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रविवार, 29 अप्रैल, 2007 को 00:42 GMT तक के समाचार
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एक मुलाक़ात : मणिशंकर अय्यर के साथ

मणिशंकर अय्यर
मणिशंकर अय्यर का सपना है कि देश में पंचायतीराज मजबूत बनकर उभरे
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

आज हमारे साथ हैं एक ख़ास मेहमान जो पहले विदेश सेवा में थे फिर जिनकी राजीव गांधी से गहरी दोस्ती रही. बाद में वो राजनीति में आए, कई मंत्रालय संभाले. आजकल वो युवा और खेल मामलों और पंचायती राज के मंत्री हैं. हमारे बीच हैं मणिशंकर अय्यर साहब जो बहुत ही पढ़-लिखे इंसान हैं और साथ ही काफ़ी शौक़ीन मिजाज़ भी.

ख़ूब पढ़ाई-लिखाई करके लोक सेवक बने होंगे. ये सियासत में आने की कैसे सूझी?

एक इम्तिहान लिखना होता है 21 की उम्र में और उसमें कामयाब हो गए तो आने वाले 35 साल तक और कुछ ख़ास प्रयास नहीं करना है. बढ़ते जाओगे और बढ़ते जाओगे. पढ़ाई-लिखाई तो मैंने कुछ ख़ास नहीं की नहीं लेकिन जब मैं बीए में था तो न सिर्फ़ प्रथम श्रेणी में पास हुआ बल्कि विश्वविद्यालय में अव्वल आया था. मेरे अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष ने तो मुझे मुबारक़बाद देने से इंकार कर दिया था. इस बारे में मैंने 20 साल बाद अपनी कॉलेज़ मैगज़ीन में लिखा कि मेरे अध्यापक बहुत निराश हुए क्योंकि उनके प्रिय शिष्य अरुण शौरी द्वितीय श्रेणी में पास हुए और मैं आगे बढ़ गया था. जब मैं 22 साल बाद पाकिस्तान से लौटा तो उन्होंने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों लिखा. मैंने कहा मुझको कोई ऐतराज़ नहीं कि आपने 22 साल विलंब किया लेकिन आज तो मुबारक़बाद दीजिए. इसलिए मैं कहता हूँ कि इत्तफ़ाकन इम्तिहान सही लिख दिया.

विदेश सेवा में जो मेरा चयन हुआ उसकी वजह यह है कि किसी ने मुझे बताया था कि ब्रिटिश कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री (ब्रिटेन का संवैधानिक इतिहास) का पेपर लूं तो अधिक अंक मिलने की संभावना है. अब हक़ीक़त तो ये थी कि न कभी मैंने ब्रिटिश इतिहास पढ़ा था न मुझे संवैधानिक क़ानून के बारे में कुछ पता था. किसी ने मुझसे कहा कि लिंडज़े केयर की ब्रिटिश संविधान पर किताब पढ़ लो तो मैंने उसे पढ़ा था. उन दिनों में कैंब्रिज़ में पढ़ रहा था. वहाँ मेरे दो बहुत क़रीबी दोस्त थे. मैं जानता था कि दोनों बहुत जानकार हैं. इतने जानकार कि प्रोफ़सरों को भी उतना पता नहीं होगा. एक हिंदुस्तानी मूल का लड़का था और दूसरा वहीं का था. जो हिंदुस्तानी मूल का लड़का कृष्ण कुमार आजकल वर्ज़ीनिया विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़सर हैं. मैं जानता था कि उनकी राय में ब्रिटेन सही मायनों में लोकतंत्र तब था जब 18वीं सदी में संसद की बढ़ती ताक़त पर अंकुश लगाने के लिए नरेश के पास भी कुछ शक्तियाँ हुआ करती थीं. उनका कहना था कि दोनों को साथ रखकर ही हम सच्चा लोकतंत्र क़ायम कर सकते हैं नहीं तो ये बहुसंख्यकवाद होगा. अल्पसंख्यक नरेश तक पहुँच कर न्याय पा सकते थे. दूसरे थे टिम क्लार्क. वो आजकल शायद बोस्टन में हैं. तो पिछले सालों के प्रश्नपत्र देखने के बाद मैंने पांच-छह सवाल छाँटे और उन्हें दोनों के सामने रख दिया. इन सवालों को लेकर उन दोनों के सामने जो चर्चा चली उसे ग़ौर से सुना. इम्तिहान में मुझे 75 फ़ीसदी अंक मिले और मैं विदेश सेवा में पहुँच गया. तो मैं कुछ ख़ास पढ़ाई-लिखाई नहीं करता था. हाँ ये कह सकते हैं कि अगर होशियार नहीं था तो चतुर ज़रूर था.

ठीक है कि आप दो पढ़े-लिखे लोगों की बहस से फ़ायदा उठाकर इम्तिहान पास कर गए. ये कहना आपका बड़प्पन है. अच्छा ये राज़ बता दीजिए कि बिना पढ़े-लिखे विश्वविद्यालय में अव्वल कैसे आया जाता है?

नहीं मैं ऐसा नहीं कहता. मेरे अंदर एक अनोखी चीज़ थी और आज भी है कि मुझे शाम को खाना खाने के बाद नींद आ जाती है. तो जब मेरे दोस्त रात को खाना खाने के बाद ताश खेलते या पढ़ते थे तब मैं सो जाता था और सुबह निशब्द बेला में उठकर पढ़ाई करता था. लेकिन मेरा अनुभव ये भी था कि अगर मैं अंतिम समय तक पढ़ते जाऊँ तो मुझे कुछ समझ नहीं आता था इसलिए मैं परीक्षा से दो घंटे पहले पढ़ना छोड़ देता था. एक नॉवेल निकाल कर पढ़ने लगता था. पीजी वुडहाउस के नॉवेल मेरे हाथ में हुआ करते थे. अभी कुछ दिन पहले मुझे किसी ने याद दिलाया कि जब परीक्षा के लिए हम सब सेंट स्टीफ़ेन्स से कला संकाय के लिए जाया करते थे तो मैं रास्ते में वुडहाउस का नॉवेल पढ़ता था और हंसते हुआ जाता था और सारे लड़के जो परीक्षा को लेकर परेशान होते थे सोचा करते थे कि ये कैसे हंस रहा है. हो सकता है कि ये भी एक कारण रहा हो कि मैं सफल रहा.

आपने बताया कि आपके समय ही अरुण शौरी भी थे. वो कैसे थे?

वो तो बहुत ही गंभीर आदमी थे. तब भी थे और आज भी हैं. हालांकि उनको हंसना आता है लेकिन सार्वजनिक स्तर पर पता नहीं क्यों वो शांत रहते हैं. कक्षा में वो सबसे आगे बैठते थे और ग़ौर से लेक्चर सुनते थे. कक्षा ख़त्म होने के बाद हम तो कॉफ़ी हाउस चले जाते थे कि कोई लड़की हमें देखकर मुस्करा दे और वो पुस्तकालय की ओर रुख़ कर लेते थे. शाम को पांच बजते ही हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर चले जाते. सभी अध्यापक उनसे बहुत ख़ुश रहते थे. मुझे भी कोई शक़ नहीं था कि इनकी पहली पोज़ीशन आएगी बल्कि मुझे लगता था कि इनकी पहली पोज़ीशन आनी चाहिए. इतनी मेहनत के बाद कुछ न कुछ पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए था. लेकिन नियति देखिए जिन्हें पहले पायदान पर आना चाहिए था वो पीछे छूट गए और मैं पहले स्थान पर आ गया.

 पिछले सालों के प्रश्नपत्र देखने के बाद मैंने पांच-छह सवाल छाँटे और उन्हें दोनों के सामने रख दिया. इन सवालों को लेकर उन दोनों के सामने जो चर्चा चली उसे ग़ौर से सुना. इम्तिहान में मुझे 75 फ़ीसदी अंक मिले और मैं विदेश सेवा में पहुँच गया. तो मैं कुछ ख़ास पढ़ाई-लिखाई नहीं करता था. हाँ ये कह सकते हैं कि अगर होशियार नहीं था तो चतुर ज़रूर था.

क्या कॉलेज़ के ज़माने में आपको पता था कि आप दोनों ही सार्वजनिक जीवन में होंगे और आपके इतने अलग-अलग रास्ते होंगे?

अपने कॉलेज़ के दिनों में मैं धुर वामपंथी था. अरुण शौरी जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के बड़े समर्थक थे. वो हमसे बहुत विस्तार से सभी विषयों पर चर्चा करते थे. समझ में नहीं आता कि इतने बड़े सामाजवादी रहे अरुण शौरी कैसे दूसरे रास्ते पर चले गए.

हम अभी आपके एक और सीनियर नटवर सिंह की भी चर्चा करेंगे लेकिन पहले अपनी पसंद का एक गाना बताइए. ख़ासकर नए गाना?

नए गाने मुझे अधिक पसंद नहीं. वैसे आजकल का एक गाना है डॉन फ़िल्म में आज की रात......मुझे पुराने गाने पसंद हैं. एक गाना है...मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम....

मैंने एक किस्सा सुना था कॉलेज़ के दिनों का. नटवर सिंह ने आगंतुक पुस्तिका में हस्ताक्षर किया था.

मैं बताता हूँ. नटवर सिंह सेंट स्टीफ़न्स में मुझे आगंतुक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करवाने के लिए प्रधानाचार्य के कमरे में ले गए थे. जब हम लोग पढ़ा करते थे तो कभी भी प्राचार्य के कमरे में नहीं जाते थे. उस दफ़्तर में जाने का मतलब होता था कि अब कॉलेज़ से निकाला जाना तय है. तो जब मैं कमरे में गया तो वैसे ही काँपने लगा जैसे पहले विद्यार्थी जीवन की बात हो. मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या लिखूँ. मैं दूसरों की टिप्पणियां देखने के लिए पन्ने पलटने लगा. मुझे एक टिप्पणी दिखी 'मैं जो कुछ भी हूँ सेंट स्टीफ़ेन्स की वजह से हूँ.' टिप्पणी के नीचे लिखने वाले का नाम था के. नटवर सिंह, विदेश राज्य मंत्री, भारत सरकार. मैंने उस टिप्पणी में एक पंक्ति और जोड़ दी...'कॉलेज़ को क्यों दोष देते हैं'. तब से ये मज़ाक बहुत मशहूर हो गया. लेकिन बाद में नटवर सिंह का ज़वाब कहीं मशहूर नहीं हुआ. एक बार उन्हें कॉलेज में भाषण देने के लिए बुलाया गया था. भाषण देने के बाद उन्होंने कहा मणिशंकर चाहे जो भी टिप्पणी करें लेकिन मैं जो कुछ भी हूँ सेंट स्टीफ़ेंस की वजह से हूँ.

आप बता रहे थे कि आप कॉलेज़ के दिनों में कैंटीन में इसलिए बैठा करते थे कि लड़कियाँ आप को देखकर मुस्कराएं.

हम इस पर अधिक बात नहीं करेंगे क्योंकि हम नाकाम रहे. कोई भी लड़की मुस्कराई नहीं.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

आप लाहौर में बड़े हुए....

नहीं मेरी पैदाइश लाहौर की है. मेरे पिताजी 1927 में मद्रास छोड़कर लाहौर चले गए. उस समय तमिलनाडु में पंडितों के ख़िलाफ़ आंदोलन चल रहा था इसलिए पिताजी ने मद्रास छोड़ने का फ़ैसला किया और दूर लाहौर पहुँच गए. वहाँ पिताजी और वैद्यनाथन अय्यर ने पीएनएस अय्यर के साथ काम करना शुरू किया जो चार्टर्ड एकाउंटेंट थे. पिता जी 1947 तक वहां रहे. मैं पिता जी का सबसे बड़ा बेटा था और 1941 में लक्ष्मी मैंसन्स नंबर 44 में पैदा हुआ था. अभी वहाँ डॉ मलिक रह रहे हैं. डॉ मलिक उस ज़माने में लंदन में पढ़ रहे थे जब मैं और पाकिस्तान के मौज़ूदा विदेश मंत्री कसूरी कैंब्रिज़ में पढ़ रहे थे. जब 1978 में पहली बार पाकिस्तान गया तो कसूरी ने मुझे लाहौर बुलाया. मैंने कसूरी से कहा अगर तुम मुझे मेरे पुराने वाले घर ले चलो तो ही मैं आउंगा. कसूरी ने मुझे पुराना वाला घर दिखाया और मैं डॉ मलिक से मिला. अभी 2005 में जब पेट्रोलियम मंत्री की हैसियत से पाकिस्तान गया तो लक्ष्मी मैंसन के लोगों ने मेरे सम्मान में भोज का आयोजन किया. मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ. ये जो फ़ोटो आप देख रहे हैं..(एक फ़ोटो दिखाते हुए) मेरे पिता, माँ और तीन बच्चों की ये तभी की है जब हम लाहौर छोड़ रहे थे. इस फ़ोटो को मलिक साहब ने वहां लगाया और दावत दी. लक्ष्मी मैंसन ऐसी जगह है जहां सआदत हसन मंटो और ज़फ़रुल्ला ख़ान रहते थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हमें काफ़ी बार शिकस्त दी थी. वहाँ ख़ालिद मेराज़ साहब रह चुके हैं जो पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म भी बने.

 अपने कॉलेज़ के दिनों में मैं धुर वामपंथी था. अरुण शौरी जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के बड़े समर्थक थे. वो हमसे बहुत विस्तार से सभी विषयों पर चर्चा करते थे. समझ में नहीं आता कि इतने बड़े सामाजवादी रहे अरुण शौरी कैसे दूसरे रास्ते पर चले गए.

तो आपका विदेश सेवा में जाना और बाकी दूसरी चीज़ें कमोबेश तय थीं. आप बहुत भाग्यशाली घर में पैदा हुए थे.

जब मैं 1963 में विदेश सेवा में आया तो हम कुल 16 लोग थे और उनमें से आठ की पैदाइश लाहौर में हुई थी. हम अपने घर से दूर हुए थे और शरणार्थी बन गए थे. हमारे माता पिता ने हमें रोका नहीं. जैसे छह साल की उम्र में शरणार्थी बन गए थे वैसे 36 साल और दुनिया घूमते. अगर मैं अपने गाँव कारगुड़ी में पैदा हुआ होता तो शायद मेरे घर वाले कहते कि बेटा कहां जाओगे.

आपकी पसंद का एक और गाना.

अंग्रेज़ी में बताना है या सिर्फ़ हिंदी में.

आपको एक अंग्रेज़ी गाने की छूट मिलेगी लेकिन अभी हिंदी गाना बताएं.

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां..ज़रा हटके ज़रा बचके ये है मुंबई मेरी जां...

लाहौर से जुड़ी कुछ बचपन की यादें हैं.

लाहौर का कुछ भी याद नहीं. यहां तक कि जब मैं दावत में गया लक्ष्मी मैंसन तो एक पारसी लड़की मेरे पास आई जो लगभग मेरे उम्र की ही थी उसकी पैदाइश दिसंबर, 1940 की थी और मैं चार महीने बाद पैदा हुआ था. जब मैं दो-तीन साल का था हम दोनों एक ही जगह रहते थे. साथ ही मैदान में खेले होंगे लेकिन मुझे कुछ भी याद नहीं आया. मुझे पहला स्मरण अकोला का है जब मैं चार साल का था तो मेरी मौसी के यहां गया था. मेरे भाई स्वामीनाथन और बहन तारा की पैदाइश वहीं की है. मुझे थोड़ा बहुत याद है वहां हमारे पास एक हिरन था उससे मैं खेलता था. और कुछ शिमला की यादें है.

ये बताइए आपके पिताजी करते क्या थे. आपके पास हिरन था आप शिमला जैसी जगह जाते थे.

वो अपील न्यायाधिकरण (ऐपेलेट ट्राइब्यूनल) में आयकर मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ बन गए थे. इसलिए सर्दियों में उन्हें लाहौर से दिल्ली और गर्मियों में शिमला आना पड़ता था क्योंकि उस ज़माने में गर्मियों में पूरा सरकारी महकमा ही शिमला चला जाता था. मुझे बताया जाता है कि मैंने ज़िद की कि मैं बर्फ़ देखूंगा क्योंकि मैंने कभी बर्फ़ नहीं देखी थी. तो हम लोग पूरी सर्दियों में वहीं रुक गए और मस्ती करने लगे. वहीं एक विलोबैग्स नाम का स्कूल था. वहां हम पढ़ा करते थे.

और विभाजन के समय.

विभाजन के समय यानी 14-15 अगस्त को मेरे पिता जी पाकिस्तानी हो गए और हम हिंदुस्तानी. क्योंकि पिताजी और उनके जैसे बहुत से लोगों ने सोचा कि बहुत अधिक बदलाव नहीं आएगा इसलिए जहां अपनी ज़िंदगी बनाई उसे छोड़कर नहीं जाना चाहिए. एक सब्ज़ी वाले ने पिताजी से कहा कि ये एक ज़ुनून है बाद में स्थिति सामान्य हो जाएगी लेकिन अभी ख़तरा है. आप घर पर ताला लगाकर अंदर से दरवाज़ा बंद कर लीजिए. मैं आपको रात में कुछ सब्ज़ियां आदि दे दिया करूंगा. लेकिन जब रात को पिता जी ने दरवाजा ख़ोला तो उसी सब्ज़ी वाले ने उन पर छुरा चला दिया. हालांकि पिता जी को कोई हानि नहीं पहुंची. पिता जी उन दिनों डालमिया सीमेंट कंपनी के ऑडीटर हुआ करते थे. उन्होंने कंपनी के ऑफ़िस में फ़ोन किया और एक ट्रक में सामान लाद कर हिंदुस्तान आ गए. शिमला में उस समय की मेरी यादें सबसे ताज़ा यादें हैं. उस समय सरदारों का एक जत्था आया. एक तीन मंजिला मकान के पहले फ़्लोर पर हम रहते थे. उन सरदारों ने कहा कि सुना है यहां मुसलमान रहते हैं. मेरा नज़दीकी दोस्त मुसलमान ही था. उसका सारा परिवार वहां आ चुका था. मेरी मां ने कहा कि सब पाकिस्तान चले गए. उसी समय मैं कहने ही वाला था कि सब नीचे हैं कोई पाकिस्तान नहीं गया है. मैं मां की तरफ से इशारा पाकर चुप हो गया.बाप्सी सिधवा की फ़िल्म में ऐसा ही होता है लेकिन बच्चा कह देता है कि वो यहां हैं.

आप शरणार्थी थे लेकिन आप एक अमीर घर में पैदा हुए थे.

इसमें कोई शक़ नहीं है. लेकिन दो बार हम शरणार्थी बने. पिताजी दिल्ली आए और ज़ल्द ही अपना व्यवसाय स्थापित कर लिया. पिताजी बड़े लोगों के साथ काम करते थे लेकिन हमें घर की बड़ी समस्या थी. हम फ़िरोज़शाह रोड पर एक कमरे में रहते थे. पिता जी हमें अच्छे स्कूल में दाख़िल कराना चाहते थे लेकिन मार्डन स्कूल में हमारा दाख़िला नहीं हो पाया और पढ़ाई के लिहाज़ से 1948 का साल पूरा ख़राब हो गया. मां ने बिना किसी को बताए हमें एक दिन बस पर बैठाया और देहरादून ले जाकर वेलहम स्कूल में भर्ती करा दिया. कुछ ही दिनों बाद मैं और मेरे भाई दून स्कूल में पढ़ने लगे. एक दिन स्कूल में प्रार्थना के बाद हमें हेडमास्टर ने कमरे में बुलाया और एक त्योहार मनाने के लिए दिल्ली जाने को कहा. हम ख़ुश हो गए लेकिन जब हम घर पहुंचे तो माहौल देखकर धीरे-धीरे समझ गए कि पिता जी का देहांत हो गया था. पिता जी की हवाई दुर्घटना में मौत हुई थी. पिता जी ख़ुद ऑडीटर थे तो अपने खाते वगैरह अजीबोग़रीब तरीके से रखते थे. देहांत के बाद बैंक के खाते में तीन हज़ार रुपए मिले. लेकिन ज़ल्द ही तीन लाख रुपए की एक बीमा पॉलिसी मिली जिससे हमें राहत मिली. मां ने दून स्कूल में हमारे हेडमास्टर से अपनी समस्या बताई कि हमारे पास बहुत पैसे नहीं रह गए हैं इसलिए बच्चों को डे-स्कॉलर बना दें. मेरी मां की वजह से ही हम तीनों भाई दून स्कूल से पढ़कर निकले. मेरी मां पढ़ाई को सबसे अहम मानती थी. लेकिन हमारे कमरे में पंखा नहीं था और तीन साल तक घर पर पहने जाने वाले कपड़े के नाम पर कुछ नहीं था सिर्फ़ स्कूल के कपड़े थे. जब मैं सोलह साल का था तो मेरे मौसा ने मेरे लिए देवानंद स्टाइल की रंगीन बुश-शर्ट ख़रीदी थी. उन दिनों मैं देवानंद का फ़ैन हुआ करता था. तो इस तरह से हमने दिक्कतें भी झेली हैं. शायद यही वजह थी कि मैं वामपंथी हो गया.

आप देवानंद की तरह बोलने का शौक रखते थे.

ऐसा नहीं था लेकिन आप मुझे दाहिने तरफ से देखिए तो मैं देवानंद की तरह दिखूंगा और बाएं तरफ से जॉनी वाकर लगूंगा.

चलिए आपने ख़ुद ही पूरी बात कह दी. नहीं तो मैं कहता कि आप ग़लतफ़हमी में हैं. आपकी पसंद का एक और गाना.

अभी न जाओ छोड़कर ये दिल अभी भरा नहीं.....

राजीव गाँधी से कहाँ मुलाक़ात हुई वहीं दून स्कूल में.

मैं 1952 में पढ़ने गया और राजीव गांधी 1955 में आए थे. वो मुझको जानते थे लेकिन मैं उनको नहीं जानता था. वो मेरे भाई के साथ के थे. मैं उनको थोड़ा बहुत जानता था. प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव बन कर आने पर ही मैं उन्हें जान पाया. अच्छा भी हुआ कि मैं उनको नहीं जानता था क्योंकि अगर दोस्ती होती तो ये स्वीकार करना कठिन हो जाता कि वो प्रधानमंत्री हैं और मैं संयुक्त सचिव. देखिए उनके क़रीबी दोस्त जैसे अरुण सिंह आदि इस दौर मैं आगे नहीं बढ़ पाए. लोगों को ऐसा लगता है कि हम और राजीव दून और कैंब्रिज़ के दोस्त हैं. मैं ख़ुश हूँ कि मेरा उनसे कोई ख़ास रिश्ता नहीं था. प्रधानमंत्री कार्यालय आने के बाद हमारा नज़दीकी रिश्ता बना. लेकिन स्कूल में वो मुझे ज़रूर जानते होंगे तभी मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय में बुलाया और अपने दौरे का इंतजाम करने का काम दिया. उन्हें दूर-दराज़ के इलाक़ों में जाकर दबे हुए फ़िरकों से मिलने में दिलचस्पी थी और ये मेरी भी दिलचस्पी का विषय था इसलिए उन्होंने मुझे अपने यहाँ बुलाया. मुझे भारत के दूर-दराज़ के इलाक़ों में रहने वालों से मिलने में मज़ा आता था कि जाएं वहां और उन्हीं से पूछें कि क्या करना चाहिए उनके भले के लिए. बड़ी लगन से मैं ये काम करने लगा. उसी से ये निकला कि सिर्फ़ आईएएस अधिकारियों से कुछ होने वाला नहीं है पंचायतों को मजबूत करने की ज़रूरत है. मुझे उन्होंने ये काम सौंपा. उनके कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों में पंचायतीराज पर काम हुआ. और आज उसी का परिणाम है कि मैं इस देश का पंचायतीराज मंत्री हूँ. आज़ादी के बाद मैं देश का पहला पंचायतीराज मंत्री हूँ.

देश के लिए और मेरे लिए निज़ी तौर पर भी राजीव जी का देहांत बहुत बड़ा नुकसान है. जब पिता जी का देहांत हुआ तब तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया लेकिन जब राजीव का देहांत हुआ तो मैं 50 साल का था और बहुत कुछ आधार तैयार किया था कि कैसे इनके साथ मिलकर काम करना है. मैं अपने पहले चुनाव की तैयारी कर रहा था. राजीव 22 मई, 1991 को मेरे क्षेत्र में सुबह सभा संबोधित करने आने वाले थे. मैं चुनाव प्रचार कर अपने कैंप में लौटा तो मुझे बताया गया कि राजीव जी के साथ हादसा हो गया है. मुझे विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब बीबीसी रेडियो सुना तो विश्वास हुआ.

एक इंसान के रूप में आप कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कैसे देखते हैं?

निज़ी तौर पर मैं उन्हें थोड़ा कम ही जानता हूँ. जैसे राजीव के साथ काम किया वैसे उनके साथ कभी काम करने का मौक़ा नहीं मिला. लेकिन फिर भी 25-28 साल का परिचय तो है ही इसलिए मैं कह सकता हूँ कि उनमें कोई ख़्वाहिश नहीं थी राजनीति में आने के लिए. वो चाहतीं तो अपने पति के देहांत के बाद ही अध्यक्ष बन सकती थीं लेकिन वो नहीं बनी. पार्टी की स्थिति बहुत ख़राब होने के बाद ही वो राजनीति में आईं.

उनके बारे में कुछ ऐसा बताएं जो आम आदमी नहीं जानते.

इसका ज़वाब देना मेरा लिए मुश्किल है क्योंकि मेरा उनसे नज़दीकी रिश्ता नहीं रहा.

एक और पसंद का गाना बताएं.

हम बीटल्स की पीढ़ी के हैं और आप उन्हीं का एट डेज़ अ वीक... गाना सुनवाएं.

 मैं 1952 में पढ़ने गया और राजीव गांधी 1955 में आए थे. वो मुझको जानते थे लेकिन मैं उनको नहीं जानता था. वो मेरे भाई के साथ के थे. मैं उनको थोड़ा बहुत जानता था. प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव बन कर आने पर ही मैं उन्हें जान पाया. अच्छा भी हुआ कि मैं उनको नहीं जानता था क्योंकि अगर दोस्ती होती तो ये स्वीकार करना कठिन हो जाता कि वो प्रधानमंत्री हैं और मैं संयुक्त सचिव. देखिए उनके क़रीबी दोस्त जैसे अरुण सिंह आदि इस दौर मैं आगे नहीं बढ़ पाए. लोगों को ऐसा लगता है कि हम और राजीव दून और कैंब्रिज़ के दोस्त हैं. मैं ख़ुश हूँ कि मेरा उनसे कोई ख़ास रिश्ता नहीं था. प्रधानमंत्री कार्यालय आने के बाद हमारा नज़दीकी रिश्ता बना.

कॉलेज़ के दिनों का कोई पहला प्यार या लगाव जो आपको हुआ हो.

पहला प्यार या लगाव तो नूतन थीं जो कभी मिली नहीं. 1959 की बात है हमें और योगेश चंद्र को कॉलेज़ की ओर से इंडियन मिलिट्री एकेडमी में भाषण प्रतियोगिता में भेजा गया था वहां लेडी इरविन कॉलेज़ की दो लड़कियां भी आई थीं. एक मेरे बगल बैठी थी और दूसरी योगेश के साथ. हमने तय किया कि लड़कियों से चाल चली जाए या टीचर के पीछे पड़ जाया जाए. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जो लड़की सुनीतवीर सिंह मेरे बगल बैठी थी उससे 14 साल बाद मेरी शादी हुई.

तो सिलसिला वहीं से शुरू हुआ.

हम दोनों एक ही ग्रुप के थे और हमारे दोस्त भी एक थे. इसलिए मिलना होता रहा. और मैंने तय किया कि इन्हीं से शादी करनी है.

सुनीतवीर सिंह गृहणी हैं या कुछ काम भी किया.

अधिकतर तो परिवार को ही संभाला है. वो लिखती बहुत बढ़िया थीं लेकिन जब पैसे की ज़रूरत होती तभी लिखतीं. वेतन आयोग की सिफ़ारिशें आने से पहले वो पैसा कमाने के लिए कुछ लिखती थीं लेकिन जैसे ही वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू हुईं तो उन्होंने लिखना ही छोड़ दिया. उन्होंने 25 साल पहले दिल्ली के सीलमपुर इलाक़े जाकर वहां रहने वाले लोगों के ऊपर बहुत ही बेहतरीन लिखा था.

 मेरा सोचना है ये पैसा आप पंचायत युवा खेल योजना पर लगा दीजिए. इस ओलंपिक में तो नहीं लेकिन 2012 के ओलंपिक में हम आपको बेहतर प्रदर्शन करके दिखा देंगे. बस मुझे 2016 तक की छूट दे दीजिए. आप कहते हैं कि संविधान में खेल राज्य सूची का विषय है और सारा पैसा खेल संघों को दे दिया जाता है. अधिकतर खेल संघों के अध्यक्ष राजनेता हैं. जबतक पैसा इस तरह से ख़र्च होता रहेगा तबतक ऐसे ही नतीज़े सामने आएंगे.

आपकी पसंद का एक और गाना.

ए मेरे वतन के लोगों....

कोई और?

जलते हैं जिसके लिए..

आपकी तीन बेटियाँ हैं और आप उनसे बहुत ख़ास ताल्लुक़ रखते हैं.

मेरी बड़ी लड़की ने ऑक्सफ़ोर्ड और न्यूयॉर्क से पढ़ाई की और पिछले आठ सालों से वक़लत कर रही है. उसकी ज़ल्दी ही शादी होने वाली है. दूसरी बच्ची ने कैंब्रिज़ और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स में पढ़ाई की. वो आजकल विश्वबैंक के दिल्ली कार्यालय में सलाहकार का काम कर रही है. तीसरी बेटी ने कैंब्रिज़ में पढ़ाई की और वहां उसने सर्वश्रेष्ठ निबंध का एक पुरस्कार भी जीता. अभी हार्वर्ड में पीएचडी की पढ़ाई कर रही है.

आपके परिवार में सब पढ़े लिखे हैं. ये अनुवांशिकी की बात है या कुछ और.

अनुवांशिकी की बात तो ये है ही लेकिन परिवार के संस्कार बड़ी चीज़ है. जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पहले स्थान पर आया तो सोचा कि मैं भी विदेश पढ़ने जाऊं लेकिन घर में पैसे तो थे नहीं. इसलिए स्कॉलरशिप की तलाश करने लगा. मेरी मां ने मुझसे कहा कि तुम अपनी ज़िंदगी कर्ज़ से क्यों शुरू करना चाहते हो और उन्होंने पिता जी के पैसों से मुझे मेरा हिस्सा दे दिया. मैं उन पैसों से कैंब्रिज़ पढ़ने गया. जब मेरे पास हिंदुस्तान लौटने का पैसा नहीं था तो उन्होंने पिताजी के क्लाइंट रहे जयदयाल डालमिया से मुझे अनुदान दिलवाया और मैं हिंदुस्तान आ सका.

आप भारत के खेल मंत्री भी हैं. हिंदुस्तान में क्रिकेट को लेकर जो दीवानगी है उस पर आप का क्या कहना है?

देखिए क्रिकेट एक खेल है इसे जंग बनाने की ज़रूरत नहीं है. कुछ दिन पहले जब हम जीते थे तो सब कहते थे कि बीसीसीआई जैसी कोई संस्था नहीं है. लेकिन हम जैसे ही हारे सब लोग कुछ-कुछ बोलने लगे. और विक्टोरिया के जमाने की दो पंक्तियां याद रखनी चाहिए..ये बड़ी बात नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा बल्कि ये महत्वपूर्ण है कि आप ने खेल कैसे खेला. मुझे अफ़सोस है कि हम विश्वकप में अच्छा नहीं कर पाए और बांग्लादेश जैसी टीम से हार गए.

लेकिन हम जैसे ज्ञान के क्षेत्र में एक शक्ति हैं वैसे खेल के क्षेत्र में क्यों नहीं बनते?

इसकी सबसे बड़ी वजह मैं आपको बताना चाहता हूँ. हमारे यहां 77 करोड़ लोग 35 साल से कम उम्र के हैं. लेकिन स्कूल-कॉलेज़ों में सिर्फ़ पांच करोड़ लोगों के खेलने की व्यवस्था है. 72 करोड़ लोगों को संगठित तरीके से खेलने के लिए कोई सुविधा नहीं मिली हुई है. इसकी तुलना में एक उदाहरण रखता हूँ क्यूबा का.1968 के ओलंपिक खेलों में क्यूबा तीसवें पायदान पर था लेकिन 12 सालों में ही वह चौथे पायदान तक पहुँचा. और आज वो खेल में पहले दस देशों में रहता है. वहां हर बच्चा स्कूल जाता है. उसको शारीरिक शिक्षा दी जाती है. पांच साल की उम्र तक वो पता कर लेते हैं कि किस बच्चे में खिलाड़ी बनने का शौक़ है. जब बच्चे 12-13 साल के होते हैं तो उनमें से अच्छे खिलाड़ियों को अलग कर ख़ास कॉलेज़ में डाल कर प्रशिक्षित किया जाता है. खेल-जीवन समाप्त होने के बाद भी सरकार उनके लिए आजीविका व्यवस्था करती है. हमें ऐसी व्यवस्था करनी होगी तभी परिणाम सामने आएंगे. अगर कोई विस्तृत योजना नहीं बनाई तो ऐसा ही चलता रहेगा. कभी-कभी कोई ग़लती से मेडल जीत लाया करेगा. हमारी फुटबॉल टीम ने 1950 में विश्वकप के लिए क्वालीफ़ाई किया लेकिन जूते न होने की वजह से उन्हें खेलने नहीं दिया गया. जबतक हम ये नहीं समझेंगे कि खेलने की क्षमता पांच साल की उम्र में तय हो जाती है तब तक हम बेहतर नहीं कर पाएंगे. कॉमनवेल्थ खेलों में पांच-छह हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा रहे हैं. मेरा सोचना है ये पैसा आप पंचायत युवा खेल योजना पर लगा दीजिए. इस ओलंपिक में तो नहीं लेकिन 2012 के ओलंपिक में हम आपको बेहतर प्रदर्शन करके दिखा देंगे. बस मुझे 2016 तक की छूट दे दीजिए. आप कहते हैं कि संविधान में खेल राज्य सूची का विषय है और सारा पैसा खेल संघों को दे दिया जाता है. अधिकतर खेल संघों के अध्यक्ष राजनेता हैं. जबतक पैसा इस तरह से ख़र्च होता रहेगा तबतक ऐसे ही नतीज़े सामने आएंगे.

आपके सर्वप्रिय अभिनेता कौन हैं.

जवानी के दिनों में नूतन प्रिय थीं और बु़ढ़ापे में माधुरी दीक्षित अच्छी लगने लगीं. वो कमाल की अदाकारा हैं.

 देखिए क्रिकेट एक खेल है इसे जंग बनाने की ज़रूरत नहीं है. कुछ दिन पहले जब हम जीते थे तो सब कहते थे कि बीसीसीआई जैसी कोई संस्था नहीं है. लेकिन हम जैसे ही हारे सब लोग कुछ-कुछ बोलने लगे. और विक्टोरिया के जमाने की दो पंक्तियां याद रखनी चाहिए..ये बड़ी बात नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा बल्कि ये महत्वपूर्ण है कि आप ने खेल कैसे खेला. मुझे अफ़सोस है कि हम विश्वकप में अच्छा नहीं कर पाए और बांग्लादेश जैसी टीम से हार गए.

और पुरुष अभिनेताओं में कौन पसंद हैं.

अरे पुरुष अभिनेताओं को कौन देखता है. बचपन में तो देवानंद पसंद थे. अब हॉलीवुड का डस्टिन हॉफ़मन बहुत पसंद है. और वो मक़बूल फ़िल्म में एक अभिनेता है उसका नाम याद नहीं आ रहा है वो भी पसंद है. अभिनेता बहुत बेहतर होते जा रहे हैं. नसीरुद्दीन शाह बढ़िया अभिनेता हैं.

अभी हाल में कौन सी फ़िल्म देखी है.

मेरी बेटी की एक दोस्त है उसका छोटा सा क़िरदार था डॉन फ़िल्म में तो वो फ़िल्म देखने गया था. मैं पहली बार मल्टीप्लेक्स में गया. वहां लगा कि क्या अज़ीबोग़रीब ख़र्चा है. मुझे याद है कि कॉलेज़ के दिनों में मेरे एक दोस्त के भैया ने हमें रिवोली सिनेमाघर में फ़िल्म दिखाई थी जिसका टिकट साढ़े तीन रुपए का था लेकिन आज मल्टीप्लेक्स में एक टिकट 190 रुपए का है. जमाना बदल गया है और हम पीछे छूट गए हैं. मुझे मीरा नायर और मणिरत्नम बहुत पसंद हैं. प्रिटी जिंटा भी बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं.

कोई ऐसा क्षण जिसे सोचकर आप अफ़सोस करते हों.

नहीं कोई ऐसा क्षण नहीं है जिस पर मैं अफ़सोस करूं. दरअसल मैं ज़िदगी में
अफ़सोस करता ही नहीं हूँ.

मन की कोई ऐसी इच्छा जो पूरी न हुई हो.

मैं चाहता हूँ कि पंचायतीराज इस देश में कामयाब हो. मेरा पूरा विश्वास है कि लोगों की भागेदारी रहेगी तो समृद्धि आएगी. और हम अगर ये सोचें कि विदेश में पढ़े-लिखे हम लोग ही दुनिया को सिखाएंगे तो काम बनने वाला नहीं है. बहुत अफ़सोस की बात है कि उसी तरह का प्रशासन जो अंग्रेज़ों ने अपने फ़ायदे के लिए तैयार किया था उसका इस्तेमाल आजतक हो रहा है. जबतक हम लोकतंत्र को जमीन से नहीं जोड़ते हैं और भारत का निर्माण भारत के लोगों से नहीं होगा और ये नहीं कि इंडिया में रहने वाले लोग भारत का निर्माण करें. हम 9.2 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहे हैं और देश में आज जापान से अधिक अरबपति हैं. दुनिया के देशों में करोड़पतियों की संख्या में हम आठवें पायदान पर हैं लेकिन संयुक्त राष्ठ्र मानव विकास सूचकांक में हम 126वें पायदान पर हैं. हमें मानव विकास सूचकांक में अपनी स्थिति सुधारने के लिए कोशिश करनी चाहिए.

ये तो आपने ऐसी बात कही जो कोई बड़ा विचारक कहता है लेकिन कोई छोटी सी महत्वाकांक्षा.

काश. मैं कभी फिर से क़बाब खा पाऊं. क्योंकि जब से मुझे दिल का दौरा पड़ा है और डाइबिटीज़ हुआ है तब से मैं इसे दूसरों को ही खाते देखता हूँ.

कुछ नहीं होगा साहब आपको आप खाते रहिए क़बाब.

ऐसे डॉक्टर मिल जाएं तो मजा आ जाए.

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