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रब्बी शेरगिल के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. एक मुलाक़ात में हमारे साथ हैं एक ऐसी शख़्सियत जिनकी आवाज़ सेक्सी भी है और आध्यात्मिक भी. वो न सिर्फ़ गाने गाते हैं बल्कि अपने गाने लिखते भी हैं. गिटार पर उनकी उँगलियाँ बहुत तेज़ दौड़ती हैं. जी हाँ आज हम बात कर रहे हैं अपनी आवाज़ से आम जनता का दिल जीत लेने वाले रब्बी शेरगिल से. आप गीत-संगीत के क्षेत्र में कैसे आए? संगीत में मेरा पहला रुझान तब हुआ जब 1989-1990 में ब्रूस स्प्रिंक्सटीन भारत आए थे. मैं अपने दोस्त और बहनों के साथ उन्हें सुनने गया था. उनको सुनने के बाद ही मैंने तय कर लिया था कि मुझे ज़िंदगी में क्या करना है. आपने जो सोचा वो आपने किया. आप बहुत भाग्यशाली हैं. मुझे लगता है कि इन सब चीज़ों के पीछे भगवान की कृपा रहती है और मेहनत चाहिए होती है. मेरा मानना है कि संगीतकार और एथलीट के बीच बहुत समानताएँ हैं. मुझे पहले तो बहुत सा समय ये सोचने में बिताना पड़ा कि मैं अपने को लोकप्रिय संगीत के लिए तैयार कैसे करूँ. पॉप म्यूज़िक, संगीत का एक अंश मात्र है. मैं पॉप म्यूज़िक के क्षेत्र का आदमी हूँ. जब तक बिस्मिल्ला ख़ान, हरि प्रसाद चौरसिया जैसे लोग हैं, मैं पूरी तरह से एक संगीतकार होने का दावा नहीं कर सकता. आपने ब्रूस स्प्रिंक्सटीन का संगीत-सामारोह सुनने के बाद क्या किया. गिटार ख़रीदा और किसी को गुरू बनाकर संगीत सीखना शुरू कर दिया? मैं अगले दिन से जेब-खर्च के पैसे बचाकर रखना शुरू कर दिया. मेरा लक्ष्य था एक गिटार ख़रीदना. मैंने उनके गानों के रिकॉर्ड्स जुटाने शुरू किए. आपने अपने घर वालों को इस फ़ैसले के बारे में बता दिया था? हमारे घर में बहुत अकादमिक माहौल था. घर में खाने की मेज पर बैठने के लिए कम से कम एमए होना होता था. आपको खाना मिल जाता था? हाँ मुझे मिल जाता था क्योंकि तब तक मेरी एमए करने की उम्र नहीं हुई थी. मेरी माँ ख़ुद एक शिक्षाविद थीं. मेरी चारों बहनों ने पोस्ट ग्रेजुएट कर रखी थी. मेरे घर में पढ़ाई का पूरी तरह से माहौल था. मुझे मालूम था कि अगर मैं किसी से कहूँगा कि मुझे संगीत सीखने के लिए स्कूल से छुट्टी दिला दो तो ऐसा कोई नहीं करेगा. मैंने अपने मन में ये गाँठ बाँध ली थी और किसी को बताया नहीं था. मैं अपने वयस्क होने का इंतज़ार करने लगा. कुछ लोग आपके संगीत को सूफ़ियाना कहते हैं और कुछ रॉक भी. आप अपने संगीत को कैसे बयान करेंगे? मैं मानता हूँ कि मेरा संगीत डायनमिक है. जैसे एक आदमी की कई पहचानें हो सकती हैं. एक आदमी पत्रकार, धर्मनिरपेक्ष और साथ ही पतंग उड़ाने वाला भी हो सकता है. इसी तरह मेरा ध्यान कभी आध्यात्मिक, कभी भोग और कभी योग की ओर जाता है. आजकल ध्यान किस ओर है? बाबा रामदेव का आजकल बोलबाला है. इसलिए मेरा ध्यान योग की तरफ़ अधिक है. वैसे यह बदलाव का दौर है. चैनल बदलते ही भोग से योग तक जाया जा सकता है. मेरा एक गाना आएगा जिसमें मैंने अपनी असलियत बताई है. उसके बोल कुछ ऐसे हैं कदे सूफ़ी कदे ऐब, कदे अव्वल कदे नलैक, कदे सच मैं कौड़ा जहर, कदे झूठ सफेद. ये हो हमारा जीवन तू साहब सच्चे वेख. जब आपने अपने घर वालों को बताया तो कोई परेशानी हुई या सब कुछ आराम से हो गया? उस समय मैंने कॉलेज़ ख़त्म ही किया था. मेरा पिता जी चाहते थे कि मैं आईएएस बनूँ या एमबीए करूँ. मेरा पिता जी किसान परिवार से थे. हमारे यहाँ एक कहावत चलती है जट्ट दा रब पटवारी यानी जाट का भगवान पटवारी होता है. मेरे घर वाले कहते थे कि तुम पटवारी नहीं लेकिन तहसीलदार ज़रूर बन जाओ. जब घर में पता लगा तो पिता जी खूब नाराज़ हुए. लेकिन मैंने अपने इकलौते होने का बहुत फ़ायदा उठाया. मैंने अपनी ज़िंदगी में छोटी-बड़ी बहुत बगावतें की हैं. समय-समय पर उनसे अपनी माँगें मनवाने के लिए मैं घर से भाग जाता था.
उस समय मीडिया क्षेत्र में कोई क्रांति जैसी चीज़ नहीं हुई थी. इसलिए इस क्षेत्र में किसी स्थिर करियर की आशा नहीं की जा सकती थी. मेरे घर वाले अंतिम में मान ही जाते थे. मुझे जब संगीत से जुड़ी कुछ चीज़ें ख़रीदनी थीं तो पिता जी से मुझे लगभग डेढ़-दो लाख रुपए मिले थे. उन्होंने ये पैसे मुझे इस शर्त पर दिए थे कि मैं इसे अपनी हॉबी ही रखूँ और साथ में एमबीए की तैयारी करूँ. मैंने कहा कि ठीक है और पैसे ले लिए. मैं एमबीए की तैयारी करने लगा. कहीं दाख़िला मिला? हाँ जी. बहुत मुश्किल है दोनों चीज़ें एक साथ करना? आपको अपनी हॉबी पूरा करने के लिए कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. मेरा एमबीए में चयन हो गया. फिर मैंने एमबीए के एक संस्थान में दाख़िला लिया और एक साल बाद ही छोड़ दिया. मुझे आज भी अपनी इस नालायकी पर बहुत गुस्सा आता है. लेकिन आज तो घर वाले बहुत ख़ुश होंगे? मेरे पिता जी का 1999 में ही देहांत हो गया था. वो यह सब नहीं देख पाए. मेरी माँ अब रिटायर्ड हो चुकी हैं. मेरी माँ चाहती थीं कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ. ख़ुद कुछ कर लूँ. वो आज ख़ुश हैं. आपका पहला हिट गाना बुल्ले की जाणा मैं कौन...कैसे आया? मेरा घर का पूरा माहौल आध्यात्मिक था. पिता जी सत्संगी थे. माँ कॉलेज़ में प्राचार्या थीं. घर में आध्यात्म से जुड़े मुद्दों पर गर्मागर्म बहसें हुआ करती थीं. बचपन से ही हम ये सब देखते आए थे. मेरे ऊपर इन चीज़ें का गहरा असर पड़ा. बीच में तीन-चार साल का समय ऐसा आया जब मैंने सोचा कि मैं सिर्फ़ आध्यात्म के क्षेत्र में पढ़ना चाहता हूँ. उस दौरान मैं दिन में अपने कमरे में बैठकर ख़ूब किताबें पढ़ता था और रात को गिटार बजाता था. मेरी माँ ने मुझे बहुत सी किताबें दे रखी थीं. उनमें से एक किताब थी ‘बुल्ले शाह दा पंजाबी काव्य’. एक दिन शाम को मैं गिटार बजा रहा था और उस किताब को सामने खोलकर पढ़ रहा था. उसमें बहुत सी सूफ़ी रचनाएँ थीं जिनमें से एक थी बुल्ले की जाणा मैं कौन...मैं बुल्ले शाह तक एक प्रक्रिया के तहत अंत में पहुँचा हूँ. सबसे पहले मैं पंजाबी के कवि शिव बटालवी की बात करना चाहूँगा जो पंजाबी के सबसे मशहूर कवि हुए हैं. इनकी एक रचना है बिरहा तू सुल्तान...मुझे नहीं मालूम था कि उन्होंने गुरूवाणी से ये पंक्ति ली है. ये मूल रूप से शेख़ फ़रीद की लाइनें हैं जिसमें तीसरे गुरू अमर दास ने कुछ जोड़ा. बुल्ले शाह की ज़बान हमारी बोली से बहुत मिलती है. हम पंजाब के माझा क्षेत्र के रहने वाले हैं. हमारा गाँव चकमिशरी ख़ान सरहद से सिर्फ़ आठ किलोमीटर दूर है. आपने इस गाने का संगीत तभी बना लिया? कविता और संगीत के मिलन से ही गाना बनता है. माँ ने जब मुझे ये किताब दी उसके क़रीब चार-पाँच महीने बाद मैंने वो किताब खोली. गाना बनाने की प्रक्रिया बहुत ही जादूई होती है. मैंने सोचा कि मेरे ऊपर पश्चिमी संगीत का बहुत प्रभाव है लेकिन मैं इसे कुछ ऐसा बनाऊँगा जिसमें मुझे आनंद भी आए और मिट्टी की ख़ुशबू भी. तब मुझे एक गाना याद आया दमादम मस्त कलंदर...मैं इस गाने की राग के बारे में जानने की कोशिश की. मुझे ये पता लगा कि अगर मैं अपने गाने को गिटार में उतारूँ तो ये लिडियन मोड (पश्चिमी संगीत की शब्दावली) पर आएगा. उन दिनों मुझे ये मोड बहुत पसंद था. मैंने एक शाम इस पर लगाने की सोची. मैं बैठ गया और मैलोडी ढूँढने लगा. बनते-बनते बात बन गई. क्या ये आपका पहला गाना था? नहीं, मैं इसके पहले दो-तीन गाने गा चुका था. एलबम लाने के लिए संघर्ष करना पड़ा? मेरे इंतज़ार को संघर्ष का नाम नहीं दिया जा सकता. जो लोग पटेल नगर के गोल चक्कर पर सोते हैं और सुबह काम पर जाते हैं उसे मैं संघर्ष कहूँगा. मेरे घर वालों ने मुझे कभी कोई कठिन काम नहीं करने दिया. मेरे पिता जी मुझे हर महीने पैसा दिया करते थे. मेरे कमरे में एक एसी भी लगा हुआ था. मेरे दोस्त वहाँ आते थे और हम मस्ती किया करते थे. इस एलबम के आने से पहले मेरे पास तीन कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट थे. बस बात कहीं अटक जाती थी. अगर इस इंतज़ार को आप संघर्ष कहें तो कह सकते हैं. अगर आप पॉप सिंगर हैं तो आपको थोड़ा अहम और महत्वाकांक्षा रखनी पड़ेगी. शास्त्रीय संगीत में लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. मैं ऐसे लोगों को जानता भी हूँ जो लंबा इंतज़ार करने को तैयार हैं. पॉप म्यूज़िशियन बनने कि लिए आपको अपनी चाभी अलग तरीके से भरनी पड़ती है. अपने अंदर एक सपना लाना पड़ता है कि आप पचास हज़ार लोगों के सामने कार्यक्रम कर रहे हैं. अपने अंदर ऊपर बने रहने का अहम के साथ-साथ दुख भी रखना पड़ता है. कोई भी सफलता के शिखर पर पहुँच चुका आदमी यह नहीं कह सकता कि सफलता ऐसे ही मिल गई. मेरा सवाल तो इतना है कि क्या आपको गाने की रिकॉर्डिंग के समय पता था कि आप इस एलबम के बाज़ार में आने के बाद अपना सपना पूरा कर सकेंगे. मतलब आप हज़ारों लोगों के सामने गाना गाएंगे? उम्मीद तो थी और डर भी. गाने की भाषा सरल नहीं थी. मुझे डर था कि लोग समझ भी पाएंगे कि नहीं. मेरे साथ-साथ इस एलबम के निर्माता केजे सिंह की भी भावनाएँ जुड़ी हुईं थीं. पिछले कई सालों में ये गाना सबसे अधिक समय तक नंबर वन रहा. शायद 18-19 हफ़्ते तक नंबर वन रहा. जब गाना पहले पायदान पर पहुँचा तो मैं जयपुर में प्लैनेट एम गया था. वहां से निकलकर मैंने अपने सभी चाहने वालों को फ़ोन किया और कहा कि आप सभी लोगों को धन्यवाद क्योंकि आप की वजह से ही मैं नंबर वन तक पहुँचा. इस सफलता के बाद कई बड़े लोग आपके प्रशंसक हो गए. अमिताभ बच्चन भी आपके बड़े प्रशंसक हैं. सही बात है यह? प्रशंसक हैं या नहीं ये मैं नहीं कह सकता. लेकिन मैं जब भी उनसे मिला तो उन्होंने मेरी सराहना की. एक पार्टी में वो बहुत गर्मजोशी से मिले और कहा अरे, आपको तो हम अपनी कार में सुनते ही रहते हैं. अपनी गायकी के लिए आपको अब तक की सबसे बेहतरीन सराहना कब मिली है? मेरी माँ मुझे लेकर बहुत परेशान और अशांत रही हैं. अब जब कभी भी मैं उनके शांत चेहरे को देखता हूँ तो वही मुझे सबसे बड़ी सराहना लगती है. और दूसरी कोई? मुझे किसी की कोई बात याद नहीं है लेकिन कई लोगों ने बहुत तारीफ़ की है. जब ये कहा जाता है कि आध्यात्म को जनता के बीच में लोकप्रिय बनाने में मेरा योगदान रहा है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. जब किसी स्टेडियम में दस-बीस हज़ार लोगों के बीच मेरे सामने बुल्ला की जाणा मैं कौन...की मांग होती है तो लगता है कि ये लोग किसी ओछी बात को नहीं दोहरा रहे हैं. ये सबसे बड़ी सराहना लगती है. लोग उन लाइनों की माँग करते हैं जो बुल्ले शाह ने 300 साल पहले ज्ञान पाने के बाद कहीं थीं. उस समय लोग 30 सेकेंड के लिए अपने को आध्यात्म के सागर में डुबो देते हैं. ऐसे में जो ऊर्जा फूट पड़ती है वो बहुत बड़ी सराहना है मेरे लिए. फ़िल्मी गानों में आपकी उतनी दख़ल नहीं देती है. उसकी कोई ख़ास वजह है? यह एक वैचारिक मतभेद वाली बात है. बॉलीवुड इस देश की संस्कृति का पर्याय बन गया है जो मुझे मंजूर नहीं है. यह बहुत विशाल देश है. यह एक पूरा महाद्वीप है. सिर्फ़ बांद्रा, शांताक्रूज़, लोखंडवाला, जुहू में रहने वाले लोग इस देश की संस्कृति नहीं तय कर सकते. मेरी इस मीडियम में कोई आस्था नहीं है. ये मेरे हीरो नहीं थे. मैं दिल्ली में पला-बढ़ा हूँ. मुझे मुंबई और मुंबई वाले भी बहुत पसंद है. आपको स्टार बहुत पसंद नहीं हैं. लेकिन कितने ही लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस देश में दो ही चीज़ें तो हैं एक क्रिकेट और दूसरी फ़िल्में? कुछ क्रिकेटर मेरे स्टार रहे हैं. हॉकी से मेरा जुड़ाव रहा है. परगट सिंह, जफ़र इकबाल और शाहिद मेरे हीरो रहे हैं. अभी बॉलीवुड में जैसी फ़िल्में बन रही हैं उनसे मैं जुड़ना नहीं चाहूँगा. अगर आगे गुणवत्ता में कुछ सुधार हो तो मैं काम करने की सोच सकता हूँ. क्या आप पंजाबी के अलावा दूसरी भाषाओं में भी गाना गाते हैं? हाँ मैंने हिंदी में गाने गाए हैं. मेरी आने वाली एलबम में हिंदी में भी गाने हैं. मेरी बड़ी बहन हिंदी में कविता करती हैं. हमारे घर में हिंदी का बहुत सा साहित्य पढ़ा जाता था और दिल्ली का होने के नाते हिंदी और अंग्रेज़ी से तो आप परिचित हो ही जाते हैं. मेरी पसंदीदा किताब है विवेकानंद की जिसमें उन्होंने राज्य के बारे में लिखा है. अगर भारतीय दर्शन को जानना है तो मेरे ख़याल से हिंदी ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है. दर्शन और पढ़ने-लिखने का शौक़ तो आपको भी है? किसी बुद्धिजीवी ने कहा है, “मैं बुद्धिमान नहीं हूँ मेरे दोस्त बुद्धिमान हैं.” मेरे घर में पढ़ने-लिखने का माहौल रहा है. मेरा घर विश्वविद्यालय के पास था. घर पर गर्मागर्म बहसें हुआ करती थीं. घर में आईएएस की तैयारी करने वाले लड़के किराए पर रहते थे. इतनी ज़्यादा आईक्यू के लोग जब जुटते थे तो देश की किसी बड़ी समस्या का निदान करके ही सोते थे.
आप अलग-अलग जगह कार्यक्रम करते हैं. आपकी पसंदीदा जगह कौन सी है? दिल्ली का होने के नाते लोगों का प्यार थोड़ा अधिक मिल जाता है. अब मुंबई भी दूसरा घर बन गया है. कोई एक ख़ास जगह नहीं है. देश, काल और संयोग के हिसाब से जगह-जगह पर अच्छे कार्यक्रम होते रहे हैं. आपके पसंदीदा गायक कौन से हैं? ये समय-समय के साथ बदलता रहता है. थोड़े समय पहले तक भारतीय गायकों में वडाली बंधु पसंद थे. अब शायद उनकी जोड़ी में से एक का निधन हो गया है और उनकी जोड़ी ख़त्म हो गई है. लता जी का भी मैं बड़ा प्रशंसक हूँ. आजकल उनके पचास, साठ, सत्तर के दशक के गाने सुन रहा हूँ. सुनिधि चौहान भी अच्छा गाती हैं. आप अपने गाने ख़ुद लिखते हैं. ये सोचा-समझा फ़ैसला है या आप दूसरों के भी गाने गा सकते हैं? जब आप बड़े हो रहे होते हैं और कुछ सीख रहे होते हैं तो कुछ लोग आपके आदर्श बन जाते हैं. आप उनकी तरह बनना चाहते हैं. जब मैं बड़ा हो रहा था तो मेरे आदर्श थे शिव बटालवी और कई विदेशी गायक जैसे बोनो, ब्रूस स्प्रिंक्सटीन और बॉब डिलन. ये लोग अपने गाने ख़ुद लिखकर गाते थे. यह मेरा सोचा-समझा फ़ैसला है. मैं तय किया था कि मैं गायक, गीतकार और गिटार प्लेयर बनूँगा. अगर आप गायक-लेखक न होते तो क्या होते? मैंने बहुत अफ़लातून काम किए हैं. मैं दिल्ली से पंजाब साइकल पर गया हूँ. मुझे हिमाचल और लद्दाख की कई जगहें पसंद हैं. अगर मैं गायक-कलाकार न होता तो शायद यात्री होता. मैं कुछ जिंगल बनाता और पैसे कमाकर यात्रा पर निकल जाता. आपकी आने वाली एलबम की थीम क्या है? इसकी थीम है ज़िंदगी के मेरे अनुभव. इसका एक गाना है छल्ला. वही आपको सुना देता हूँ. आपके पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्री? इरफ़ान ख़ान और काजोल पसंद है. आप अभिनय में क्यों नहीं जाते? अगर मैं अभिनय में जाऊँगा तो पूरी तैयारी से जाऊँगा. मैं कभी किताब बीच से नहीं पढ़ता. पूरी तरह से समझकर पढ़ता हूँ. वैसे आजकल मैं अपनी आवाज़ और गिटार पर समय दे रहा हूँ. जो लोग संगीत को ही अपना करियर बनाना चाहते हैं उनके लिए रब्बी शेरगिल का क्या संदेश है? ख़ूब मस्ती कीजिए. लोगों के दिल तोड़िए और अपना दिल भी टूटने दीजिए. ज़िंदगी के अनुभव लीजिए. ख़ूब यात्रा कीजिए. ज़िंदगी में छोटे-छोटे मजे भी लूटिए. मैंने देखा है कि जो भी लोग संगीत सीखते हैं वो सब प्रसिद्ध होना चाहते हैं. अगर आपको प्रसिद्ध होना है तो लोगों से जुड़ना होगा. |
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