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रविवार, 17 जून, 2007 को 07:24 GMT तक के समाचार
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सुनील मित्तल के साथ 'एक मुलाक़ात'

सुनील भारती मित्तल
सुनील मित्तल ने भारत में निज़ी क्षेत्र की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी खड़ी की है
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

आज हमारे बीच एक ऐसे मेहमान हैं जो ज़ीरो से हीरो बने हैं. अगर किवदंतियों को सही माना जाए तो सिर्फ़ बीस हज़ार रुपए से इन्होंने अपने धंधे की शुरुआत की थी. ये पहली पीढ़ी के सफल उद्योगपति हैं और भारती टेलीकॉम के मालिक हैं. हमारी पीढ़ी के सबसे तेज़ी से बढ़ते अरबपति व्यवसायी सुनील भारती मित्तल हमारे बीच में हैं.

बचपन कैसा था आपका था सुनील?

एक छोटे शहर में जैसा बचपन गुज़रता है वैसा ही बचपन गुज़रा मेरा. मैं लुधियाने का रहने वाला हूँ. बचपन की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. पढ़ाई में मेरा दिल नहीं लगता था. अधिकतर समय खेलने-कूदने में बीता.

हम लोग फ़ालतू ही अपने बच्चों को पढ़ाते हैं?

हम भी कोशिश करते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिख लें. पढ़ाई आपके लिए एक बेस तैयार करती है और कभी न कभी ज़िंदगी में काम भी आती है. लेकिन मैं नहीं मानता कि पढ़ाई ही आपको बड़ा आदमी बनाती है. मेरी रुचि पढ़ाई में नहीं थी. स्कूल में खेलता रहता था. कॉलेज़ पहुँचा तब तो और भी कोई पूछने वाला नहीं रहा. शूटिंग, फ़्लाइंग और ग्लाइडिंग की. घर में सब लोग परेशान रहते थे कि पता नहीं कि ये बच्चा क्या करेगा.

तो क्या जब घर वाले परेशान होते थे तो सुनील मित्तल की पिटाई करते थे?

हाँ पिटाई पड़ती थी.

भगवान करे सभी अपने बच्चों को पिटाई लगाए जिससे सब सुनील भारती मित्तल बनें. आजकल तो बच्चों को मार पड़ती ही नहीं. ये आउट ऑफ़ फ़ैशन हो गया है. पास पड़ोस के लोग आपको शरारती और शैतान कहते थे या सिर्फ़ खेलने-कूदने वाला बच्चा मानते थे?

शरारती मानते थे. लेकिन मेरा संबंध सबसे बहुत अच्छा था. मैं सबसे घुल-मिल कर रहता था.

आपने अपने एक भाषण में हाल में ही कहा कि हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था में डॉक्टर और इंजीनियर बनाने के साथ प्लंबर और इलेक्ट्रीशयन बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए. और इसमें भी बराबर का सम्मान महसूस करना चाहिए.

हाँ. मेरा मानना है कि अपने देश में वोकेशनल शिक्षा को अधिक सम्मान नहीं दिया जाता. हम हिंदुस्तानी ही जब विदेश जाते हैं तो इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर जैसा रोज़गार करने वालों का सम्मान करते हैं. हमारा उनके प्रति नज़रिया दूसरा रहता है. लेकिन अपने देश में ऐसा धंधा करने वालों का हम सम्मान नहीं करते. आने वाले समय में दुनिया में ऐसे हुनरमंद लोगों की भारी कमी होने वाली है. अपने देश में क़रीब 25-30 करोड़ युवा ऐसे हैं जो बावर्ची, नर्स, प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन बनकर दूसरे देश में जाकर अच्छा पैसा कमा सकते हैं. लेकिन सबसे पहले ऐसी वोकेशनल शिक्षा की व्यापक व्यवस्था करने और समाज को अपने नज़रिए में बदलाव लाने की ज़रूरत है.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

कोई बहुत ख़ुशनुमा या दुखभरी याद जो आज भी जहन में मौज़ूद है?

जब हमारी परीक्षाएं होती थीं तो मैं बहुत परेशान हो जाता था. मैंने 18 साल की उम्र में 1976 में कॉलेज़ छोड़ा. लेकिन उसके अगले 10 साल बाद तक अप्रैल में मैं परेशान होने लगता था. मेरे अंदर अप्रैल में होनी वाली परीक्षाओं का ख़ौफ़ इस हद तक मौज़ूद था.

 हाँ. मेरा मानना है कि अपने देश में वोकेशनल शिक्षा को अधिक सम्मान नहीं दिया जाता. हम हिंदुस्तानी ही जब विदेश जाते हैं तो इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर जैसा रोज़गार करने वालों का सम्मान करते हैं. हमारा उनके प्रति नज़रिया दूसरा रहता है. लेकिन अपने देश में ऐसा धंधा करने वालों का हम सम्मान नहीं करते. आने वाले समय में दुनिया में ऐसे हुनरमंद लोगों की भारी कमी होने वाली है

अपने माता-पिता से आपने एक बड़ी बात क्या सीखी?

बहुत कुछ सीखा. जब आप बड़े हो रहे होते हैं तो माँ-बाप से बहुत कुछ सीखते हैं. अपने पिता जी से तो मैंने काफ़ी कुछ सीखा. वो राजनीति में थे. मैंने उनको कंबाइन करते देखा था. उनको आम लोगों से मिलते झुग्गियों में जाते देखा है तो संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते भी देखा है. वो दो धुरी की चीज़ों को बहुत आराम से निपटा देते थे. आज आप मुझे चाहे सड़क पर बैठा दीजिए या विश्व आर्थिक मंच की बैठक में. मुझे कोई असर नहीं पड़ेगा. बहुत कम भारतीय होंगे जो विश्व आर्थिक मंच की बैठक में उपाध्यक्ष बने हों. मैंने लोगों को देखा है या तो वो पलड़े के इस तरफ हैं या उस तरफ. दो धुरियों में संतुलन बहुत कम लोग बैठा पाते हैं. अपने पिता जी की वजह से मैं ऐसा कर सका.

अच्छा ये जो आपका ज़मीनी आदमी होना है. ये कोई दिखावा है या सच्चाई?

देखिए चाहे धीरू भाई अंबानी रहे होंगे या टाटा या बिड़ला कंपनी के संस्थापक सभी आपको ज़मीन से जुड़े हुए ही मिलेंगे. क्योंकि ये नीचे उठे हैं. मैं 30-35 घंटे की रेलवे यात्रा बैठकर की है. ट्रकों में गोदी से माल उठाकर उसे बाज़ार में लाकर बेचा है. इसलिए हमें इसे छोड़ने में मुश्किल होगी. बनाए रखने में कोई मुश्किल नहीं होगी.

क्या आपने बचपन में ही तय कर लिया था कि आपको बिज़नेस मैन ही बनना है?

हाँ ये तो तय कर लिया था. जब पढ़ाई में मन लगता नहीं था तो दो ही विकल्प बचते थे. एक राजनीति में जाने का और दूसरा व्यापार करने का. लुधियाना शहर में व्यापार करने का अच्छा माहौल था. मैंने भी 18 साल की उम्र में व्यापार करना शुरू किया. सबसे पहले ब्रजमोहन मुंजाल साहब की हीरो साइकिल कंपनी के लिए साइकिल के पार्ट्स बनाने शुरू किए.

क्या कोई बड़ी सी फ़ैक्ट्री लगाई या छोटे से शेड मे काम शुरू किया?

हाँ छोटे से शेड में काम करना शुरू किया था. कोई बहुत बड़ा काम नहीं था. स्टील की रॉडों को गर्म करके साइकिल के पार्ट्स बनाए जाते थे.

साइकिल का ये धंधा करते हुए पहली कार कब ख़रीदी?

अपने पैसे से पहली गाड़ी मैंने 1979-80 में ख़रीदी थी. तब मैं 20-21 साल का था. ये एक फ़िएट कार थी. उस समय बहुत साधारण गाड़ियाँ मिलती थीं इसलिए उसे काट-पीट कर थोड़ा फ़ैशनबल बनाया गया था.

अच्छा क्या किया था आपने कार के साथ?

अंदर से कुछ सीटों में बदलाव किया. स्टीरियो लगवाया.

चर्चा हुई थी इस गाड़ी की लुधियाना में?

हाँ पसंद की गई थी.

कार को 20-21 साल की उम्र में ख़रीदना, फ़िर उसे फ़ैशनबल बनाना. ये सब क्यों किया था. लड़कियों को प्रभावित करने के लिए, दोस्तों पर रुआब झाड़ने के लिए या अपनी ख़ुशी के लिए?

आप ज़िंदगी में तय करते हैं कि इस समय ये करना है. मैंने भी तय किया था. समाज में आप एक जगह बनाना चाहते हैं. इन सबमें लड़कियों भी शामिल ही होती थीं.

आप लड़कियों को प्रभावित करने के लिए क्या करते थे?

मेरे पास समय नहीं होता था. जब मेरे दोस्त घूमने-फ़िरने निकलते थे उस समय मैं काम पर निकलता था. पहले दिन से ही मन से काम पर लग गया था.बहुत अधिक समय काम में निकल जाता था. बहुत कम समय मिलता था.

लेकिन आप बहुत तेज़ी से कम समय में चीज़ों को अंजाम देते हैं.

हाँ लेकिन जो समय बचता था उसमें दोस्तों से मिलना और हँसी-मज़ाक हो जाता था. लड़कियों के पीछे जाएँ इतना समय नहीं मिल पाता था.

आपकी अपनी पत्नी से पहली मुलाक़ात कब हुई. क्या ये पहली नज़र का प्यार था?

मेरी बीबी स्कॉटलैंड से हैं. वो मेरे एक दोस्त की पत्नी की बहन हैं. एक बार वो लोग हिंदुस्तान के दौरे पर थे. तभी उनसे मुलाक़ात हुई. बस बात बन गई.

इतनी ज़ल्दी.

एक दिन में तय कर लिया था. लगा कि यहाँ कैमेस्ट्री मिल जाएगी. 20-25 दिन में शादी हो गई. बहुत समय नहीं लगा था.

समय तो है ही नहीं आपके पास. आपकी पत्नी का क्या नाम है?

नायना.

ये बताइए आपने इतनी ज़ल्दी कैसे तय कर लिया कि बस इन्हीं से शादी करनी है. घंटी बजने लगी या और कुछ हुआ?

घर वालों की तरफ से दबाव था. मेरी उम्र भी साढ़े पच्चीस साल की थी. तो जब इनसे मिला तो लगा कि हाँ शादी कर लेनी चाहिए. मुझे जैसी पत्नी चाहिए थी ये वैसी ही थीं.

कैसी?

अगर मैं आगे काम करूँ तो मेरी पत्नी घर को सँभाल सके. और ये एक अच्छे, संस्कारित परिवार से थीं. इनकी बहन से मैं मिला था. सब कुछ जानता था.

ये आपका पहला प्यार था या इससे पहले भी आप प्यार में बर्बाद हो चुके थे?

नहीं प्यार में इस कदर तो नहीं पड़े थे. लेकिन छोटा-मोटा टकराव तो हो ही गया था.

किसी लड़की या महिला में आपको सबसे अधिक क्या प्रभावित करता है?

मैं किसी के पूरे व्यक्तित्व से ही प्रभावित होता हूँ. किसी की आँख, कान, नाक देखकर तो कुछ कहा नहीं जा सकता. बहुत सी लड़कियाँ सुंदर होने के बावज़ूद प्रभावित नहीं करतीं और कुछ सामान्य सी दिखने वाली लड़कियाँ बहुत प्रभावित करती हैं.

एक सफल शादी का क्या राज़ है?

मेरा मानना है कि आपको संबंधों में पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए. चरित्र बढ़िया होना चाहिए. मैं अगर रात को देरी से आता हूँ तो घर वालों को पता होता है कि मैं कहाँ था. मेरा पूरा कार्यक्रम मेरे घर में पता होता है. मुझे लगता है कि अगर घर के लोगों को पता हो कि आप का रोज़ का क्या कार्यक्रम है तो एक विश्वास का रिश्ता बन जाता है. दूसरा जब आपकी घर पर ज़रूरत हो तो आप उपलब्ध हो जाएँ. आपकी पत्नी समझे कि आप एक मिशन पर चल रहे हैं और जुड़ जाए तो चीज़ें आसान हो जाती हैं. मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जब मैं बड़ा व्यवसायी नहीं बना था तब शहर की बड़ी शख़्सियत तो बन ही गया था. मेरे परिवार के लोग देख सकते थे कि मैं क्या कर रहा हूँ. कौन लोग मुझसे मिल रहे हैं. मैं कोशिश करता हूँ कि रविवार को घर पर अपने परिवार के लोगों के साथ रहूँ. मैं देखा है कि अगर मेरे बच्चों से मेरा मामला ठीक चल रहा है तो मेरी पत्नी ख़ुश रहती है.

मैं एक कहानी बताता हूँ आपको. इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद यादव आए थे. उसने मैंने पूछा कि आपका और राबड़ी जी का इतना अच्छा संबंध कैसे हैं. उन्होंने कहा कि क्योंकि हमें मोबाइल पर बात करना नहीं आता. अगर आता होता तो राबड़ी हमसे पूछती रहती कि अभी कहाँ हो. क्या कर रहे हो. आपकी अपनी पत्नी से मोबाइल पर बात होती रहती है?

नहीं. जब काम पर होता हूँ तो बिल्कुल नहीं. अगर मैं गाड़ी से निकल रहा होता हूँ या यात्रा कर रहा होता हूँ तो मैं उनसे बात कर लेता हूँ. वैसे उनको पता होता है कि मैं कब क्या कर रहा होता हूँ.

एक पिता होने का अहसास होने पर कैसा लगता है?

अच्छा अहसास ही होता है. मेरे बच्चों के साथ मेरा बहुत लगाव है. अपने साथ के लोगों की अपेक्षा मैं अपने बच्चों से बहुत बेहतरीन तरीके से जु़ड़ा हूँ. उनके साथ मैं टेनिस खेलता हूँ. मेरी तरह मेरे दोनों लड़के भी खेल में रुचि लेते हैं. मेरी बच्ची को राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहुत रुचि है. मेरा भी उसमें रुझान है. तो दोनों में बातचीत होती रहती है. मेरे बच्चे क्या कर रहे हैं, क्या पढ़ाई कर रहे हैं मुझे सब कुछ क़रीब-क़रीब पता रहता है.

आपने अपनी ज़िंदगी में सफलता की नई ऊँचाइयाँ छुईं हैं. आपके लिए सफलता की परिभाषा क्या है?

हर आदमी के लिए सफलता के पैमाने बदलते रहते हैं. आज जो सफलता है वो कल आपके लिए एक सामान्य घटना होती है. पहले मेरे लिए सफलता के पैमाने कुछ और थे आज कुछ और है. बीस हज़ार रुपए से मैंने बिज़नेस शुरू किया था आज मैं 20 बिलियन का लक्ष्य बना सकता हूँ. लेकिन इस सबके बीच मुझे लगता है कि सफलता वो है कि जब आप शाम को अपना काम पूरा कर लें तो आपको लगे कि कुछ किया. एक गुगगुदी सी हो. मेरा मानना है कि सफलता आदमी के अंदर रहती है. और आपको बताती है कि आप ठीक दिशा में जा रहे हैं.

क्या आपको सफलता आसानी से मिली. अगर आसानी से नहीं मिली तो उसका राज़ क्या था?

देखिए सफलता आसानी से नहीं मिलती. क्योंकि आसान सफलता जैसी कोई चीज़ नहीं होती. लेकिन मेरा एक मूल मंत्र है सफलता के लिए. जो मैं स्कूल कॉलेज़ के युवाओं से बताता हूँ. मैं उनसे कहता हूँ कि अगर मौका मिले तो जो आप ज़िंदगी में करना चाहते हैं वही करिए. अगर ऐसा नहीं हो पाता तो कोई औसत ज़िंदगी तो जी सकता है लेकिन बड़ी सफलता नहीं पा सकता. बड़ी सफलता तो तभी मिलेगी जब डॉक्टर की चाह रखने वाला डॉक्टटर बने, इंजीनियर बनने की चाह रखने वाला इंजीनियर बने और बिज़नेसमैन बनने की चाहत रखने वाला आदमी बिज़नेसमैन बने. मेरे लिए हर सोमवार की सुबह बहुत ख़ूबसूरत होती है. मैं अपनी कुर्सी पर बैठकर अपना काम शुरू करता हूँ. भारती टेलीकॉम में काम करने वाले हर आदमी के लिए ये बात सही है. हर आदमी अपने काम में ख़ुशी महसूस करता है. मैं अपने बच्चों से भी यही कहता हूँ.

 देखिए सफलता आसानी से नहीं मिलती. क्योंकि आसान सफलता जैसी कोई चीज़ नहीं होती. लेकिन मेरा एक मूल मंत्र है सफलता के लिए. जो मैं स्कूल कॉलेज़ के युवाओं से बताता हूँ. मैं उनसे कहता हूँ कि अगर मौका मिले तो जो आप ज़िंदगी में करना चाहते हैं वही करिए. अगर ऐसा नहीं हो पाता तो कोई औसत ज़िंदगी तो जी सकता है लेकिन बड़ी सफलता नहीं पा सकता. बड़ी सफलता तो तभी मिलेगी जब डॉक्टर की चाह रखने वाला डॉक्टटर बने, इंजीनियर बनने की चाह रखने वाला इंजीनियर बने और बिज़नेसमैन बनने की चाहत रखने वाला आदमी बिज़नेसमैन बने

आप ख़ुद को प्रेरणा दे लेते हैं. लेकिन अपने उन सैकड़ों कर्मचारियों को प्रेरित कैसे करते हैं. ऐसे भी कई कर्मचारी होंगे जो अपनी मनपसंद की नौकरी नहीं कर रहे होंगे?

ये बहुत ही अच्छा सवाल है. मैं जब अपने हज़ारों कर्मचारियों से मिलता हूँ तो उनसे कहता हूँ कि अगर सोमवार को ऑफ़िस आते समय आप में उमंग नहीं है तो अपने आप से पूछिए कि कहाँ ग़लती हो रही है. कहीं आप ग़लत जगह तो नहीं हैं. अगर थोड़ा बहुत बदलाव लाना चाह रहे हैं यहीं काम करना चाह रहे हैं तो शाम को जाकर कॉलर खींच दीजिए दो-चार. लेकिन इस उस धंधे में बिल्कुल मत रहिए जिसमें आपका मन नहीं लग रहा है.

ये कॉलर खींच लेने का मतलब क्या है?

अपने बॉस के कॉलर खींचिए. मतलब अपने बॉस से सवाल पूछिए. देखिए सफलता वहीं मिली है जहाँ लोगों ने काम में अपनी जान लगा दी. अगर काम में मुश्किलें भी आएंगी तो आप उसे पार कर जाएंगे क्योंकि आप पूरे दिल से उस काम को कर रहे हैं.

क्या रिस्क लेना भी कामयाबी हासिल करने का एक तरीका है?

बिल्कुल है. मैंने तो एक बार नहीं दर्ज़नों बार अपनी कंपनी दाँव पर लगाई है. अब पिछले दस सालों से ऐसी नौबत नहीं आ रही है. आज से पाँच साल पहले कंपनी के शेयर की कीमत 20 रुपए थी और कंपनी की कीमत उसमें लगाई पूँजी की भी आधी हो गई थी. लेकिन ऐसी स्थिति बन चुकी थी कि हालात संभले हुए थे. अगर तीसरे नंबर पर न होते तो तीन सौवें नंबर पर होते. लेकिन आज मैं कंपनी को दाँव पर नहीं लगा सकता क्योंकि इसमें शेयर होल्डर्स का पैसा लगा हुआ है. अब रिस्क लेने की जगह रिस्क प्रबंधन पर कोशिश होती है. छोटा व्यापारी धंधे में कई बार कंपनी को दाँव पर लगा देता हैं. मैंने भी लगाया है.

हमारे हज़ारों-लाखों श्रोताओं के पास तो इतने पैसे हैं नहीं. ये बताइए पैसा कितना महत्वपूर्ण है ज़िंदगी बदलने के लिए. जब आपने फ़िएट ख़रीदी थी और आज में आपकी ज़िंदगी में कितना अंतर आया है?

जब आप छोटे होते हैं तो छोटी सफलताएँ और लड़ाइयाँ भी बड़ी लगती हैं. जब आप बड़े हो जाते हैं तो वो लड़ाइयाँ, सफलताएँ छोटी लगने लगती है और आप बड़ी लड़ाइयाँ लड़ते हैं. अगर आज आप छोटी गाड़ियाँ ख़रीद सकते हैं तो 15-20 साल बाद बड़ी गाड़ियाँ भी ख़रीद सकते हैं. अगर आपका पैसा बनाने में रुचि है.

मैं पूछना चाह रहा था कि आपकी ज़िंदगी में क्या परिवर्तन आया. बहुत से ऐसे लोग मिलते हैं जो सफलता मिलने के बाद कहते हैं कि वो पहले वाली ज़िंदगी ही अच्छी थी. वो कहते हैं कि पहले अधिक सुख-शांति थी. पैसे ने आपकी ज़िंदगी को कैसे बदला है?

पैसा आपको कुछ मूल सुख-सुविधाएँ देता है. पहले आप ट्रेन से मुंबई जाते थे. आज चार्टर्ड प्लेन से जा सकते हैं. पहले अपार्टमेंट में रहते थे आज बड़े घर में रह सकते हैं. चीज़ों का महत्व सापेक्ष रुप से बढ़ जाता है. लेकिन पूरी तरह से महत्व कभी नहीं बदलता. पैसा आपको बाँधता भी है. समाज में ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है. पहले आप जो चीज़ें कर सकते थे वो आज नहीं कर सकते. नज़रिए की बात है. पैसे का महत्व है लेकिन एक स्तर के बाद नहीं है.

आप कहाँ रहते हैं?

मैं अमृता शेरगिल मार्ग पर रहता हूँ.

कहते हैं कि पहला एक करोड़ रुपया बनाने में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ होती है. क्या ये बात सच है?

बिल्कुल नहीं. उभरती अर्थव्यवस्था में ऐसे दाग़ लग जाते हैं कि ऊपर आने के लिए कुछ न कुछ ग़लत करना ही पड़ता है. अगर आप अमरीका और इंग्लैंड जैसे देशों में जाएंगे जहाँ कार गैराज़ों से धंधा शुरू कर लोग अरबपति हो गए वहाँ सवाल नहीं उठेगा. लेकिन भारत, श्रीलंका, लैटिन अमरीका जैसे देशों में अगर आप तेज़ी से बढ़ रहे हैं तो कहा जाएगा कि आप कुछ न कुछ ग़लत करके ही आगे बढ़ रहे होंगे. वैसे कुछ लोग होते हैं जो ऐसा करते हैं. लेकिन सभी ऐसा करके आगे नहीं बढ़ते. एक दूसरी बात भी कहूँगा. कुछ कुंठित लोग होते हैं जो अपनी ज़िंदगी में ख़ुद कुछ नहीं कर पाते. वो कहते हैं कि हम ऐसा नहीं कर सकते इसलिए आगे नहीं बढ़ पाए.

आपको बिज़नेस समुदाय में से कौन से लोग पसंद हैं?

हमारे यहाँ कहा जाता है कि जो टाटाज़ का वैल्यू सिस्टम है और रिलायंस की जो स्पीड है अगर इन दोनों को मिला दें तो आदर्श कंपनी बनेगी. मेरा मानना है कि भारती में दोनों चीज़ें मौज़ूद हैं. इसमें वैल्यू सिस्टम और प्रोफ़ेनलिज़्म बहुत अव्वल दर्ज़े की है और स्पीड भी है.

कौन से रिलायंस की बात कर रहे हैं?

देखिए दोनों ही स्पीड के मामले में बहुत तेज़ हैं.

 बिल्कुल नहीं. उभरती अर्थव्यवस्था में ऐसे दाग़ लग जाते हैं कि ऊपर आने के लिए कुछ न कुछ ग़लत करना ही पड़ता है. अगर आप अमरीका और इंग्लैंड जैसे देशों में जाएंगे जहाँ कार गैराज़ों से धंधा शुरू कर लोग अरबपति हो गए वहाँ सवाल नहीं उठेगा. लेकिन भारत, श्रीलंका, लैटिन अमरीका जैसे देशों में अगर आप तेज़ी से बढ़ रहे हैं तो कहा जाएगा कि आप कुछ न कुछ ग़लत करके ही आगे बढ़ रहे होंगे. वैसे कुछ लोग होते हैं जो ऐसा करते हैं. लेकिन सभी ऐसा करके आगे नहीं बढ़ते

सुनील भारती मित्तल में ये भारती क्या है?

भारती हमारे परिवार के लिए एक उपनाम बनाया गया था. दरअसल मेरे पिता जी ने उस ज़माने में अपनी मर्ज़ी से जाति से बाहर प्रेम विवाह किया था. उन्होंने ही तय किया कि उनके बच्चों के नाम के पीछे मित्तल नहीं भारती लगेगा. हमारे स्कूल के सर्टीफ़िकेट, पहले के पासपोर्ट में भारती ही लिखा था. अगर पहले के दोस्त मिलेंगे तो वो भारती ही कहेंगे मित्तल नहीं पुकारेंगे.

ज़िंदगी में सबसे अधिक पछतावा किस बात पर होता है?

कोई पछतावा नहीं है जिंदगी में. जब ज़िंदगी परिकथा की तरह गुज़री हो तो पछतावा कैसा. छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं.

सबसे अधिक ख़ुशी के क्षण?

हिंदुस्तान की पहली मोबाइल कॉल करना शायद सबसे बड़ा क्षण था. मैं चाहता था कि हिंदुस्तान में कुछ अलग किया जाए.

 अपना भारत अगले 15-20 साल तक तरक्की करता रहेगा. इसके दो-तीन पहलू हैं. एक तो भारत में उपभोक्ताओं की संख्या बहुत है. और दूसरा भारत में युवाओं की संख्या भी बहुत है. दुनिया भर के लोगों को हिन्दुस्तान के लोगों की ज़रूरत पड़ेगी. आर्थिक क्षेत्र में भारत तरक्की करता रहेगा. अगर 8-9 फ़ीसदी से भी तरक्की होती रही तो विशेषज्ञों की भविष्यवाणी के अनुसार 2040 में भारत दुनिया की तीसरा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा. लेकिन कुछ काम करने की भी ज़रूरत है. कोशिश होनी चाहिए कि सभी को इस प्रगति में हिस्सेदारी मिले

अपने आपको फ़िट कैसे रखते हैं?

मैं हर रोज़ एक-सवा घंटा कसरत करता हूँ. मेरी कोशिश रहती है कि हफ़्ते में चार-पाँच दिन मैं कसरत करूँ. मैं लोदी गार्डन में टहलने जाता हूँ. अगर शहर के बाहर हूँ तो जो बाग-बगीचा मिलता है उसमें जाता हूँ. यदि नहीं मिलता तो ट्रेडमिल पर लग जाता हूँ. योगा भी करता हूँ.

पसंदीदा खेल?

कह सकते हैं कि टेनिस. वैसे अब तो समय मिलता नहीं. कोई ऐसा खेल नहीं रहा जिसमें मैंने हाथ न आजमाया हो.

रोमांचक खेल खेलते हुए डर नहीं लगता?

कोई डर नहीं लगता.

क्यों?

बस यूँ ही. अभी हाल ही में जब मैंने स्कीइंग की तो प्रशिक्षक भी परेशान हो गया. मैं बहुत ऊपर से स्कीइंग कर रहा था. मैं रोमांचक खेलों में बहुत सहज रहता हूँ.

पसंदीदा फ़िल्म और फ़िल्म अभिनेत्री?

फ़िल्में मुझे वही पसंद आती हैं जिनमें थोड़ी गंभीरता हो. कोई एक फ़िल्म बताना तो मुश्किल है. मुझे आमिर ख़ान वाली ‘रंग दे बसंती’ और अंग्रेज़ी फ़िल्मों में ‘द लास्ट समुराय’ बहुत पसंद आई. ‘द लास्ट समुराय’ मैंने दो बार देखी थी. किसी सामाजिक संदेश या इतिहास से जुड़ी फ़िल्में मुझे पसंद आती हैं.

अपनी पसंद के गाने बताइए.

मुझे जगजीत सिंह के गाने पसंद हैं. पुरानी फ़िल्मों के गाने पसंद है.

पुरानी फ़िल्मों के कौन से गाने पसंद हैं?

ये तो बताना मुश्किल है.

पुराने समय के कौन से गायक पसंद हैं?

एक समय में किशोर कुमार पसंद थे. उनके चुलबुले गाने मुझे पसंद आते थे. कभी-कभी मुकेश के गाने भी अच्छे लगते थे.

भारत एक बहुत रोमांचक मोड़ से गुज़र रहा है. सभी भारत के बारे में तरह-तरह की संभावना व्यक्त कर रहे हैं. भारत के बारे में आप का क्या कहना है?

अपना भारत अगले 15-20 साल तक तरक्की करता रहेगा. इसके दो-तीन पहलू हैं. एक तो भारत में उपभोक्ताओं की संख्या बहुत है. और दूसरा भारत में युवाओं की संख्या भी बहुत है. दुनिया भर के लोगों को हिन्दुस्तान के लोगों की ज़रूरत पड़ेगी. आर्थिक क्षेत्र में भारत तरक्की करता रहेगा. अगर 8-9 फ़ीसदी से भी तरक्की होती रही तो विशेषज्ञों की भविष्यवाणी के अनुसार 2040 में भारत दुनिया की तीसरा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा. लेकिन कुछ काम करने की भी ज़रूरत है. कोशिश होनी चाहिए कि सभी को इस प्रगति में हिस्सेदारी मिले. अभी मैं यूपी होकर आया. वहाँ बहुत ग़रीबी और गंदगी है. अगर आप शहर से चालीस मील भी बाहर निकलें तो आपको पता चलेगा कि एक दूसरी दुनिया भी जी जा रही है. सरकार को ग्रामीण स्तर पर बुनियादी ढाँचा खड़ा करने की कोशिश करनी चाहिए. नहीं तो देश की अर्थव्यवस्था तो बढ़ जाएगी लेकिन फिर अपराध बढ़ेगा. लोगों को आशाएं बढ़ेगी और अगर वो पूरी नहीं पाई तो दिक्कत होगी. दो संभावनाएँ अपने देश की अर्थव्यवस्था बारे में व्क्त की जा रही हैं. एक तो ये कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों को अपनी इच्छाएँ पूरी करने का मौका मिलेगा. दूसरे में सारे संसाधन कुछ हाथों में ही रह जाएंगे. जिसकी वजह से ग़ैर-बराबरी बढ़ेगी. उससे दबाव बढ़ेगा.

मैं भी एक संभावना व्यक्त करता हूँ कि सुनील भारती मित्तल राजनीति में आएंगे. जिस तरह से आप बात कर रहे हैं उससे लगता है कि आप में सार्वजनिक जीवन जीने वाला एक आदमी भी छुपा हुआ है?

सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति का रोल अदा करना मेरे लिए दिक्कत वाली बात नहीं है. मैं आज भी हज़ारों लोगों से मिलता हूँ. मेरे को लगता है मैं अपने लोगों को प्रेरित कर पाता हूँ उनको एक दृष्टिकोण दे पाता हूँ. चार-पाँच साल पहले तो मुझे लगता था कि मैं 50 साल की उम्र में राजनीति में चला जाऊँगा. लेकिन अब ऐसा नहीं लगता. मैं अपने धंधे से बहुत चिपक कर नहीं बैठता. मैं अपनी व्यापार की ज़िम्मेदारियाँ छोड़ता रहता हूँ. आज चार-पाँच साल के सफ़र के बाद मैं कह सकता हूँ कि राजनीति में जाना मुश्किल है. हाँ अगर सरकार कोई काम देगी तो ज़रूर करूँगा. अभी सीआईआई का अध्यक्ष हूँ. अगले एक साल तक काम करूँगा. ये एक सार्वजनिक काम ही है. इसमें तो पैसा तो बन नहीं रहा.

चलिए 50 नहीं तो 55.

हाँ कुछ कह नहीं सकते. राजनीतिक परिवार से हूँ. राजनीति की बारीकियों को समझता हूँ. लेकिन आज की राजनीति का जो माहौल है वो मेरे लायक नहीं है. राजनीति में जिस तरह से जाति का खेल हो रहा है उस देखकर मैं हैरान हूँ. युवाओं में भी ये रुझान देखने को मिल रहा है. मेरा मानना है कि राजनीति में सबको साथ लेकर देश के लिए लगाया जाए.

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