ग़ज़ा में जंग के बीच क्या सऊदी अरब और इसराइल की दोस्ती करा पाएगा अमेरिका?

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
- Author, सेनिया गोगिडिडज़े
- पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा
ग़ज़ा में युद्ध शुरू होने से पहले मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने के लिए मज़बूती से बात हो रही थी.
सऊदी अरब के इसराइल को मान्यता देने की तरफ़ मामला बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा था. उम्मीद थी कि जल्द एक फ़लस्तीनी राष्ट्र नक़्शे पर दिखाई देने लगेगा.
इसके बदले में अमेरिका.. सऊदी अरब को ईरान से पैदा होने वाले किसी भी ख़तरे की स्थिति में सुरक्षा की गारंटी देने की बात कर रहा था.
लेकिन 7 अक्टूबर को हमास ने इसराइल पर हमला कर दिया, जिसके बाद मध्य पूर्व में शांति बहाल करने को लेकर की जा रही सभी कोशिशों पर विराम लग गया.
हालांकि हाल के महीनों में अमेरिका और सऊदी अरब के राजनयिकों ने शांति समझौते की बात फिर से शुरू की है. सवाल है कि क्या ऐसा होने की कोई संभावना है?
ईरान.. हमास का समर्थक है और वह फ़लस्तीनियों को अपना समर्थन देने में गर्व महसूस करता है. वह इस बात को पसंद नहीं करता कि सऊदी अरब कभी भी इसराइल को मान्यता दे.
अमेरिका की कोशिश है कि वह सऊदी अरब को इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने और इसराइली पीएम नेतन्याहू को फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण के लिए सहमत होने के लिए राज़ी कर ले.
यह बड़ा समझौता न सिर्फ मध्य पूर्व में देशों के बीच संबंधों को पूरी तरह से बदल देता बल्कि यह अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के लिए भी विदेश नीति में एक बड़ी उपलब्धि साबित होगा और इसका फ़ायदा वे आगामी राष्ट्रपति चुनावों में उठाते.
इसके बाद क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अपने उन महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की तरफ़ लौटता, जिन पर वह भविष्य की सोच आगे रखकर काम कर रहा है. साथ ही वे अपने देश को पर्यटन का केंद्र बनाने की तरफ़ ध्यान देते.
इसके अलावा मध्य पूर्व में इसराइल को एक शक्तिशाली सहयोगी मिलता, जो ईरान के साथ किसी भी मुश्किल स्थिति में सऊदी अरब की मदद करता.
लेकिन यह योजना अधूरी रह गई और अब इसे पूरा करने में पहले से कई अधिक चुनौतियां हैं.
क्या हैं चुनौतियां

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
पहली सबसे बड़ी मुश्किल इसराइल-ग़ज़ा युद्ध है और ऐसे समय पर भविष्य की बात करने का कोई मतलब नहीं है.
दूसरी मुश्किल इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू हैं. वे साफ़तौर पर कई बार फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण का विरोध कर चुके हैं.
तीसरी मुश्किल अमेरिकी संसद है, जिसे सऊदी अरब के साथ संभावित समझौते पर मुहर लगानी होगी.
और इस बीच समय तेज़ी से भाग रहा है. बाइडन जल्दी में हैं और वे इसे राष्ट्रपति चुनाव से पहले पूरा कर लेना चाहते हैं.
फ़लस्तीनी मुद्दा सभी के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है. कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो इसराइली पीएम नेतन्याहू इस बात पर अड़े हुए हैं कि फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता नहीं देंगे. उन्हें डर है कि ऐसा कर वे अपने अति-राष्ट्रवादी गठबंधन सहयोगियों का समर्थन खो देंगे.
अगर ऐसा हुआ तो इसराइल में फिर से चुनाव होंगे और नेतन्याहू को डर है कि वे इसमें हार सकते हैं.
वहीं दूसरी तरफ़ सऊदी क्राउन प्रिंस भी फ़लस्तीनी मुद्दे पर अड़े हुए हैं. उनका कहना है कि फ़लस्तीनी मुद्दे के समाधान के बिना स्थिति सामान्य नहीं हो सकती.
अमेरिका भी फ़लस्तीनी राष्ट्र को समझौते के केंद्र में रखता है. युद्ध के बाद ग़ज़ा का भविष्य शांति बहाल करने के लिए अरब देशों की भागीदारी और इसराइल के साथ संबंधों पर निर्भर करता है.
हमास के हमले और बड़े पैमाने पर युद्ध की शुरुआत से पहले सऊदी अरब ने निजी बातचीत में यह साफ़ कर दिया था कि अगर इसराइल कम से कम फ़लस्तीनी राष्ट्र बनाने की दिशा में बढ़ने का वादा करता है तो वह संबंध सामान्य करने के लिए तैयार होगा.
ग़ज़ा युद्ध और हज़ारों लोगों की मौत ने अब शांति की अहमियत को और ज़्यादा बढ़ा दिया है.
सऊदी अरब में रहने वाले इसराइल और सऊदी अरब संबंधों के विश्लेषक अज़ीज़ अल्गाशियान कहते हैं कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सऊदी अरब ने इसराइल के साथ भविष्य में संबंधों को सामान्य करने के लिए इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष के समाधान को शर्त बनाया है लेकिन अब ग़ज़ा में जो हालात हैं, उससे दोनों पक्षों को अब पहले से ज़्यादा क़ीमत चुकानी होगी.
अपने अरब सहयोगियों के चलते अब क्राउन प्रिंस फ़लस्तीनी मुद्दे को पीछे धकेलने में असमर्थ होंगे. हालांकि समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने फ़रवरी महीने में लिखा था कि इसराइल से बिना किसी ठोस प्रतिबद्धता के भी सऊदी अरब संबंध सामान्य करने के लिए सहमत होगा.
एजेंसी का कहना था कि इसराइल का फ़लस्तीनी राष्ट्र की दिशा में एक छोटा सा वादा भी सऊदी अरब के लिए काफ़ी होगा.
रफ़ाह हमले ने बढ़ाई चिंता

इमेज स्रोत, Getty Images
अब अमेरिका और सऊदी अरब, दोनों के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ युद्ध को ख़त्म करना और लंबे समय के लिए संघर्ष विराम के लिए सहमति बनाना है.
वहीं दूसरी तरफ ग़ज़ा में युद्ध जारी है. अमेरिका के बार-बार मना करने के बावजूद इसराइल, रफ़ाह में एक नया ज़मीनी हमला करने की बात कर रहा है, जिसके चलते उसने वहां रहने वाले क़रीब एक लाख लोगों को अपनी जगह छोड़ने का आदेश दिया है. इसके बाद संघर्ष विराम की संभावना पहले से कहीं अधिक मुश्किल हो गई है.
इसी हफ़्ते मिस्र में इसराइल और हमास के बीच चल रही शांति वार्ता भी बेनतीजा रही है. रफ़ाह के फ़लस्तीनी हिस्से पर क़ब्ज़ा करने से हमास ग़ुस्सा है.
इसराइली सार्वजनिक रेडियो स्टेशन कान के मुताबिक़ मई की शुरुआत में अमेरिकी अधिकारियों ने इसराइल को यह तय करने के लिए एक महीने का समय दिया था कि वह सऊदी अरब के साथ संबंध सामान्य करेगा या नहीं?
न्यूयॉर्क टाइम्स में स्तंभकार थॉमस फ्रीडमैन ने इस स्थिति को समझाते हुए लिखा कि इसराइल को रफ़ाह और रियाद (सऊदी अरब की राजधानी) के बीच एक को चुनना होगा.
इसराइल का कहना है कि वह रफ़ाह में सीमित हमला कर रहा है. अमेरिका ने पहले इस बात पर ज़ोर दिया था कि रफ़ाह पर किया गया बड़ा सैन्य हमला बातचीत की संभावना को ख़त्म कर देगा.
क्या चाहता है सऊदी अरब

इमेज स्रोत, Reuters
सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंधों को सामान्य करने के लिए यह बातचीत पिछले साल गर्मियों में सक्रिय रूप से शुरू हुई थी, जो मध्य पूर्व को बदल सकती है.
अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी के बदले सऊदी अरब.. इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने और इसराइल.. द्विराष्ट्र के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए सहमत हुआ .
हालांकि कई विश्लेषकों और राजनयिकों ने इस तरह के समझौते पर हस्ताक्षर होने को लेकर संदेह जताया था. अब की तुलना में उस वक़्त वह संभावित समझौता वास्तविकता के बहुत क़रीब था.
ब्लूमबर्ग ने सूत्रों का हवाला देते हुए मई की शुरुआत में लिखा था कि नेतन्याहू की मज़बूत स्थिति के कारण सऊदी अरब और अमेरिका ‘प्लान बी’ लेकर आए थे.
इस योजना के मुताबिक़ इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य करने की बात किए बिना सऊदी अरब और अमेरिका के बीच में एक सैन्य समझौते की बात थी.
साथ ही अमेरिका ने भविष्य में क्राउन प्रिंस को चीन, ईरान और रूस से दूर कर पश्चिमी सहयोगियों के ज़्यादा क़रीब लाने के लिए मनाने की योजना बनाई.
लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सऊदी अरब असल में वैसा ही काम करेगा जैसा अमेरिका चाहता है.
जैसा कि यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस (ईसीएफ़आर) के फ़ैलो सिंज़िया बियान्को लिखते हैं कि सऊदी अरब, अमेरिका के साथ ख़ास रिश्ते नहीं बनाना चाहते हैं.
वे डिजिटल या साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में चीन के साथ सहयोग को सीमित करने या रोकने के लिए तैयार हैं लेकिन चीनी मुद्रा में तेल व्यापार जैसी चीज़ों में संबंध तोड़ने के लिए सहमत नहीं होंगे.
क्राउन प्रिंस, भविष्य के सऊदी अरब का निर्माण कर रहे हैं. वे किसी भी संघर्ष से दूर रहना चाहते हैं फिर वह चाहे धार्मिक हो, नस्लीय संघर्ष या फिर देशों के बीच हो.
तनाव और अस्थिरता वे चीज़ें है जो निवेश को रोकती हैं इसलिए क्राउन प्रिंस व्यावहारिक रूप से काम करते हैं और वे क्षेत्र में सिर्फ़ एक भागीदार पर भरोसा नहीं करना चाहते हैं.
पिछले साल गर्मियों में चीन की मध्यस्थता के ज़रिए सऊदी अरब अपने कट्टर दुश्मन ईरान के साथ और सीरिया के साथ राजनयिक संबंधों को फिर से शुरू करने पर सहमत हुआ था. इससे पहले भी सऊदी अरब ने क़तर और तुर्की के साथ शांति कायम की थी.
सितंबर 2023 में यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस ने एक सर्वे किया था. इसके मुताबिक़ 77 प्रतिशत सऊदी लोगों का मानना है कि अमेरिका और चीन, दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे जाने चाहिए.
हालांकि सर्वे में शामिल आधे से ज़्यादा लोगों ने अगले पांच सालों के अंदर अमेरिका और चीन के बीच सैन्य टकराव की आशंका जताई है.
जब लोगों से पूछा गया कि इस स्थिति में सऊदी अरब को किसका समर्थन करना चाहिए? तो 50 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका और 39 प्रतिशत लोगों ने चीन का नाम लिया.
अमेरिका-सऊदी अरब समझौता

इमेज स्रोत, Getty Images
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच जो द्विपक्षीय समझौता है, उसमें रक्षा क्षेत्र में सहयोग का मुद्दा भी शामिल है. अमेरिका सऊदी अरब को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा में क्षमता विकसित करने में मदद पर सहमति देगा.
इतना ही नहीं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आर्थिक सहयोग पर भी दोनों देशों के बीच समझौता होना है. इस समझौते के तहत सऊदी अरब में अमेरिकी मदद से सेमीकंडक्टर का उत्पादन भी होना है.
इसके एवज़ में सऊदी अरब को अमेरिका से ये वादा करना है कि वो चाइनीज़ टेक्नोलॉजी की सीमित ख़रीदारी करेगा. सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम को विकसित करने में मदद के एवज़ में अमेरिका को वहां संवर्धित होने वाले यूरेनियम तक पहुंच हासिल होगी.
इससे पश्चिमी देशों की रूस पर इसकी सप्लाई के लिए निर्भरता कम होगी. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अमेरिकी डिप्लोमैट्स सऊदी अरब के साथ इस द्विपक्षीय समझौते पर दस्तख़त करने के लिए तैयार हैं. एक बार ये समझौता हो जाएगा तो इसराइल को इसमें शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया जाएगा.
अप्रैल के आख़िर में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने सऊदी अरब में कहा था, "सऊदी अरब और अमेरिका ने इस समझौते की दिशा में जो प्रगति की है, उससे ये पूरा होने के क़रीब पहुंचा है. स्थिति सामान्य होने की दिशा में क़दम बढ़ाने के लिए दो चीज़ों की ज़रूरत है- ग़ज़ा में अमन और फ़लस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए एक भरोसेमंद रास्ते का चुनाव."
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने भी कहा, "हम समझौते के बहुत क़रीब हैं."
लेकिन यहां सब कुछ सामान्य नहीं लगता है. बाइडन प्रशासन भले ही प्लान बी पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो जाए, इस बात की संभावना कम ही है कि वो कांग्रेस को इसके लिए राज़ी कर पाएंगे.
रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर लिंड्से ग्राहम ने यरूशलम पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि कांग्रेस सऊदी अरब के साथ किसी भी ऐसे समझौते को मंज़ूरी नहीं देगी जिसमें इसराइल शामिल न हो.
"इसराइल को किनारे रखकर सऊदी अरब और अमेरिका के बीच हुए किसी रक्षा समझौते को सीनेट में 67 वोट नहीं मिलेंगे."
अमेरिकी रक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने फ़ाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में ये भरोसा दिलाने की कोशिश की बाइडन प्रशासन रियाद के साथ ऐसे किसी समझौते पर दस्तख़त नहीं करेगा जिसमें इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य करने का वादा न लिया गया हो.
उन्होंने कहा कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच जो सहमति बनेगी उसमें रियाद और तेल अवीव के बीच संबंधों को सामान्य करने की बात और फ़लस्तीनी लोगों के लिए सार्थक क़दम उठाने का मुद्दा शामिल होगा.
जेक सुलिवन ने कहा, "ये एक साथ होगा... ये नामुमकिन है कि एक मुद्दे को दूसरे से अलग कर दिया जाए."
हाल के महीनों में ऐसी कई रिपोर्टें आई हैं जिनमें ये दावा किया गया है कि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच होने वाले द्विपक्षीय समझौते से इसराइल को अलग रखा जाएगा.
इस पर कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ये बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार पर दबाव बनाने के लिए ऐसी ख़बरें लीक कराई जा रही हैं ताकि वो अमेरिका की छत्रछाया में सऊदी अरब के साथ बड़ा समझौता करने के लिए तैयार हो जाएं.
कड़ा रुख़

इमेज स्रोत, Getty Images
सात अक्टूबर, 2023 को किए गए हमास के हमले से पहले भी बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार फ़लस्तीन के मुद्दे पर कोई बड़ी रियायत देने के पक्ष में तैयार नहीं थी.
बिन्यामिन नेतन्याहू कई बार अलग फ़लस्तीनी राज्य के विचार को सीधे तौर पर ख़ारिज कर चुके हैं.
फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ स्टीफ़नी लैटे अब्दुल्ला कहती हैं, "नेतन्याहू इस संघर्ष का कोई हल नहीं चाहते हैं. उनके सामने सबसे बड़ा मुद्दा अपने सियासी वजूद को बचाए रखने का है."
अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक चैटम हाउस, द रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स के विशेषज्ञ बिलाल साब लिखते हैं, "जब भी फ़लस्तीनी राज्य के गठन की बात आती है, बिन्यामिन नेतन्याहू शायद ही कभी ये जताने से चूकते हैं कि वो इसके ख़िलाफ़ हैं. नेतन्याहू का पूरा ध्यान इस जंग को जारी रखकर अपने सियासी वजूद को बचाए रखने पर है."
"वे नाराज़ इसराइली लोगों को शांत रखने की कोशिश कर रहे हैं. वे ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि जैसे ही जंग रुकेगी, जनता उन्हें सात अक्टूबर, 2023 को हुए हमास के हमले को रोकने में हुई उनकी नाकामी के लिए सज़ा देगी."
लेकिन अतीत में अमेरिकी दबाव में बिन्यामिन नेतन्याहू को अपने रुख़ पर नरम पड़ते हुए देखा जा चुका है.
14 अप्रैल को जब ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया तो अमेरिका समेत कुछ पश्चिमी और अरब देशों की मदद से हालात को बिगड़ने से पहले संभाल लिया गया.
इस पहल में फ्रांस, ब्रिटेन और जॉर्डन भी शामिल थे.
इसी वजह से ये माना जा रहा है कि अमेरिका शायद इसराइल को सऊदी अरब के साथ संबंध सामान्य करने के लिए तैयार कर ले ताकि अरब जगत में साझा ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए तेल अवीव और रियाद के बीच संभावित सैन्य सहयोग का रास्ता खुल जाए.
इसराइल के पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र चक फ्रीलिक ने इसराइली न्यूज़ वेबसाइट हारेट्ज़ के लिए अपने कॉलम में लिखा है, "अमेरिका के नेतृत्व में ये समझौता तेल अवीव और वॉशिंगटन दोनों के लिए जीत होगी. इससे मध्य पूर्व में एक सिक्योरिटी आर्किटेक्चर का उदय होगा जो ईरान, हमास, हिज़बुल्लाह और अन्य आतंकवादी समूहों के 'एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस' का मुक़ाबला करेगा."
चक फ्रीलिक का सुझाव है कि बाइडन प्रशासन सऊदी अरब और अमेरिका के बीच होने वाले सैनिक समझौते को पूरा करने के लिए नेतन्याहू को निमंत्रण देकर उनके लिए स्थितियां अनुकूल कर सकता है.
वे कहते हैं कि इसके लिए बाइडन प्रशासन की तीन चरणों वाली योजना में एक पॉइंट और जोड़ा जा सकता है. इसमें इसराइल हमास के बीच समझौता, युद्ध की समाप्ति, बंधकों की रिहाई और सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंधों को सामान्य करने के सब मुद्दे आ जाएंगे.
रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर लिंड्से ग्राहम भी इसराइल को दिए गए अमेरिकी ऑफ़र को एक अच्छा अवसर मानते हैं.
उनका कहना है, "इसराइल की पहली प्राथमिकता बंधकों की रिहाई है. लेकिन इसराइल की दीर्घकालीन सुरक्षा के नज़रिये से देखें तो सऊदी अरब और इसराइल के बीच का कोई समझौता इसराइली राष्ट्र के गठन से अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि ही मानी जाएगी."
अगर इसराइल में सत्तारूढ़ धुर दक्षिणपंथी गठबंधन की सरकार गिर जाती है और नए चुनाव होते हैं तो मुमकिन है कि बिन्यामिन नेतन्याहू की पार्टी इलेक्शन हार जाए.
नेतन्याहू की जगह भविष्य में इसराइल की बागडोर जिनके हाथ में जा सकती है, उनमें नेशनल यूनिटी पार्टी के प्रमुख और नेतन्याहू की मिलिट्री कैबिनेट के सदस्य बेनी गैट्ज़ प्रमुख नाम हैं.
बेनी गैट्ज़ भी रियाद के साथ इसराइल के समझौते के प्रबल समर्थक हैं.
अप्रैल में बेनी गैट्ज़ ने कहा था कि इसराइल सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करने और ग़ज़ा पट्टी में उदारवादी अरब देशों के साथ सिक्योरिटी शेयरिंग एग्रीमेंट के क़रीब है.
उन्होंने तब ये कहा था कि ये हमास को बेदखल करने की कोशिश का हिस्सा है.
हालांकि फ़लस्तीनी राज्य के भविष्य को लेकर उन्होंने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा. लेकिन उनकी कुछ गतिविधियों से ये संकेत मिलते हैं कि वे इस विचार को ख़ारिज करने के लिए तैयार नहीं हैं.
जब वे इसराइल के रक्षा मंत्री थे तो उन्होंने फ़लस्तीनी प्राधिकरण के नेता महमूद अब्बास से कई बार मुलाक़ातें की थीं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















