अर्दोआन की चाल भांपने में क्या चूक गए पुतिन?

पुतिन और अर्दोआन

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इमेज कैप्शन, साल 2015 में पुतिन ने कहा था कि तुर्की ने पीठ में छुरा भोंका है

तुर्की ने सीरिया की सीमा पर साल 2015 में 24 नवंबर को रूस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया था.

तब तुर्की ने कहा था कि रूसी विमान ने उसके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया था. जवाब में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि तुर्की ने पीठ में छुरा भोंका है.

पुतिन ने तुर्की को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी.

तुर्की ने लंबे समय तक इसे लेकर रूस से माफ़ी नहीं मांगी थी. तुर्की का कहना था कि लगातार चेतावनी के बावजूद रूसी विमान उसके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन कर रहा था.

वहीं रूस का कहना था कि उसका विमान सीरिया के भीतर था लेकिन तुर्की ने सुनियोजित तरीक़े से उकसाऊ क़दम उठाया है. रूस ने जनवरी 2016 में कहा था कि तुर्की ने इसे लेकर माफ़ी मांग ली है.

यह वाक़या उसी युद्ध का था, जिसका अंत पिछले हफ़्ते सीरिया में बशर अल-असद के शासन के अवसान के साथ हुआ.

सीरिया में तुर्की और रूस आमने-सामने थे. तुर्की सीरिया में विद्रोही गुटों का समर्थन कर रहा था और रूस बशर अल-असद का. अंततः सीरिया में तुर्की की जीत हुई और बशर अल-असद को भागकर रूस जाना पड़ा.

क़रीब डेढ़ महीने पहले ही अर्दोआन रूस गए थे और ब्रिक्स समिट में उन्होंने पुतिन से मुलाक़ात की थी. तब शायद ही पुतिन को पता था कि डेढ़ महीने बाद सीरिया में तुर्की से उन्हें मुँह की खानी पड़ेगी. एक बार फिर से कहा जा रहा है कि तुर्की ने रूस की पीठ में छुरा भोंका है.

बाइडन और अर्दोआन

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन

क्या पुतिन माफ़ कर देंगे?

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सोशल मीडिया पर 2018 का पुतिन के इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप वायरल हो रहा है.

यह इंटरव्यू रूसी भाषा में है. पुतिन से सवाल पूछा गया कि क्या आप माफ़ कर देते हैं? जवाब में पुतिन कहते हैं- हाँ, लेकिन सब कुछ माफ़ी के दायरे में नहीं आता. फिर पुतिन से सवाल पूछा गया, ऐसा क्या है जो आपके लिए माफ़ी के लायक नहीं होता? पुतिन जवाब में कहते हैं- विश्वासघात.

रूस के विश्लेषकों को लग रहा है कि अर्दोआन ने पुतिन के साथ विश्वासघात किया है.

रूस के राजनीतिक विज्ञानी और लेखक एलेक्जेंडर दुगिन ने सीरिया में बशर अल-असद के शासन ख़त्म होने के बाद लिखा है, ''रूस ऐसा कुछ भी नहीं करेगा, जिससे तुर्की को नुक़सान हो. लेकिन इस तरह के विश्वासघात के बाद तुर्की मुश्किल घड़ी में रूस से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता है. समय-समय पर मुश्किलें आती रहती हैं. तुर्की और रूस के बीच कई स्तरों पर संबंध रहे हैं. तुर्की का रवैया स्पष्ट रूप से इसराइल के पक्ष में है. यह बहुत ही दुखद है.''

एलेक्जेंडर दुगिन ने लिखा है, ''जैसा कि पश्चिम के देश बता रहे हैं कि रूस कमज़ोर पड़ गया है लेकिन यह सच्चाई नहीं है. मेरा मानना है कि पश्चिम का आकलन ग़लत है. तुर्की का दुश्मन इस्लामिक कट्टरता है. अरब के देश तुर्की के नेतृत्व से कभी सहमत नहीं होंगे.''

''सीरिया में कुर्द पश्चिम के समर्थन से सत्ता पर काबिज़ होने की कोशिश करेंगे. सीरिया में रूस के नहीं होने से अर्दोआन ने एक अहम सहयोगी और दोस्त को खो दिया है. हम अब तक अर्दोआन का समर्थन करते थे. 2015 में हमने तुर्की से टकराव बढ़ने से रोका था. अर्दोआन के ख़िलाफ़ तख़्तापलट को रोकने में भी हमने मदद की थी. लेकिन सीरिया में जो कुछ भी हुआ, वो हमारे लिए दुखद है. मुझे लगता है कि अर्दोआन ने रणनीतिक ग़लती की है.''

भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी को लगता है कि पुतिन से अर्दोआन को समझने में चूक हुई है.

जॉनी ने लिखा है, ''जब पुतिन ने सीरिया में तुर्की की मदद से गृह युद्ध रोकने की पहल की तो उन्होंने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी थी कि अर्दोआन आख़िरकार नेटो के सहयोगी हैं. पुतिन को लगा कि वह यूक्रेन में तुर्की को नियंत्रित करने में कामयाब रहे हैं. ज़ाहिर है कि तुर्की रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम के प्रतिबंध में शामिल नहीं हुआ. लेकिन अर्दोआन अपने समय का इंतज़ार कर रहे थे. आख़िरकार अर्दोआन ने सीरिया में पुतिन को मात दी.''

तुर्की-रूस

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इमेज कैप्शन, कहा जाता है कि अर्दोआन जब भी पश्चिम से नाराज़ो होते हैं तो रूस की तरफ़ जाते हैं

तुर्की से मात खाता रूस?

जब पिछले हफ़्ते सीरिया में विद्रोही गुटों के सामने बशर अल-असद की सेना हार रही थी तो रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ दोहा फोरम में शामिल होने क़तर गए थे. दोहा फोरम में अल-जज़ीरा ने लावरोफ़ से पूछा कि बशर अल-असद की हार रूस के लिए कितना बड़ा झटका है?

इस सवाल के जवाब में लावरोफ़ ने कहा, ''रूस न केवल सीरिया में लोगों की मदद कर रहा था बल्कि इराक़, लीबिया और लेबनान में भी हमने मदद की है. दुनिया में दो तरह की लड़ाई चल रही है. दुनिया का एक हिस्सा अपने दबदबे की लड़ाई लड़ रहा है तो दूसरा हिस्सा अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है. अगर आप चाहते हैं कि हम ये कहें कि सीरिया में हमारी हार हुई है तो कोई बात नहीं, आप पूछना जारी रखिए.''

सेर्गेई लावरोफ़ से पूछा गया कि सीरिया में जो कुछ भी हो रहा है, उसमें तुर्की की क्या भूमिका है? आपको लगता है कि सीरिया में जो कुछ भी हो रहा है, तुर्की उसे कंट्रोल कर रहा है?

इसके जवाब में लावरोफ़ ने कहा, ''आपको पता है कि तुर्की सीरिया में काफ़ी प्रभावी है. तुर्की की सीमा सीरिया से लगी है और सुरक्षा को लेकर उसकी अपनी चिंताएं हैं.''

रूस को न केवल तुर्की से सीरिया में हार मिली है बल्कि लीबिया और कारबाख़ में भी हार का सामना करना पड़ा है.

पड़ोसियों के साथ तुर्की की विदेश नीति को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.

तुर्की के पूर्व प्रधानमंत्री अहमत दावुतोग्लु ने निक्केई एशिया से अर्दोआन की विदेश नीति के बारे में कहा था, ''राष्ट्रपति ने पड़ोसियों से कोई समस्या नहीं वाली नीति को छोड़ दिया और सभी पड़ोसियों से समस्या ही समस्या वाली नीति को अपना लिया है.''

असद और पुतिन

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इमेज कैप्शन, सीरिया में विद्रोही गुटों से हार के बाद बशर अल-असद रूस चले गए हैं

अर्दोआन का 'संतुलन' वाला गेम

वॉशिंगटन इंस्टिट्यूट में टर्किश रिसर्च प्रोग्राम के निदेशक सोनेर कगाप्तय ने अर्दोआन पर 'अ सुल्तान इन ऑटोमन' नाम से एक किताब लिखी है.

इस किताब में उन्होंने लिखा है, ''अर्दोआन ने सत्ता में रहने के दौरान ख़ुद को उम्मीद से ज़्यादा मज़बूत किया. इराक़, सीरिया और लीबिया में प्रभावी सैन्य अभियान को अंजाम दिया और तुर्की की राजनीतिक ताक़त का अहसास करवाया. जहाँ तुर्की राजनयिक ताक़त बनने में नाकाम रहा, वहाँ उसकी सैन्य ताक़त ने भरपाई कर दी.''

कहा जाता है कि अर्दोआन जब भी पश्चिम से नाराज़ होते हैं तो रूस की ओर रुख़ करते हैं. 2021 के सितंबर में अर्दोआन न्यूयॉर्क में यूएन की आम सभा को संबोधित करने गए थे. अर्दोआन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिलना चाहते थे लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई थी. अर्दोआन इससे नाराज़ हो गए थे और वह रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिलने चले गए थे.

निक्केई एशिया से अमेरिका के एक पूर्व सैन्य अधिकारी रिच ऑटज़ेन ने अर्दोआन की विदेशी नीति के बारे में कहा था, ''तुर्की के पास चौतरफ़ा बैलेंसिंग मैकनिज़म है.

अर्दोआन यूरोप से पश्चिम तक संतुलन चाहते हैं. इस्लामिक दुनिया से लेकर साउथ तक और पूरब में यूरेशिया के अलावा उत्तर में रूस तक अपना संबंध चाहते हैं. जब भी वह किसी एक तरफ़ ख़तरा महसूस करते हैं, दूसरी तरफ़ मुड़ जाते हैं.''

कई लोग मानते हैं कि तुर्की रूस और अमेरिका के गेम में कई बार ख़ुद ही फँस जाता है. कहा जाता है कि तुर्की इस तरह का गेम लंबे समय से खेलता रहा है. कई बार तुर्की को गेम में रूस से समझौता करना पड़ता है.

2016 में तुर्की में जब तख़्तापलट नाकाम रहा तो अर्दोआन इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि इसके पीछे अमेरिका में रह रहे स्व-निर्वासित इस्लामिक स्कॉलर फ़तुल्लाह गुलेन हैं.

तुर्की

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इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ

पुतिन के लिए मौक़ा

तुर्की अमेरिका से गुलेन के प्रत्यर्पण की मांग लंबे समय से करता रहा है. अमेरिका ने तुर्की की मांग कभी नहीं मानी. इस मामले में अर्दोआन का शक़ अमेरिका पर बढ़ता गया.

कहा जाता है कि रूस ने इस स्थिति को मौक़े की तरह लिया और इसका पर्याप्त दोहन किया. 'अ सुल्तान इन ऑटोमन' में सोनेर कगाप्तय ने लिखा है, ''पुतिन इस बात को बख़ूबी जानते थे कि गुलेन अमेरिका में रहते हैं. तुर्की में कई लोग इस बात को तत्काल मानने के लिए तैयार हो गए थे कि तख्तापलट की कोशिश के पीछे अमेरिका का हाथ था."

"तख्तापलट की कोशिश वाली उथल-पुथल में 250 से ज़्यादा लोगों की जान गई थी. इसमें अर्दोआन के कुछ क़रीबी भी थे. तब पुतिन दुनिया के पहले नेता थे, जब उन्होंने अर्दोआन से संपर्क किया था. पुतिन ने विचलित अर्दोआन को अपने गृहनगर सेंट पीटर्सबर्ग बुलाया था.''

''अर्दोआन के पास तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कोई फोन नहीं आया था. जब चार दिन बाद वॉशिगंटन से अर्दोआन के पास फोन आया तो लाइन पर तत्कालीन विदेश मंत्री जॉन केरी थे. तख्तापलट की कोशिश के तीन हफ़्ते बाद अर्दोआन सेंट पीटर्सबर्ग पहुँचे थे और पुतिन से मुलाक़ात की थी.''

कहा जाता है कि इसी बैठक में पुतिन ने अर्दोआन को एस-400 ख़रीदने के लिए सहमत कराया था. 2017 में एस-400 की ख़रीदारी की आधिकारिक घोषणा हुई थी. एस-400 मिसाइल की पहचान नेटो के प्लेन्स को मार गिराने के रूप में है.

तुर्की के एस-400 ख़रीदने की प्रतिक्रिया में अमेरिका ने एफ-35 फाइटर प्लेन देने से मना कर दिया था.

तुर्की-रूस

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इमेज कैप्शन, कहा जाता है कि पुतिन के पास भी जब मौक़ा आया तुर्की से फ़ायदा उठाया

पुतिन से दोस्ती मजबूरी में?

सोनेर कगाप्तय ने लिखा है, ''पुतिन से दोस्ती के बाद अर्दोआन के लिए अलग होना आसान नहीं था. दोनों देशों के संबंधों में शक्ति का असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखा. अगर तुर्की एस-400 से पीछे हटता तो पुतिन ट्रेड और टूरिज़म को रोक देते जो तुर्की की अर्थव्यवस्था के लिए राजस्व पैदा करने का ये अहम ज़रिया है. पुतिन अर्दोआन की वैश्विक स्तर पर मज़बूत छवि को भी गंभीर नुक़सान पहुँचा सकते हैं. वैश्विक स्तर पर अर्दोआन की मज़बूत छवि से उन्हें अपने घर में ख़ूब फ़ायदा मिला है.''

लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि अर्दोआन को सियासी और अंतरराष्ट्रीय मुश्किलों से निकलना आता है. पिछले दो दशकों में अर्दोआन ने कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया है और सबसे मज़बूत बनकर निकले हैं.

वो चाहे जियोपॉलिटिकल संकट हो या 2016 का तख़्तापलट या फिर टर्किश स्प्रिंग. अर्दोआन ने सबको ठीक से हैंडल किया. अर्दोआन ने अपनी पार्टी की पहचान इस रूप में बनाई कि तुर्की में इस्लामिक मूल्यों को वही वापस ला सकती है.

2003 के पहले तुर्की में सेना का दबदबा रहता था. अतातुर्क भी फ़ौज से ही आए थे. तुर्की की अर्थव्यवस्था में भी फ़ौज का ही ज़्यादा दखल था. तख़्तालट भी तुर्की में होता रहता था. अर्दोआन ने इसे ख़त्म किया.

अर्दोआन के आने के बाद से तुर्की में निजी कारोबारी उभरे. तुर्की की सरकार में सेना का दखल ख़त्म हुआ. इस लिहाज से देखें तो अर्दोआन ने तुर्की की राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह से बदलकर रख दिया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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