सऊदी अरब में खुलेगी शराब की पहली दुकान, क्या इस्लामिक पहचान पड़ेगी कमज़ोर?

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सऊदी अरब ने कहा है कि वह रियाद में ग़ैर-मुस्लिम प्रवासियों के चुनिंदा समूह को शराब बेचने के लिए एक दुकान खोलेगा.

70 साल में यह पहली बार होगा, जब सऊदी अरब में शराब बिकेगी. रियाद में इस शराब की दुकान के ग्राहक सीमित डिप्लोमैटिक स्टाफ़ होंगे.

ये डिप्लोमैटिक स्टाफ़ सालों से सीलबंद आधिकारिक पैकेज आयात करते रहे हैं. इसे डिप्लोमैटिक पाउच कहा जाता है.

सऊदी के अधिकारियों का कहना है कि यह दुकान शराब के अवैध व्यापार को रोकेगी. सऊदी अरब में शराब पर प्रतिबंध 1952 से है, तब किंग अब्दुल अज़ीज़ के बेटे ने शराब के नशे में एक ब्रिटिश डिप्लोमैट की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

समाचार एजेंसी एएफ़पी और रॉयटर्स ने जो दस्तावेज़ देखे हैं, उनके मुताबिक़ शराब का यह नया स्टोर रियाद के डिप्लोमैटिक क्वॉर्टर में होगा.

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क्या हैं पैमाने?

शराब बेचने की योजना से वाकिफ अधिकारियों ने रॉयटर्स से बताया कि दुकान कुछ हफ़्तों में खुल सकती है.

हालाँकि दुकान को लेकर कुछ सीमाएं हैं-

  • शराब की तलब वाले राजनयिकों को पहले रजिस्ट्रेशन कराना होगा और फिर सरकार से क्लियरेंस मिलेगी
  • शराब के स्टोर में 21 साल से कम उम्र के लोगों को आने की इजाज़त नहीं होगी और दुकान के भीतर हमेशा उचित पोशाक की ज़रूरत होगी
  • शराब पीने वाले किसी और से शराब नहीं मंगवा सकते हैं. जैसे अपने ड्राइवर से शराब नहीं मंगवा सकते हैं
  • बयान के मुताबिक़ शराब ख़रीदने की मासिक सीमा होगी
  • हालांकि एएफ़पी ने जो दस्तावेज़ देखे हैं, उसके मुताबिक़ ये नियम सख़्त नहीं होंगे
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रजिस्टर्ड ग्राहकों को हर महीने 240 'पॉइंट्स' शराब मिलेगी. एक लीटर स्पिरिट्स को छह पॉइंट मापा जाएगा. एक लीटर वाइन को तीन पॉइंट्स के रूप में देखा जाएगा और एक लीटर बीयर एक पॉइंट में.

यह नहीं बताया गया है कि आम विदेशियों को भी शराब मिलेगी या डिप्लोमैट्स तक ही सीमित रहेगी. शराब रियाद के जनजीवन का हिस्सा बन जाएगी लेकिन शराबियों के लिए सबसे अहम यह होगा कि कहाँ पीते हैं और पीने के बाद कैसा व्यवहार करते हैं.

अभी सऊदी अरब में शराब पीने या रखने के लिए जुर्माना, क़ैद, सार्वजनिक रूप से कोड़े और अनाधिकृत विदेशियों को वापस भेजने का क़ानून है.

शराब नीति से जुड़े नए दस्तावेजों के मुताबिक़ सऊदी प्रशासन नए नियम पर काम कर रहा है. नए नियम के तहत शराब की ख़ास मात्रा लाने की अनुमति होगी. इससे शराब के अनियंत्रित लेन-देन पर रोक लगेगी.

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जब प्रिंस ने मारी ब्रिटिश डिप्लोमैट को गोली

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सालों से डिप्लोमैटिक स्टाफ़ अपना पाउच इस्तेमाल करते हैं और सऊदी प्रशासन इस मामले में कोई दखल नहीं देता है. सऊदी अरब के इस रुख़ को भी उसके 'विजन 2030' के आईने में देखा जा रहा है.

सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस विज़न के तहत सख़्त नियमों को उदार बना रहे हैं. खाड़ी के दूसरे देशों में भी शराब को लेकर ऐसी ही नीति है.

हालाँकि यूएई और क़तर में 21 से ऊपर की उम्र वाले ग़ैर-मुस्लिमों को होटल, क्लब और बार में शराब बेचने की अनुमति है. सऊदी अरब के दस्तावेज़ में अभी यह नहीं बताया गया है कि वह भी यूएई और क़तर की तरह ही करेगा या नहीं. इस्लाम में शराब हराम है. सऊदी अरब का 1952 तक शराब को लेकर एक किस्म का समझौतावादी रुख़ था.

लेकिन 1951 में प्रिंस मिशारी बिन अब्दुल अज़ीज़ अल-साऊद ने जेद्दा में ब्रिटिश राजयिक सिरिल उस्मान की गोली मारकर हत्या कर दी थी. ऐसा उन्होंने एक फंक्शन में और शराब देने से इनकार करने पर किया था. इस घटना के एक साल बाद किंग अब्दुल अज़ीज़ ने शराब को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया था. मिशारी को हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था.

इससे पहले महिलाओं को मिला था ड्राइविंग का अधिकार

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2018 में सऊदी अरब में पहली बार महिलाओं को लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. 2018 जून में पहली बार 10 महिलाओं को लाइसेंस दिए गए थे.

इसी साल सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने महिलाओं पर लगे ड्राइविंग बैन को हटाने का ऐतिहासिक फैसला लिया था.

2018 में 24 जून से सऊदी अरब में महिलाएं सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाती नज़र आई थीं.

महिलाओं को गाड़ी चलाने का हक़ देने का ये क़दम रूढ़िवादी देश को आधुनिक बनाने के लिए क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के उदारीकरण अभियान के तहत उठाया जा रहा है.

हालांकि इन क़दमों के बावजूद क्राउन प्रिंस को आलोचना का सामना भी करना पड़ रहा है.

दरअसल सऊदी की जिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने वहां की महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार दिलाने के लिए अभियान चलाए थे, उन्हें सऊदी की सरकार ने बाहरी ताक़तों से संबंध होने के आरोप लगाकर हिरासत में ले लिया है.

विज़न 2030 की घोषणा 2016-17 में की गई थी. इस योजना का मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था की तेल निर्यात पर निर्भरता को कम कर के उसमें विविधता लाना है.

देश में दूसरे उद्योगों को विकसित करना, पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना और नीजी उद्योगों को बढ़ावा देना है ताकि वो देश में अधिक रोज़गार पैदा कर सकें और सरकार पर से यह बोझ कम हो.

क्या इस्लामिक पहचान से दूर जा रहे हैं क्राउन प्रिंस?

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38 साल के मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस हैं. क्राउन प्रिंस पिछले सात सालों से मुल्क का नेतृत्व कर रहे हैं.

क्राउन प्रिंस ने अपने नेतृत्व में सऊदी अरब में कई ऐसे फ़ैसले किए जिनकी तारीफ़ हुई और कहा गया कि एमबीएस सऊदी अरब को एक इस्लामिक रूढ़िवादी मुल्क से आधुनिक देश बना रहे हैं.

साल 2016 में क्राउन प्रिंस ने विज़न 2030 से पर्दा हटाया था. इस विज़न के तहत कई तरह के सुधार शुरू किए गए. उन्होंने सऊदी को और अधिक खुला बनाया. क्राउन प्रिंस ने सिनेमा और कंसर्ट से पाबंदी हटाई.

यहाँ तक कि हिप-हॉप कलाकारों को भी बुलाया गया. महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार मिला और उनके लिबास को लेकर भी उदारता दिखाई गई.

क्राउन प्रिंस ने प्रतिक्रियावादी मौलवियों की भूमिका सीमित की. धार्मिक पुलिस को ख़त्म किया. इसके साथ ही एमबीएस ने इसराइल से संबंध ठीक करने की गुंजाइश भी तलाशी.

अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक ने सऊदी क्राउन प्रिंस से 2022 में पूछा था कि क्या वह सऊदी अरब को इतना आधुनिक बनाएंगे कि उसकी इस्लामिक पहचान कमज़ोर पड़ जाए?

इस सवाल के जवाब में क्राउन प्रिंस ने कहा था, ''दुनिया में हर देश की स्थापना अलग-अलग विचारों और मूल्यों के आधार पर हुई है. मिसाल के तौर पर अमेरिका लोकतंत्र, स्वतंत्रता और मुक्त अर्थव्यवस्था जैसे मूल्यों के आधार पर बना है. लोग इन्हीं मूल्यों के आधार पर एकजुट रहते हैं. लेकिन क्या सभी लोकतंत्र अच्छे हैं? क्या सभी लोकतंत्र ठीक से काम कर रहे हैं? निश्चित तौर पर नहीं.''

''हमारा मुल्क इस्लाम के मूल्यों और विचारों की बुनियाद पर बना है. इसमें क़बाइली संस्कृति है, अरब की संस्कृति है. साथ ही सऊदी की संस्कृति और मान्यताएं हैं. यही हमारी आत्मा है. अगर हम इसे छोड़ देते हैं तो देश नष्ट हो जाएगा. हमारे लिए सवाल यह है कि सऊदी अरब को विकास और आधुनिकीकरण के सही रास्ते पर कैसे लाया जाए. इसी तरह के सवाल अमेरिका के लिए हैं कि कैसे लोकतंत्र, मुक्त बाज़ार और स्वतंत्रता को सही रास्ते पर रखा जाए. यह सवाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ये ग़लत रास्ते पर जा सकते हैं.''

''इसलिए हम अपने मूल्यों से दूर नहीं होंगे क्योंकि यही हमारी आत्मा है. सऊदी अरब में पवित्र मस्जिदें हैं और इन्हें कोई हटा नहीं सकता. हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि ये पवित्र मस्जिदें हमेशा रहें और हम मुल्क को सऊदी के लोगों के लिए, इस इलाक़े के लिए सही रास्ते रास्ते पर रखना चाहते हैं. शांति और सह-अस्तित्व के आधार पर हम चाहते हैं कि बाक़ी दुनिया में चीज़ों को जोड़ें.''

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