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रविवार, 07 अक्तूबर, 2007 को 00:45 GMT तक के समाचार
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शत्रुघ्न सिन्हा के साथ 'एक मुलाक़ात'

शत्रुघ्न सिन्हा
शत्रुघ्न सिन्हा भारत के स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

एक मुलाक़ात में इस बार हमारे साथ हैं एक बहुत ही जानी-मानी शख़्सियत. इन्होंने पहले सिनेमा के रुपहले पर्दे पर जलवा बिखेरा और आजकल राजनीति में नाम कमा रहे हैं. हम बात कर रहे हैं शत्रुघ्न सिन्हा से.

आपको अपनी नेता और अभिनेता में से कौन सी भूमिका अधिक पसंद है?

ये सभी भूमिकाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं. मैं लोगों के प्यार की वजह से अभिनेता बन पाया. फिर मुझे लगा कि जिन लोगों ने इतना प्यार दिया मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए. अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को समझते हुए ही मैं राजनीति में आया.

आपके जवाब से लग रहा है कि आपको अपना नेता वाला पक्ष अधिक पसंद है?

इस समय आपने मुझे उसी रूप में बुलाया है. लेकिन यह ज़रूर है कि पूरी दुनिया में मुझे अभिनेता की वजह से ही पहचान मिली. फ़िल्म मेरा पहला प्यार है. साथ ही मुझे अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवन की वजह से सम्मान भी मिला.

आपको ‘शॉटगन’ कहकर भी पुकारा जाता है. ऐसा क्यों है?

दरअसल मेरा जो नाम है वो थोड़ा टेढ़ा है-शत्रुघ्न प्रसाद सिन्हा. उस नाम को मैंने छोटा कर लिया. लोगों ने मुझे तोड़-मरोड़कर अलग-अलग नामों से पुकारा. फिर मैंने अपना नाम शत्रु कर लिया. लेकिन कुछ अख़बारों और पत्रिकाओं ने मुझे ‘शॉटगन’ कहकर पुकारना शुरू कर दिया. वहीं से मेरा यह नाम चर्चित हो गया.

जब आप फ़िल्म इंडस्ट्री में आए उस समय सभी अभिनेता बिना दाढ़ी-मूँछ के चिकने चेहरे वाले होते थे. ऐसे में आपने अपना नाम बनाया. आपको कुछ तो लगता होगा कि यार क्या है मुझमें?

मैं ख़ुद कहता था अगर मैं अभिनेता बन सकता हूँ तो कोई भी अभिनेता बन सकता है. जब मैं अपने इस चेहरे के साथ पुणे फ़िल्म संस्थान से स्नातक करके निकला तो लगा कि इस माया नगरी मुंबई में अपनी जगह कैसे बनाऊँ. पूरे फ़िल्म उद्योग मेरा कोई गॉड फ़ादर तो क्या कोई परिचित तक नहीं था. कुछ लोगों ने कहा कि अपना कटा-फिटा चेहरा छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवा लो.

लेकिन देवानंद ने कहा कि जब तुम्हें सफलता मिल जाएगी तो तुम्हारी कमियाँ ही तुम्हारी स्टाइल बन जाएगी. लेकिन मैं तय किया कि नाम के साथ-साथ चेहरा भी नहीं बदलूँगा. फिर मुझे लगा कि यहाँ कैसे अपने आपको स्थापित करूँगा तो मुझे किसी ने मंत्र दिया. वो बात सभी लोगों के साथ मैं ‘एक मुलाक़ात’ के जरिए बाँटना चाहता हूँ. अगर ज़िंदगी में सफल होना है तो अपने को साबित करके दिखाओ और अगर किसी वजह से साबित नहीं कर सकते तो यह दिखाओ कि तुम कैसे सबसे अलग हो. आज लोगों को मेरी नकल करते हुए देख सकते हैं. लेकिन कभी मुझे किसी की नकल करते हुए नहीं देखा होगा. यह उसी मंत्र की वजह से है.

 अगर ज़िंदगी में सफल होना है तो अपने को साबित करके दिखाओ और अगर किसी वजह से साबित नहीं कर सकते तो यह दिखाओ कि तुम कैसे सबसे अलग हो. आज लोगों को मेरी नकल करते हुए देखते हैं. लेकिन कभी मुझे किसी की नकल करते हुए नहीं देखा होगा

आपकी ‘मेरे अपने’ जबर्दस्त फ़िल्म थी. उसमें विनोद खन्ना साहब भी थे. कैसे थे उस समय के अनुभव?

उस समय तक मेरी कई फ़िल्में आ चुकी थीं. लेकिन ‘मेरे अपने’ ने मुझे इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया. ऐसा पहली बार हुआ कि एक खलनायक पर्दे पर इंट्री मारता और तालियाँ बजने लगतीं. ‘मेरे अपने’ फ़िल्म का बंगाली संस्करण मैंने देखा था. उसका नाम था ‘ऑपन जान’. मेरे अंदर न जाने कौन सा विश्वास था कि मैंने कह दिया था कि यह फ़िल्म मेरे पास आएगी. उसमें भी चरित्र का नाम था छेनू. बंगाली में यह फ़िल्म तपन सिन्हा ने बनाई थी. हिंदी में यह फ़िल्म पहले जलाल आगा के पास चली गई थी. लेकिन हफ़्ते बाद ही मुझे गुलजार की इस फ़िल्म के लिए चुन लिया गया. यह गुलजार की भी पहली फ़िल्म थी.

उस फ़िल्म के एक दृश्य के दौरान मुझे और विनोद खन्ना को लड़ाई करनी थी. हम आपस में भिड़ गए. एक-डेढ़ मिनट के बाद ही हम बुरी तरह हाँफने लगे. मुझे लगा कि इतनी भरी जवानी में हम हाँफ रहे थे. इसकी एक ही वजह समझ में आई कि हम दोनों सिगरेट पीते थे. तब ही से मुझे लगा कि सिगरेट नहीं पीना चाहिए. फिर कुछ सालों में ही मैंने सिगरेट पीनी छोड़ दी.

आपको कब और कैसे लगा कि आपको फ़िल्म अभिनेता ही बनना है?

हम चार भाई हैं. उनके नाम हैं राम, लक्ष्मण, भरत और मैं शत्रुघ्न. मेरे पिता जी का नाम बीपी सिन्हा है. उन्होंने अमरीका से बीएससी और एमएससी की थी. वो हम भाइयों में से दो को वैज्ञानिक और दो को डॉक्टर बनाना चाहते थे. आज मेरे दो भाई सफल वैज्ञानिक हैं और एक भाई डॉक्टर हैं. लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा तो कंपाउंडर बनने लायक नहीं था. वो बात अलग है कि मैं एक दिन भारत का स्वास्थ्य मंत्री बन गया. उन्होंने पूरी कोशिश की लेकिन मुझे डॉक्टर बनाने में कामयाब नहीं हो पाए.

बचपन में एक फ़िल्म देखी ‘श्री420’. मैं राज कपूर को बहुत पसंद करता था और आज भी करता हूँ. फिर मैंने एक्टिंग करनी शुऱू कर दी थी और अभिनेताओं की नकल करनी शुरू कर दी. किसी ने मुझे पुणे फिल्म संस्थान में प्रशिक्षण लेने की बात कही. पिताजी ने कहा कि यह कौन सी बात हुई कि एक्टिंग का प्रशिक्षण. लोगों को तब संस्थान का पता नहीं था. पिता जी नहीं माने. वो बहुत दुखी हुए और उन्होंने मेरे फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं किए. मेरे भाई ने हस्ताक्षर किए थे. लेकिन बाद में मेरे पिता जी ने मेरे काम को पसंद किया.

शत्रुघ्न सिन्हा
शत्रुघ्न सिन्हा भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक हैं

आपको अपनी फ़िल्में से सबसे अच्छी फ़िल्में कौन सी लगती हैं?

एक बंगाली फ़िल्म थी ‘अंतरजली यात्रा’. इसे अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. हिंदी में भी बनी ‘महायात्रा’ के नाम से. इसे गौतम घोष ने बनाया था. इसे कला फ़िल्मों में गिना जाता है. फिर समझौता, आ गले लग जा, मेरे अपने और दोस्त फ़िल्में पसंद हैं. दोस्त में मेरे साथ धर्मेंद्र और हेमा मालिनी थे. उसी फ़िल्म का एक गाना है आ बता दें कि कैसे जिया जाता है... अमिताभ बच्चन के साथ काला पत्थर, दोस्ताना, नसीब और शान जैसी फ़िल्में कीं. सभी फ़िल्में कामयाब रहीं. दोस्ताना का गाना है सलामत रहे दोस्ताना हमारा...कालीचरण और विश्वनाथ भी पसंदीदा फ़िल्मों में हैं.

मेरे साथ कई निर्देशकों ने अपना करियर शुरू किया. सुभाष घई ने कालीचरण और विश्वनाथ बनाई. राकेश रोशन ने खुदगर्ज बनाई. डेविड धवन ने भी अपनी करियर की शुरुआत मेरे साथ की. मुझे खलनायक के रूप में लोगों का इतना प्यार मिला कि निर्माता-निर्देशकों ने मुझे हीरो बना दिया. नायक के रूप में शायद मेरी पहली फ़िल्म थी मिलाप और एक नारी दो रूप.

वैसे कुछ लोगों का कहना है कि आपका पूरा चरित्र खलनायक की भूमिका में ही उभरकर आता था. वैसे आप जिस फ़िल्म में खलनायक बनते उसके भी नायक बन जाते थे?

हाँ आप खलनायक की जगह नकारात्मक भूमिका कह सकते हैं. बाग़ी चरित्र होता था वो. जैसा काला पत्थर और दोस्ताना फ़िल्म में था. यह भूमिका मैं पसंद करता हूँ.

आपके पसंदीदा गायक?

मुकेश मेरे पसंदीदा गायक हैं. लेकिन उसकी एक वजह और भी है कि वो राज कपूर के साथ जुड़े हुए थे. राज कपूर साहब से जुड़े हर एक आदमी को मैं जानता था. राधू करमाकर, अलादीन खान, शैलेंद्र और हसरत जयपुरी जैसे उन सभी लोगों को मैं बचपन से जानता था जो राज कपूर के साथ काम करते थे.

मैं किशोर कुमार को भी बहुत मानता हूँ. मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर को तो एक संस्था ही मानता हूँ. हेमंत कुमार और मन्ना डे का भी बहुत सम्मान करता हूँ. ये लोग देशों को जोड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. मैंने अपनी पाकिस्तान यात्राओं के दौरान देखा है कि ये लोग जितना भारत में प्रसिद्ध हैं उतना ही पाकिस्तान में भी.

राज कूपर के समय में ही दिलीप कुमार और देवानंद भी बहुत मशहूर थे. आपको वो लोग भी पसंद थे कि अकेले राज कपूर?

राज कपूर मेरी पहली पसंद थे. मेरे लिए वो स्वर्णिम क्षण थे जब मैंने उनके साथ ‘ख़ान दोस्त’ नाम की फ़िल्म में काम किया. उसका गाना भी मशहूर हुआ था काहे की दोस्ती, काहे की यारी...लेकिन मुझे दिलीप कुमार भी बहुत पसंद हैं. उनका आशीर्वाद मुझे मिलता रहता है. मैंने अशोक कुमार के साथ भी काम किया. मुझे लगता है कि मैं ऐसा कलाकार हूँ जिसे हर दौर के अभिनेता के साथ काम करने का मौक़ा मिला.

ऐसी कई फ़िल्में रहीं जो आपने छोड़ी और वो फ़िल्में हिट रहीं?

दीवार और शोले उनमें प्रमुख हैं. दीवार मे अमिताभ वाला रोल मिल रहा था. फ़िल्म ‘शोले’ में भी अमिताभ वाली भूमिका मिल रही थी. कुछ लोग चाहते यह भी थे कि मैं अमजद ख़ान वाला रोल करूँ. लेकिन तब तक मैं नायक के रूप मे स्थापित हो चुका था. रमेश सिप्पी साहब ने तो किताब में लिखा कि वो मुझे ‘शोले’ में लेना चाहते थे. लेकिन जो बात हो गई वो हो गई. पुरानी बात पर अफ़सोस नहीं करना चाहिए. खिलौना जानकर मेरा दिल तोड़ जाते हो.

अच्छी फ़िल्म थी.

फ़िल्म ‘खिलौना’ के लिए मैं मुमताज़ का आभारी हूँ. मैं चाहता था कि वो बिहारी का रोल मुझे मिल जाए. लेकिन लोग कहते कि मैं बहुत कम उम्र का लगूँगा. मुमताज़ ने मेरे लिए बहुत कोशिश की. उन्होंने मुझे वो रोल दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई. इसलिए अगर आप मुझसे पूँछे कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री कौन हैं तो मैं कहूँगा कि मुमताज़. वैसे उस फ़िल्म को दिलाने में संजीव कुमार ने भी बहुत कोशिश की थी. वो सच्चे अर्थों में मेरे दोस्त और मार्गदर्शक थे. मैं उनकी बहुत कमी महसूस करता हूँ.

अपनी पसंद का गाना बताएँ.

मैं अपनी पत्नी और परिवार के लिए एक-एक गाना सुनवाना चाहता हूँ. मेरी पत्नी एक गाना गाया करती थीं जैसे राधा ने माला जपी राम की...और दूसरा गाना है तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिलकर बनेगी प्रीत...पहले हमारे पास बहुत ही बेहतरीन गीतकार और संगीतकार हुआ करते थे. अब तो पता नहीं कैसा संगीत आ रहा है.

 हम चार भाई हैं. उनके नाम हैं राम, लक्ष्मण, भरत और मैं शत्रुघ्न. मेरे पिता जी का नाम बीपी सिन्हा है. उन्होंने अमरीका से बीएससी और एमएससी की थी. वो हम भाइयों में से दो को वैज्ञानिक और दो को डॉक्टर बनाना चाहते थे. आज मेरे दो भाई सफल वैज्ञानिक हैं और एक भाई डॉक्टर हैं. लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा तो कंपाउंडर बनने लायक नहीं था. वो बात अलग है कि मैं एक दिन भारत का स्वास्थ्य मंत्री बन गया

पहले बहुत अच्छा संगीत बनता था. लेकिन लोगों का यह भी मानना है कि आजकल फिर से अच्छा संगीत रचा जा रहा है. ऐसा क्यों होता है कि हम लोग सिर्फ़ बीते हुए कल को अधिक बेहतर समझते हैं?

हाँ, आपकी बता सही है. लेकिन मुझे यह बताइए कि क्या आज दिलीप कुमार जैसे अदाकार मिलेंगे जो अपने आप में एक संस्था बन गए हैं. आज हम लोग अलग-अलग संस्थानों से पढ़कर इंडस्ट्री में आ गए हैं लेकिन हममें से संस्था कौन बन पाया. आज बहुत से फ़िल्मकार चोरी की हुई कहानियों पर फ़िल्में बना रहे हैं. ऐसे में हमें सत्यजीत रे जैसे फ़िल्म निर्देशक कहाँ मिलेंगे. वैसे आज भी हमारे यहाँ अच्छी फ़िल्में बन रही हैं. मैं ‘चक दे इंडिया’ के लिए शाहरुख़ ख़ान को बधाई देना चाहता हूँ. उन्होंने इस विषय पर बहुत ही बेहतरीन फ़िल्म बनाई. हमें आज भी बेहतरीन फ़िल्मकार और अदाकार मिलेंगे लेकिन नए विषयों की तलाश करके फ़िल्में बनाने की ज़रूरत है. दूसरों की फ़िल्मों की कहानियाँ चुराना अच्छी बात नही है. अभी एक फ़िल्म पर एक कंपनी ने दावा ठोका है कि उनकी कहानी चोरी करके वह फ़िल्म बनाई गई है.

कहते हैं कि आप के ज़िया-उल-हक़ साहब से बहुत अच्छे संबंध थे?

हाँ, मेरे उनसे पारिवारिक संबंध थे. इन संबंधों का आधार रखा था उनकी बेटी ज़ैन ज़िया ने. जो उनकी सबसे चहेती बेटी थी. वो आज भी मुझे राखी बाँधती है.

फ़िल्मों में आप अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी किसे मानते थे?

मुझे बहुत से लोगों ने अपना प्रतिद्वंदी माना. महात्मा गाँधी ने कहा था कि किसी आंदोलन और अभियान में सफलता पाने के लिए आपको चार चीज़ों से होकर गुज़रना पड़ेगा. पहला उपहास, दूसरा उपेक्षा, तीसरा तिरस्कार और चौथा दमन. अगर इन चारों दिक्कतों का सामने कर ले गए तो आपको सफलता और सम्मान ज़रूर मिलेगा.

आप राजनीति में किस दौर से गुजर रहे हैं?

मैं दमन और सम्मान के दौर के बीच झूल रहा हूँ.

शत्रुघ्न सिन्हा-फ़ाइल
शत्रुघ्न सिन्हा ने पुणे फ़िल्म संस्थान से अभिनय का प्रशिक्षण लिया

मेरे पास एक लिस्ट है जिसमें आपके साथ काम की हुई अभिनेत्रियों के नाम हैं. ये नाम हैं जया भादुड़ी, रीना रॉय, मौसमी चटर्जी और जीनत अमान. इनमें से आपको प्रतिभा के हिसाब से सबसे बेहतरीन अभिनेत्री कौन सी लगी?

सभी बहुत ही बेहतरीन अभिनेत्रियाँ हैं. जया भादुड़ी बहुत ही बेहतरीन अभिनेत्री रही हैं. रीना रॉय बहुत मेहनत किया करती थीं. मौसमी चटर्जी भी अच्छी अभिनेत्री थीं. ज़ीनत अमान अपने फ़ैशन और डिज़ाइन के लिए मशहूर थीं.

उस दौर में ज़ीनत अमान और परवीन बॉबी बहुत ही आधुनिक किस्म की अभिनेत्रियाँ गिनी जाती थीं.

उन दोनों ने एक अलग जगह बनाई. लेकिन उन्होंने सम्मान भी बनाकर रखा हुआ था.

आज के जमाने में लड़की के लिए आत्म सम्मान बनाकर रखना बहुत कठिन काम हो जाता है. लोग तरह-तरह की बातें करते हैं. किसी लड़की के लिए इंडस्ट्री में आत्मसम्मान बनाए रखना क्या इतना कठिन है?

कोई भी क्षेत्र इन बातों से अछूता नहीं है. बस कहीं अधिक है तो कहीं कम. और ये बातें सबसे अधिक इंसान पर निर्भर करती हैं. लेकिन इसमें किसी का कोई निजी मामला हो सकता है. कभी-कभी कोई मामला ऐसा सुनने में आ सकता है कि कोई लड़की किसी भी कीमत पर काम करने के लिए तैयार हो जाए तो लोग उससे फ़ायदा उठाने की सोच सकते हैं. मेरे सामने अभी तक ऐसा कोई किस्सा नहीं आया है.

 क्या आज दिलीप कुमार जैसे अदाकार मिलेंगे जो अपने आप में एक संस्था बन गए हैं. आज हम लोग अलग-अलग संस्थानों से पढ़कर इंडस्ट्री में आ गए हैं लेकिन हममें से संस्था कौन बन पाया. आज बहुत से फ़िल्मकार चोरी की हुई कहानियों पर फ़िल्में बना रहे हैं. ऐसे में हमें सत्यजीत रे जैसे फ़िल्म निर्देशक कहाँ मिलेंगे

आपने जिन अभिनेताओं के साथ काम किया उनमें से आपको सबसे प्रतिभाशाली अभिनेता कौन सा लगा?

संजीव कुमार बहुत ही बेहतरीन अभिनेता थे. राजेश खन्ना का स्टाइल बहुत अच्छा था. उन्होंने सुपर स्टार होने के मामले में जितनी लोकप्रियता देखी उतनी शायद ही किसी ने देखी होगी. अमिताभ बच्चन आज की तारीख़ में सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में सबसे अधिक सम्मानित व्यक्तियों में से एक हैं. जितेंद्र तो मिलनसार, तेज़तर्रार कलाकार रहे. उनके साथ काम करने में बहुत आनंद आया. मुझे राजेश खन्ना के साथ काम करने में भी बहुत आनंद आया.

आपने उनके साथ किस फ़िल्म में काम किया?

दिले नादान, पापी पेट का सवाल जैसी फ़िल्मों में काम किया.

प्रशंसा करने के मामले में आपका दिल बहुत बड़ा है.

मैं सफेद को सफेद और काले को काला कहने की कोशिश करता हूँ.

जिस तरह से राजेश खन्ना दिखना कम हुए हैं वो मुझे कुछ समझ नहीं आया.

उनके बारे में मैं अधिक नहीं बता सकता. मेरी पार्टी ने मुझे उनके ख़िलाफ़ चुनाव में खड़ा कर दिया था. तब से ही वो मुझसे कुछ दूर-दूर रहने लगे. मैंने उनको समझाने की भी कोशिश की. राजनीति अपनी जगह है और फ़िल्म की दोस्ती अपनी जगह. लेकिन जब मैं उनसे मिलता हूँ तो बढ़िया से मिलता हूँ. उनको अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करना चाहिए. मैं उनकी बेहतरी की कामना करता हूँ.

इतनी लड़कियाँ आपकी दीवानी रहीं. आपको सबसे अधिक दीवानगी किसमें देखने को मिली?

देखिए एक दीवानी लड़की से तो मेरी शादी हो गई. कई लोग मेरे दीवाने रहे. कुछ तो ऐसे भी रहे जिन्होंने शादी तक नहीं की. मैंने उन्हें समझाने की भी कोशिश की. प्यार सकारात्मक और रचनात्मक होना चाहिए न कि विध्वंसात्मक.

आपकी पत्नी पूनम सिन्हा आशुतोष गोवरीकर की फ़िल्म ‘जोधा-अकबर’ में काम कर रही हैं?

हाँ आशुतोष मेरे पास आए और कहा कि ऋतिक की माँ के लिए उन्हें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो पूनम जैसा हो. फिर कुछ दिनों बाद मुझसे पूछा कि अगर मैं हाँ कर दूँ तो पूनम को ही इस भूमिका के लिए ले लिया जाए. यह एक विशेष फ़िल्म है और उसमें पूनम को विशेष भूमिका मिल रही थी तो मैंने हाँ कर दी.

आप अपने बेटे को भी फ़िल्मों में ला रहे हैं?

बेटे बड़े हो चुके हैं. योजना भी दिमाग में है.

आप अपने दिन की योजना कैसे बनाते हैं. क्या दूसरे कलाकारों की तरह दोपहर में एक बजे उठते हैं?

इन कलाकारों के दोपहर एक बजे उठने के अपने कारण होते हैं. वो रात में देर तक काम करते हैं. मैं सब लोगों से योग करने के लिए कहता हूँ. मैं आज नियमित रूप से तो योग नहीं कर पाता लेकिन फिर भी करता हूँ. इससे रक्तचाप काबू में रहता है. मेरा रक्तचाप आज भी किसी 12 साल के बच्चे के रक्तचाप 120/80 जितना है. मैं चश्मा भी नहीं लगाता. मैं समझता हूँ कि इसमें सबसे बड़ा योगदान योग का है. राजनीति मे आने के बाद मेरा योग अनियमित हुआ है.

तो यह है आपकी ख़ूबसूरती का राज.

योग और प्राणायाम.

आप अपना समय कैसे गुजारते हैं?

संगीत सुनना, पढ़ना-लिखना और दोस्तों से मिलना.

आने वाले दिनों से हम लोग शत्रुघ्न सिन्हा से क्या उम्मीद रखें?

मैं जहाँ भी रहूँ लोगों के लिए काम कर सकूँ. उनके चेहरे पर ख़ुशी ला सकूँ. बस यही कोशिश रहेगी. अगर ऐसा कर सका तो मैं अपना जीवन सार्थक समझूँगा.

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