बशर अल-असदः सुन्नी मुस्लिम बहुल मुल्क पर आधी सदी तक राज करने वाले शिया परिवार के वारिस

बशर अल-असद

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इमेज कैप्शन, सीरिया पर बशर अल-असद का क़रीब ढाई दशक तक शासन था.

सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के जीवन में कई निर्णायक मोड़ रहे हैं, लेकिन हज़ारों किलोमीटर दूर हुई एक कार दुर्घटना ने शायद उनके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया.

शुरू में बशर अल-असद को अपने पिता की विरासत संभालने के लिए तैयार नहीं किया गया था. लेकिन बड़े भाई बासेल की मौत के बाद इस राह पर उनकी यात्रा शुरू हुई.

बात साल 1994 के शुरुआती दिनों की है जब बशर लंदन में ऑप्थैल्मोलॉजी (नेत्र चिकित्सा) पढ़ रहे थे और दमिश्क के पास उनके बड़े भाई की एक कार दुर्घटना में मौत हो गई.

इसके बाद छोटे भाई को सत्ता सौंपने की योजना की तैयारी शुरू कर दी गई. इसके बाद उन्होंने देश की बागडोर संभाली और उनके कार्यकाल में देश ने खूनी जंग देखी जिसमें लाखों लोगों की जान चली गई और दसियों लाख लोग विस्थापित हो गए.

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लेकिन बशर अल-असद का एक डॉक्टर से एक ऐसे निरंकुश नेता के रूप में रूपांतरण कैसे हुआ, जिन पर युद्ध अपराध के आरोप लगे?

पिता की विरासत

हाफ़िज़ अल-असद

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इमेज कैप्शन, असद के पिता हाफ़िज़ क़रीब तीस सालों तक देश के राष्ट्रपति रहे थे.

बशर अल-असद का जन्म साल 1965 में हुआ था. उनके पिता का नाम हाफ़िज़ अल-असद था और मां का नाम अनीसा मख़लूफ़ था.

उनके जन्म का यह वही समय था जब सीरिया, मध्य पूर्व और उसके आसपास के हालात में नाटकीय बदलाव हुए.

उस समय इस क्षेत्र के कई देशों में अरब राष्ट्रवाद क्षेत्रीय राजनीति का अहम हिस्सा हुआ करता था और सीरिया भी इससे अलग नहीं था.

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मिस्र और सीरिया के बीच थोड़े समय के लिए हुए एकीकरण (1958-1961) की असफलता के बाद बाथ पार्टी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया और अरब राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया.

इस दौर के अधिकांश अरब देशों की तरह ही सीरिया में लोकतंत्र नहीं था और ना ही बहुदलीय चुनाव की व्यवस्था थी.

असद परिवार का ताल्लुक अलावाइत समुदाय से है जो कि शिया इस्लाम को मानता है और यह सीरिया में सबसे पिछड़ा समुदाय था.

आर्थिक मुश्किलें, इस समुदाय के बहुत से लोगों के सीरियाई सेना में शामिल होने का कारण बनीं.

हाफ़िज़ अल-असद बाथ पार्टी के एक कट्टर समर्थक और एक सैन्य अफ़सर के तौर पर प्रमुखता से उभरे और 1966 में रक्षा मंत्री बने.

हाफ़िज़ अल-असद ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की और साल 1971 में राष्ट्रपति बन गए और इस पद पर वो साल 2000 तक रहे.

सीरिया के आज़ादी के बाद के इतिहास में इतना लंबा कार्यकाल बहुत उल्लेखनीय था, क्योंकि तब तक यह कई सैन्य तख़्तापलट का गवाह बन चुका था.

हालांकि विपक्ष का दमन करते हुए और लोकतांत्रिक चुनावों को ख़ारिज करते हुए हाफ़िज़ अल-असद ने बहुत कड़ाई से शासन किया.

लेकिन उन्होंने विदेशी नीति में व्यवहार कुशलता का परिचय दिया और सोवियत संघ के साथ गठबंधन के बावजूद, 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान वो अमेरिका की अगुवाई वाले गठबंधन में शामिल हो गए.

डॉक्टरी की पढ़ाई और लंदन

अस्मा अल-अखरास

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इमेज कैप्शन, लंदन में पढ़ाई के दौरान ही बशर अल-असद की मुलाक़ात भावी पत्नी आसमा अल-अख़रास से हुई थी.

हालांकि शुरू में बशर अल-असद ने राजनीति और सेना से अलग, अपना रास्ता अख़्तियार किया. उन्होंने मेडिसिन में अपना करियर बनाने का फ़ैसला किया.

दमिश्क यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद, ऑप्थैल्मोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए वो साल 1992 में लंदन स्थित वेस्टर्न आई हॉस्पिटल में पढ़ाई के लिए ब्रिटेन चले गए.

साल 2018 में आई बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री 'ए डैंजरस डायनेस्टीः द असद्स' के अनुसार बशर लंदन की ज़िंदगी में रम गए थे.

उन्होंने अंग्रेज़ी गायक फिल कोलिंस की तारीफ़ की और पश्चिमी संस्कृति के पहलुओं को अपनाया.

लंदन में ही बशर अपनी होने वाली पत्नी आसमा अल-अख़रास से मिले.

आसमा किंग्स कॉलेज लंदन में कम्प्यूटर साइंस पढ़ रही थीं और बाद में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एमबीए में उनका प्रवेश हो गया.

हालांकि जल्द ही उनकी ज़िंदगी ने एक अलग मोड़ ले लिया.

हाफ़िज़ अल-असद के दूसरे बेटे के तौर पर बशर की शख़्सियत आमतौर पर अपने बड़े भाई बासेल की छाया में ही ढंकी रही.

उस समय बासेल को ही 'उनका वारिस' माना जा रहा था.

लेकिन जनवरी 1994 में बासेल की मौत ने बशर की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया. उन्हें तुरंत लंदन से वापस बुला लिया गया और इसके साथ ही सीरिया के नए नेता के रूप में उनकी तैयारी शुरू कर दी गई.

बशर सेना में शामिल हो गए और भविष्य की अपनी भूमिका के लिए अपनी सार्वजनिक छवि बनाने लगे.

बदलाव का सपना

असद परिवार

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इमेज कैप्शन, असद के परिवार ने सीरिया पर आधी सदी तक राज किया.

साल 2000 में हाफ़िज़ अल-असद की मौत हो गई और 34 साल के बशर को तुरंत देश का राष्ट्रपति बना दिया गया.

इसके लिए सीरियाई संविधान में न्यूनतम उम्र की 40 वर्ष की सीमा को घटाने के लिए संशोधन किया गया.

साल 2000 की गर्मियों में बशर ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली और नया राजनीतिक सुर अपनाया.

उन्होंने 'पारदर्शिता, लोकतंत्र, विकास, आधुनिकीकरण, जवाबदेही और संस्थागत सोच' के बारे में बातें कीं.

राष्ट्रपति बनने के कुछ महीने बाद बशर ने आसमा अल-अख़रास से शादी कर ली. उनके तीन बच्चे हैं- हाफ़िज़, ज़ेन और करीम.

राजनीतिक सुधार और प्रेस की आज़ादी को लेकर बशर के बयानों ने शुरू में सीरियाई लोगों के बीच उम्मीद जगाई.

उनके नेतृत्व की स्टाइल और आसमा की पश्चिमी शिक्षा से लोगों को लगा कि यह बदलाव के नए दौर की शुरुआत का संकेत है.

कुछ समय के लिए सीरिया ने नागरिक बहसों और अपेक्षाकृत अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक छोटा दौर देखा जिसे 'दमिश्क स्प्रिंग' के नाम से जाना जाता है.

लेकिन साल 2001 में सुरक्षा बलों ने दमन का चक्र फिर से चला दिया और सत्ता के मुखर विरोधियों की गिरफ़्तारियां शुरू हो गईं.

बशर ने सीमित आर्थिक सुधारों की नींव रखी जिसने निजी क्षेत्र में विकास को बढ़ावा दिया. उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के शुरुआती वर्ष में उनके चचेरे भाई रामी मख़लूफ़ का उभार हुआ.

मख़लूफ़ ने अपना एक विशाल आर्थिक साम्राज्य स्थापित किया, जिसके बारे में आलोचकों का कहना था कि यह सत्ता और संपत्ति के गठजोड़ का प्रतीक था.

इराक़ और लेबनान

रफ़ीक हरीरी

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इमेज कैप्शन, लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक हरीरी की हत्या के बाद बशर अल-असद पर दबाव बढ़ गया था.

साल 2003 में इराक़ युद्ध वो घटना थी जो बशर अल-असद और पश्चिमी सरकारों के बीच रिश्ते में बड़ी बाधा बनी.

सीरियाई राष्ट्रपति ने अमेरिकी आक्रमण का विरोध किया. कुछ लोगों का मानना है कि इसका कारण उनका ये डर था कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का अगला निशाना सीरिया हो सकता है.

उधर अमेरिका ने सीरिया पर आरोप लगाया कि, इराक़ में अमेरिकी अतिक्रमण का विरोध करने वाले विद्रोही गुटों को हथियार की तस्करी पर वह आंख बंद किए हुए है और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा से चरमपंथियों को घुसने की इजाज़त दे रहा है.

दिसम्बर 2003 में अमेरिका ने कई कारणों से सीरिया पर प्रतिबंध लगा दिए, इनमें केवल इराक़ ही कारण नहीं था, बल्कि लेबनान में सीरिया की मौजूदगी भी एक कारण था.

फ़रवरी 2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक हरीरी की सेंट्रल बेरूत में एक विशाल विस्फोट में मौत हो गई थी. हरीरी लेबनान में सीरिया के प्रमुख विरोधी थे. इस हत्या के आरोप सीरिया और उसके सहयोगियों पर लगे.

लेबनान में सामूहिक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जबकि दमिश्क पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ने लगा. जिसकी वजह से सीरिया ने 30 सालों की सैन्य मौजूदगी के बाद लेबनान खाली कर दिया.

इन सबके बावजूद असद के प्रमुख सहयोगी लेबनानी ग्रुप हिज़्बुल्लाह ने हरीरी की हत्या में शामिल होने की ख़बरों का खंडन किया. हालांकि, साल 2020 में एक हिज़्बुल्लाह सदस्य को एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने हत्या में शामिल होने के लिए सज़ा दी थी.

अरब स्प्रिंग

सीरियाई विद्रोह

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इमेज कैप्शन, साल 2011 में अरब स्प्रिंग का असर सीरिया में भी हुआ और देश में प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

बशर अल-असद के पहले दशक के कार्यकाल में सीरिया के संबंध ईरान के साथ प्रगाढ़ हुए और क़तर और तुर्की के साथ ही उसे संबंधों में सुधार हुआ, हालांकि बाद में इसमें भी बदलाव आया.

युवा राष्ट्रपति को लेकर रियाद के शुरुआती समर्थन के बावजूद सऊदी अरब के साथ रिश्तों में काफ़ी उतार चढ़ाव रहा.

कुल मिलाकर, बशर अल-असद ने विदेश नीति में अपने पिता के नक्शेक़दम पर चलते हुए, सीधे सैन्य टकराव से बचते हुए सावधानी से काम किया.

एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद, असद के शासन को निरंकुश रवैये वाला कहा जा सकता है क्योंकि इस दौरान विपक्ष की आवाज़ को दबाया जाता रहा.

दिसम्बर 2010 में उनकी पत्नी आसमा अल असद ने वोग मैग्ज़ीन को एक साक्षात्कार दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका घर 'लोकतांत्रिक' तरीक़े से चलता है.

ठीक उसी दिन ट्यूनीशिया में एक सब्ज़ी विक्रेता ने, पुलिस के पीटे जाने के विरोध में खुद को आग लगा ली थी, जिसके बाद ट्यूनीशिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और राष्ट्रपति ज़ाइन अल आबिदीन बेन अली को सत्ता छोड़नी पड़ी थी.

टयूनीशिया के जनउभार ने अचानक पूरे अरब जगत में क्रांतिकारी आंदोलनों को प्रेरित किया और यह मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन और सीरिया तक पहुंचा.

वोग का इंटरव्यू 'ए रोज़ इन द डिज़र्ट' शीर्षक से मार्च 2011 में छपा जिसमें सीरिया को 'बमबारी, तनावों और अपहरणों से मुक्त' देश बताया गया था.

लेकिन आने वाले समय में यह तस्वीर नाटकीय तरीक़े से बदल गई.

मार्च के मध्य तक आते आते दमिश्क में प्रदर्शन शुरू हो गए और इसके कुछ दिनों बाद ही दक्षिणी शहर दरआ में भी प्रदर्शन शुरू हो गए क्योंकि यहां असद विरोधी नारे दीवार पर लिखने की वजह से बच्चों को गिरफ़्तार किया गया था.

सीरियाई लोगों को संबोधित करने से पहले असद ने विरोध प्रदर्शन शुरू होने के दो सप्ताह बाद तक इंतज़ार किया. संसद में उन्होंने ये माना कि अधिकांश लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं हो रही थीं, लेकिन उन्होंने सीरिया में 'साज़िश' को नाकाम करने का वादा किया.

इसी बीच सुरक्षा बलों ने दरआ में प्रदर्शनकारियों पर फ़ायरिंग कर दी, जिसने प्रदर्शनों में घी का काम किया और कई शहरों में उनके इस्तीफ़े की मांग होने लगी. प्रशासन ने और हिंसा से इसका जवाब दिया और उन्हें 'विदेशी ताक़तों के इशारे पर तोड़फोड़ करने वाले और घुसपैठिये' बताया.

इसके कुछ महीने बाद ही हालात इतने बिगड़े कि सरकारी सुरक्षा बलों और हथियार उठाने वाले विपक्ष के बीच पूरे देश में संघर्ष शुरू हो गया.

अंतरराष्ट्रीय दख़ल, जिहादी और युद्ध अपराध

सीरिया

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इमेज कैप्शन, एक दशक से भी लंबे समय तक चले गृह युद्ध में सीरिया के कई शहर तबाह हो गए.

संघर्ष तेज़ हुआ और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का दख़ल बढ़ा तो संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, हताहतों की संख्या हज़ारों से लाखों में पहुंच गई.

असद के सुरक्षा बलों के साथ साथ रूस, ईरान और ईरान समर्थित हथियारबंद ग्रुपों ने दख़ल दिया, जबकि तुर्की और खाड़ी देशों ने हथियारबंद विपक्षी गुटों का समर्थन किया.

हालांकि असद विरोधी प्रदर्शनों में शुरू में लोकतंत्र और सभी के लिए आज़ादी की मांग की थी लेकिन जल्द ही गुटबाज़ी सतह पर आ गई. विपक्षी गुटों ने आरोप लगाए कि सरकार सुन्नी बहुसंख्यकों की बजाय अलावाइतों को तरजीह दे रही थी.

क्षेत्रीय शक्तियों की दख़लंदाज़ी ने सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा बना दिया.

इस्लामी गुटों ने अलावाइतों के ख़िलाफ़ दुश्मनी वाला रुख़ अपनाया, जबकि हिज़्बुल्लाह की अगुवाई वाले शिया मिलिशिया ईरान के वफ़ादार थे और असद सरकार का समर्थन करने के लिए सीरिया आ गए थे.

इस बीच पड़ोसी इराक़ में इस्लामी क़ानून को और कड़ाई से लागू करने की वकालत करने वाला एक इस्लामी चरमपंथी ग्रुप का उभार हुआ- इस्लामिक स्टेट (आईएस).

इस गृह युद्ध का फ़ायदा उठाते हुए आईएस ने सीरिया के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया, और पूर्व शहर रक्का को अपनी राजधानी घोषित कर दिया.

अगस्त 2013 में, दमिश्क के पास विपक्षी गठबंधन के कब्ज़े वाले पूर्वी ग़ौटा शहर में हुए रासायनिक हमले में सैकड़ों लोग मारे गए थे.

इस हमले के लिए पश्चिमी शक्तियों और सीरियाई विपक्ष ने असद सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया.

हालांकि दमिश्क ने इसमें अपना हाथ होने से इनकार किया. लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबावों और धमकियों के चलते उसने अपने रासायनिक हथियारों के ज़ख़ीरे को नष्ट करने पर सहमति जताई.

हालांकि इससे सीरियाई जंग में होने वाले अत्याचारों का अंत नहीं हुआ और आगे भी रासायनिक हथियारों से हमले हुए.

संयुक्त राष्ट्र आयोगों ने सभी पक्षों पर युद्ध अपराध के आरोप लगाए जिसमें हत्या, टॉर्चर और बलात्कार शामिल थे.

2015 में एक बार ऐसा लगा कि असद सरकार गिर जाएगी, क्योंकि देश के एक बड़े इलाक़े पर उसका नियंत्रण जा चुका था. हालांकि रूस के सैन्य हस्तक्षेप के बाद यह स्थिति बदली और असद ने अपने कई प्रमुख इलाक़ों पर फिर से कब्ज़ा किया.

ग़ज़ा युद्ध

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इमेज कैप्शन, पिछले कुछ दिनों में विपक्षी विद्रोहियों की बढ़त नाटकीय रही है.

साल 2018 और 2020 में, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत ऐसी स्थिति बनी, जहां सरकारी बलों को सीरिया के अधिकांश हिस्से का नियंत्रण मिला जबकि उत्तर और उत्तर पूर्व में इस्लामी विपक्षी ग्रुपों और कुर्द मिलिशिया का साझा नियंत्रण था.

इन समझौतों ने असद की स्थिति को मज़बूत किया और उन्हें धीरे धीरे अरब कूटनीतिक मंच पर फिर से अहमियत मिली.

साल 2023 में सीरिया को अरब लीग में शामिल किया गया और अरब देशों ने दमिश्क में अपने दूतावास को फिर से बहाल किया.

असद के शासन के तीसरे दशक में सीरिया के सामने भयंकर आर्थिक संकट आया लेकिन ऐसा लगा कि वे इससे बच निकले.

अक्तूबर 2023 में जब हमास ने इसराइल पर अचानक हमला किया, जिसके बाद ग़ज़ा युद्ध शुरू हुआ था, तो इसके नतीजे लेबनान तक पहुंचे, जहां असद के सहयोगी हिज़्बुल्लाह पर इसका ख़ास असर हुआ.

इस संघर्ष में हिज़्बुल्लाह को बहुत भारी नुक़सान उठाना पड़ा, जिसमें इसके नेता हसन नसरल्लाह की मौत भी शामिल है.

जिस दिन लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, हयात तहरीर अल शाम (एचटीएस) की अगुवाई वाले सीरियाई विपक्षी गुटों ने सीरिया में औचक हमला शुरू कर दिया और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो पर कब्ज़ा जमा लिया.

विपक्षी गुट तेज़ी से आगे बढ़े, हमा और अन्य शहरों पर कब्ज़ा कर लिया, जबकि देश का दक्षिणी हिस्सा भी सरकार के नियंत्रण से जाता रहा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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