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लता मंगेशकर के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में आज हमारे बीच में हैं 'स्वर कोकिला' लता मंगेशकर. लता जी समझ नहीं आ रहा है कि आपकी तारीफ़ में क्या कहूँ. इतने लोगों ने इतना कुछ कह दिया है कि शब्द ही नहीं सूझ रहे. आप प्लेबैक सिंगिग का पर्याय बन गईं हैं. कैसा लगता है अपनी तारीफ़ें सुनकर? सच बताऊँ तो मुझे अपनी तारीफ़ अच्छी नहीं लगती. मैं बहुत घबरा जाती हूँ जब कोई मेरी तारीफ़ करता है. समझ में नहीं आता है कि क्या कहूँ. मैं भी आपके लाखों-करोड़ों प्रशंसकों में एक हूँ. आपके गले में सरस्वती विराजती हैं. बहुत-बहुत शुक्रिया. लोग कहते हैं कि लता ही संगीत है और संगीत ही लता है. आपके लिए संगीत क्या है? संगीत मेरा जीवन है और संगीत के बग़ैर मैं अपने आपको कुछ नहीं समझती हूँ. संगीत के बिना लता कुछ नहीं है. जब मन थोड़ा अच्छा नहीं होता या जिस दिन आप छुट्टी पर होती हैं तो क्या उस समय संगीत से भी छुट्टी ले लेती हैं? उस दिन अगर संगीत और गाने सुन लेती हूँ तो मूड अच्छा हो जाता है. मैं अपने गाने नहीं सुनती हूँ. दूसरे कलाकारों के गाने सुनती हूँ. उनमें शास्त्रीय संगीत थोड़ा अधिक होता है. बड़े गुलाम अली, जसराज जी, भीमसेन जोशी जी, मेंहदी हसन साहब जैसे कलाकारों का संगीत सुनती हूँ. ये तो बहुत बड़े लोग हैं. फिर भी उस दिन आप सबसे अच्छे गाने यानी अपने गाने तो नहीं सुनती हैं. ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जिससे आपका मूड ख़राब होता है? देखिए इंसान हैं तो छोटी-मोटी, अच्छी-बुरी बातें होती ही रहती हैं. ये तो बहुत ही स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है. कलाकार तो और भी अधिक संवेदनशील होता है. मुझे कोई छोटी सी बात दुख पहुँचा देती है तो किसी छोटी सी बात से मैं बहुत ख़ुश भी हो जाती हूँ. ये मेरे स्वभाव की बात हुई. दो बातों से मैं बहुत परेशान होती हूँ. एक, अगर मुझे कोई बेसुरा संगीत सुनाता है तो मैं बहुत परेशान हो जाती हूँ. तो मुझसे गाने को मत कहिएगा. और दूसरा. अगर कोई झूठ बोलकर मुझे प्रभावित करने की कोशिश करता है तो मुझे बहुत दिक्कत हो जाती है. मैं गुस्से में आ जाती हूँ. अपनी पसंद का एक गाना बताएँ. मेरे भाई का एक गाना है- यारा सीली सीली... अपनी आवाज़ को अभी तक इतना सुरीला कैसे बना रखा है आपने? ये भगवान की देन है. उसने मुझे देते हुए बिल्कुल भी कंजूसी नहीं की है. दोनों हाथों से दिया है. भगवान की कृपा है. मेरे माता-पिता और गुरूजनों का आशीर्वाद है. भगवान को धन्यवाद कैसे देती हैं? उनसे कहती हूँ कि ये आपकी ही कृपा है जो मैं लोगों की संगीत के माध्यम से सेवा कर रही हूँ या संगीत की सेवा कर रही हूँ. ('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) आप इंदौर में पैदा हुईं. आप संगीतकार पिता की पांच संतानों में एक हैं. आपके बचपन के दिन कैसे थे? हमारे यहाँ मान्यता है कि पहला बच्चा लड़की के माँ के घर होता है. इसलिए मेरा जन्म मेरी नानी के घर इंदौर में हुआ था. फिर हम कोल्हापुर के पास सांगली चले आए. मेरे पिता जी नाटक कंपनी चलाते थे जिसे बंदकर उन्होंने एक फ़िल्म कंपनी बनाई. हमने वहाँ मकान बनाया. मैं बहुत शरारती थी. मेरे एक भाई और चार बहनें हैं. मैंने पांच-छह साल की उम्र में पिता जी से गाना सीखना शुरू किया. पिता जी ने फिर से ड्रामा कंपनी शुरू की. हम उनके साथ-साथ टहलने लगे. तो आप पिता जी के अधिक क़रीब थीं? उनके क़रीब थी लेकिन मैं उनसे बहुत डरती थी. हम सभी भाई-बहन उनसे डरते थे. उन्होंने हमें कभी डांटा-मारा नहीं. वो बहुत प्यार से पेश आते थे. फिर भी हम उनसे डरते थे. यानी जो आपसे प्यार करते हैं आप उनसे डरती हैं? उनका बहुत रौब था. पिता जी बहुत मशहूर थे. हमको लगता था कि ये पिता हैं इनसे डरना चाहिए. माँ से बिल्कुल डर नहीं लगता था. मैंने उनको बहुत तंग किया है और पिटाई भी खाई है. आपको अभिनय का शौक़ था. आपने कुछ फ़िल्मों में काम भी किया है? अभिनय का शौक़ बिल्कुल नहीं था. पिता जी की ड्रामा कंपनी में छोटे बच्चों के रोल किया करती थी. पिता जी जब तक जीवित थे तब तक कुछ शौक़ था. पिता जी का देहांत 1942 में हुआ. उसके बाद परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई. तब मैंने 'नवयुग फ़िल्म्स प्राइवेट लिमिटेड' के लिए एक फ़िल्म की. इसमें मैं हीरोइन की बहन बनी थी. वो मेरी पहली फ़िल्म थी जिसका नाम था 'पहली मंगला गौड़'. वो एक मराठी फ़िल्म थी. ये फ़िल्म करने के बाद मैं कोल्हापुर आई. वहाँ मास्टर विनायक थे. मराठी फ़िल्मों में उनका बहुत नाम था. उनकी कंपनी में मैंने नौकरी कर ली. मेरा पगार दो सौ रुपए थी. उस समय के हिसाब से बहुत ही अच्छी पगार थी. हाँ, लेकिन भाई हृदयनाथ बहुत बीमार रहता था. पिता जी के समय में हम लोग बहुत शान से रहा करते थे. वैसा समय तो रहा नहीं. मैं सुबह से शाम तक काम करती थी तो पढ़ना-लिखना हुआ नहीं. कहते हैं कि आप सहगल साहब की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं? आज भी हूँ. मैं सबसे पहले उनके ही गाने गाने शुरू किए थे. मैं अपने पिता जी को सुनाया करती थी. मुझे आज भी सहगल साहब पसंद हैं. सहगल साहब की कौन सी बात आपको पसंद थी? मुझे उनकी आवाज, गाने का अंदाज़ बहुत पसंद था. उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा हुआ था. इसलिए हर तरह के गाने वो गा सकते थे. मुझे अपने पिता जी के अलावा उनके ही गाने पसंद आते थे. लोग कहते हैं कि उनकी वजह से ही आप फ़िल्म इंडस्ट्री में आईं. तो सहगल आपके पहले आदर्श थे, पहले क्रश थे. क्या थे वो आपके लिए? बिल्कुल मेरे आदर्श थे. मैं उनके ही गीत सुना करती थी और गाया करती थी.
आपके मुँह बोले भाई मुकेश भी सहगल साहब के बहुत बड़े प्रशंसक थे और अपनी ज़िंदगी का पहला गाना भी उन्होंने उनकी तर्ज़ पर गाया था? बिल्कुल. वो गाना था. दिल जलता है तो जलने दे... अपनी पसंद का एक और गाना बताइए? ओ सजना बरखा बहार आई...... कोई एक ऐसा गाना है जिससे आपको लगा कि बस आपने प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया जीत ली? वो महल फ़िल्म का गाना था आएगा आने वाला... एक ही साल के अंदर पांच-छह फ़िल्में ऐसी आईं जो सुपर हिट थीं. वो फ़िल्में थीं महल, अंदाज़, बरसात, बड़ी बहन जिनका संगीत बहुत चला था. आपने तो ऐसे नाम गिना दिए कि मैं तो फ़्लैशबैक में चला गया. लेकिन देखिए जब महल फ़िल्म का गाना रिकॉर्ड हो रहा था तो खेम चंद्र प्रकाश जी जो मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे, उन्होंने कहा था कि देखना महल के गाने खूब चलेंगे. फ़िल्म आई और गाने भी खूब बजे. लेकिन खेम चंद्र प्रकाश जी का देहांत हो गया. मुझे बहुत दुख हुआ. मैं और किशोर कुमार उन्हें चाचा कहकर बुलाया करते थे. वो देख ही नहीं पाए कि आएगा आने वाला....इतना चला. लता जी इसी को नियति कहते हैं. लेकिन महल फ़िल्म के उस गाने में एक ख़ुशनुमा माहौल में झूले पर बैठकर मधुबाला गाती हैं. शूटिंग करते समय ऐसा माहौल कैसे पैदा करते थे आप लोग? उस गाने की शूटिंग तो बहुत ही मज़ेदार रही है. मलाड में बॉम्बे टाकीज़ का बहुत बड़ा स्टूडियो था. स्टूडियो पूरा खाली था. मैंने गाना शुरू किया. लेकिन उनका कहना था कि वो प्रभाव नहीं आ रहा है कि जैसे आवाज़ दूर से आ रही हो. उन्होंने मुझे स्टूडियो के एक कोने में खड़ा करके माइक बीच में रख दिया गया. माइक मुझसे क़रीब 20 फुट दूर रखा था. जो गाने से पहले का शेर था ख़ामोश है जमाना...वो शेर कहते हुए मैं एक-एक कदम आगे बढ़ती थी और गाना शुरू होने तक मैं माइक के पास पहुँच जाती थी. इस गाने पर बहुत मेहनत की मैंने. वो गाना बहुत अच्छा था. उसे थोड़ा गाकर सुना दीजिए. क्या ब्यूटी है उस गाने में. ब्यूटी तो उस गाने के शेर में है. बोल बहुत अच्छे हैं. धुन भी बहुत मेहनत से बनाई है. धुन में कई बार बदलाव किए गए थे. (लता जी गाना गाकर सुनाती हैं) आपने इतनी हीरोइनों के लिए गाया. लेकिन आपको ऐसी कौन सी हिरोइन लगीं जिनकी आवाज़ से आपकी आवाज़ मैच करती थी? मेरी आवाज़ नूतन और मीना कुमारी से बहुत मिलती है. मुझे लगता था कि मेरी आवाज़ नरगिस से भी मिलती है लेकिन लोगों को लगता था कि ऐसा नहीं है. नूतन खुद एक गायिका थीं. जब वो अपना संवाद खत्म करतीं और मैं गाना शुरू करती तो लगता था कि नूतन ही गा रही हों. नूतन जी का ऐसा कोई गाना जो आपने गाया हो और आपको बहुत अच्छा लगता हो? ऐसे तो कई सारे गाने हैं. लेकिन एक गाना है जिसमें उन्होंने बहुत बढ़िया अभिनय भी किया है मनमोहना बहुत झूठे...एक क्लासिकल गाना है. उसने इतनी अच्छी ऐक्टिंग की थी कि लगता था कि वही गा रही है. इस गाने में इतनी ताने और आलाप हैं कि इस पर अभिनय करना बहुत कठिन हो जाता है. लेकिन नूतन ने इतनी आसानी से किया कि लगता था मैं नहीं गा रही हूँ. और नई हिरोइनों में आपको किस हिरोइन से अपनी आवाज़ मैच होती लगती है? मुझे लगता है कि काजोल और माधुरी दीक्षित से मेरी आवाज मिलती है. इन दोनों के लिए गाया एक-एक गाना बताइए. काजोल के साथ एक गाना है मेरे ख़्वाबों में जो आए... और माधुरी के लिए? ओ राम जी तेरे लखन ने बहुत दुख दीना... आपने बहुत से पुरुष गायकों के साथ गाने गाए हैं. आपको सबसे अच्छा कौन-सा गायक लगता था? मुझे किशोर कुमार बहुत अच्छे लगते थे. कुछ गानों में मोहम्मद रफ़ी साहब और मुकेश भैया भी अच्छे लगते थे. किशोर कुमार मुझे हर गाने में अच्छे लगते थे. उन्होंने मेरे साथ हर तरह के गाने गाए. मुझे उनके गाने का अंदाज़ अच्छा लगता था. उन्हें संगीत की समझ थी. उनके दर्द भरे गाने भी बहुत अच्छे बन पड़े. रफ़ी साहब के साथ जो मैंने रोमांटिक साँग गाए हैं वो बहुत बेहतरीन हैं. ये बहुत बेहतरीन गाने कौन से हैं? जैसे एक गाना है वो हैं ज़रा ख़फ़-ख़फ़ा... किशोर कुमार का कौन-सा गाना है जो आपको सुनने का मन करता है? अभी कोई याद नहीं आ रहा है. मुकेश साहब का कोई गाना? बहुत से गाने हैं. राज कपूर का गाना है आ जा रे मेरा दिला पुकारा... या सावन का महीना...मुकेश भैया बहुत बढ़िया गाते थे और भले इंसान थे.
और राज कपूर के साथ भी आपके बहुत ख़ास संबंध थे. कोई फ़िल्म उन्होंने ऐसी नहीं बनाई जिसमें लता जी के गाने न हों. एक आपसी समझ थी. उन्हें आलाप बहुत अच्छे लगते थे. वो मुझ पर ही छोड़ देते थे कि मैं आलाप गाऊँ. आपको याद होगा कि एक गाना था आ अब लौट चलें...मुकेश भैया का गाना था. लेकिन राज कपूर साहब ने मुझे बुलाया कि मैं आकर गाने में आलाप दे दूँ. मैंने गाने में कुछ भी नहीं गाया सिर्फ़ आलाप दिए हैं. उनको क्या चाहिए वो समझा देते थे. मौजूदा पीढ़ी के संगीतकारों मे आपके पसंदीदा कौन हैं? मुझे एआर रहमान और जतिन-ललित अच्छे लगते हैं. अब तो जतिन और ललित अलग हो गए हैं. देखिए क्या होता है. आपने कई पीढ़ी के संगीतकारों के साथ काम किया है. आपको आज के और पहले के संगीतकारों के काम में, काम के प्रति समर्पण में क्या अंतर दिखाई देता है? आज के संगीतकारों के काम में समर्पण की बात तो मैं आपको बता नहीं सकती क्योंकि मैं तो बहुत काम करती नहीं आजकल. लेकिन मैं कुछ कमी महसूस करती हूँ. आज लोग कहेंगे कि ये पुराने ख़यालात के लोग हैं. नौशाद साहब एक गाना बनाने के लिए सोचते थे कई-कई दिन तक. एक गाना बनाने में उन्हें 15 दिन लग जाते थे. कई बार धुनें बदली जाती थीं. सलिल चौधरी थे. आज अगर सलिल दा होते तो उनका गाना सुनना लोगों को मुश्किल होता. संगीत में खो जाते थे ये लोग. शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे लोग थे. जब तक काम से संतुष्ट नहीं होते वो लोग बैठे रहते थे. वो अभी देखने को नहीं मिलता. आज के संगीत में वो बात किस हद तक है, मुझे नहीं मालूम. बिल्कुल ठीक कहा आपने. सभी लोगों का कहना है कि आज के गानों से वो मेलोडी गायब है. आज तो मैं पहले गाना सुनती हूँ बाद में गाने जाती हूँ. एक ज़माने में हमें फ़ोन आता था कि नौशाद साहब का गाना है, आ जाइए. हम दौड़े चल जाते थे. आज के गानों में कोई ऐसी बात दिखाई देती है जो पुराने गानों में नहीं मिलती? आज के लोग रिदम का बहुत इस्तेमाल कर रह हैं. पश्चिमी धुनों का ज़्यादा सहारा लिया जाता है. हिंदुस्तानीपन देखने को नहीं मिलता. ज़मीन से ज़ुडे गाने गायब हो गए हैं. हिंदुस्तान की मिट्टी से जुड़ा संगीत अब कम होता जा रहा है. लेकिन हाल के सालों का कोई ऐसा गाना जो सुनकर आपको लगा हो क्या बात है? सोनू निगम के एक-दो गाने अच्छे लगे थे लेकिन ऐसा नहीं लगा कि क्या बात है. ये गाने कल हो न हो...और मैं हूँ ना...अच्छे बन पड़े थे. फ़िल्म कैसी लगी थी? फ़िल्म मैंने देखी थी लेकिन मुझे गाने अच्छे लगे थे. शाहरुख़ ख़ान मेरे पंसदीदा कालाकारों में से हैं. अमिताभ भी पसंद हैं. शाहरुख़ और अमिताभ में कौन अधिक पसंद हैं? दोनों का अपना अलग-अलग अंदाज़ है. मुझे दोनों ही पसंद है. आपके सबसे पसंदीदा अभिनेता कौन हैं? दिलीप कुमार शुरू से ही मेरे सबसे पसंदीदा अभिनेता हैं. आज के दौर में शाहरुख़ और अमिताभ पसंद हैं. और अभिनेत्रियों में कौन पसंद हैं? काजोल, रानी मुखर्जी और माधुरी दीक्षित मुझे अच्छे लगते हैं. काजोल और माधुरी ने तो काम करना छोड़ दिया है. आपकी बहन आशा भोसले भी बहुत अच्छी गायिका हैं. उन्होंने भी बहुत नाम कमाया है. उनके गाने का अंदाज़ भी अलग है. आप लोगों में कुछ समानताएँ हैं और भिन्नताएँ भी. लोगों ने बहुत बातें बनाईं कि आशा जी लता जी के व्यक्तित्व की वजह से दबकर रह गईं. मैं ऐसा नहीं मानता. आशा जी ने अपनी जगह बनाई है. घर में भी कुछ ऐसा होता है? लोगों को तो बातें बनाने की आदत होती है. उसने ख़ुद अपना एक अंदाज़ बनाया है. इसमें किसी की सहायता नहीं ली. आशा ने जब गाना शुरू किया तो उसकी शादी हो चुकी थी. उसकी आवाज़ बहुत अलग तरीके की थी. उसने बहुत मेहनत से अपनी आवाज बनाई. मैं मानती हूँ कि उसने मेरे से अधिक मेहनत की और उस वजह से उसका अपना नाम है.
आपको आशा भोसले का अंदाज़ पसंद है? मुझे उसके गाने का अंदाज़ पसंद आता है. उसकी वजह ये है कि मैं ऐसे गाने कभी गा ही नहीं सकती. आशा भोसले का कोई गाना जो आपको पसंद है? एक क़व्वाली है रोशन लाल की जो मुझे बहुत अच्छी लगती है. गाना है निगाहें मिलाने को जी चाहता है... फ़िल्म इंडस्ट्री को बहुत तड़क-भड़क वाला माना जाता है. लेकिन इसमें भी आपने ‘लेडी इन व्हाइट’ की छवि बना के रखी है. इतनी सादगी वाली छवि आपने सोच-समझ के बनाई? नहीं सोच समझ के नहीं बनाई. बचपन से मुझे सफ़ेद रंग के कपड़े पहनने पसंद थे. जब मैं छोटी थी तो सफ़ेद रंग की घाघरा-चुन्नी पहना करती थी. मुझे कई लोगों ने टोका भी कि तुम युवा लड़की हो क्यों सफ़ेद रंग पहनती हो, रंगीन कपड़े पहना करो. अगर कभी मैं रंगीन कपड़े पहनती हूँ तो मुझे लगता है कि किसी ने मेरे ऊपर रंग डाला हुआ है. मुझे ऐसा भी लगता है कि जब मैं सफ़ेद कपड़े पहनती हूँ तो मेरे काम भी बन जाते हैं. अगर आपको 20-25 साल वाली उम्र में पहुँचा दिया जाए जहाँ आपने अपने परिवार को ठीक जगह पहुँचा दिया है, अपना करियर बना लिया है तो आप कौन से एक-दो काम करना चाहेंगी जो आप न कर पाईं हों? ऐसा कुछ कभी सोचा नहीं मैने. जो हुआ, अच्छा ही हुआ है. मुझे एक ही बात का मलाल है कि जब मैं शास्त्रीय संगीत का रियाज़ कर रही थी तो मुझे फ़िल्मों में गाना पड़ा. इस वजह से मैं शास्त्रीय संगीत ठीक से नहीं सीख सकी. आपने बहुत बढ़िया गाया है. आपको तो इस बात का मलाल नहीं होना चाहिए कि और अच्छा गा लेती. ये मेरी अपनी ख़ुशी की बात है. शुरू में मैंने कोशिश की थी लेकिन जब प्लेबैक सिंगिंग में आ गई तो बिल्कुल ही समय नहीं मिलता था. आपने अपनी ज़िंदगी में किसी राजकुमार(प्रिंस) के आने की बात नहीं सोची? नहीं. देखिए मैं भाग्य को बहुत मानती हूँ. मेरा मानना है कि जन्म, शादी और मौत की बात किसी को मालूम नहीं होती. मेरी बहन आशा ने 15-16 साल की उम्र में प्रेम-विवाह किया. मेरे नसीब में नहीं था इसलिए नहीं हुआ. उसका मुझे अफ़सोस भी नहीं है. सुना है कि आपको क्रिकेट बहुत अच्छा लगता है? मुझे क्रिकेट, टेनिस और फुटबॉल अच्छा लगता है. मैं टीवी पर मैंच देखती हूँ. कुछ खिलाड़ियों को जानती भी हूँ जैसे सचिन और सुनील गावस्कर. इनसे मैं कभी-कभी मिलती भी रहती हूँ. मुझे फ़ोटोग्राफ़ी भी पसंद है. तो विश्वकप में भारत जब अंतिम आठ में भी नहीं पहुँचा था तो आप दुखी हुई होंगी? बहुत दुखी हुई थी. सचिन से आजकल नाराज़ होंगी आप? नहीं-नहीं. ऐसा कैसे हो सकता है. मैं किसी को दोष नहीं देती. खाने में क्या-क्या पसंद है? मराठी स्टाइल का खाना पसंद है. जो बहुत सादा होता है. मराठी नॉन वेज भी पसंद है. कोल्हापुरी चिकन, मटन अच्छा लगता है. कोल्हापुरी मटन बहुत अच्छा लगता है. इसका पुलाव बनाते हैं. ऐसा कहते हैं कि इंडस्ट्री में ईमानदारी नहीं बरती जाती. यहाँ लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है. क्या ये सही है? मुझे इस बारे में वाकई मालूम नहीं. मैं अपना काम करके घर आ जाती हूँ. किसी पार्टी में भी नहीं जाती. अच्छा और बुरा तो हर जगह होता है. इंडस्ट्री की बातें इसलिए पता चल जाती हैं क्योंकि यहाँ स्टार रहते हैं. छुट्टी मनाना कहाँ पसंद करती है? लंदन जाना अच्छा लगता है. उन्होंने अपनी पुरानी बातों को छोड़ा नहीं है. अगर उनके गांवो में जाइए तो आपको पुराने लंदन के दर्शन हो जाएंगे. उन्होंने अपनी परंपराओं को सहेज कर रखा है. हमारे यहाँ तो अगर कोई पुराना किला है तो कहेंगे कि तोड़ो उसको, बिल्डिंग बनाओ. हम अपने इतिहास को सहेज कर नहीं रख पाते. आपकी ज़िंदगी का ख़ुशीभरा यादगार मौका कौन-सा है? मैं हिंदुस्तान के बाहर पहली कार्यक्रम करने गई थी. कार्यक्रम लंदन के अल्बर्ट हॉल में था. दिलीप कुमार साहब भी थे. मैं बहुत घबराई हुई थी. मैं जब मंच पर जाती हूँ तो जूते-चप्पल नहीं पहनती. उस कार्यक्रम में भी जब मैं मंच पर जाने लगी तो अपने जूते उतार दिए. उस समय बहुत ठंड पड़ रही थी. दिलीप साहब ने कहा कि अरे जूते पहनो, ठंड लग जाएगी. मैंने कहा कोई बात नहीं. मैं मंच पर सरस्वती की आराधना करने जा रही हूँ. मैं जूते पहनकर ऐसा नहीं कर सकती. फिर मैं मंच पर गई. लोगों ने खड़े होकर अपना प्यार जताया. मेरा वो सपना था कि कभी ऐसा दिन आए. मैं वो दिन कभी नहीं भूल सकती. आने वाले समय में आपके चाहने वाले क्या उम्मीद रखें? मैं इतना ही कह सकती हूँ कि जब तक और जहाँ तक हो सकता है मैं अपने चाहने वालों के सामने अपना कार्यक्रम पेश करूँ. और तब तक पेश करती रहूँ जब तक वो पसंद करें. जाते-जाते किसी गाने की लाइनें गुनगुना दीजिए. (लता जी गाती हैं) लुका छिपी बहुत हुई, सामने आ जा ना... | इससे जुड़ी ख़बरें मुलाक़ात- लालकृष्ण आडवाणी के साथ26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: लालकृष्ण आडवाणी से26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: शीला दीक्षित से02 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: वसुंधरा राजे के साथ22 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात : मणिशंकर अय्यर के साथ29 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस सुनील मित्तल के साथ 'एक मुलाक़ात'17 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 'एक मुलाक़ात' सर्वश्रेष्ठ मौलिक कार्यक्रम घोषित04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: प्रीति ज़िंटा के साथ31 दिसंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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