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मधुर भंडारकर के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. एक मुलाक़ात में हमारे आज के मेहमान हैं एक ऐसे शख़्स जो यथार्थवादी और ज़मीन से जुड़ी हुई फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इनकी फ़िल्में हक़ीकत के नज़दीक होने के साथ ही व्यावसायिक भी होती हैं. हम बात कर रहे हैं ‘पेज थ्री’ जैसी सफल और संवेदनशील फ़िल्में बनाने वाले फ़िल्मकार मधुर भंडारकर की. मधुर आप रहने वाले कहाँ के हैं? मैं मुंबई के खार इलाक़े का रहने वाला हूँ. ज़िंदगी का संघर्ष यहीं मुंबई में हुआ है. आपने शुरुआत की एक वीडियो लाइब्रेरी से. फिर उसके बाद कई राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार. कैसे रहा यह सफ़र? वीडियो लाइब्रेरी तो बस यूँ ही खुल गई थी. दरअसल मुझे शुरू से फ़िल्मों का बहुत शौक था. मैं एक सामान्य मध्यम वर्ग परिवार से आता हूँ इसलिए थिएटर में बहुत सी फ़िल्में नहीं देख पाता था. उन दिनों सड़कों पर 16एमएम के प्रोजेक्टर पर फ़िल्में दिखाई जाती थीं. मैंने उस पर बहुत सी फ़िल्में देखीं. मैं फ़िल्मों के शुरू होने से पहले सभी नाम भी बड़े गौर से पढ़ा करता था. मैं सोचता था कि निर्देशक बहुत छोटा आदमी होता होगा क्योंकि उसका नाम बहुत बाद में आता था. लेकिन बाद में किसी ने बताया कि निर्देशक फ़िल्म बनाने वाली टीम का कप्तान होता है इसलिए उसका नाम बाद में आता है. वीडियो कैसेट का दौर आने पर तो मुझे चस्का ही लग गया. वहीं से मैंने दस-बारह कैसटों से अपना काम शुरू किया. मैं घरों पर भी कैसेट पहुँचाया करता था. मेरे पास चार सालों में 1800-1900 कैसेट हो गए थे. फिर आप फ़िल्मों से जुड़े. सहायक निर्देशक बने. आपने राम गोपाल वर्मा के साथ भी काम किया. हाँ. अगर इंडस्ट्री में आपका कोई पैरोकार न हो तो दिक्कतें आ ही जाती हैं. मुझे बहुत पापड़ बेलने पड़े. मैं कई फ़िल्म वालों को भी कैसट दिया करता था. मिथुन दा को भी मैं कैसेटें देता था. वो मुझसे आज भी कहते हैं कि यार मधुर विश्वास नहीं होता कि तू वही लड़का है जो मुझे कैसेट पहुँचाया करता था. मैंने सेट पर बहुत छोटे-छोटे काम किए. उस समय मुझे 30 रुपए मिला करते थे. फिर मैंने राम गोपाल वर्मा के साथ करीब चार-पाँच साल काम किया. मैंने उनके साथ ‘रात’ फ़िल्म में काम किया जिसमें रेवती थीं, ‘द्रोही’ में काम किया जिसमें नागार्जुन थे, एक फ़िल्म थी ‘नायक’ जो पूरी नहीं बन पाई. फिर ‘रंगीला’ में मैंने उनके साथ ऐसोसिएट डायरेक्टर के रूप में काम किया. आपकी पसंद का एक गाना बताएँ. मेरी फ़िल्म ‘पेज थ्री’ का गाना है कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पर… यह गाना लता जी ने गाया है. ‘रंगीला’ आपने आप में बहुत अलग तरह की फ़िल्म थी. हाँ, 1995 के हिसाब से वो बहुत अलग तरह की फ़िल्म थी. फ़िल्म ने राम गोपाल वर्मा को स्थापित किया. मुझे और उर्मिला मातोंडकर को भी इंडस्ट्री में पहचान मिली. उर्मिला स्टार बन गईं और मुझे भी 'रंगीला' के बाद ही इंडस्ट्री में ख़ुद से फ़िल्म बनाने का मौक़ा मिला. एआर रहमान का अलग तरह का संगीत मशहूर हुआ. आमिर ख़ान और जैकी श्रॉफ़ ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय किया था. क्या ‘रंगीला’ बनाते समय लगा था कि कुछ अलग बना रहे हैं? हाँ. ये फ़िल्म रामू जी के दिमाग की उपज थी. वो चीज़ों को अलग तरह से करने में यकीन रखते हैं. फ़िल्म बनाते समय बहुत से लोगों ने कहा कि फ़िल्म का चल पाना कठिन है क्योंकि इंडस्ट्री में इंडस्ट्री पर बनी फ़िल्में नहीं चल पातीं. लेकिन रामू जी ने इस धारणा को तोड़ा और फ़िल्म सफल रही. फ़िल्म ‘रंगीला’ का कोई गाना जो बहुत पसंद हो. तनहा-तनहा… गाना बहुत पसंद है. यह गाना गोवा में शूट किया गया था. क्या उस समय लगा था कि उर्मिला हॉट स्टार बनेंगी? उर्मिला जी का मैं पहले से प्रशंसक था. उन्होंने ‘चमत्कार’ और ‘नरसिंहा’ जैसी फ़िल्मों में काम किया था. बीच में उनका समय कुछ अच्छा नहीं रहा. ‘रंगीला’ में उन्होंने अपने आपको सिद्ध किया. निर्देशक के रूप में आपकी पहली फ़िल्म थी ‘त्रिशक्ति’ जो बहुत बुरी तरह पिट गई थी. कैसा लगा था जब पहली ही फ़िल्म पिट गई? इंडस्ट्री में ब्रेक मिलना ही कठिन था. अगर आपके समर्थन में कोई बड़ा स्टार या प्रोड्यूसर नहीं खड़ा है तो फ़िल्म मिलना मुश्किल है. वो दौर मसाला फ़िल्मों का था. 1980 और 1990 के मध्य तक बॉलीवुड में ख़ूब मसाला फ़िल्में बनीं. मैं लोगों के पास जब कहानियाँ लेकर जाता तो कहते कि तुम्हारी कहानियाँ श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी टाइप की हैं. आपको पसंद थे ये निर्देशक? बहुत पसंद थे. मैं आपको बताऊँ जब मैं वीडियो कैसेट का धंधा करता था उस समय मैंने श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की बहुत सी फ़िल्में देखी थीं. मैं हर तरह का सिनेमा देखा करता था और मजे के साथ देखता था. वैसे मेरे ऊपर श्याम बाबू का बहुत प्रभाव रहा. मैंने ‘रंगीला’ के बाद रामू के साथ काम करना छोड़ दिया था. मैं एक-डेढ़ साल बिना काम के रहा. मैंने बहुत संघर्ष किया. लोगो के पास प्रस्ताव लेकर गया. अंत में एक निर्माता और वितरक ने कहा कि ठीक है तुम फ़िल्म बनाओ हम पैसा लगाएँगे लेकिन संदेश प्रधान फ़िल्म नहीं होना चाहिए. तब मैंने उनके कहने पर ‘त्रिशक्ति’ बनाई. मैंने सोचा चलो निर्देशक बनने का मौक़ा तो मिला. लेकिन मेरे ग्रह-नक्षत्र इतने ख़राब थे कि फ़िल्म बनने में तीन साल लग गए. फ़िल्म के अभिनेता थे अरशद वारसी, मिलिंद गुणाजी और शरद कपूर. जब मैंने फ़िल्म पर काम शुरू किया तो वो ठीक ठाक काम कर रहे थे और उनका मार्केट भी ठीक था. लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ के लिए तैयार हुई उस समय तक इनकी स्थिति भी ख़राब हो चुकी थी. फ़िल्म के कई बार प्रोमो चले. फ़िल्म रिलीज़ हुई और फ़्लॉप हो गई. मैं भी समझ गया था कि इसका कुछ होने वाला नहीं है. लोगों ने फ़िल्म देखी और कहा कि अच्छा काम किया है. लेकिन जो मुझे अच्छी तरह से जानते थे वो यह भी समझते थे कि ये मधुर भंडारकर टाइप फ़िल्म नहीं है. वो जानते थे कि इसने ये फ़िल्म नहीं बनाई, इससे बनवाई गई है. इसका फ़ायदा मुझे मिला. फ़िल्म 12 बजे आई और तीन बजे उतर भी गई पता तक नहीं चला.
आप की पसंद का एक और गाना.. किशोर कुमार का गाना है ज़िंदगी के सफर में निकल जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते...राजेश खन्ना और मुमताज़ हैं इसमें. मैं राजेश खन्ना का बड़ा प्रशंसक हूँ. मैं भी बड़ा प्रशंसक हूँ. मैं उनका इतना बड़ा प्रशंसक था कि उनकी तरह वाला कुर्ता पहना करता था. आपकी फ़िल्म ‘चाँदनी बार’ को निर्माताओं ने स्वीकार कैसे कर लिया. फ़िल्म ‘त्रिशक्ति’ के बाद तो मेरे ऊपर फ़्लॉप निर्देशक का ठप्पा लग गया. मेरे ख़याल से आलोचकों ने फ़िल्म की समीक्षा तक नहीं लिखी थी. ‘त्रिशक्ति’ के बाद मैंने एक बार फिर से संघर्ष किया. मैं बस और ऑटो में जाया करता था. जो लोग कभी मुझसे काम मांगने आते थे मैं उनके साथ ही बस में बैठकर सफर करने लगा था. मुझे यह बहुत ख़राब भी लगता था. फ़िल्मी पार्टियों में किसी के भी साथ लटक कर चला जाता. ये बताइए क्या संघर्ष के दौरान मोटी चमड़ी वाला भी बनना पड़ता है? बिल्कुल. मुझे यह बात लोगों को बताने में शर्म भी नहीं है. मैं चाहता हूँ कि लोगों को पता लगे कि यहाँ तक पहुँचने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. एक असफल फ़िल्म निर्देशक से कोई बात करने को राज़ी नहीं होता. मेरे से सभी मुँह फेर लेते या कहते कि बाद में बात करते हैं. एक दिन मेरा दोस्त मुझे बियर पिलाने के लिए एक लेडीज़ बियर बार में लेकर गया. वहाँ लड़कियाँ संगीत की धुन पर नाच रही थीं. मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा और मैं लौट आया. लेकिन सारी रात वो संगीत मुझे परेशान करता रहा. मैं शाम को अपने दोस्त के साथ मुंबई के कई बारों में गया. आख़िर में हम सायन के एक छोटे तबके के बार में गए. वहाँ से निकल कर मैंने दोस्त से कहा कि मैं बार की लड़कियों पर फ़िल्म बनाउँगा. उसने कहा कि अभी ही फ़्लॉप फ़िल्म बनाई है और ऐसी बात कर रहा है. लेकिन मैंने इस विषय पर शोध करना शुरू किया और अगले पाँच-छह महीने तक काम करता रहा. इस विषय के बारे में मैंने फ़िल्म निर्माताओं से बात की. कुछ ने कहा कि फ़िल्म बनाओ लेकिन इसमें मसाला और 10-12 आइटम सॉंग डालना मत भूलना. लेकिन मैं इस गंभीर विषय पर एक संवेदनशील फ़िल्म बनाना चाहता था. आपने एक फ़्लॉप फ़िल्म के बाद तंगी के दिनों में एक संवेदनशील विषय पर छह महीने तक शोध किया. लोग क्या कहते थे? लोग कहते थे कि कुछ नहीं हो सकता. यह फ़िल्म नहीं बन पाएगी. कुछ ने तो सलाह दी कि मैं किसी निर्देशक के साथ फिर से जुड़ जाऊँ. कुछ ने कहा होगा कि इसे कुछ नहीं करना है. इसे बार का चस्का लग गया है. एक तबका होगा जिसने ऐसा भी कहा होगा. लोगों ने बहुत उत्साह हनन किया. इस तरह साल भर निकल गए. ब्रेक कैसे मिला? मुझे आर मोहन साहब मिले. इन्होंने गर्दिश, कभी न कभी, सज़ा-ए-काला पानी जैसी फ़िल्में बनाई थीं. इन्होंने मेरी फ़िल्म ‘त्रिशक्ति’ देखी थी. उनका कहना था कि मैंने तकनीकी रूप से अच्छी फ़िल्म बनाई थी. उन्होंने मुझसे कहा था कि कोई अच्छी पटकथा लेकर आओ तो साथ काम करेंगे. मैं यह आइडिया लेकर उनसे मिला लेकिन उन दिनों उनका धंधा अच्छा नहीं चल रहा था. उनकी फ़िल्में भी पिट रही थीं. लेकिन उन्होंने मुझमें विश्वास जताया और फ़िल्म पर काम शुरू हुआ. हमने पटकथा लिखी और तब्बू जी से मिले. उन्हें पटकथा बहुत पसंद आई. इस तरह फ़िल्म बन गई. और चाँदनी के बाद मधुर भंडारकर इंडस्ट्री में स्थापित हो गए. मुझे हमेशा लगता था कि मैं एक बार लोगों को दिखा सकूँ कि ये देखो मैंने अपने हिसाब से फ़िल्म बनाई है फिर चाहे फ़िल्म चले या न चले. मैं धारावाहिक बनाकर काम चलाने को भी राज़ी था. चाँदनी बार ने मुझे एक ही रात में सितारा बना दिया. अपनी पसंद का एक और गाना बताइए. फ़िल्म ‘गाइड’ का गाना काँटो से छीनकर ये आँचल...देव साहब और वहीदा जी पर फ़िल्माया गया था. ‘गाइड’ ने मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव डाला. 1966 में बनी इस फ़िल्म ने कई फ़िल्मकारों पर असर डाला. 'चाँदनी बार' के बाद आपने कौन सी फ़िल्म बनाई? मैंने फिर ‘सत्ता’ बनाई. वो फ़िल्म मुझे बहुत अच्छी लगी लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म सफल नहीं रही. लेकिन इस फ़िल्म को फ़िल्म समीक्षकों ने बहुत सराहा और रवीना टंडन के अभिनय की भी बहुत प्रशंसा हुई. उस फ़िल्म में एक सामान्य घर की लड़की राजनीतिज्ञों के घर बहू बनकर जाती है. जब राजनीतिज्ञ उसका इस्तेमाल करते हैं तो वो उन पर पलट वार करती है. वो फ़िल्म मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है. आपकी सभी फ़िल्मों में केंद्रीय भूमिका में महिला ही क्यों होती है? मुझसे देश-विदेश में औरतें पूछा करती हैं कि मैं औरतों के मन को इतनी अच्छी तरह कैसे पढ़ लेता हूँ. मेरे ख़याल से ये अपने आप है. अपने देश में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें महिला प्रधान फ़िल्म बनाकर बढ़िया से समझा जा सकता है. मैं हमेशा ये साफ तौर पर कहता हूँ कि मैं मूल रूप से एक प्रयोगधर्मी फ़िल्मकार हूँ न कि व्यावसायिक फ़िल्मकार. मैं हमेशा प्रयोग करता हूँ. मेरी किसी फ़िल्म ने सौ करोड़ का धंधा नहीं किया. लेकिन कोई भी फ़िल्म बहुत बड़े बजट की नहीं होती और ठीक-ठाक धंधा कर लेती है. निर्माता-वितरक सभी ख़ुश रहते हैं. ‘पेज़ थ्री’ में आपने शानोशौक़त की ज़िंदगी जीने वालों पर तीखा कटाक्ष किया है.
मैं इसके पीछे की कहानी बताता हूँ. जब मेरी फ़िल्म ‘चाँदनी बार’ हिट हुई और ‘सत्ता’ को भी सराहा गया तो मैं रातोरात स्टार बन गया. मुझे बड़ी-बड़ी पार्टियों का न्योता आने लगा. वहाँ मैं उन बड़े नेताओं, फ़िल्मकारों और व्यावसायियों से मिला जो मेरी सोच के भी बाहर थे. मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि कभी उनसे मिल पाउँगा. मुझे लगा कि ये अलग तरह का नशा है लेकिन मैंने इन पार्टियों का नशा अपने ऊपर नहीं चढ़ने दिया. मैं उन दिनों विजय आनंद जी से मिला करता था और उनसे सलाह-मशविरा करता रहता था. मैंने असफलता और सफलता दोनों देखी थी इसलिए पार्टियों के इस नशे से दूर ही रहा. इन पार्टियों में लोग दो-तीन पेग शराब पीने के बाद दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाते थे. मुझे लगा कि इस विषय पर फ़िल्म बनानी चाहिए. आपको कौन अधिक अच्छा लगता है तब्बू या कोंकणा? यह कहना कठिन है. मेरी सभी नायिकाएँ अच्छी रही हैं. तब्बू बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं. वैसे भी वो मेरी पहली अभिनेत्री रही हैं. उनकी एक ख़ास जगह है. कोंकणा सेन शर्मा भी अच्छी अभिनेत्री हैं. बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं. उनको कुछ भी समझाओ तुंरत समझ लेती हैं. ‘पेज़ थ्री’ से लेकर ‘ट्रैफ़िक सिगनल’ तक में उन्होंने बहुत अच्छा अभिनय किया है. आपकी पसंद का एक और गाना. पंचम दा एक गाना है नाम गुम जाएगा... आरडी बर्मन पसंद हैं आपको? बहुत पसंद हैं. कहते हैं कि मधुर भंडारकर बड़ी शख़्सियतों का ख़ुलासा करने में अधिक रुचि लेते हैं. लोग कहते हैं कि मधुर भंडारकर की फ़िल्में ख़ुलासा करती हैं जिसे मैं बिल्कुल नहीं मानता. मेरी फ़िल्में सामाजिक रूप से प्रासंगिक विषयों पर आधारित होती है. मेरी फ़िल्म में किसी फ़ैसले पर नहीं पहुँचा जाता. मैं निर्णय पूरी तरह से जनता पर छोड़ देता हूँ. मैं मुख्य किरदार के जीवन सफ़र को दिखाने की कोशिश करता हूँ जिसमें कई चीज़ें सामने आती हैं. हाँ किसी ऐसे विषय पर मुझे फ़िल्म बनाना अच्छा लगता है जिससे आम आदमी जुड़ा होता है. आपके बारे में कहा जाता है कि आप ख़ास विषयों पर फ़िल्में बनाने में अधिक रुचि लेते हैं न कि बड़े कलाकारों के साथ. वैसे आपकी फ़िल्म में स्टार भी होते हैं. मेरी फ़िल्मों में स्टार कहाँ होते हैं. ‘पेज़ थ्री’ कोंकणा शर्मा की पहली फ़िल्म थी. ‘ट्रैफ़िक सिग्नल’ में भी नए लोग थे. आप महिला प्रधान फ़िल्में अधिक बनाते हैं. पुरुषों का नंबर कब आएगा? ‘फ़ैशन’ शायद मेरी अंतिम महिला प्रधान फ़िल्म होगी इसके बाद मैं पुरुष प्रधान फ़िल्म बनाउँगा. आपकी पसंद का एक और गाना. फ़िल्म ‘धूम’ का क्रेज़ी किया रे... आप बहुत फिट नज़र आ रहे हैं. कहीं अभिनय का इरादा तो नहीं. नहीं ऐसा कुछ नहीं है. आदमी को फिट रहना चाहिए. जिम में एक घंटा मेहनत करने से आदमी में ऊर्जा बनी रहती है. आपकी फ़िल्में कुछ ख़ास विषय पर ही होती हैं. आप अपने आपको सीमित तो नहीं कर रहे? हाँ कुछ लोग कहते हैं कि मैं एक ही तरह की फ़िल्म बनाता हूँ. लेकिन मैं कॉमेडी और थ्रिलर भी बनाना चाहूँगा. लेकिन उनमें मधुर भंडारकर की झलक दिखनी चाहिए. मेरी प्रेरणा रहे राज खोसला, राज गुरू और विजय आनंद साहब. विजय आनंद की अगर आप गाइड, ज्वेलथीफ़ या जॉनी मेरा नाम देखो तो बहुत अंतर देखने को मिलेगा. आजकल बहुत कॉमेडी फ़िल्में बन रही हैं. हाँ. कॉमेडी बनाना बहुत कठिन है. लेकिन मैं कॉमेडी फ़िल्म ज़रूर बनाउँगा. किस अभिनेता की कॉमेडी आपको बहुत अच्छी लगती है. मुझे तो गोविंदा अच्छा लगता है? गोविंदा की कॉमेडी अच्छी है. मुझे सलमान ख़ान की कॉमेडी बहुत अच्छी लगती है. मेरी पसंदीदा फ़िल्म ‘अंदाज़ अपना अपना’ है. इसमें आमिर और सलमान ने ग़जब की कॉमेडी की है. आपकी तरह के कई दूसरे युवा फ़िल्मकार भी हैं जो नए विषयों पर फ़िल्में बनाते हैं लेकिन ऐसा क्यों लगता है कि कहानी चुराई गई है या किसी दूसरी फ़िल्म से प्रेरित होकर बनाई गई है. किस बात की कमी है हमारे यहाँ? हमारे लोग पुरानी सफल फ़िल्मों पर ही निर्भर करते हैं. वो सुरक्षित रहकर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. किसी दूसरी भाषा या विदेशी भाषा की सफलता से प्रेरित होकर लोग फ़िल्म बना रहे हैं. वो शोध नही करते. नए विषय पर फ़िल्म बनाने से थोड़ा झिझकते हैं. लोगों में संयम नहीं है.
ये संयम कैसे आता है? संयम में रहने के लिए आप में जुनून होना चाहिए जिससे आप किसी विषय पर अच्छा और नया काम कर सकें. मैं फ़ील्ड वर्क अधिक करता हूँ. ट्रैफ़िक सिग्नल के दौरान मैं कई ट्रैफ़िक सिग्नल पर गया और वहाँ रहने वाले लोगों से मिला और उन्हें समझने की कोशिश की. आपकी पसंद का एक और गाना. एआर रहमान का गाना है तू ही रे...बॉम्बे फ़िल्म का. आप रीमेक फ़िल्मों के समर्थक हैं? मैं व्यक्तिगत तौर पर इसका समर्थक नहीं हूँ. लेकिन अगर किसी फ़िल्मकार को लगता है कि वो पुरानी फ़िल्म को नए तरीके से और अधिक बेहतर फ़िल्म बना सकता है तो उसे बनानी चाहिए. हॉलीवुड में भी कई फ़िल्मकार ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्मों को दोबारा बनाते हैं और वो सफल भी होती हैं. आप किस फ़िल्म का रीमेक बनान चाहेंगे? मेरा मन करता है कि मैं ‘गाइड’ का रीमेक बनाऊँ. वो तो बहुत कठिन है. बहुत-बहुत कठिन है. मैं सोच भी नहीं सकता. आप कहाँ से देवानंद, वहीदा रहमान और सचिन देव बर्मन को लेकर आएँगे. मैं तो बोल ही रहा हूँ कि हिम्मत भी नहीं है. वो बहुत संतुलित और पूर्ण फ़िल्म है. आज के दौर मे आपका पसंदीदा फ़िल्म निर्देशक कौन सा है? मुझे राजकुमार हीरानी बहुत पसंद हैं. मैंने उनकी मुन्ना भाई वाली दोनों फ़िल्में देखी हैं. बहुत शानदार फ़िल्में बनाते हैं. उनमें एक संदेश भी होता है. बहुत ही ईमानदार निर्देशक हैं. आपको कौन से अभिनेता अच्छे लगते हैं? पुराने ज़माने के अभिनेताओं में देव साहब, राजेश खन्ना और अमित जी पसंद हैं. कमला हसन और नसीरुद्दीन शाह भी अच्छे हैं. संजीव कुमार और बलराज साहनी कमाल के अभिनेता रहे हैं. आज के दौर के अभिनेताओं में कौन पसंद हैं? आमिर ख़ान और रितिक रोशन अच्छे लगते हैं. अभिषेक बच्चन ‘गुरू’ में बहुत अच्छे लगे थे. शाहरुख़ ख़ान भी अच्छे हैं. बीच में आपको लेकर कुछ बवाल हुआ था. प्रेस को कैसे संभालते हैं? देखिए ये सब हो ही जाता है. किसी तरह संभाल लेते हैं. आपकी पसंद का एक और गाना. फ़िल्म कटी पतंग का का गाना है प्यार दीवाना होता है…किशोर कुमार ने गाया है. दस साल बाद अपने आपको कहाँ पाते हैं? आज के छह साल पहले मैं सड़क पर खड़ा होता था और बाद में सफल निर्देशक बना. इसलिए किस मुकाम पर होऊंगा कह नहीं सकता. लेकिन फ़िल्में बनाता रहूँगा. आज मैं सफल फ़िल्में बना रहा हूँ तो मेरे पास निर्माता और कलाकार आ रहे हैं. कल पता नहीं क्या हो जाए. आप दस साल भी अपनी तरह की फ़िल्में बना पाएँ इसके लिए शुभकामनाएँ. धन्यवाद. |
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