ईरान और इसराइल के मीडिया में मिसाइल हमले को कैसे देखा जा रहा है?

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ईरान ने मंगलवार रात इसराइल पर एक के बाद एक कई मिसाइलें दागीं.
इसराइल ने कहा है कि ईरान की तरफ़ से कुल 181 मिसाइलें दागी गईं लेकिन ज़्यादातर मिसाइलों को बीच में ही नष्ट कर दिया गया. इसराइल का कहना है कि ईरानी हमले में वेस्ट बैंक में एक फ़लस्तीनी व्यक्ति की मौत हुई है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि ईरान ने बड़ी ग़लती की है और इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी. वहीं ईरान ने कहा है कि इसराइल अगर फिर से कुछ नई चाल चलता है तो उसका जवाब दिया जाएगा.
दोनों देशों के बीच का टकराव वहाँ के मीडिया में भी साफ़ दिख रहा है. इसराइल के प्रमुख अख़बार टाइम्स ऑफ इसराइल ने लिखा है कि मंगलवार की रात क़रीब एक करोड़ लोगों को बॉम्ब शेल्टर में जाना पड़ा.
टाइम्स ऑफ इसराइल ने लिखा है, ''ईरान का हमला लगभग नाकाम रहा और हमले के तुरंत बाद इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान ने बड़ी ग़लती कर दी है और उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा. मिसाइल हमले के धमाकों की गूंज पूरे इसराइल में थी. यरुशलम से लेकर जॉर्डन वैली तक.''


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हमले में कितना नुक़सान
'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' की ख़बर के मुताबिक़ ईरानी मिसाइल हमले में 37 साल के एक फ़लस्तीनी नागरिक की मौत हो गई है और दो अन्य लोग घायल भी हुए हैं.
जेरिको के गवर्नर हुसैन हमायल ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है, "आसमान से एक रॉकेट के टुकड़े गिरने से जेरिको में एक फ़लस्तीनी व्यक्ति की मौत हो गई."
अख़बार लिखता है कि मूल रूप से ग़ज़ा पट्टी के जबालिया के रहने वाले मज़दूर समेह अल-असाली की जेरिको के पास वेस्ट बैंक के नुइमा गाँव में मौत हुई है जबकि चार अन्य फ़लीस्तीनी भी कथित तौर पर उसी मिसाइल के छर्रे से घायल हुए हैं.
टाइम्स ऑफ इसराइल ने लिखा है, ''इसराइल की वायु सेना ने अमेरिका और जॉर्डन के साथ मिलकर ईरान के ज़्यादातर मिसाइलों को गिरने से पहले ही नष्ट कर दिया.''

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बंकर में इसराइली सुरक्षा कैबिनेट की बैठक
ईरानी हमले के बाद यरुशलम के पास एक सुरक्षित बंकर में इसराइल की सुरक्षा कैबिनेट की बैठक हुई. ईरानी हमले पर इसराइल के सहयोगी देश उसके समर्थन में खुलकर आए. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान और फ़्रांस ने हमले की निंदा की और इसराइल के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता जताई.
अमेरिका ने कहा कि इसराइल को ईरानी हमले से निपटने में वह मदद करता रहेगा.
इसराइल पहले से ही दो मोर्चों पर लड़ रहा है. हमास से गज़ा में और लेबनान में हिज़्बुल्लाह से लड़ाई अब भी ख़त्म नहीं हुई है.
इसराइल ने मंगलवार को लेबनान में ज़मीन पर सैन्य कार्रवाई की घोषणा की थी और इसके ठीक बाद ही ईरान ने इसराइल पर मिसाइल दागना शुरू किया. ईरान ने कहा है कि उसने मिसाइल हमला नसरल्लाह और अन्य लोगों की हत्या के जवाब में किया है.
अंतरराष्ट्रीय टकराव को क़रीब से देखने वाले कई जानकारों का कहना है कि ईरान पर अपने ही लोगों का दबाव है कि वो इस तरह से इसराइल के सामने आत्मसमर्पण ना करे. ईरान की कोशिश की थी वह पश्चिमी देशों के साथ टकराव ख़त्म करे लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है.
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि रहीं मलीहा लोधी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है, ''ईरान का लक्ष्य किसी को मारना और नष्ट करना नहीं था बल्कि वह यह दिखाना चाहता था कि इसराइल आक्रामक होगा तो वह चुप नहीं बैठेगा.''

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'ख़ामेनेई ने हिब्रू ज़ुबान में इसराइल को धमकाया'
इसराइल के एक अन्य प्रमुख अख़बार ‘द यरूशलम पोस्ट’ ने ईरान के मिसाइल हमलों की ख़बर को विस्तार से छापा है.
अख़बार के मुताबिक़ ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने हिब्रू (इसराइली ज़ुबान) में इसराइल को धमकाया है.
ख़ामेनेई ने इसराइल को संदेश देने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स का सहारा लिया है और यहाँ उन्होंने इसराइल की भाषा 'हिब्रू' में पोस्ट किया है.
यरूशलम पोस्ट ने पूरे मामले पर एक संपादकीय टिप्पणी छापी है. अख़बार ने लिखा है, ''नसरल्लाह के मारे जाने के बाद भी रॉकेट फायर बंद नहीं हुए हैं. इस समस्या का समाधान राजनयिक ही हो सकता है. लेबनान से लगी सीमा पर इसराइली अपने घरों में सुरक्षित तभी रहेंगे जब कोई राजनयिक समाधान निकलेगा.''
''लेबनान के मुद्दे पर इसराइल में सरकार और विपक्ष के बीच कोई मतभेद नहीं है. विपक्ष भी लेबनान में इसराइली सैनिकों की कार्रवाई का समर्थन कर रहा है. विपक्ष कह रहा है कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह की मौजूदगी मिटानी होगी. इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने भी कहा है कि अब बहुत हो गया है.''
पश्चिम के मीडिया में कहा जा रहा है कि बिन्यामिन नेतन्याहू जिस युद्ध में उलझे हुए हैं, उसका अंत निकट भविष्य में नहीं दिख रहा है.
द गार्डियन ने लिखा है, ''नेतन्याहू के पास इस युद्ध से निकलने का कोई ठोस प्लान नहीं दिख रहा है. इसराइल डिफेंस फोर्स ग़ज़ा में अभी लड़ रहा है. वेस्ट बैंक में भी जंग जारी है. यमन में भी हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू की है. लेबनान और ईरान से टकराव जारी ही है. इसराइल तभी रुक सकता है, जब उसे अमेरिका हथियार देना बंद कर दे.''
इसराइल के प्रमुख ऑनलाइन न्यूज़ वेबसाइट वाई नेट न्यूज़ डॉट कॉम ने ईरान-इसराइल संघर्ष पर एक लेख को जगह दी है.
इसमें कहा गया है कि ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल की प्रतिक्रिया इलाक़े में युद्ध को रोकने के लिहाज से सोची समझी होनी चाहिए.
इस लेख के मुताबिक़ इसराइल, ईरान के परमाणु ठिकानों या तेल ठिकानों पर हमला कर सकता है, लेकिन यह उसके और अमेरिका के हितों के ख़िलाफ़ होगा.
मंगलवार को ईरान का मिसाइल हमला हवाई अड्डों और डिमोना जैसे रणनीतिक इलाक़ों के आसपास था लेकिन वह सटीक नहीं था. ईरान को पता है कि इसराइल में उसके लिए लक्ष्य तक पहुँचना आसान नहीं है.

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ईरानी मीडिया में क्या छपा है?
ईरान की आधिकारिक न्यूज़ एजेंसी इरना के मुताबिक़ ईरान ने कहा है कि यहूदी शासन के ख़िलाफ़ ईरान ने आत्मरक्षा में मिसाइल हमला किया है.
इरना के मुताबिक़ है कि ईरानी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि ईरान के सशस्त्र बलों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 में ज़िक्र किए गए 'आत्मरक्षा' के मुताबिक़ टार्गेट, सैन्य और सुरक्षा ठिकानों पर मिसाइल हमलों का सिलसिला शुरू किया.
इरना की ख़बर के मुताबिक़ ईरान ने कहा कि ज़रूरी हुआ तो इस्लामी गणतंत्र ईरान अपने वैध हितों की रक्षा के लिए किसी भी सैन्य आक्रमण और बल प्रयोग के ख़िलाफ़ अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए ज़्यादा रक्षात्मक क़दम उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार है.
वहीं तेहरान टाइम्स ने ‘हम तैयार हैं’ की हेडिंग के साथ एक रिपोर्ट छापी है.

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ईरान का 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस'
तेहरान टाइम्स लिखता है कि आईआरजीसी (इस्लामिक रिवॉल्यूशन गार्ड कोर) ने कुछ ही घंटों के भीतर दो बयान जारी किए. इनमें इसराइली शासन के ख़िलाफ़ मिसाइल हमलों की ख़बरों को स्वीकार किया गया और घोषणा की गई कि मिसाइल हमलों में तेल अवीव के पास तीन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया था.
अख़बार के मुताबिक़ मंगलवार को ईरानी मिसाइल हमले को ऑपरेशन 'ट्रू प्रॉमिस' नाम दिया गया है.
तेहरान टाइम्स की एक अन्य ख़बर में कहा गया है कि ईरान ने अब तक इसराइल पर 400 बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. ये मिसाइलें इस्फ़हान, तबरीज़, खोरमाबाद, करज और अराक से दागी गई हैं.
आईआरजीसी ने एक बयान में कहा कि इसराइल के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई का निर्णय ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा लिया गया और दो महीने के "संयम" के बाद यह निर्णय लिया गया.
तेहरान टाइम्स ने लिखा है, ''इसराइली क़ब्ज़े वाले ठिकानों पर हुए ईरान के मिसाइल हमलों के बारे में ईरानी रक्षा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल अज़ीज़ नासिरज़ादेह ने बताया है कि इस ऑपरेशन की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई थी.''
''यह सैन्य मक़सद से किया गया ऑपरेशन था, जिसकी अंतरराष्ट्रीय वैधता थी और यह पूरी तरह से सफल रहा है. उन्होंने कहा कि यह हमला ईरान के मिसाइल अभियानों का "केवल पहला वेव" था. हमने अभी तक अपनी ज़्यादातर उन्नत मिसाइल क्षमताओं को तैनात नहीं किया है. अगर यहूदी शासन या उसके समर्थक इस क्षेत्र को युद्ध में घसीटना चाहते हैं, तो हम निश्चित तौर पर आगे ज़्यादा ताक़त से जवाब देंगे.''

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ईरान और इसराइल की दुश्मनी
इसराइल और ईरान में खूनी प्रतिद्वंद्विता सालों से चली आ रही है. इस प्रतिद्वंद्विता की तीव्रता भू राजनीतिक हालात पर घटती-बढ़ती रहती है. इसकी नब्ज़ मध्य-पूर्व में अस्थिरता के मुख्य स्रोतों में से एक बन गई है.
ईरान के लिए इसराइल के पास उसके अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ईरान के शासक इसराइल को 'छोटा शैतान' मानते हैं, जो मध्य-पूर्व में अमेरिका का सहयोगी है. अमेरिका को वो 'बड़ा शैतान' बताते हैं. ईरान चाहता है कि अमेरिका और इसराइल इस क्षेत्र से ग़ायब हो जाएं.
इसराइल ईरान पर चरमपंथी समूहों के वित्त पोषण और अयातुल्लाह के यहूदी-विरोधी भावना से प्रेरित होकर उसके हितों के खिलाफ हमला करने का आरोप लगाता है.
इन दो कट्टर दुश्मनों की प्रतिद्वंद्विता में बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं. यह अक्सर गुप्त कार्रवाइयों का परिणाम होता है. इसकी ज़िम्मेदारी कोई भी सरकार नहीं लेती है.
ग़ज़ा में जारी युद्ध ने हालात को और भी बदतर बना दिया है.
इसराइल और ईरान के संबंध 1979 तक काफ़ी सौहार्दपूर्ण थे. उस दौरान अयातुल्लाह ख़ुमैनी की तथाकथित इस्लामी क्रांति ने तेहरान में सत्ता हासिल की थी.
हालांकि इसने फ़लस्तीन के विभाजन की योजना का विरोध किया था. इसकी वजह से 1948 में इसराइल राष्ट्र का निर्माण हुआ था. तुर्की के बाद ईरान इसराइल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम बहुल देश था.
उस समय, ईरान पहलवी वंश के शाहों की ओर से शासित एक राजतंत्र था. वह मध्य-पूर्व में अमेरिका के मुख्य सहयोगियों में से एक था. इस वजह से इसराइल के संस्थापक और उसकी पहली सरकार के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन ने अपने अरब पड़ोसियों द्वारा नए यहूदी राज्य के प्रति ईरान की मित्रता की तलाश कर उसे हासिल किया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















