सीरिया में जो कुछ हो रहा है उसकी वजह क्या है?

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- Author, डेविड ग्रिटेन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोही गुटों ने बीते कई सालों में अपनी सबसे बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है.
सीरियाई सैनिकों के तेज़ी से पीछे हटने के बाद विद्रोही बलों ने देश के उत्तर-पश्चिम के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है.
इसमें देश के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो का ज़्यादातर हिस्सा भी शामिल है.
इसके बाद विद्रोही बल दक्षिण की ओर बढ़े और हमा शहर पर कब्ज़ा कर लिया. इसके साथ ही ये कसम भी खाई कि उनका अगला लक्ष्य होम्स शहर होगा.
जॉर्डन की सीमा के नज़दीक दक्षिण में स्थानीय विद्रोही गुटों ने देरा इलाके के ज्यादातर हिस्से पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा कर लिया है. ये वो जगह है जहां साल 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह का जन्म हुआ था.

सीरिया में जंग क्यों हो रही है?

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साल 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण और लोकतंत्र समर्थक विद्रोह एक गृह युद्ध में तब्दील हो गया, जिसने न केवल देश को तबाह किया बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां भी इसमें शामिल हो गईं.
तब से लेकर अब तक इस जंग में पाँच लाख से अधिक लोग मारे गए हैं. एक करोड़ 20 लाख लोगों को अपने घर से पलायन करने को मजबूर होना पड़ा. इनमें से लगभग 50 लाख लोग अब या तो शरणार्थी हैं या फिर वे विदेश में शरण चाह रहे हैं.
विद्रोहियों के हमले से पहले ऐसा लग रहा था मानो जैसे रूस, ईरान और ईरान समर्थित मिलिशिया की मदद से असद सरकार के देश के कई शहरों पर नियंत्रण हासिल करने के बाद ये युद्ध खत्म हो गया हो.
हालांकि, देश के कुछ बड़े हिस्से अभी भी सरकार के सीधे नियंत्रण से बाहर हैं.
इनमें उत्तरी और पूर्वी क्षेत्र शामिल हैं जहां अमेरिका समर्थित कुर्द नेतृत्व वाले सशस्त्र समूहों का नियंत्रण है.
विद्रोहियों का आख़िरी बचा हुआ गढ़ उत्तर-पश्चिमी प्रांतों अलेप्पो और इदलिब में है, जो तुर्की की सीमा से लगे हैं और यहां चालीस लाख से अधिक लोग बसते हैं, जिनमें से कई विस्थापित हैं.
उत्तर-पश्चिम इलाके में इस्लामी चरमपंथी समूब हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) का प्रभुत्व है. लेकिन तुर्की समर्थित विद्रोही गुट-जिन्हें सीरियन नेशनल आर्मी (एसएनए) के तौर पर जाना जा है, भी तुर्की के सैनिकों की मदद से इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखते हैं.
हयात तहरीर अल-शाम क्या है?

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हयात तहरीर अल-शाम का गठन (एचटीएस) अल-नसरा फ्रंट के नाम से हुआ था. गठन के अगले साल ही उसने अल-क़ायदा के प्रति अपनी निष्ठा रखने की कसम खाई.
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ लड़ रहे विद्रोहियों के सभी गुटों में अल-नसरा फ्रंट ही सबसे घातक और असरदार था. लेकिन ऐसा लगता है कि ये गुट क्रांति के उत्साह की तुलना में जिहादी विचारों से ज्यादा प्रेरित था. उसका ये रवैया कई बार विद्रोहियों के सबसे प्रमुख गठबंधन फ्री सीरियन आर्मी से इसके टकराव की वजह बना.
2016 में अल नसरा ने अल-क़ायदा से अपने संबंध तोड़ लिए और एक साल बाद दूसरे विद्रोही गुटों में विलय के दौरान अपना नाम हयात तहरीर अल-शाम रख लिया.
हालांकि अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देश अब भी एचटीएस को अल-कायदा का ही सहयोगी मानते हैं और अक्सर उसे अल-नसरा फ्रंट ही कहते हैं.
एचटीएस ने अपने प्रतिद्वंद्वियों अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट की इकाइयों को कुचल कर इदलिब और अलेप्पो में अच्छी-खासी ताक़त जुटा ली. उसने इस इलाके में शासन करने के लिए कथित तौर पर सीरियन सैल्वेशन सरकार का भी गठन कर लिया है.
एचटीएस का अंतिम लक्ष्य है असद का तख़्तापलट और एक इस्लामी सरकार की स्थापना. लेकिन इससे पहले तक इसने बड़े पैमाने पर संघर्ष छेड़ने की कोशिश और असद की सत्ता को दोबारा चुनौती देने से परहेज़ ही किया था.
हालांकि अब एचटीएस के नेता अबू मोहम्मद अल-जुलानी ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि विद्रोहियों का लक्ष्य असद के शासन को ख़त्म करना है.
सीरिया और सहयोगी देशों ने अब तक क्या किया है?

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राष्ट्रपति बशर अल-असद ने विद्रोहियों को 'कुचल' डालने की कसम खाई है. वो उन्हें 'आतंकवादी' कह रहे हैं.
दो दिसंबर को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़िश्कियान से फोन पर बात करते हुए उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों पर युद्ध भड़काने का आरोप लगाया था.
उन्होंने कहा था कि पश्चिमी देश इस क्षेत्र का 'नक्शा बदल देना' चाहते हैं.
इस बातचीत के दौरान ईरान के राष्ट्रपति ने कहा था कि उनका देश सीरिया की सरकार और इसके लोगों के साथ मजबूती से खड़ा है. उनका कहना था कि सीरिया की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखना इस क्षेत्र में उसकी रणनीति की बुनियाद है.
क्रेमलिन (रूस) के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस अलेप्पो के इर्द-गिर्द के हालात को 'सीरिया की संप्रभुता' पर हमला मानता है.
वह चाहता है कि सीरिया की सरकार जल्द से जल्द इस इलाके में हालात सामान्य कर संवैधानिक व्यवस्था बहाल करे. वो सीरिया के इस कदम के समर्थन में है.
रूस ने शुक्रवार को सीरिया में रह रहे अपने नागरिकों को देश छोड़ देने के लिए कहा था.
पश्चिमी देश और तुर्की क्या कह रहे हैं

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असद के विरोधी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने 2 दिसंबर को संयुक्त बयान जारी कर सभी पक्षों से तनाव को और न बढ़ाने की अपील की.
संयुक्त बयान में कहा गया कि सभी पक्ष नागरिकों और इन्फ्रास्ट्रक्चर की हिफाजत करें ताकि लोगों का और ज्यादा विस्थापन न हो. ये युद्ध में फंसे और विस्थापित लोगों तक मानवीय मदद पहुंचाने के लिए भी जरूरी है.
उन्होंने इस संघर्ष का सीरिया की अगुवाई में राजनीतिक समाधान निकालने की भी अपील की. संयुक्त राष्ट्र के 2015 के एक प्रस्ताव में भी सीरियाई संघर्ष के राजनीतिक समाधान को रेखांकित किया गया है.
इससे पहले 30 नवंबर को व्हाइट हाउस की राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता सीन सावेत ने कहा कि असद इस समस्या का राजनीतिक समाधान निकालने में दिलचस्पी नहीं रखते. वो इसके लिए किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहते.
इसके अलावा उनकी 'रूस और ईरान' पर निर्भरता ने भी हालात को मौजूदा संघर्ष तक पहुंचा दिया है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'अमेरिका का विद्रोहियों के हमले से कोई लेना-देना नहीं है'.
तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने भी कहा कि सीरिया में जो हो रहा है उसमें किसी विदेशी ताकत के दखल की बात करनी एक गलती होगी. उन्होंने कहा कि सीरिया सरकार अपने लोगों और वैधानिक विपक्ष से सुलह कर ले.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















