँ बहुत ठंड पड़ती है तो जोर-जोर से गाना पड़ता है कि सीधा पसीना आना चाहिए. इसलिए आपके यहाँ के गायक ऐसा करते हैं.हमारे यहाँ गर्मी ज्यादा पड़ती है. इसलिए हम आराम-आराम से गाते हैं कि हमें ज्यादा गर्मी न लगे.

अच्छा कोई ऐसा वाक़या जिसे आप अपनी ज़िंदगी से मिटा देना चाहते हों? कभी कोई शर्मिंदगी झेलनी पड़ी हो?

ऐसा तो कोई है नहीं लेकिन एक दो दफ़ा वादाखिलाफ़ी हो गई थी. देर हो गया था मैं. एक दफ़ा बोस्टन में कार्यक्रम था आठ बजे लेकिन फ्लाईट देर होने के चलते मैं साढ़े नौ बजे पहुँचा. लोग जा रहे थे और गालियाँ भी दे रहे थे.

वो जब मैनें सुनी तो मैंने कहा कि अब मैं लोगों को मौका नहीं दूँगा. तक़रीबन अगर मेरे पास समय हो तो मैं एक दिन पहले ही चला जाता हूँ.

जब आपने ये बता दिया कि कौन-कौन सी चीजें आप नहीं खाते हैं तो यह भी बताइये कि कौन सी चीज का बहुत शौक है खाने में?

स्वादिष्ट चीजों को खाने का शौक है ज्यादा. चिकन खाता हूँ. ज्यादातर सब्जियाँ ही खाता हूँ. मटन वगैरह खाना छोड़ दिया है. पहले खाता था. अब डॉक्टर ने मना किया है. हल्का-फुल्का खाता हूँ लेकिन तभी जब स्वादिष्ट हो.

कोई ऐसा अरमान, ऐसा ख़्वाब जिसे पूरा करने का ज़बर्दस्त तमन्ना हो?

मैं अजीब सा टेढ़ा आदमी हूँ. मैं ऐसा समझता ही नहीं हूँ कि कोई और मेरा ख़्वाब है. मुझे इतना प्यार मिला इतनी इज़्ज्त मिली इतनी प्रसिद्धि मिली कि मैं उससे संतुष्ट हूँ.

मेरे अपने माँ-बाप की दुआएँ, मेरे उस्तादों की और अच्छे भाइयों और बहनों की दुआएँ लगीं और मैं बिल्कुल संतुष्ट हूँ. मुझे ऐसा कुछ नहीं है कि ये भी हो जाता, वो भी हो जाता तो ठीक था. जो कुछ भी है ठीक है. जो कुछ नहीं है वो नहीं है.

बचपन की कोई ऐसी याद जो आपके दिमाग पर छाप छोड़ गई हो?

तब मैं सात-आठ साल का था और स्कूल जाता था.छह वर्ष की उम्र से मैंने स्कूल जाना शुरू किया था. तो स्कूल में गा लेता था यूँ ही गुनगुनाता रहता था.

एक दिन मास्टर साहब का दिया हुआ कोई सवाल हल करते हुए कुछ गा रहा था, गुनगुना रहा था और बजा रहा था अपने घुटने पर. तो मास्टर जी देखा और बुलाया. मैं घबरा गया कि क्या हुआ. उन्होंने पूछा कि क्या कर रहे थे. मैंने कहा कि सवाल निकाल रहा था. उन्होंने पूछा कि उसके बाद क्या कर रहे थे. मैंने कहा जी कुछ भी नहीं.

दरअसल अंदर से वे संगीत के शौकीन थे. उन्होंने छड़ी लेकर प्यार से पूछा कि सच बताओ मैंने तुम्हें देखा है. तुम गा रहे थे गुनगुना रहे थे. क्या गा रहे थे सुनाओ. मैंने जब सुनाया तो मास्टर जी बड़े खुश हुए. उन्होंने कहा कि बच्चे जो सुबह-सुबह प्रार्थना के रूप में पढ़ते हैं न हम्द़ और नात वो आप पढ़ा करो.

अब जब मेरी ड्यूटी लग गई तो उस समय हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का विभाजन नहीं हुआ था और वहाँ राजिंदर सिंह रहते थे. उन्हें हम चाचा राजिंदर सिंह कहते थे. उनकी बेग़म को हम भाभी कहते थे. उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी. पूछा ये कौन गा रहा है. मेरे अब्बाजी का नाम था दौलत अली. उन्होंने कहा दौलत का बेटा है. तो उन्होंने कहा कि अच्छा-अच्छा ये ग़ुलाम अली है! इसको कहें कि ये इधर से होकर जाएगा.

स्कूल के पास ही उनका बंगला. उन्होंने मुझे उधर बुला लिया. इतनी अच्छी तेरी आवाज़ है मुझे भी सुना के जाओ. वो गाने को बहुत प्यार करती थीं. उन्होंने मुझे पाँच रुपए दिए और रोज़ की ड्यूटी लगा दी कि मुझे रोज़ सुना के जाया करो.

जब मैंने घर जाकर अम्मा को पाँच रुपए दिए तो बजाए खुश होने के अम्मा गुस्सा हो गईं कि कहीं से चोरी करके तो नहीं लाया. मैंने कहा कि पता कर ले जाके. फिर जब उन्होंने पता किया तो भाभी ने कहा कि यदि आप इज़ाज़त दें तो ये रोज यहाँ से गाकर जाया करेगा.

बहुत अच्छा मेहनताना मिला था उस ज़माने में तो पाँच रुपए बड़ी रक़म हुआ करती थी.

उसके बाद जब तेरह-चौदह साल के हुए और रियाज़ करते थे तो अब्बाजी सादा पका हुआ चावल नहीं खाने देते थे. मुझे जुकाम होने से गले पर असर पड़ता था. मेरे ननिहाल में चावल की खेती-बाड़ी बहुत होती थी. बड़े अच्छे चावल होते थे. मुझे बड़ा शौक था चावल का. जी तो चाहता था लेकिन अब्बाजी के डर से खाता नहीं था. मेरी माँ उनसे चोरी छुपे खिलाती थी चावल. तो उनको भी डाँट पड़ती थी और मुझे भी पड़ती थी. तो ये भी एक वाक़या है.

अमजद अली ख़ानएक ख़ास मुलाक़ात
जाने-माने सरोद वादक अमजद अली ख़ान के साथ एक मुलाक़ात.
प्रियरंजन दासमुंशीदासमुंशी से मुलाक़ात
भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी से एक मुलाक़ात.
इससे जुड़ी ख़बरें
एक मुलाक़ात: गायत्री देवी के साथ
04 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: लालू प्रसाद के साथ
20 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: बाबा रामदेव के साथ
06 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात - शम्मी कपूर के साथ
24 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात- इरफ़ान पठान के साथ
16 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>