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कविता कृष्णमूर्ति के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी एक मुलाक़ात में हमारे साथ हैं मशहूर प्लेबैक फ़िल्म सिंगर कविता कृष्णमूर्ति. इतनी सुरीली आवाज़ कैसे पाई आपने? शुक्रिया. इसके बारे में तो पता नहीं लेकिन इतना ज़रूर पता है कि बचपन से ही मुझे संगीत से बहुत प्रेम है. पहले शौक़िया तौर पर सीखती थी. कुछ संगीत प्रतियोगिताएँ जीतने के बाद घर वालों को अहसास हुआ कि मैं गा सकती हूँ. मेरी एक आंटी हैं प्रतिमा भट्टाचार्या. उनका सपना था कि मैं प्लेबैक सिंगर बनूँ. उन्होंने ही मुझे बॉम्बे लाने के लिए जंग लड़ी. मैं उन्हें माँ कहती हूँ. शुरुआत में एक आज्ञाकारी बेटी की तरह मैं उनके कहे अनुसार सब कुछ करती रही. रियाज़ करती रही गाने गाती रही. पहले मुझे संगीत कार्यक्रमों में गाना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि मुझे श्रोताओं के सामने गाना अच्छा नहीं लगता था. मैं थोड़ा डर जाती थी. कॉलेज़ की पढ़ाई पूरी होने के बाद ही संगीत मेरा सपना बना. इसलिए सुरीली आवाज़ होने या न होने की बात ही सामने नहीं आई. आपको पहली बार कब लगा कि आपका पहला प्यार संगीत है? संगीत से मुझे हमेशा से बहुत प्यार था. ख़ुद गाना गाने की बात दूसरी होती है. बचपन से ही मैं संगीत सुना करती थी. रेडियो पर लता जी, मन्ना दा के गाने सुनती और गुनगुनाती रहती थी. दिल्ली में शास्त्रीय संगीत के हमारे गुरू बलराम पुरी जी मुझे, मेरी दीदी नंदिता और भाई शेखर को बहुत प्यार से संगीत सिखाते थे. इस तरह हमें संगीत से बहुत लगाव हो गया. वो कहते थे कि हमें संगीत प्रोग्राम सुनना चाहिए. हम अमीर ख़ान साहब, कुमार गंधर्व जी के प्रोग्राम सुना करते थे. मेरे पिता जी रिकॉर्ड्स लाया करते थे. लेकिन ख़ुद सिंगर बनने की बात अलग थी. मुझे लोगों के सामने गाने से डर लगता था. कॉलेज़ में आकर कुछ प्रतियोगिताओं में जीती. कॉलेज़ के कार्यक्रमों में गाया. फिर मेरी अमीन सयानी जी से मुलाक़ात हुई. सी रामचंद्रन जी से मुलाक़ात हुई. उनके साथ कार्यक्रमों में गाने लगी. डर कम होता गया. उसी दौरान 1971 में हेमंत कुमार जी ने बुलाया और बंगाली टैगोर संगीत की तीन-चार लाइनें सिखाकर कहा कि इंतज़ार करो लता जी आ रही हैं. उनके साथ गाना है. मैं तो वहीं घबरा गई. ये मेरे लिए सपना पूरे होने जैसा था. लता जी आईं. मैंने उनके साथ गाया. मैं लाइनें भूल भी गई. वो मेरी तरफ देखकर मुस्कराईं. फिर मैंने गाना पूरा किया. लता जी को जब मैंने गाते देखा तो मेरे अंदर ये बात आ गई कि बस यही तो मैं करना चाहती हूँ. मैं ऐसे ही माइक के सामने खड़े होकर गाना चाहती हूँ. मुझे पता चल गया कि मैं एक प्लेबैक सिंगर बनना चाहती हूँ. उस समय मैं बंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज़ से अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रही थी. अपनी पढ़ाई के बाद मैंने अपने पिता जी से कहा कि मैं प्लेबैक सिंगर बनना चाहती हूँ. मेरे पिता जी उन दिनों स्विट्ज़र लैंड में थे. उनका सपना था कि मैं आगे पढ़ाई करूँ. उन्होंने लंदन स्कूल में मेरे पढ़ने के प्रयास भी किए हुए थे. लेकिन मैं छु्ट्टियों में उनसे मिलने गई तो कह दिया कि मैं प्लेबैक सिंगर बनना चाहती हूँ. उन दिनों मैं पेशेवर तरीके से संगीत से पैसा कमा रही थी. पिता समान मन्ना दा के साथ पूरी दुनिया में मैं प्रोग्राम पेश कर रही थी. बहुत कम लोग जानते होंगे कि आप लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स जाने वाली थीं. आप इकोनॉमिस्ट बन जातीं. मेरे पिता जी ऐसा ही चाहते थे. वो मुझे एकेडमिक्स में देखना चाहते थे. उन्होंने मेरे दाख़िले की व्यवस्था भी कर ली थी. लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. जब मैं दिल्ली के ज़ीज़स एंड मेरी स्कूल में पढ़ रही थी तो मैं विदेश सेवा की परीक्षा देना चाहती थी. मेरे पिता जी शिक्षा मंत्रालय में थे. घर में पूरी तरह से सरकारी नौकरी वाला माहौल था. ('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) आपने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा ली? मैं दिल्ली में ही बड़ी हुई. कालीबाड़ी मंदिर में सुरमा बासू नाम की एक संगीत शिक्षिका से पहले रवींद्र संगीत सीखा. फिर बलराम पुरी जी से सीखा. वो गंधर्व महाविद्यालय में सिखाते थे और साथ में हमें घर पर आकर सिखाते थे. वो संगीत के बहुत ही बहुत अच्छे जानकार और बेहतरीन शिक्षक थे. उनकी वजह से हमने सिर्फ़ संगीत ही नहीं सीखा बल्कि संगीत से लगाव भी उन्हीं की वजह से पैदा हुआ. वो सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत नहीं सिखाते थे बल्कि फ़िल्म का रिकॉर्ड्स भी लेकर आते थे और कहते थे कि सुनो इसको, देखो कैसा गाया है. एक गुरू का बहुत बड़ा काम होता कि वो आठ-नौ साल के बच्चे को तानपुरे के साथ दो घंटे एक जगह बैठा कर रखे. हमने उनसे संयम करना भी सीखा. तो शुरुआत वहाँ से हुई. फिर बंबई में किसी से एक साल, किसी से दो साल संगीत सीखा. सबसे पहले मानस मुखर्जी से संगीत सीखा. मानस मुखर्जी आज के दौर के गायक शान के पिता हैं. वो बंबई में मेरे पहले शिक्षक थे. उसके बाद मलय चक्रवती, गोविंद प्रसाद जयपुरवाले, पंडित जसराज जी के साथ थोड़ समय तक, पंडित राम नारायण जी और गौतम मुखर्जी से सीखा. इस तरह मैंने कई लोगों से संगीत सीखा. आपकी पसंद का एक गाना. मन्ना दा का गाना है पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई... ये ‘मेरी सूरत, तेरी आँखें फ़िल्म’ का गाना है शायद. मुझे आपका जो गाना सबसे पहला गाना याद आता है वो है हवा हवाई... ये हवा हवाई कैसे हुआ? हालांकि हवा हवाई से पहले मैं मांग भरो सजना गाया था. ‘प्यार झुकता नहीं’ का गाना भी चला था. ये शायद 1984 की बात है. हवा हवाई के लिए मुझे बुलाकर बताया गया कि मैं फ़िल्म के लिए नहीं गा रही हूँ. मुझे सिर्फ़ शूटिंग के लिए गाना रिकॉर्ड करना है. शायद आशा जी गाना गाने वाली थीं. उन दिनों मैं लक्ष्मी कांत-प्यारे लाल जी के यहाँ लता जी के लिए ज़्यादा गाने डब किया करती थी. तो मैंने पूरे मन से गाना गाया. वो ‘ची हुआ, हुआ’ वाले हिस्से तो बहुत मज़ाकिया हुआ करते थे. जो भी आता एक शब्द जुड़वा देता था. जावेद साहब आए उन्होंने कहा मोम्बासा जोड़ लो. एक संगीतकार आए उन्होंने कहा पंजाब को क्यों छोड़ रहे हो. कुछ लस्सी-वस्सी जोड़ो. लक्ष्मी जी ने मुझसे कहा जो भी शब्द कोई बताए सब जोड़ लो. ऐसे करके वो गाना बना है. उन दिनों गायक संगीतकारों के साथ लाइव गाते थे. एक साथ सौ-सौ संगीतकार हुआ करते थे. वायलिन बजाने वाले ही 40 लोग थे.
आपने कैसे किया? मैं उन दिनों बहुत शर्मीली होती थी. रिहर्सल के समय सिंगर के केबिन से बाहर निकल संगीतकार के हॉल में आना पड़ता था. यहाँ 40 वायलिन, 20 रिदम और भी कई तरह के म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट लिए लोग बैठे रहते थे. मैं बिल्कुल बीच में खड़ी होती थी. सब मुझे ही देख रहे होते थे और मैं ची हुआ कर रही होती थी. सब हंस रहे होते और मैं भी हंसती. प्यारे जी ने कहा कि अब सीरियस हो जाओ तब जाकर किसी तरह गाना पूरा हुआ. गाना पहले रिकॉर्ड हुआ और ये वाला हिस्सा बाद में रिकॉर्ड हुआ. जब गाना आया था तो वो रपा चिकी वाला हिस्सा बहुत प्रसिद्ध हुआ था. वो वाला हिस्सा गाकर सुना दीजिए. (कविता गाना गाकर सुनाती हैं.) मैंने एक बार शेखर कपूर के एक इंटरव्यू में सुना था कि उस गाने में श्रीदेवी के चेहरे के भाव बहुत ही कमाल के थे और जो आवाज़ है वो चेहरे के भावों को पूर्णता देती है. आपने क्या श्रीदेवी को दिमाग में रखकर गाया था? ऐसा नहीं था. मुझे श्रीदेवी की ऐक्टिंग स्टाइल के बारे में कुछ पता नहीं था. मुझे कल्पना करके गाने के लिए कहा गया. मुझे बताया गया था कि ये एक शरारती किस्म का गाना है और इसमें उनका ड्रेस कुछ अलग किस्म का होगा. कुछ माई फ़ेयर लेडी टाइप पहनावा होगा. मुझे तो पता था कि ये शूटिंग के लिए गाना है. मैंने गाना गा दिया. दो महीने बाद मुझे लक्ष्मी जी के ऑफ़िस से फ़ोन आया कि कविता जी ये गाना श्रीदेवी पर बहुत शूट हो रहा है. वो लोग गाने को फ़िल्म में जस का तस रख रहे हैं. मैंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है. मैंने तो उसमें एक शब्द ग़लत गाया है. उन्होंने कहा कि नहीं जी, अब आप भी वैसा नहीं गा सकतीं. वो वही गाना फ़िल्म में रख रहे हैं. तो उस समय मेरी किस्मत अच्छी थी. गाना फ़िल्म में रख लिया गया और चल निकला. आपके बहुत से संगीतकारों से गहरे संबंध रहे. संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को कैसे याद करती हैं? बहुत इज़्ज़त से. लक्ष्मी-प्यारे जी से जो मेरा संबंध बना उसके लिए मुझे हेमा मालिनी और उनकी माँ जया चक्रवर्ती का शुक्रिया अदा करना चाहिए. वो भी दिल्ली के रहने वाले थे. जया चक्रवर्ती और मेरी आंटी प्रतिमा चक्रवर्ती गहरे दोस्त थे. जब हेमा मालिनी सपनो का सौदागर में ड्रीम गर्ल बनीं तो मेरी आंटी हिम्मत करके मुझे भी बंबई ले गईं. कालेज़ में भर्ती होने के साथ-साथ मैं गाती रही. मैंने जिंगल्स गाए. मेरा पहला जिंगल गीता दत्त जी के साथ था. हेमंत कुमार जी के साथ स्टेज़ पर काम करने का मौक़ा मिला. इस तरह शुरुआत ठीक ठाक रही. इन्हीं दिनों हेमा मालिनी की माँ जया चक्रवर्ती ने लक्ष्मी-प्यारे जी को बता कर रखा था कि हेमा की एक बहन है जो बहुत अच्छा गाती है. कभी उसे मौक़ा दीजिएगा. एक फि़ल्म में रिकॉर्डिंग के दौरान 1977 में लता जी नहीं आ सकीं. लक्ष्मी-प्यारे जी को गाना ज़ल्द चाहिए था. उनका फ़ोन आ गया कि कल आ जाओ तो गाने का अभ्यास कर लेंगे और परसों गाना रिकॉर्ड कर लेंगे. वो शायद ‘चाचा-भतीजा’ का गाना था. बाटली को तोड़ दे, शराब को छोड़ दे...कुछ ऐसा गाना था. तो इस तरह गाना डब करना शुरू किया. लक्ष्मी-प्यारे जी उन दिनों टॉप पर हुआ करते थे. तो मुझे हफ़्ते में दो-तीन गाने मिलने लगे. प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ वो बहुत ही बेहतरीन इंसान थे. मैं डबिंग सिंगर थी फिर भी वो मेरे साथ बहुत इज़्ज़त से पेश आते थे. अगर मैं ठीक से नहीं गा पाती तो 50 बार गाने का रिहर्सल किया जाता था. उनके साथ काम करके ऐसा लगा जैसे मैं प्लेबैक सिंगिंग के किसी स्कूल में सीख रही हूँ. इस तरह 1977 से लेकर जब तक लक्ष्मी जी जीवित रहे हमारा साथ बना रहा. आप लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इतने प्यार से याद करती हैं. उनका कोई गाना बताइए. उनके जो गाने बनते थे उसमें लता जी के बहुत से गाने होते थे. एक गाना है चलो सजना जहाँ तक घटा चले....फिर एक गाना है ये दिल कहीं लगता नहीं हम क्या करें... कविता जिसने अपना पहला गाना ही लता जी के साथ गाया हो उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता है कि अब तो लता जी के साथ गा लिया तो हम कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन इतना सब होने के बावज़ूद आप ज़मीन से बहुत ज़ुड़ी हुई हैं और बहुत विनम्र हैं. ऐसा सभी गायकों में दिखाई नहीं पड़ता. वो तो पता नहीं. लेकिन ईश्वर को दो चीज़ों के लिए शुक्रिया अदा करती हूँ. एक कि मैं संगीत के क्षेत्र में आई. ये बहुत बड़ी बात होती है कि जिस चीज़ को आप प्यार करें उसे ही अपना पेशा बना लें. ऐसा अवसर कम ही लोगों को मिल पाता है. दूसरा ये कि सही समय पर सही लोगों से मेरी मुलाक़ात हुई. मैं दिल्ली के एक परंपरावादी दक्षिण भारतीय-बंगाली परिवार से उठकर मैं बंबई पहुंची थी. वहाँ अगर मुझे फ़िल्म उद्योग में ग़लत लोग मिल जाते तो शायद संगीत में मेरी रुचि ही ख़त्म हो जाती. फिर ऐसे कॉलेज़ में दाख़िला मिला जहाँ संगीत मंडल बहुत सशक्त था. कॉलेज़ के प्रोग्राम में अमीन सयानी साहब मिले. मन्ना डे, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, तलत साहब, मुकेश जी के साथ काम करने का मौक़ा मिला. कितने लोगों को ऐसे अवसर मिल पाते हैं. और मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि ये सभी बहुत ही बेहतरीन इंसान भी थे. औरतों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए वो इनसे सीखना चाहिए. इतने बड़े कलाकार होने के साथ-साथ सभी बहुत विनम्र थे. बहुत ही सकारात्मक अहसासों के साथ मैंने अपनी यात्रा की. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और पंचम दा जैसे लोगों के साथ तो शुरुआत की है मैंने. इतने बड़े-बड़े लोगों में मैंने कहीं भी घमंड नहीं देखा. इन लोगों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया. संगीत के सागर में तो हम लोग कुछ हैं ही नहीं. इतनी मेहनत की है लोगों ने, इतना काम किया है हम तो सोच भी नहीं सकते. मैंने डॉ एल सुब्रमनियम से विवाह किया है जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वायलिन वादक हैं. मैंने उनको रियाज़ करते देखा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर का वायलनिस्ट बनने के लिए कितनी मेहनत और समर्पण की ज़रूरत होती है वो मैंने देखी है. पूरी ज़िंदगी बीत जाती है. ऐसे लोगों को देखने के बाद मैं किस चीज़ पर घमंड करूँ कि मैंने पाँच हज़ार गाने गाए हैं. सबसे ज़रूरी ये है कि एक विद्यार्थी की तरह सीखते हुए मैं अपनी यात्रा ज़ारी रखूँ. मुकेश जी और तलत जी का कोई गाना बताइए. मुकेश जी के गानों में मेरा पसंदीदा गाना है सारंगा तेरी याद में, नैन हुए बेचैन... और हेमंत जी के साथ स्टेज़ पर मैं एक गाना गाती थी तो मुझे लगता था कि मैं रो पड़ूंगी. वो गाना था जाग मेरे इश्क जाग...क्या आलाप उठता था लता जी का. तलत साहब के साथ बहुत से गाने हुआ करते थे. एक पसंदीदा गाना था रिमझिम के वो प्यारे-प्यारे गीत लिए... मैंने अभी कहीं पढ़ा था कि अलका याग्निक का कहना है वो लता मंगेशकर स्कूल ऑफ़ सिंगिंग से हैं. आप अपने को किस स्कूल से मानती हैं. मैं लता जी को आइकन मानती हूँ. लेकिन मैं ये नहीं कह सकती हूँ कि मैं उस स्कूल से हूँ. अगर आप हवा हवाई...सुनिए तो आपको लगेगा कि ये उस तरह का गाना नहीं है. मैंने नैयर जी के लिए भी गाया है. तो नैयर जी के लिए गाए गाने मुझे आशा जी के स्कूल से अलग करते हैं. मुझे लगता है कुछ ऐसे गाने मुझे भाग्य से मिले जैसे तुमसे मिलकर, हवाहवाई और ख़ुदा गवाह का गाना. फिर श्रीदेवी जी के लिए मैनें गाने गाए जैसे ‘चालबाज़’ के गाने. मुझे श्रीदेवी की आवाज़ कहा जाने लगा. फिर ‘1942 - अ लव स्टोरी’ आने पर मुझे मनीषा कोइराला की आवाज़ कहा जाने लगा. तो इस तरह मुझे कुछ ऐसे गाने मिले जिसकी वजह से मैं लता और आशा जी के स्कूल से अलग होती हूँ. इस बात से मैं बहुत ख़ुश भी हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ कि मैं उनके जैसे नहीं गा सकती. मैं जो भी गाया अपनी तरह से गाया. कहा जाता है कि लता और आशा जी में प्रतिस्पर्धा रहती थी और दोनों दो अलग-अलग स्कूल हैं. आप कितना सहमत हैं? स्कूल तो नहीं कहूँगी. हाँ दोनों का गाने का अपना अलग-अलग तरीका है. दोनों अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुसार गाने गाते थे. यही वजह थी जो दोनों इतने सफल गायक बने. अगर प्रतिस्पर्धा रही तो बहुत ही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रही. जिसकी मैं दाद देती हूँ. अगर आप मदन मोहन जी का वो गाना सुने जब-जब तुम्हें भुलाया... दोनों शेरनियों ने आमने-सामने माइक पर साथ-साथ गाया. दोनों कहते होंगे मैं दूसरे से कम नहीं. दीदी कहती होंगी मैं दीदी हूँ और आशा कहती होंगी मैं दीदी से बेहतर गाऊँ. आप गाना सुनिए तो किसी एक को ज़्यादा बेहतर कहना मुश्किल हो जाएगा. अपने-अपने व्यक्तित्व के हिसाब से उन दोनों ने गाना गाया और गाना बेहतर बन पड़ा. मैं एक गाना और बताती हूँ. भीमसेन जोशी और मन्ना दा का. दोनों का साथ गाना बहुत मुश्किल था. भीमसेन जोशी उस समय युवा थे. उनकी तानें छुरी की तरह जाती थीं. मन्ना दा शास्त्रीय संगीत के रुझान वाले सफल प्लेबैक सिंगर थे. गाना था केतकी गुलाब जूही चंपक बन फूले...और फ़िल्म में ये गाना बैजू बावरा और तानसेन के बीच एक प्रतिस्पर्धा के समान था. मन्ना दा बैजू बावरा थे और उन्हें वो प्रतिस्पर्धा जीतनी थी. सोचिए मन्ना दा को कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी. लेकिन गाना सुन लीजिए. उनके गाने की सच्चाई पता चल जाएगी. उनकी मेहनत कम नहीं लगेगी. इसलिए आपके सामने कोई बड़ा भी आ जाए लेकिन आप अपनी पहचान बनाए रखें. अपने जीवन में अच्छा करने की कोशिश करती रहनी चाहिए.
अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में थोड़ा बताइए. सुब्रमनियम जी से प्यार कैसे हुआ? मेरी शादी बहुत बाद में हुई. संगीत ही हम दोनों को पास लाया. मुझे इनके लिए एक गाना गाना था हरिहरन जी के साथ मिलकर. मैं स्टूडियो गई थी तो बहुत टेंशन में थी. ये बहुत बड़ी वायलिनिस्ट थे. मैं उनके अनुसार गा पाऊँगी कि नहीं इसका मुझे विश्वास नहीं था. लेकिन वहाँ पहुँचने पर मुझे वो बहुत विनम्र और शांत लगे. उन्होंने बहुत आराम से मुझे सिखाया. उन्हें परफ़ेक्शन बहुत पसंद है. इसलिए गाने की रिकॉर्डिंग में बहुत समय लगा. फिर मैंने उनके फ़्यूज़न अलबम में काम किया. उसी दौरान मैं उनके बच्चों से मिली. उनकी पहले शादी हो चुकी थी और 1995 में उनकी पत्नी का कैंसर की वजह से देहांत हो चुका था. उन दिनों मैं उनको पसंद कर ही रही थी. मुझे ये नहीं पता था कि शादी होगी कि नहीं. तभी उन्होंने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा. ये 1999 की बात है. मैंने कुछ ही मिनटों में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि संगीत दो आत्माओं को मिलाता है. ये सचमुच बहुत गहरे संबंधों की बात थी. मैंने फ़िल्म लाइन में कई आदमियों के साथ काम किया था लेकिन कभी भी शादी का ख़याल ही नहीं आया था. मैं घर, परिवार और संगीत में खोई हुई थी. इनसे मिलने के समय मेरी उम्र भी बहुत हो चुकी थी. मेरे लिए ये कठिन निर्णय था कि शादी और बच्चों के बाद फ़िल्म संगीत का हिस्सा रह पाउँगी कि नहीं. लेकिन मेरी अंतरात्मा ने कहा कि यही मेरे लिए सही आदमी हैं. अपने साथ गाने वालों में सबसे अधिक पसंद कौन है? मेरे सभी से अच्छे संबंध रहे हैं. चाहे सुरेश वाडेकर, हरिहरन शानू, सोनू, उदित नारायण सभी के साथ दोस्ताना तरीके से काम हुआ है. लेकिन एक ऐसे गायक हैं जिनका मैं बहुत सम्मान करती हूँ. वो हैं एसपी बालसुब्रमनियम. उनके साथ मैंने एक डबिंग आर्टिस्ट और फ़िल्म में प्लेबैक सिंगर दोनों तरीके से गाया. उनका व्यवहार हमेशा एक भले आदमी का ही रहा. एक बार मैं लक्ष्मी जी के लिए तमिल फ़िल्म कर रही थी. एसपी बालसुब्रमनियम साथ गा रहे थे. उन दिनों मुझे कुछ समस्या थी जिसकी वजह से मैं सिंगर बूथ का दरवाजा थोड़ा खोलकर रखती थी. बालसुब्रमनियम जी को इसमें दिक्कत थी. लेकिन मेरे कहने पर उन्होंने दरवाज़ा खुला रहने दिया. जबकि उस दौरान उन्हें बहुत दिक्कत हुई. इस घटना के पाँच साल बाद मैं आनंद-मिलिंद के साथ एक गाना कर रही थी. इस गाने में भी बालसुब्रमनियम जी साथ गा रहे थे. सिंगर बूथ में जब वो आए तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे दरवाजा खुला रखना है. मुझे इतनी हैरानी हुई कि इन्हें आज भी वो घटना याद है. लेकिन मैंने इन पाँच सालों में अपनी ये दिक्कत दूर कर ली थी. मैंने बालसुब्रमनियम जी को बहुत धन्यवाद दिया कि उन्होंने ये बात याद रखी. इसलिए एक आदमी के तौर पर उनका बहुत सम्मान करती हूँ. चलिए इसी बात पर एसपी बालसुब्रमनियम जी का एक गाना सुनते हैं. उनको सलमान ख़ान की आवाज़ कहा जाता है. मुझे तो ‘मैंने प्यार किया’ फ़िल्म के सभी गाने अच्छे लगते हैं. एक गाना और है तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन... आज की पीढ़ी के गायक जैसे सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल अपने करियर में बहुत अच्छा कर रहे हैं. इनकी स्टाइल ऑफ़ सिगिंग पर आप क्या कहेंगी? इनको मैं इस बात के लिए दाद देना चाहूंगी कि ये अपनी तरह से ही गाने गा रही हैं. किसी की नकल नहीं करतीं. अपनी पहली फ़िल्म ‘देवदास’ से ही श्रेया ने बहुत बढ़िया काम किया है. दोनों अपने संगीत और काम के बारे में सोचती हैं. दोनों अच्छा करेंगी. नए पुरुष गायकों जैसे कुणाल गांजेवाला, शान में कौन से गायक पसंद हैं? सबके कुछ-कुछ गाने अच्छे लगते हैं. जैसे शान ने ‘दिल चाहता है’ में मेरे साथ गाया था. कुणाल के साथ कुछ प्रोग्राम किए थे. उनक संगीत में थोड़ा पश्चिम का असर है लेकिन वो अच्छा गा लेते हैं. फिर केके भी अच्छे गायक हैं. तीनों बच्चे बेहतर कर रहे हैं. लगता है तीनों बहुत रियाज़ करते है. केके का मुझे ‘हम दिल दे चुके सनम’ का तड़प, तड़प...गाना बहुत अच्छा लगता है. आप दिल्ली में पली बढ़ीं. आपको दिल्ली की सबसे ख़ास बात क्या लगती है? दिल्ली के रेस्टोरेंट में जो खाना मिल जाता है वो कहीं नहीं मिलता. कालीबाड़ी मुझे पसंद है. बचपन में बिड़ला मंदिर के पीछे एक बगीचे में आकर मैं संडे को खेला करती थी. कालीबाड़ी में दुर्गा पूजा के समय बहुत मजा आता था. प्रतियोगिताएँ और जात्रा हुआ करती थीं. ट्रक यमुना की तरफ मूर्तियाँ लेकर जाते थे. ढोल बजता था. हम लोग रोया करते थे. वैसे हम जिस सरकारी बंगले में रहते थे उसकी जगह दूसरी ऊँची इमारते बन गईं हैं. कोई निशान नहीं बचा. फिर भी दिल्ली से जुड़ी मेरी बहुत यादें हैं. आज भी मैं अपनी दीदी के यहाँ आया करती हूँ. ऐसा कहा जाता है कि किसी दिल्ली वाले के लिए मुंबई जाकर बसना बहुत कठिन है. मुंबई वाला कहता है कि मुंबई जैसा कुछ नहीं. दोनों में कौन बेहतर है? ये कहना बहुत मुश्किल है. दिल्ली मुझे बहुत अच्छा लगती है. लेकिन मुंबई ने मेरे करियर को संवारा. मुंबई बहुत डायनमिक है. जिसको काम करना है मुंबई उसके लिए बहुत बेहतर शहर है. ये मेंटल एडजस्टमेंट की बात है. आज सात साल से मैं बैंगलोर में रहती हूँ. मुंबई में काम करने के बाद मैं जब बैंगलोर जाती हूँ तो अच्छा महसूस करती हूँ. कलकत्ता में पले-बढ़े आदमी को कलकत्ता से बेहतर कुछ नहीं लगेगा. इन चारों मैट्रोपोलिटन में आप कहीं भी रह सकते हैं. बॉलीवुड में आपके पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्री. जब मैं बड़ी हो रही थी तब संजीव कुमार बहुत पसंद थे. अमिताभ बच्चन बहुत पसंद हैं. बचपन में दिलीप कुमार बहुत पसंद थे. आमिर ख़ान और उनकी फ़िल्में बहुत पसंद हैं. रानी मुखर्जी, काजोल और प्रिटी जिंटा पसंद हैं. पहले के कलाकारों में श्रीदेवी और शबाना आज़मी भी काफ़ी पसंद हैं. शबाना आज़मी बेहतरीन अभिनेत्री हैं. आपके प्रशंसक आपसे क्या अपेक्षा रखें. कहना मुश्किल है. फ़िल्मों में तो इंतज़ार रहता है कि अच्छा गाना मिल जाए. देवदास और हम दिल दे चुके सनम जैसे गाने मिल जाए. अच्छे गानों की तलाश रहती है. गज़लों की एक अलबम ‘दिल की आवाज़ दो’ दो महीने पहले आई है. एक और अलबम आने वाली है. फिर भक्ति से जुड़े गानों की एक-दो अलबम आएगी. अपने पति के साथ एक अलबम निकालना है जो लंबे से रुका पड़ा है. हम दोनों ने तय किया है कि इस साल के अंत तक वो बाज़ार में आ जाए. हिंदी गाने हैं. अकेले और दूसरे गायकों के साथ गाए गाने हैं. एक क्रॉसओवर फ़्यूज़न गाना भी है. अपने प्रशंसकों को किस तरह बाय-बाय करना चाहेंगी? मेरा कोई ऐसा गाना तो है नहीं. लेकिन अगर देश को सलाम करूँ तो कहूँगी हर करम अपना करेंगे ए वतन तेरे लिए. दिल दिया है जाँ भी देंगे ए वतन तेरे लिए... | इससे जुड़ी ख़बरें एक मुलाक़ात: शीला दीक्षित से02 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: ग़ुलाम अली के साथ04 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: अमर सिंह के साथ07 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: राम जेठमलानी के साथ14 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: वसुंधरा राजे के साथ22 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात : मणिशंकर अय्यर के साथ29 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'एक मुलाक़ात' सर्वश्रेष्ठ मौलिक कार्यक्रम घोषित04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: लालकृष्ण आडवाणी से26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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