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मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2007 को 10:26 GMT तक के समाचार
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शेखर सुमन के साथ 'एक मुलाक़ात'

शेखर सुमन
शेखर सुमन ने अपने नए एल्मब के लिए बॉडी बनाई है
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं एक बहुत ही ख़ास शख़्सियत, जिन्होंने फ़िल्मों में एक हैंडसम नौजवान के रूप में एक बहुत ही सुंदर अभिनेत्री के साथ क़दम रखा था और आज उसके एक-दो दशक बाद उससे ज़्यादा जवान नज़र आते हैं. आज फ़िल्मों में कम और छोटे पर्दे पर ज़्यादा नज़र आते हैं. हम कह सकते हैं कि वे भारतीय टेलीविज़न की दुनिया के पहले सुपरस्टार हैं. अब वह फिर फ़िल्मों में वापसी कर रहे हैं, म्यूज़िक वीडियो रिलीज़ कर रहे हैं. जी हाँ हम बात कर रहे हैं शेखर सुमन की.

मैने आपकी इस यात्रा का जो वर्णन किया उसमे सबसे मज़ेदार पड़ाव कौन-सा था ?

हर पड़ाव ख़ूबसूरत होता है. ज़िंदगी उतार-चढ़ाव से गुज़रती जाती है, खुशी भी मिलती है और दुख भी. लेकिन दुखों को ऊर्जा में तब्दील करना पड़ता है ताकि खुशी मिल सके. हर व्यवसाय में उतार-चढ़ाव लगा रहता है. ये सही है कि फ़िल्म ‘उत्सव’ से मेरे करियर की शानदार शुरुआत हुई थी और उसके बाद मैंने उतार देखा.

निजी ज़िंदगी में त्रासदी से भी जूझा लेकिन आज जब पीछे पलट कर देखता हूँ तो अपने को इस मुक़ाम पर देखकर खुश हूँ. इसमें ईश्वर की असीम अनुकंपा और लोगों का बहुत सारा प्यार रहा है कि आज भी मेरा वजूद है. मैं जिस सपने को लेकर मुंबई आया था उसे पूरा कर सका इसलिए इसे एक ख़ूबसूरत सफ़र मानता हूँ.

इस ख़ूबसूरत सफ़र के एक बहुत सुंदर पड़ाव ‘उत्सव’ का आपने नाम लिया, जिसमें उस समय की सुपरस्टार रेखा थीं और उनके साथ आपके काफ़ी अंतरंग दृश्य भी थे. यह फ़िल्म आपको कैसे मिली ?

मैंने कहा न आपको कि मेरा शुक्र काफ़ी तेज़ है और इस मामले में सौभाग्यशाली हूँ. जैसा कि कहा जाता है कि फ़िल्मों में काम पाने के लिए बहुत खाक छाननी पड़ती है लेकिन मुझे मुंबई आने के दो हफ़्ते बाद ही यह फ़िल्म मिल गई और वो भी बिना किसी गॉडफादर के.

निजी ज़िंदगी में त्रासदी से भी जूझा लेकिन आज जब पीछे पलट कर देखता हूँ तो अपने को इस मुक़ाम पर देखकर खुश हूँ. इसमें ईश्वर की असीम अनुकंपा और लोगों का बहुत सारा प्यार रहा है कि आज भी मेरा वजूद है. मैं जिस सपने को लेकर मुंबई आया था उसे पूरा कर सका इसलिए इसे एक ख़ूबसूरत सफ़र मानता हूँ.

ये सब अचानक हो गया. मैं शशि कपूर साहब की एक फ़िल्म की शूटिंग के दौरान उनसे मिलने गया था और वे शॉट के बीच में मुझसे बात कर रहे थे. मैंने उन्हें बताया कि मैं थियेटर कर चुका हूँ और काम की तलाश में हूँ. अचानक एक शॉट ख़त्म होने के बाद जब वो मेरे पास आए तो मूझसे पूछा, तुम मेरी फ़िल्म में काम करोगे. काफ़ी बड़ी फ़िल्म है, उत्सव इसका नाम है. रेखा इसकी हीरोइन हैं और हम हीरो की तलाश कर रहे हैं.

मुझे लगा कि वो मुझे इस फ़िल्म में कोई छोटा-मोटा रोल देने की बात कर रहे हैं. मैंने उनसे पूछा कि मैं तैयार हूँ बताइए क्या रोल है तो उन्होंने कहा कि मैं हीरो के रोल की बात कर रहा हूँ. जिस दिन मैं उनसे मिलने पहुँचा उसी दिन देवानंद का इंटरव्यू सुना था जिसमें उन्होंने कहा था कि मुंबई आने के दो साल बाद उन्हें पहला काम मिला था. इसे याद करते हुए मैंने शशि कपूर जी से कहा मैं अभी-अभी मुंबई आया हूँ और आप मेरे साथ इतना बड़ा मजाक मत कीजिए, हार्ट अटैक से मर जाऊंगा.

इस पर शशि जी ने कहा देखिए मैं चाहता हूँ कि यह रोल आप करें पर यह इतना आसान नहीं है आपाको स्क्रीन टेस्ट देना पड़ेगा. जब मैं स्क्रीन टेस्ट के लिए आर.के. स्टूडियो पहुँचा तो वहाँ बहुत सारे लड़के थे. एक से मैंने कहा कि मैं चारु दत्त के रोल के लिए स्क्रीन टेस्ट देने आया हूँ तुम किस रोल के लिए आए हो तो उसने बताया कि वह भी चारु दत्त के रोल के लिए आया है. तो मुझे लगा कि शशि कपूर जी ने सिर्फ़ मुझे ही सपना नहीं दिखाया बल्कि इन सब लोगों के पास भी शगूफा छोड़ दिया था.

ऑडिशन के बाद गिरीश कर्नाड ने कहा कि सब लोग जा सकते हैं सिवाय शेखर सुमन के. मुझे लगा कि या तो मैंने बहुत ख़राब किया है या फिर बहुत अच्छा. ख़ैर दूसरी बात सही निकली और उन्होंने कहा आपका ऑडिशन सबको बहुत पसंद आया है. हम स्क्रीन टेस्ट लेंगे फिर आपको बताएंगे. जब स्क्रीन टेस्ट का नतीज़ा आया तो मैं पृथ्वी थियेटर में था और शशि कपूर जी ने मुझे कहा कि आप हीरो के लिए चुन लिए गए हैं, जाइए गिरीश कर्नाड से मिल लीजिए.

मैं इससे उत्साहित हो गया कि मेरी दीदी अंधेरी ईस्ट में रहा करती थी और मेरे पास ऑटो पकड़ने के लिए भी टाइम नहीं था. मैं सात किलोमीटर तक दौड़ता ही चला गया, दीदी और हमलोग तीसरी मंजिल पर रहते थे और मै दौड़ते-दौड़ते पाँचवीं मंजिल पर चला गया.

आपको हीरो का रोल भी मिल गया. लेकिन आप उस हार्ट अटैक से कैसे बच गए जो रेखा के साथ दृश्य करने का बाद आना चाहिए था?

ये तो मुझे अपने दिल से पूछना होगा कि उसने अपने आपको कैसे संभाला क्योंकि उस समय दिल तो मेरे वश में था नहीं. एक नए अभिनेता के लिए रेखा जैसी बड़ी, मशहूर और संपूर्ण अभिनेत्री के साथ प्रणय दृश्य. मुझे याद है कि जब मुझे स्क्रिप्ट दी गई तो मैं चर्च गेट से अंधेरी उतरने के बजाय अक्सर उत्साह में पढ़ते-पढ़ते बोरीविली चला जाता था. मैं कल्पना करता था कि जब इस तरह के दृश्य होंगे तो क्या होगा. मुझे लगता था कि मैं कैसे यह कर पाऊंगा?

जब पहला दृश्य था कि रेखा को आगोश में लेकर मुझे लेटना था तो गिरीश कर्नाड ने मुझे कहा देखो तुम एक नायक हो और वो नायिका हैं. तुम उनके साथ जो कुछ भी करोगे वो शेखर सुमन नहीं करेगा चारु दत्त का किरदार करेगा और ये बात मन से निकाल दो कि तुम उन्हें कहीं छूओगे तो उन्हें बुरा लगेगा.रेखा बड़ी सहज अभिनेत्री हैं.

जब मैंने रेखा के साथ पहला दृश्य किया तो उन्होंने गिरीश कर्नाड से पूछा कि ये तो नया लड़का है और इसे मुझे पकड़ते समय नर्वस होना चाहिए लेकिन यह तो एक प्रोफ़ेशनल की तरह मुझे आगोश में ले रहा है.

रेखा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा ?

रेखा ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा सहयोग किया. उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि नए लड़के के साथ इस तरह के दृश्य नहीं करने चाहिए. मैं थियेटर से था इसलिए मुझे इसका अंदाज नहीं था कि कैमरे का कैसे सामना करना है, कब कितना देखना है और कैसे पोज़ देना है. यह सब रेखा मुझे पूरी फ़िल्म के दौरान समझाती रहीं. रेखा ने मुझे बताया कि उन्होंने इससे पहले इस तरह के दृश्य कभी नहीं किए थे इसलिए उनके लिए भी यह नया था. इसके बावजूद उनमें कभी हिचक नहीं दिखी. यही प्रोफ़ेशनल कलाकार की पहचान होती है.

हम उत्सव से आगे के आपके फ़िल्मी सफ़र और बचपन के दिनों की बात करेंगे, लेकिन पहले अपनी पसंदा का एक गाना बताइए.

झोंका हवा का आज भी ज़ुल्फ़ें उड़ाता होगा न...

आप अच्छा गाते भी हैं. अभिनय तो थियेटर से सीखा, क्या गाने की भी कहीं से शिक्षा ली थी?

थियेटर सबकुछ सीखा देता है, वहाँ आपको अभिनय, गाने, कॉस्ट्यूम, मेकअप सबके बारे में पता चल जाता है. इन सबके अलावा गाना मेरा जुनून बन गया था और मुझे लगा कि संगीत सीखना चाहिए. ये अलग बात है कि समय मुझे अब मिला तो मेरा म्यूज़िक एल्बम अब आ रहा है. वैसे भी वक़्त से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी किसी को कुछ नहीं मिलता है.

 रेखा ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा सहयोग किया. उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि नए लड़के के साथ इस तरह के दृश्य नहीं करने चाहिए. मैं थियेटर से था इसलिए मुझे इसका अंदाज नहीं था कि कैमरे का कैसे सामना करना है, कब कितना देखना है और कैसे पोज़ देना है. यह सब रेखा मुझे पूरी फ़िल्म के दौरान समझाती रहीं. रेखा ने मुझे बताया कि उन्होंने इससे पहले इस तरह के दृश्य कभी नहीं किए थे इसलिए उनके लिए भी यह नया था. इसके बावजूद उनमें कभी हिचक नहीं दिखी. यही प्रोफ़ेशनल कलाकार की पहचान होती है.

आप जिस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं उसमें फ़िल्म अभिनेता बनने की बात पर तो कोहराम मच गया होगा ?

मेरे नाना बिहार के पहले एडवोकेट जनरल थे और पिताजी स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशक थे. घर आईएएस और आईएफ़एस से भरा था. घर में पढ़े-लिखे लोग होने से यह होता है कि किसी भी चीज़ को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जाता है. मुझे भी प्रताड़ित नहीं किया गया कि आप डॉक्टर या आईएएस ही बनिए. हो सकता है कि पिताजी के मन में ऐसी इच्छा रही होगी. हालांकि घर में यह सवाल उठता रहा कि मेरे दिमाग में यह ख़याल आया कहाँ से. बहरहाल, जब सबको पता चला तो सबने यही कहा कि पहले पढ़ाई-लिखाई पूरी कर लीजिए इसके बाद कोशिश कीजिए. इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली.

लगता है कि यह पढ़े-लिखे लोगों से घिरे होने की वजह से आप हरफ़नमौला के रूप में विकसित हुए.

पढ़ाई-लिखाई का बड़ा असर पड़ता है क्योंकि शिक्षित आदमी का मन स्वस्थ होता है. शिक्षित होने की वजह से आज मैं टेलीवज़िन पर होस्ट के रूप में सफल हो पाया क्योंकि यहाँ उतना ग्लैमर नहीं होता और आप जो बोलते हैं लोग उसे सुनते हैं. मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि मैं पढ़े-लिखे परिवार से आता हूँ और ख़ुद भी पढ़ा-लिखा हूँ. मैं लोगों को नसीहत भी देता हूँ कि कुछ भी करें पर पढ़ाई जरूर करें.

इससे पहले कि कार्यक्रम के सफ़र को आगे बढ़ाएं अपनी पसंद का एक गाना बताएं ?

मेरे मन ये बता दे तू, किस ओर चला है तू.....

आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, लड़कियाँ तो मरती होंगी आप पर ?

ये तो मुझे नहीं पता लेकिन जितने भी अभिनेता हैं सबकी ख़्वाहिश होती है कि उनके प्रशंसक हों इसीलिए वो अभिनय की दुनिया में आते हैं तो थोड़ी-बहुत मेरी भी हैं.

आपके इतने सारे किरदार हैं उसमें से कई मेरे हृदय के भी काफ़ी करीब है लेकिन ज़्यादातर लोगों का मानना है कि आप राजनेताओं पर जो गजब की चुटकी करते हैं. कैसे करते हैं यह सब, इतने संतुलन के साथ?

देखिए यहीं पर पढ़ाई-लिखाई काम आती है, जिससे पता चलता है कि यह सीमा है और इसके पार अश्लीलता है, अभद्रता है. यह अंदरूनी बात है. ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ करते वक़्त जब वाजपेयी जी, लालू जी, मायावती जी, राबड़ी जी के बारे में मैंने बोलना शुरू किया तो मेरे अंदर का अभिनेता सजग हो गया. मुझे लगा कि इन सबको अगर मैं किरदार के रूप में लूं तो बहुत मज़ा आएगा क्योंकि इन सबकी आदतें लोगों से बहुत जुड़ी हुई हैं.

वाजपेयी जी के अंदर भी एक अभिनेता है. उनके अंदर एक कवि है, बहुत ही संवेदनशील इंसान हैं वो. जिस तरह से वे बोलते हैं लगता है कोई अभिनय कर रहा है. एक दिन बोलते–बोलते मैंने उनकी नकल कर दी. जब मैंने वाजपेयी जी के बारे में बोलना शुरू किया तो लोगों ने मुझसे कहा आज तक प्रधानमंत्री के बारे में किसी ने नहीं बोला कार्यक्रम पर रोक लग जाएगी, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं हुआ.वैसे ही हमारे हर नेताओं की अपनी-अपनी अदा है और मैं इसे भुनाता गया लेकिन मैंने कभी भी सीमा नहीं लाँघी.

आजकल आप जिन कॉमेडी शो में जज होते हैं उनमें कई बार मैंने देखा है यह सीमा लाँघ दी जाती है. तब मैंने देखा है कि आपका मुँह बन जाता है.

काफ़ी दफ़ा लोग यह सीमा पार कर देते हैं. आप तो जो देखते हैं वो तो संपादित होता है. इनको देखकर मुझे लगता है कि कॉमेडी के नाम पर लोग कहाँ तक जा सकते हैं और इससे मैं हँसने के बजाय आहत हो जाता हूँ. मुझे मेरे निर्देशक आकर कहते हैं कि आप हँस नहीं रहे हैं. देखिए आपके बगल वाले कितना हँस रहे हैं.

मुझे ऐसा लगा कि यहीं पर पढ़ाई-लिखाई की बात आती है. जब एक परिवेश नहीं मिलता है तो लोगों को इस सीमा के बार में नहीं पता होता है और कुछ भी बोल जाते हैं. देखिए इंडियन आइडल के बारे में रेडियो जॉ़की ने क्या बेवकूफ़ी वाली बात कह दी.

 वाजपेयी जी के अंदर भी एक अभिनेता है. उनके अंदर एक कवि है, बहुत ही संवेदनशील इंसान हैं वो. जिस तरह से वे बोलते हैं लगता है कोई अभिनय कर रहा है. एक दिन बोलते–बोलते मैंने उनकी नकल कर दी. जब मैंने वाजपेयी जी के बारे में बोलना शुरू किया तो लोगों ने मुझसे कहा आज तक प्रधानमंत्री के बारे में किसी ने नहीं बोला कार्यक्रम पर रोक लग जाएगी, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं हुआ.वैसे ही हमारे हर नेताओं की अपनी-अपनी अदा है और मैं इसे भुनाता गया लेकिन मैंने कभी भी सीमा नहीं लाँघी.

मैं आपको एक वाक़या बताता हूँ. मैं एक बार किसी उद्योगपति के बेटे की शादी में गया हुआ था तो पता चला कि वहाँ तब प्रधानमंत्री वाजपेयी जी भी आए हुए हैं और मुझे ये पता था कि वो मेरा कार्यक्रम काफ़ी पसंद करते हैं. मुझे उनसे मिलने की बड़ी इच्छा थी लेकिन जब मैं उनसे मिलने के लिए गया तो पता चला कि प्रधानमंत्री जी गाड़ी मैं बैठ चुके हैं. छगन भुजबल जी उस समय महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री थे और वो वाजपेयी जी को विदा करने के लिए खड़े थे. मुझे लगा कि जब उनका काफ़िला वहाँ से गुजरेगा तो वो भुजबल जी की ओर जरूर देखेंगे और मैं उन्हें नमस्कार कर लूंगा.

जैसी की उम्मीद थी वाजपेयी जी ने भुजबल जी की ओर देखा तो मैंने उन्हें नमस्कार कर लिया. उन्होंने तुरंत गाड़ी रुकवाई और उतरकर मेरे पास आए और कहा, हमें आप पर गर्व है, आप देश के बेहतरीन अभिनेता हैं. क्या अब भी मेरी नक़ल कर रहे हैं. यकीन मानिए जब आप मेरी नक़ल करते हैं तो सबसे ज़्यादा मैं हँसता हूँ.

वाजपेयी जी के बाद हम लालू और राबड़ी जी की भी बात करेंगे लेकिन उससे पहले अपनी पसंद का एक गाना बता दीजिए?

लता जी का एक गाना है, लग जा गले कि फिर ये हँसी रात हो न हो...

हमने सुना है कि लालूजी भी आपको बड़ा पसंद करते हैं ?

लालू जी को तो पसंद करना ही था.बिहार से हूँ, पटना से हूँ, उस तरह की बोली बोलता हूँ. जब मैंने लालू जी के बारे में बोलना शुरू किया तो लोग पूछने लगे कि किसके बारे में बात करते हो. उस समय लालू जी बिहार में तो लोकप्रिय हो चुके थे लेकिन बाहर कम ही लोग उनकी शैली से परिचित थे. उस समय ‘मूवर्स और शेकर्स’ भी लोकप्रिय हो रहा था और लालू जी भी राजनीति में तेज़ी से ऊपर बढ़ रहे थे.

वैसे लालू जी मेरा बारे में कहा करते थे कि शेखर मेरे बारे में बात करके पैसा कमा रहा है उसको कहो आधा हिस्सा देगा और मैं कहा करता था कि मैं आपके बारे में सप्ताह में पाँच दिन बात करता हूँ, आप आधा पैसा दीजिए. वैसे भी लालू जी की शख़्सियत ऐसी है कि मैं उनके मामले में थोड़ी स्वतंत्रता ले सकता हूँ पर यहाँ भी कभी मर्यादा नहीं लाँघी.

लोगों को लगता था कि वे मुझसे बहुत नाराज़ होंगे और मिलेंगे तो न जाने क्या होगा. आख़िर वो समय भी आया और एक शादी में हमारी मुलाक़ात हुई. मीडिया के लोग बेसब्री से इस घड़ी का इंतज़ार कर रहे थे और लालू जी ने मुझे कसकर गले लगाया और कहा- सब बुरबक है, इन लोगों को पता ही नहीं है कि ‘एनी पब्लिसिटी इज़ गुड पब्लिसिटी. तुम हमरे बारे में जो बोलता है हमको बहुत अच्छा लगता है.’

आपकी बात से तो पता चल गया कि आपके पसंदीदा नेता कौन हैं, शायद वाजपेयी जी हैं?

बिल्कुल, मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ. वे एक महान नेता है, कवि हैं, वक्ता हैं और बहुत अच्छे इंसान हैं. इसलिए उनका किरदार निभाना बहुत पसंद है.

आपके पसंदीदा अभिनेता कौन हैं ?

दिलीप कुमार साहब. वो अभिनय का स्कूल हैं, संवाद बोलते थे तो लगता ही नहीं था कि संवाद बोल रहे हैं, लगता था कि बात कर रहे हैं. ये बात उनसे बहुत लोगों ने सीखी चाहे वह संजीव कुमार हों या फिर अमिताभ बच्चन हों. दिलीप कुमार अभिनय के ब्रह्मा हैं और सब उनकी ही नाभि से निकले हैं.

उनके द्वार निभाया गया सबसे पसंदीदा किरदार कौन सा है ?

निश्चित रूप से मुगले आज़म में निभाया गया सलीम का किरदार. देवदास का कैरेक्टर भी गज़ब का निभाया था.

आप इतने सारे रोल करते हैं, कभी आपने सोचा है कि आपको अपना कौन सा किरदार सबसे ज़्यादा पसंद है ? हालांकि मुझे ‘मैं’ का आपका किरदार बहुत पसंद आया था पर यह उतना हिट नहीं हुआ.

मुझे इस बात की खुशी है कि आपने इस धारावाहिक की ओर ध्यान दिलाया. ‘मैं’का किरदार मेरे दिल के काफ़ी क़रीब रहा है. यह एक जटिल किरदार था और करने के लिए बहुत कुछ था. एक सुपरस्टार का किरदार था जो अहंकारी था और अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता था. आप देखेंगे कि अहंकारी का एक दूसरा पहलू भी होता है जो बहुत विनम्र होता है. आजकल भी ऐसे सुपरस्टार हैं जो कभी कहते हैं, ‘आई एम द बेस्ट, आई एम द किंग’ और दूसरे ही क्षण कहते हैं कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ अभी सीख रहा हूँ. ‘मैं’ का किरदार भी इसी पसोपेश में पड़ा रहता है. दरअसल हर अभिनेता अभिमानी होता है और अगर नहीं होगा तो स्टार नहीं होगा.

 वैसे लालू जी मेरा बारे में कहा करते थे कि शेखर मेरे बारे में बात करके पैसा कमा रहा है उसको कहो आधा हिस्सा देगा और मैं कहा करता था कि मैं आपके बारे में सप्ताह में पाँच दिन बात करता हूँ, आप आधा पैसा दीजिए. वैसे भी लालू जी की शख़्सियत ऐसी है कि मैं उनके मामले में थोड़ी स्वतंत्रता ले सकता हूँ पर यहाँ भी कभी मर्यादा नहीं लाँघी.

पर क्या आपने कभी सोचा था कि देश में ‘कॉमेडी किंग’ के रूप में जाने जाएंगे ?
मैं हास्य की तरफ मुड़ा तो इसलिए कि जो कर रहा था यह उसके यह एकदम विपरीत था. ट्रैजडी किंग रहते हुए भी दिलीप साहब की कोशिश रही की वो कॉमेडी करे, अमिताभ बच्चन कॉमेडी के ज़रिए ज़्यादा जाने गए.लोग गंभीरता के बजाय हास्य से ज़्यादा ख़ुद को ज़ोड़ते हैं. लेकिन इसके लिए दूसरी तरह की प्रतिभा चाहिए. इसमें टाइमिंग का बहुत महत्व होता है.

आपका पसंदीदा कॉमेडियन कौन है?

कॉमेडियन एक ग़लत शब्द होगा लेकिन अमिताभ बच्चन की कॉमेडी की टाइमिंग गज़ब की थी. आप चुपके-चुपके देखिए, शोले में मौसी से शादी की बात करने के लिए जब जाते हैं उस समय अमिताभ की टाइमिंग देखिए. दिलीप साहब को देखिए, संजीव कुमार को देखिए. जो अभिनेता आँधी और शोले का ठाकुर जैसा गंभीर किरदार कर सकता है वो अंगूर भी करते थे. मैं समझता हूँ कि जो गंभीर रोल काफ़ी अच्छा करते हैं वो कॉमेडी भी अच्छा कर सकते हैं. इस लिहाज से अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार काफ़ी अच्छे रहे.

आगे बढ़ने से पहले एक और गाने बताएं ?

तूझे देख-देख सोना, तूझे देख कर है जगना....

ये फ़िटनेस का नया फंडा क्या है?

लोगों को ये गलतफ़हमी है कि बॉलीवुड के लोगों को ही अच्छा दिखने की ज़रूरत है जबकि सच्चाई ये है कि हर किसी को स्वस्थ और अच्छा दिखने की जरूरत है. मैंने महसूस किया है कि हमलोग शरीर के प्रति काफ़ी लापरवाही बरतते हैं. अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं और अभिनय पर भी ध्यान देते हैं लेकिन शरीर पर ध्यान नहीं देते. अच्छा दिखना भी एक कला है और हमारी इंडस्ट्री में तो ख़ासकर ज़रूरी है.

पर आप तो हमेशा अच्छा दिखते रहे हैं.

ये भी तो ज़रूरी है कि आगे भी अच्छा दिखता रहूँ. देव साहब भी बहुत अच्छे थे और कोशिश करते रहे थो लगातार अच्छे दिखते रहे. संजीव कुमार बहुत अच्छे अभिनेता थे लेकिन कोशिश नहीं की तो ख़राब दिखने लगे और बाद में पेट भी निकल गया. जब तक किरदार की ज़रूरत नहीं हो हम मोटे नहीं दिख सकते.

तो फ़िट रहने के लिए आजकल क्या-क्या कर रहे हैं?

ये पूछिए कि क्या नहीं कर रहा हूँ. वैसे लोगों में ग़लत धारणा है कि डायटिंग से पतला हुआ जा सकता है. ज़रूरी ये है कि आप अच्छा और सही खाना खाएं. मैं तो छह वक़्त थोड़ा-थोड़ा खाता हूँ और शाम सात बजे के बाद नहीं खाता हूँ.

 लोगों को ये गलतफ़हमी है कि बॉलीवुड के लोगों को ही अच्छा दिखने की ज़रूरत है जबकि सच्चाई ये है कि हर किसी को स्वस्थ और अच्छा दिखने की जरूरत है. मैंने महसूस किया है कि हमलोग शरीर के प्रति काफ़ी लापरवाही बरतते हैं. अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं और अभिनय पर भी ध्यान देते हैं लेकिन शरीर पर ध्यान नहीं देते. अच्छा दिखना भी एक कला है और हमारी इंडस्ट्री में तो ख़ासकर ज़रूरी है.

सुबह जूस, फल,चना और सलाद खाता हूँ, ज़्यादा फल भी नहीं खाना चाहिए क्योंकि उसमें शूगर ज़्यादा होता है.फिर दो घंटे बाद भीगा बादाम , पनीर और अंडे का सफेद हिस्सा खाता हूँ. बाद में बाजरे की रोटी खाता हूँ. अंतिम बार खाना शाम सात बजे खा लेता हूँ. शाम को ध्यान करता हूँ. यह एक मानसिक कसरत है.

शौक किन-किन चीज़ों का है?

बहुत सारी चीजों का है. कपड़ों का है, घड़ियों का है, गाड़ियों का है. फिर शौक तो बदलते रहता है ताज़ा शौक गाने का और बॉडी बिल्डिंग का है.

एक और गाना हो जाए.

तुमको देखा तो ये ख़याल आया...

आने वाले वक़्त में शेखर सुमन क्या सरप्राइज़ देने वाले हैं?

जीवन आश्चर्यों से भरा है. कभी भी लोगों को अपने बारे में भविष्यवाणी मत करने दीजिए, हमेशा अंचभित करते रहिए.

कोई एक सरप्राइज़ बताए जिससे आप आने वाले दिनों में चौंकाने वाले हैं.

अगर बता दूँगा तो वो सरप्राइज़ नहीं रह जाएगा. उसके बाहर आने का इंतज़ार कीजिए.

जीवन का सबसे बेहतरीन दिन कौन सा है?

जिस दिन मेरी शादी हुई थी.

आप साल्सा सीख रहे हैं और अपने एल्बम में ब्राज़ीली मॉडल के साथ क्यों नाचे ?

देखिए साल्सा मैं नहीं जानता हूँ और यह एक नृत्य है जो मुझे लगा कि सीखना चाहिए. मैं आने वाले दिनों में कई शो करने वाला हूँ जिसमें साल्सा का उपयोग है. जहाँ तक अपने एल्बम में ब्राज़ीली मॉडल को चुनने का है तो उनका चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि वो काफ़ी ख़ूबसूरत हैं. और फिर ख़ूबसूरती की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती.

आपके बेटे का नाम अध्ययन है, क्या वो भी फ़िल्म कर रहे हैं ?

अभी उनकी लंदन में स्कूलिंग ख़त्म हुई है और वो आगे न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में पढ़ना चाहते हैं. वो फ़िल्मों में काम भी करना चाहते हैं लेकिन उनका कहना है कि इससे पहले वो प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग चाहते हैं. इसलिए अभी एक फ़िल्म कर रहे हैं जिसका नाम है हाल-ए-दिल. ओंकारा बना चुके कुमार मंगत साहब की ये एक टीनएजर लव स्टोरी है. उम्मीद है कि अध्ययन इस फ़िल्म से बहुत कुछ सीखेंगे और आगे हमलोगों का नाम रोशन करेंगे.

आपकी पसंद का एक और गाना हो जाए.

साँवरिया फ़िल्म का टाइटल गीत मुझे बहुत पसंद है.

एक किरदार जो निभाने का बहुत मन हो.

स्कारफेस का अल-पचीनो वाला किरदार निभाना चाहता हूँ.

स्टारडम से मिलने वाले पैसे और प्रसिद्धि के अलावा कोई एक ऐसी चीज़ जो सबसे अधिक संतुष्टि देती है ?

मुझे लगता है काम की सही प्रशंसा सबसे ज़्यादा संतुष्टि देती है. जब कोई साधारण आदमी आकर आपके पास आपके काम की प्रशंसा करता है तो लगता है कि चलो जिसके लिए आया था और जिनसे जुड़ने आया था वो काम हो गया. जब कोई आम आदमी पास आकर हाथ पकड़ कर कहता है कि हमने आपको छू लिया और हमारा जीवन सफल हो गया तो ये सबसे ज़्यादा संतुष्टि देती है.

वैसी कोई इच्छा कि ये मेरा हो जाता ?

इच्छाएं अनंत होती हैं और वो कभी ख़त्म नहीं होतीं. मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि जैसा हूँ वैसा बना रहूँ और बहकूँ न. भगवान मुझे इतनी शक्ति दे कि जो अधूरे ख़्वाब हैं उनको पूरा कर सकूँ.

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