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अनिल कपूर के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. आज हमारे साथ हैं एक ऐसी शख़्सियत जिन्होंने 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में बॉलीवुड में एक सोलो फ़िल्म से इंट्री ली थी. उस संगीतमय फ़िल्म में बहुत ही ख़ूबसूरत सी हीरोइन उनके साथ थीं. उनकी आवाज़ का जादू कुछ वैसे ही छाया जैसे अमिताभ बच्चन का हुआ करता था. पिछले 25 सालों से लगातार वो इंडस्ट्री में बने हुए हैं. 'एक मुलाक़ात' में हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के सदाबहार अभिनेता अनिल कपूर से. फ़िल्म जगत में आपकी पिछले 25 वर्षों की यात्रा कैसी रही? मुझे लगता है मैं उन कुछ ख़ुशनसीबों में हूँ जिन्हें उनका चाहा हुआ सबकुछ मिल जाता है. मुझे मेरे भगवान, परिवार और बड़ों का आशीर्वाद है. मेरा एक सुंदर सा परिवार है. मेरे साथ हमेशा अच्छा ही हुआ है. मैंने अच्छे लोगों के साथ काम किया है. बहुत ही बेहतरीन सफ़र रहा है. मुझे तो लगता है कि जैसे ये यात्रा अभी शुरू ही हुई है. मैं जब कल एक इंटरव्यू कर रहा था तो लगा जैसे मैं पहला ही इंटरव्यू ही कर रहा हूँ. जो भी काम करें पूरे मन से करें. जब सभी इंटरव्यू हो गए तो मैंने पूछा कि अगर कोई और हो तो बुलाओ उसे. मैंने देखा है कि लोग इंटरव्यू तो देते हैं लेकिन उनका मन कहीं और होता है. वो ऐसे इंटरव्यू देते हैं जैसे अहसान कर रहे हों. इसी बात के लिए तो हमने पूरी ज़िंदगी मेहनत की है. मैं तो भगवान का आभारी हूँ कि लोग मुझे आज भी सुनना चाहते हैं. मुझसे सभी पत्रकार इंटरव्यू में पूछने लगे कि मैं अपनी ही फ़िल्म 'गांधी माई फ़ादर' में क्यों नहीं हूँ. मैं तो यही समझ रहा था कि सर मुड़वाकर फ़िल्म में गांधी का रोल आप ही कर रहे हैं. क्यों नहीं काम किया आपने फ़िल्म में? मेरा पूरा परिवार पिछले 50 वर्षों से फ़िल्में बना रहा है. हम लोग विषय के साथ पूरा न्याय करते हैं. मैंने भी ये फ़िल्म पूरी ईमानदारी से बनाने की कोशिश की. हमने इस फ़िल्म में हर भूमिका के लिए ऑडिशन किए. जो सबसे बेहतर था उसे ही लिया गया. अगर मैं उस फ़िल्म में किसी भूमिका में नहीं हूँ तो समझ लीजिए कि मैं उसके लिए सबसे अच्छा विकल्प नहीं था. मैंने अपने क़रीबी दोस्तों से जब बात की तो उनका भी कहना था कि या तो मैं अभिनेता बनूँ या निर्माता बनूँ. दोनों भूमिकाएँ एक साथ करने पर मैं फ़िल्म के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा. मुझे भी ऐसा ही लग रहा था. हो सकता है कि मेरे अंदर ये क्षमता ही न हो कि मैं दोनों चीज़ें कर पाऊं. लेकिन बहुत से अभिनेता हैं जो फ़िल्म में काम भी करते हैं और निर्माता भी बनते हैं.
आपमें इतने सुलझे हुए विचार पहले से ही थे या ये समझ धीरे-धीरे विकसित हुई. पहले आप ‘वो सात दिन’ में एक सीधे-साधे आदमी की भूमिका मे आए. लेकिन फिर ‘मेरी जंग’ में अमरीश पुरी के ख़िलाफ़ लड़ते एक वकील की भूमिका में नज़र आए. आगे रामलखन, किशन कन्हैया, रखवाला जैसी फ़िल्मों में आपने टपोरी की भूमिका निभाई. इतनी विविधता भरी भूमिकाएँ कैसे कर लेते थे. पहले तो आप कई शिफ़्टों में काम करते रहे होंगे? मैंने रोशन तनेजा साहब के यहाँ एक साल अभिनय का प्रशिक्षण लिया है और मैं उनका बहुत सम्मान भी करता हूँ. मैंने हमेशा से ही कम काम किया है. फिर भी तीन-चार फ़िल्में हो ही जाती थीं. जब मुझे विदेश जाकर विदेशी फ़िल्मकारों से मिलने का मौका मिला तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि हम तीन-चार फ़िल्मों में एक साथ काम कैसे कर लेते हैं. दरअसल हम भारत के लोग बहुत क्षमतावान हैं और मैं भी एक भारतीय हूँ. शायद इसीलिए मैं भी ऐसा कर पाता हूँ. मुझे भारतीय होने पर गर्व है. इन सब किरदारों में आपके सबसे क़रीब कौन सा किरदार होता था. वो सीधा-साधा आदमी, स्ट्रीट स्मार्ट, टपोरी या एंग्री यंगमैन वाला किरदार. 1980 के दशक में तो आप ‘एंग्री यंगमैन’ की भूमिका वाले किरदारों में अमिताभ से भी आगे निकल गए थे? सबसे पहले तो मैं ये ईमानदारी से कहना चाहूँगा कि मैंने उनसे आगे नहीं निकल पाया. वो महानतम अभिनेताओं में से हैं. हाँ, ये सच है कि मैं ऐसी कई फ़िल्मों में काम किया जिनकी पटकथा अमिताभ जी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी. मैंने तो जब ‘मेरी जंग’ देखी तो लगा कि ये तो अमिताभ साहब की फ़िल्म में अनिल कपूर हैं. बहुत ही बढ़िया भूमिका की थी आपने. हाँ, पहले वो इस फ़िल्म को करने वाले थे. ‘मिस्टर इंडिया’ भी पहले वही करने वाले थे. लेकिन मैंने इस भूमिकाओं में अपना अंदाज जोड़ा. अगर आप 'मिस्टर इंडिया' देखें तो आपको कहीं से नहीं लगेगा कि इस फ़िल्म को पहले अमिताभ करने वाले थे. फिर जावेद साहब की लिखी फ़िल्मों में काम किया जो अमिताभ जी के लिए फ़िल्में लिखा करते थे. यश चोपड़ा की फ़िल्मों में काम किया जो अमिताभ जी को लेकर फ़िल्में बनाया करते थे. लोगों ने अमित जी से तुलना की तो मैंने इसे एक सम्मान माना कि चलो यहाँ तक तो पहुँच गए कि लोग अमित जी से तुलना कर रहे हैं. मानें या न मानें लेकिन आप 1980 के दशक के सबसे बड़े स्टार तो थे ही. मैं कभी उसके बारे में सोचा ही नहीं. मैं सिर्फ़ काम करता था. लोग कहते थे कि अनिल कपूर मैगज़ीन के कवर पर छपा है तो मुझे बहुत असर नहीं पड़ता था. मेरा करियर ग्राफ़ बहुत अधिक उतार-चढ़ाव भरा नहीं रहा है. मैं हर एक-दो साल में हिट फ़िल्में दे ही दिया करता था. घर-परिवार में भी कोई दिक्कत नहीं रही. भगवान की दया से सब अच्छा ही रहा. अपनी पसंद का एक गाना बताइए. मेरा बहुत ही पसंदीदा एक गाना है जिसे सुनकर मुझे मेरी बीबी से प्यार हुआ था. मैं आपको गाना गाकर सुनाता हूँ पल-पल दिल के पास तुम रहती हो... आपकी आवाज़ बहुत ही अच्छी है. अगर आप अभिनेता न होते तो आप एक गायक ज़रूर बन सकते थे. हाँ पहले मैं रियाज़ किया करता था. मैं कह सकता हूँ कि जो भी एक्टर फ़िल्मों में गाते हैं मैं उनसे बेहतर गायक बन सकता था. अच्छा तो आपको संगीत का भी शौक़ है. आप बाकायदा रियाज़ भी करते थे? हाँ मैं रियाज़ भी किया करता था. ‘वो सात दिन’ में मैं संगीत निर्देशक बनने बंबई आता हूँ. मेरे पास हमेशा एक हारमोनियम रहता है. आप देखेंगे कि मैं उस हारमोनियम में बहुत कम्फ़र्टेबल महसूस करता हूँ. ‘वो सात दिन’ की शूटिंग 1982 में हुई थी. मैंने 1977-78 में छोटे इकबाल साहब से संगीत सीखा था. जब मैं सातवीं में पढ़ा करता था और 12-13 साल की उम्र रही होगी तो एक फ़िल्म ‘तू पायल मैं गीत’ में मैंने शशि कपूर के बचपन का रोल निभाया था. मैंने घर में बिना बताए ऑडिशन दिया था और चुना गया था. उसमें मुझे सितार बजाना था. मैंने कहा कि मुझे तो सितार बजाना आता नहीं. मेरे निर्देशक ने बताया कि बांद्रा में एक गुरू जी हैं जो सितार सिखाते हैं. मैं सोचा अगर बिना सितार बजाना सीखे फ़िल्म में काम किया तो बहुत ख़राब लगेगा. एक महीने तक मैं बस से सितार सीखने जाता था. मैं हमेशा से ही काम को पूरे जुनून के साथ किया करता था. अगर काम ढंग से न हो रहा हो तो लगता है कि यार मज़ा नहीं आ रहा है. इसी तरह मैंने घुड़सवारी और तैराकी भी सीखी. मैंने कोई भी चीज़ इतनी ही सीखी कि जब मैं स्क्रीन पर आऊं तो लगे कि मुझे ये चीज़ आती है. ये सब इसलिए किया जिससे अपनी एक्टिंग ठीक तरीके से कर सकूँ. कन्फ़्यूज़न कभी नहीं था कि ज़िंदगी में क्या करना है. मैं हमेशा से अभिनेता बनना चाहता था. आसपड़ोस के लोग, घर-परिवार वाले भी कहते थे कि तुम में कुछ है, तुम एक्टर बन सकते हो या ये ग़लतफ़हमी सिर्फ़ आपको थी? सिर्फ़ मुझे ही ये ग़लतफ़हमी थी. सब पागल समझते थे. लोग कहते थे कि ये दुबला-पतला, बड़े-बड़े बालों के बीच छोटा सा मुँह, पतली टांगों वाला लड़का कैसे हीरो बनेगा. बस एक जोश था. मैं घर में चिल्ला-चिल्लाकर संवादों का अभ्यास नहीं कर सकता था इसलिए अपने दादा जी के साथ टहलने जाता था. उस इलाक़े में कोई नहीं रहता था. वहाँ मैं एक आठ-दस मंज़िल ऊँची टंकी पर चढ़कर प्रैक्टिस किया करता था. बहुत बढ़िया अनिल साहब. लोगों को पता चलना चाहिए कि ऊँचाई पर पहुँचने के लिए कितनी कोशिश करनी पड़ती है. कितना जुनून चाहिए होता है? और ये जुनून पैदा नहीं किया जा सकता. ये आप में होगा या नहीं होगा. कोई भी सोचता होगा कि इस उम्र में ये दादा जी के साथ क्यों टहलने जा रहा है. इसे तो मस्ती करनी चाहिए. लेकिन मैंने सोचा दादा जी के साथ जाकर मैं अपना काम आसानी से कर सकता हूँ.
आपने किसी इंटरव्यू में कहा था कि आप डांस नहीं सीख पाए. वैसे मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ. लेकिन आप बताइए क्या आप सच में नहीं सीख पाए या ऐसे ही कह दिया था? भगवान दादा के टपोरी डांस के कुछ स्टेप मुझे डांस मास्टर कमल ने सिखाए थे. मुझसे पहले अमिताभ बच्चन इसे किया करते थे. अमित जी तो उत्तर भारत के थे. लेकिन मैं तो मुंबई का ही था और चेंबूर में रहता था. ये टपोरी डांस भी टिपिकल महाराष्ट्रियन था. इसलिए ये मैं इसे बहुत नेचुरली सीख सका. मुझे रिदम की थोड़ी समझ है इसलिए भांगड़ा के भी कुछ स्टेप करने लगा. लेकिन पश्चिमी देशों के डांस मैं नहीं कर पाता था. अगर किसी फ़िल्म में आपको मेरा डांस पसंद आएगा तो उसकी वजह ये है कि मैंने अपनी स्टाइल में डांस किया होगा. अगर आप मुझे बंदिश में डाल देंगे और चाहेंगे कि मैं प्रभुदेवा या मिथुन जैसा डांस करूँ तो दिक्कत हो जाएगी. फिर ताल फ़िल्म में कैसे डांस किया? सरोज जी के साथ काम करते-करते थोड़ा-बहुत नाचना आ गया. गाने की पैकेजिंग इतनी अच्छी थी कि मैं भी आपको अच्छा लगने लगा. अपनी पसंद का एक और गाना बताइए. मैंने कुछ ऐसी फ़िल्में भी कीं जिनको देखकर लगा कि इनका संगीत ही सब कुछ है. अब ‘1942 अ लव स्टोरी’ को ही लीजिए. मैंने ये फ़िल्म इसके संगीत की वजह से ही की थी. विनोद चोपड़ा मेरे पास आए तो मैंने उनसे कहा यार इस फ़िल्म में मुझे क्यों ले रहा है. मैं तीन बच्चों का बाप हूँ और तुम मुझसे लव स्टोरी करवा रहे हो. इसमें रोमियो-जूलियट की तरह का सीन भी था. तब उन्होंने मुझे रिकॉर्ड किया हुआ एक गाना सुनाया कुछ न कहो… मैंने सोच लिया कि मैं ये फ़िल्म ज़रूर करूँगा. आप मुझे वही गाना सुनवा दीजिए. ‘1942 अ लव स्टोरी’ का एक और गाना है जो मुझे पसंद है एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा... मुझे लगता है कि इस गाने को इतिहास में जगह में मिलनी चाहिए. कुमार शानू ने बहुत अच्छा गाया था. फ़िल्म के लिए कुमार शानू का नाम मैंने ही सुझाया था. कुमार शानू दाढ़ी बढ़ाए हुए आया था. फ़िल्म निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने कुमार शानू से कहा कि यार मेरा इतना रोमांटिक गाना तुम ऐसी शक्ल में गाओगे, जाओ पहले दाढ़ी बनाओ. एक और किस्सा है. गाने को फ़िल्माने के लिए विधू के पास पैसे नहीं थे. उन दिनों विधू के पास बहुत पैसे नहीं हुआ करते थे. फ़िल्म के संगीतकार पंचम दा थे. उन्होंने कहा कि विधू तुम गाना फ़िल्माओ पैसा मैं लगाऊंगा और फिर उन्होंने पैसे दिया. गाना बहुत बढ़िया फ़िल्माया गया था. ये गाना फ़िल्माया था संजय लीला भंसाली ने. तब ही मुझे उनकी प्रतिभा का अंदाजा हुआ था. गाने में मेल सिंगर था तो ये मेरे ऊपर फ़िल्माया जाना चाहिए था लेकिन सारे शॉट्स मनीषा कोइराला पर फ़िल्माए जा रहे थे. मैंने संजय से बहुत बहस की थी. गाना में बहुत काव्यात्मकता थी. मुझे बाद में अहसास हुआ कि वो सही थे और मैं ग़लत. अभी आप प्रभुदेवा और मिथुन का नाम ले रहे थे. आपके हिसाब से भारत में ऐसा कौन सा डांसर है जिसे देखकर आपको लगता हो कि काश, मैं भी ऐसे नाच पाता? मेरे हिसाब से प्रभुदेवा आज की तारीख़ में देश के सबसे बेहतरीन डांसर हैं. ऋतिक रोशन और श्यामक डावर भी बढ़िया डांस करते हैं. ऐसी कौन सी फ़िल्म है जिसे आप अपने करियर की ‘ब्रेक थ्रू’ फ़िल्म की तरह देखते हों? कई ऐसी फ़िल्मे हैं जैसे परिंदा, वो सात दिन, लम्हे, मिस्टर इंडिया, राम लखन, तेज़ाब, 1942 अ लव स्टोरी. आपको अपनी किस फ़िल्म की भूमिका सबसे अधिक पसंद आती है? मैं अपनी फ़िल्मों को दोबारा देखता नहीं हूँ. मैं अतीत की बातें में जाना पसंद नहीं करता. इसलिए इस पर कुछ कह नहीं सकता. 1980 और 1990 के दशक में श्री देवी और माधुरी दीक्षित दो बड़ी हीरोइनें रहीं. उन दोनों के साथ ही आपने कई फ़िल्में कीं. आपके ज़्यादा क़रीब कौन था? मैंने माधुरी जी के साथ अधिक काम किया है. वो मुंबई से हैं. इसलिए उनसे अधिक जुड़ाव महसूस करता हूँ. मेरे साथ काम करके ही उनके करियर का ग्राफ़ आगे बढ़ा. तेजाब से उनको पहचान मिली. मैंने जब श्री देवी के साथ काम करना शुरू किया तो वो बड़ी स्टार थीं और मैं उभरता सितारा था. उनके साथ भी मैंने बहुत काम किया. ‘लम्हे’ और ‘मिस्टर इंडिया’ में वो मेरे साथ थीं. उनकी शादी मेरे भाई के साथ हुई है तो अब वो मेरी भाभी बन गईं हैं. वो बहुत ही अच्छी अदाकार हैं. मैं बेहतरीन डांसरों में श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित को भी शामिल करूंगा. आपकी ऑलटाइम सबसे पसंदीदा अदाकारा कौन हैं? अलग-अलग फ़िल्मों में अलग-अलग अदाकारा पसंद आईं. नरगिस जी का काम पसंद था. ‘पाकीज़ा’ में मीना कुमारी अच्छी लगीं थीं. मधुबाला बहुत सुंदर लगती थीं. अभिनेताओं में सबसे अच्छा कौन लगता है? दिलीप कुमार, राज कपूर, नसीरुद्दीन शाह, अमिताभ बच्चन, कमला हसन, रॉबर्ट डी नीरो, अलपचीनो. इन सबका काम बहुत पसंद है. आजकल ‘खानों’ की चर्चा है. आपका पसंदीदा ‘खान’ कौन सा है? तीनों की अपनी ख़ूबियाँ और कमियाँ हैं. सलमान स्क्रीन पर सबसे बढ़िया दिखाई देता है. अपने काम के लिए जो गंभीरता, प्रतिबद्धता और ईमानदारी आमिर खान में है वो कहीं और देखने को नहीं मिलेगी और शाहरुख की ऊर्जा, चार्म, आँखें और मुस्कुराहट का जवाब नहीं. इसीलिए वो तीनों अच्छा कर रहे हैं. आज की अभिनेत्रियों में कौन अच्छी लगती है? मुझे माधुरी के बाद ऐश्वर्या और काजोल बहुत अच्छी लगीं. उनमें कुछ जादू है. रानी भी अच्छी अभिनेत्री हैं. उन्होंने अपने अभिनय में बहुत सुधार किया है.'ब्लैक' में उनकी भूमिका शानदार थी. प्रिटी जिंटा की अपनी ख़ूबियाँ हैं. आपकी इतनी सफल शादीशुदा ज़िंदगी का राज़ क्या है? ये दो तरफा संबंध होता है. आप हमेशा कुछ मांग नहीं सकते. आपको देना भी पड़ता है. मुझे लगता है कि आज मैं जो कुछ भी हूँ अपनी शादी की वजह से हूँ. मेरी शादी और पत्नी मेरी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ें हैं. मैं शादी को बहुत ही अच्छी संस्था मानता हूँ और इसमें मेरा पूरा विश्वास है. मैं बराबर के संबंधों पर विश्वास करता हूँ. इतनी ख़ूबसूरत हीरोइनों के साथ काम करते हुए कभी भी आपका दिल नहीं मचला? हमेशा मचलचा था. ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब मेरा दिल नहीं मचलता. तब सोचता हूँ कि दो सेकेंड की ख़ुशी चाहिए या ज़िंदगी भर की. हमेशा ज़िंदगी भर की ख़ुशी ही चुनते हैं? हाँ. अपने आपको ख़ुश करूँ या किसी और का दिल दुखाऊँ. हमेशा कशमकश चलती रहती है. इसीलिए मेरी बीबी पिछले 34 सालों से एक गर्ल फ़्रेंड, एक दोस्त और बीबी की तरह मेरे साथ है. आपकी बेटी सोनम भी फ़िल्मों में आ रही हैं. फ़िल्मों मे आने के फ़ैसले का आपने समर्थन किया या आप ख़िलाफ़ थे? समय बदल चुका है. आज की तारीख़ में बच्चे तय करते हैं कि उन्हें क्या करना है. वो अभिनेत्री बनना चाहती थी तो मैंने बढ़ावा दिया. लेकिन इस क्षेत्र के बारे में उसे सब कुछ बता दिया.
आपने अपने आपको बहुत फ़िट और ‘मेनटेन’ रखा है. इसका क्या राज़ है? आप अपने काम को मजा लेकर करिए. ख़ुश और रोमांटिक रहिए. कसरत करिए. थोड़ा-बहुत खाना पीना पड़ता है. बीबी के लिए ही इतने रोमांटिक बनते हैं या फिर... मेरे दरवाजे सबके लिए खुले हैं. सोचने में क्या जाता है. सोचने के लिए इतनी मेहनत. मैं नहीं सोचता. लोग सोचें कि काश मैं अनिल कपूर के साथ होती. लेकिन मैं उपलब्ध नहीं हूँ.
आपकी ज़िंदगी के सबसे महानतम क्षण कौन से हैं? जब मुझे अपनी बीबी से प्यार हुआ, जब मेरी बेटी पैदा हुई, जब मैंने 'मेरी जंग' साइन की. जब मेरे परिवार ने मेरे ऊपर गर्व महसूस किया, जब मैंने ‘गांधी-माई फ़ादर’ बनाकर पूरी की, जब मैंने ये फ़िल्म प्रेस कांफ़्रेंस में लोगों के सामने प्रस्तुत की. इस उत्तर से तो यही समझ आया कि जब जीवन में कई महानतम क्षण होते हैं तो एक अनिल कपूर बनता है और एक ख़ुश और रोमांटिक इंसान बनता है. बिल्कुल. कोई दुखभरा क्षण. कोई नहीं. कोई सपना. भारतीय मनोरंजन उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा मनोरंजन उद्योग बने. भारत की फ़िल्म उद्योग हॉलीवुड से भी बड़ा बने. और उसके चमकते सितारों में अनिल कपूर भी हों. बस मैं भी अपना योगदान देकर चला जाऊँ. अपनी फ़िल्म 'गांधी-माई फ़ादर' के बारे में कुछ बताइए. मेरी फ़िल्म ‘गांधी-माई फ़ादर’ का संदेश है कि गांधी जी ने अपने देश को परिवार से पहले रखा. आज लोग व्यक्तिगत फ़ायदों के लिए देश को कुर्बान करने को तैयार हैं. मेरा मानना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए. लोगों को पहले देश के बारे में सोचना चाहिए. आगे की क्या योजनाएं हैं? 'गांधी-माई फ़ादर' 3 अगस्त को रिलीज़ हो रही है. फिर अनीस बज़्मी की ‘वेलकम’ आएगी. उसके बाद अब्बास-मस्तान की एक फ़िल्म आएगी. मैं सुभाष घई की भी एक फ़िल्म में काम कर रहा हूँ जिसका नाम ‘ब्लैक एंड वॉइट’ है. |
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