समुद्र में बिछी इंटरनेट केबलों का कटना कई देशों के लिए चिंता क्यों बन गया?

बाल्टिक सागर

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इमेज कैप्शन, 12 अक्तूबर 2015 को खींची गई इस तस्वीर में सी-लायन 1 सबमरीन टेलीकम्युनिकेशन केबल नज़र आ रही है, जिसे "इले डी ब्रेहट" जहाज़ हेलसिंकी, फ़िनलैंड के तट पर बाल्टिक सागर में बिछाता दिखा था.

इस साल नवंबर में नेटो की नौसेना की 13 नौकाओं में सवार चार हज़ार नौसैनिकों ने उत्तर-पूर्वी यूरोप के बाल्टिक सागर में दस दिनों तक सैनिक अभ्यास किया.

उनके अभियान का लक्ष्य बाल्टिक सागर में बिछी उन इंटरनेट केबल और गैस पाइप लाइनों के जाल की रक्षा करना था, जो इस क्षेत्र के देशों से जुड़ी हुई हैं.

इस अभियान के शुरू होने से दो दिन पहले ही चीन की एक नौका ने वहां समुद्र तल पर लंगर डालकर दो केबलों को घसीटकर काट दिया था.

इनमें से एक केबल स्वीडन और लिथुआनिया को जोड़ती है और दूसरी फ़िनलैंड और जर्मनी को जोड़ती है.

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2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से बाल्टिक सागर में बिछे ढांचागत संसाधनों पर कई हमले हो चुके हैं. इस कड़ी में समुद्र में बिछी इंटरनेट केबलों का काटा जाना ताज़ा वारदात है.

इससे क्षेत्र के देशों को चिंता हो रही है कि इस तरह की वारदातों से यूक्रेन युद्ध उनके दरवाज़े तक पहुंच सकता है.

इस हफ़्ते "दुनिया जहान" में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या नेटो बाल्टिक सागर की रक्षा कर सकता है?

केबल का कटना क्या दुर्घटना है?

बाल्टिक सागर

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इमेज कैप्शन, जर्मनी और फ़िनलैंड ने 18 नवंबर 2024 को एक संयुक्त बयान में कहा था कि बाल्टिक सागर में बिछी टेलीकम्युनिकेशंस केबल के कटने की घटना को लेकर वे बेहद चिंतित हैं.
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इस ताज़ा हमले के संकेत 17 नवंबर की सुबह मिले. इस बारे में हमने वॉशिंगटन स्थित थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल की वरिष्ठ शोधकर्ता एलिज़ाबेथ ब्राव से बात की.

उनकी लिखी किताब 'अंडर सी वार' जल्द प्रकाशित होने वाली है.

उन्होंने बताया कि स्वीडन और लिथुआनिया को जोड़ने वाली केबल को संचालित करने वालों ने पाया कि वो केबल क्षतिग्रस्त हो गई है.

इसके चौबीस घंटे के भीतर ही जर्मनी और फ़िनलैंड को जोड़ने वाली एकमात्र केबल की देखरेख करने वालों को भी पता चला कि वो केबल क्षतिग्रस्त हो गई है.

बाद में पता चला कि जिसने भी इन केबलों को नुक़सान पहुंचाया, उसने समुद्र तल पर लंगर डालकर इन्हें घसीटा, जिससे ये कट गईं.

जांच में पाया गया कि एक चीनी व्यापारी नौका घटना के समय उसी स्थान पर मौजूद थी.

ये चीनी मालवाहक जहाज़ यी पेंग-3 घटना से कुछ घंटे पहले सेंट पीटर्सबर्ग से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित एक रूसी बंदरगाह से रवाना हुआ था.

एलिज़ाबेथ ब्राव ने बताया कि स्वीडन और अन्य क्षेत्रीय देशों ने इस जहाज़ का पीछा किया. बाद में ये जहाज़ डेनमार्क के विशेष आर्थिक क्षेत्र में स्थित एक बंदरगाह पर जाकर रुका और अब वहीं ठहरा हुआ है.

हालांकि, समुद्र में इंटरनेट केबलों का दुर्घटनावश कट जाना आम है, लेकिन एलिज़ाबेथ ब्राव का कहना है कि अगर जहाज़ का लंगर केबल में फंसकर उसे घसीटने लगे, तो नाविकों को इसकी जानकारी हो जाती है, क्योंकि इससे जहाज़ की रफ्तार धीमी हो जाती है.

वो कहती हैं कि चौबीस घंटे के भीतर दो वारदातों का होना महज़ दुर्घटना नहीं लगता. स्वीडन का प्रशासन इस मामले की जांच कर रहा है. यी पेंग जहाज़ के लंगर को क्षतिग्रस्त पाया गया है.

लेकिन, एलिज़ाबेथ ब्राव का कहना है कि अगर स्वीडन ये साबित नहीं कर पाया कि नाविकों ने जानबूझकर केबल को लंगर से घसीटा है, तो जहाज़ के नाविकों और कंपनी के ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मुक़दमा दायर नहीं किया जा सकेगा.

अगर ये केबलें दुर्घटनावश नहीं कटी हैं, तो सवाल उठता है कि इन हमलों के पीछे कौन है?

इस सवाल पर एलिज़ाबेथ ब्राव का कहना है कि चीन इस क्षेत्र के समुद्री मार्गों पर पैनी नज़र रखता है.

अगर एक व्यापारी जहाज़ ने रूस के कहने पर ये केबलें काटी हैं, तो निश्चित ही उसे चीनी सरकार का समर्थन प्राप्त होगा.

लेकिन, हमले के स्वरूप को देखते हुए इसमें रूस का हाथ होने की संभावना ज़्यादा लगती है.

उन्होंने कहा, "अगर रूसी नौसेना के जहाज़ों ने ये केबल काटी होती, तो इसे युद्ध की तरह देखा जाता. लेकिन, इसे एक चीनी व्यापारी जहाज़ ने काटा है, जिसे दुर्घटना कहा जा सकता है."

"रूस ने ये काफी चालाकी के साथ किया है, क्योंकि इस हमले में सीधे उसे ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसलिए नेटो के लिए उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करना मुश्किल है."

फ़िलहाल यी पेंग जहाज़ डेनमार्क के क़रीब अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में खड़ा है और उसे डेनमार्क और जर्मनी के जहाज़ों ने घेर रखा है.

चीन ने कहा है कि वो इस वारदात की जांच में सहयोग करने को तैयार है, और रूस ने इन हमलों के आरोपों का खंडन किया है. मगर, क्षेत्रीय नेता इससे सहमत नहीं हैं.

जर्मनी के प्रतिरक्षा मंत्री और स्वीडन के प्रधानमंत्री ने कहा है कि इस वारदात को जानबूझकर अंजाम दिया गया है. इसके बाद से बाल्टिक सागर क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है.

बाल्टिक सागर का सामरिक महत्व

बाल्टिक सागर.

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इमेज कैप्शन, यह तस्वीर 28 दिसंबर, 2024 को फ़िनलैंड की खाड़ी में पोर्ककलान्नीमी, किर्ककोनुम्मी में ली गई. इसमें बायीं तरफ तेल टैंकर ईगल एस दिख रहा है, जबकि दायीं तरफ टगबोट उक्को दिख रही है.

टालिन में लेनार्ट मैरी कॉन्फ़्रेंस की निदेशक हेल्गा काम का मानना है कि बाल्टिक सागर का विशेष सामरिक महत्व है.

इस समुद्र के इर्द-गिर्द रूस सहित नौ देश हैं, जिनमें से आठ नेटो के सदस्य हैं. इनमें एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, फ़िनलैंड, स्वीडन, डेनमार्क, पोलैंड और जर्मनी शामिल हैं.

हेल्गा काम कहती हैं कि बाल्टिक सागर विश्व व्यापार का एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है.

उन्होंने बताया कि बाल्टिक सागर से होकर कई जहाज़ अटलांटिक महासागर के रास्ते उत्तरी अमेरिका, लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका, चीन और अन्य देशों की ओर जाते हैं.

कई बड़े तेल वाहक जहाज़ भी यहां से गुज़रते हैं. यहां काफ़ी अधिक यातायात होता है. रूस के लिए ये व्यापार का एक बड़ा महत्वपूर्ण मार्ग है.

सेंट पीटर्सबर्ग के अलावा, रूस को बाल्टिक सागर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण ज़मीन का टुकड़ा है- कलीनिनग्राड, जो बाल्टिक सागर के पूर्वी किनारे पर लिथुआनिया और पोलैंड के बीच स्थित है.

रूस ने कलीनिनग्राड में अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर रखी हैं. यानी इस छोटे से क्षेत्र में कई देशों के हित जुड़े हैं और यूक्रेन युद्ध के बाद स्थिति ज़्यादा पेचीदा हो गई है.

वहीं, रूस ने इस क्षेत्र के आठ देशों के साथ सहयोग बंद कर दिया है.

हेल्गा काम ने कहा, "यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ सहयोग मुश्किल हो गया है. क्योंकि, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जल सीमा को लेकर जिस प्रकार की व्यवस्था बनायी गई थी, उससे रूस ख़ुश नहीं है. वो इसे बदलना चाहता है, जिससे क्षेत्र के अन्य देश चिंतित हैं."

हेल्गा काम कहती हैं कि इससे सबसे ज़्यादा चिंता एस्टोनिया को है, क्योंकि सेंट पीटर्सबर्ग से कलीनिनग्राड को जाने वाला समुद्री मार्ग एस्टोनिया के एक्सक्लूज़िव इकोनॉमिक ज़ोन के पास से गुज़रता है.

इसके चलते रूस एस्टोनिया को आसानी से निशाना बना सकता है. बाल्टिक सागर के नौ में से आठ देश नेटो के सदस्य हैं, इसलिए कुछ लोग इसे नेटो लेक भी कहते हैं.

मगर, हेल्गा काम कहती हैं कि हमें याद रखना चाहिए कि रूस नेटो का सदस्य नहीं है. स्वीडन और फ़िनलैंड के नेटो में शामिल होने के बाद से इस क्षेत्र में नेटो की स्थिति मज़बूत हुई है.

हेल्गा काम ने कहा, "इससे नेटो की मौजूदगी अधिक ठोस तो हुई है, लेकिन ख़तरा कम नहीं हुआ है."

ये चिंता इसलिए व्यक्त की जा रही है, क्योंकि बाल्टिक सागर के तल में क्षेत्र के संचार माध्यमों और गैस पाइप लाइनों का जाल बिछा हुआ है, जो इस क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

किन संसाधनों को ख़तरा?

थिंक टैंक में सीनियर रिसर्चर एलिज़ाबेथ ब्राव का बयान.

लंदन स्थित थिंकटैंक चैटहम हाउस की वरिष्ठ शोधकर्ता मैरियन मैसमर का मानना है कि बाल्टिक सागर के तल में बिछे इंटरनेट केबल और गैस पाइप लाइनों के साथ-साथ ऊर्जा और संचार के अन्य संसाधनों को भी ख़तरा है.

उन्होंने कहा, "समुद्री तट के नज़दीक स्थित ढांचागत संसाधनों को भी ख़तरा है. इनमें रिनिवेबल एनर्जी, जैसे लहरों से बिजली बनाने वाले प्लांट और पवन चक्कियों से बिजली बनाने वाले प्लांट भी शामिल हैं, जो ख़तरे में पड़ सकते हैं. पहले स्थिति ऐसी नहीं थी."

2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर की गई चढ़ाई के बाद इस क्षेत्र में स्थिति बदल गई.

उस साल सितंबर में रूस और जर्मनी के बीच बिछी नॉर्ड स्ट्रीम 3 गैस पाइपलाइन विस्फोटों के कारण क्षतिग्रस्त हो गई, जिस वजह से इसे बंद करना पड़ा.

उसके लगभग एक साल बाद फ़िनलैंड और एस्टोनिया के बीच बिछी बाल्टिक कनेक्टर गैस पाइपलाइन और उसके पास की दो इंटरनेट केबल एक चीनी जहाज़ के लंगर से घसीटने के कारण क्षतिग्रस्त हो गईं.

कुछ ही दिन बाद सेंट पीटर्सबर्ग और कलीनिनग्राड के बीच बिछी एक रूसी डाटा केबल क्षतिग्रस्त हो गई. और हाल में दो और ऐसी वारदातें हुईं, जिनकी चर्चा हमने पहले की थी.

इन वारदातों के पीछे किसका हाथ था, ये कहना मुश्किल है.

मैरियन मैसमर ने कहा, "निश्चित तौर पर कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन बाल्टिक कनेक्टर हमले के पीछे रूस का हाथ होने की संभावना ज़्यादा है, क्योंकि वो फ़िनलैंड और एस्टोनिया को जोड़ता है और इस क्षेत्र से रूस के हित जुड़े हुए हैं.

नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन पर हुए हमले के पीछे यूक्रेन का हाथ हो सकता है, क्योंकि वो अपने सहयोगियों को दिखाना चाहता होगा कि रूस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

"जहां तक कलीनिनग्राड और सेंट पीटर्सबर्ग के बीच बिछी डाटा केबल के हमले का सवाल है, पश्चिमी देश या नेटो के सदस्य देश सीधे तौर पर इस तरह के हमले में सामान्यतः शामिल नहीं होते."

"फिर भी, हो सकता है कि रूस की हरकतों का जवाब देने के लिए क्षेत्र के किसी देश ने ये हमला किया हो."

इन हमलों की अस्पष्टता को मैरियन मैसमर 'ग्रे ज़ोन अटैक' करार देती हैं.

इसका मतलब है कि संघर्ष चलता रहता है, लेकिन कोई देश खुलकर ऐसा बड़ा हमला नहीं करता जिसे युद्ध की कार्यवाही कहा जा सके.

क्योंकि, सभी खुलकर युद्ध करने से कतराते हैं, लेकिन तनाव हमेशा बना रहता है. नेटो ने इस साल अक्तूबर में बाल्टिक क्षेत्र में बिछे संसाधनों पर किसी हमले से निपटने के लिए एक नया टास्क फ़ोर्स बनाया है.

मैरियन मैसमर के अनुसार, इस टास्क फ़ोर्स का पहला काम ये है कि नेटो सदस्य बाल्टिक क्षेत्र में संसाधनों की रक्षा से जुड़ी जानकारियां एक-दूसरे के साथ साझा करें.

इसका दूसरा उद्देश्य रूस को ये संदेश देना है कि नेटो के सभी सदस्य देश एकजुट हैं और इस मुद्दे पर उनमें कोई मतभेद नहीं है.

इन हमलों का मक़सद क्या है?

नेटो का झंडा

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इमेज कैप्शन, यह तस्वीर 26 नवंबर, 2024 की है. वारसॉ, पोलैंड में विदेश मंत्रालय में लगा नाटो का झंडा.

ओस्लो के नेशनल डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रोफ़ेसर और नॉर्वे की ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व अधिकारी टॉर्मोड हेयर का मानना है कि भविष्य में ऐसे और हमले होंगे और उनके पीछे किसका हाथ है, ये साबित करना मुश्किल होगा. दरअसल, इन हमलों का मक़सद दुश्मन देश की जनता का मनोबल गिराना है.

उन्होंने कहा, "भविष्य में नेटो देशों पर रूस के हाइब्रिड हमले और बढ़ेंगे. इस प्रकार के हमलों का उद्देश्य ये है कि देश की जनता का अपनी सरकार पर से भरोसा हट जाए."

"अगर लोग देखेंगे कि उनकी सरकार रूसी हमलों से देश के संसाधनों की रक्षा नहीं कर पा रही, तो उनका सरकार पर से विश्वास उठ जाएगा. इससे देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण हो जाएगा."

"ऐसी स्थिति में मध्यमार्गी उदारवादी दलों के लिए जनता का समर्थन बनाए रखना कठिन हो जाएगा."

टॉर्मोड हेयर कहते हैं कि कलीनिनग्राड में रूसी परमाणु मिसाइलों की तैनाती काफ़ी महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, "जब तक ये मिसाइलें इस्तेमाल नहीं होतीं, तब तक इनका सबसे बड़ा असर यूरोपीय नेटो देशों के फ़ैसलों को प्रभावित करना है."

"उनकी मौजूदगी इन देशों की जनता पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाती है, ताकि अगर रूस कोई ग़लत कार्यवाही करे, तब भी नेटो के ये सदस्य देश उसके ख़िलाफ़ कोई कड़ा कदम उठाने से हिचकिचाएं."

ये वैसा ही मनोवैज्ञानिक द्वंद है, जैसा बीसवीं सदी में शीत युद्ध के दौरान नेटो और सोवियत संघ के बीच चल रहा था.

फ़र्क सिर्फ इतना है कि अब हम एक डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, और महज़ एक इंटरनेट केबल के कट जाने से जीवन बुरी तरह बाधित हो सकता है.

टॉर्मोड हेयर कहते हैं कि इस प्रकार के हाइब्रिड या मिले जुले और ढंके-छिपे हमलों से रूस को ये फ़ायदा है कि नेटो के लिए आर्टिकल-5 के तहत कार्यवाही करना मुश्किल होगा.

नेटो के आर्टिकल-5 के तहत, अगर उसके किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो इस गठबंधन के सभी 32 सदस्य मिलकर उस हमले का जवाब दे सकते हैं.

टॉर्मोड हेयर की राय है कि परमाणु हथियारों की दुनिया में कोई भी देश तीसरा महायुद्ध नहीं छेड़ना चाहता. इसलिए, भविष्य में युद्ध का स्वरूप अधिकतर आर्थिक होगा.

मिसाल के तौर पर, दो देशों के बीच की गैस या तेल पाइप लाइनों को उड़ाने से भी दुश्मन देश को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा सकता है.

वहीं, रूस को इस हाइब्रिड वार से ये फ़ायदा है कि नेटो की इससे निपटने की क्षमता सीमित है.

टॉर्मोड हेयर ने कहा, "नेटो मुख्यत: एक सैन्य संगठन है. रूस इन हमलों के ज़रिए नेटो की सेनाओं या सैनिक ठिकानों को निशाना नहीं बना रहा, बल्कि लोगों के मनोबल पर हमला कर रहा है."

"जब तक ये संघर्ष खुले युद्ध में नहीं बदलते, तब तक नेटो का काम इस क्षेत्र में संसाधनों की निगरानी और पुलीसिंग करना ही होगा."

अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर – क्या नेटो बाल्टिक सागर की रक्षा कर सकता है?

इसका संक्षिप्त उत्तर ये है कि ये उसके लिए मुश्किल होगा, क्योंकि बाल्टिक सागर में बिछी केबल और गैस पाइप लाइनों को निशाना बनाकर काफ़ी नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन हमला करने वाले के लिए इसमें जोखिम कम है. क्योंकि, जब तक युद्ध की घोषणा नहीं होती, नेटो इसका कड़ा जवाब नहीं दे सकता.

ऐसे में, नवंबर में बाल्टिक सागर में नेटो का सैन्य अभ्यास एक प्रकार का शक्ति प्रदर्शन था.

इसका दूसरा उद्देश्य ये पता लगाना था कि क्षेत्र में किन संसाधनों को ज़्यादा ख़तरा है और साथ ही हमलावरों को पीछे हटने के लिए चेतावनी देना भी था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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