खानाबदोश बद्दू समूह से एक देश कैसे बना सऊदी अरब

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- Author, सईदुल इस्लाम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, ढाका
हिमयुग खत्म होने के बाद करीब 15 से 20 हज़ार साल पहले सऊदी अरब के रेगिस्तान में इंसानों की बसावट शुरू हुई थी.
इस्लाम धर्म के प्रचार के बाद वह खलीफा का मुख्य केंद्र था. लेकिन वह बहुत दिनों तक स्थायी नहीं रहा.
सीरिया, इराक़ और तुर्की से सऊदी अरब पर शासन किया जाता रहा है. इसके काफी सालों तक तीन बार प्रयास करने के बाद मौजूदा सऊदी अरब एक स्वाधीन राष्ट्र के तौर पर अस्तित्व में आया.
यायावर बद्दू देश

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यह क्षेत्र विभिन्न बद्दू जनजातियों का खानाबदोश क्षेत्र था. यहां तमाम जनजातियां आज़ादी से रहती थीं.
जेम्स वेनब्रांट ने अपनी पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ सऊदी अरेबिया' में लिखा है, मौजूदा बहरीन और आस-पास के तटवर्ती इलाकों में ईसा पूर्व 32वीं शताब्दी में दिलमुन नामक एक सभ्यता विकसित हुई थी.
उस समय एक अन्य शहर मेगान (मौजूदा ओमान) बेबीलोन और सिंधु नदी घाटी में मेसोपोटामिया जैसे शहरों के साथ उनका व्यापार और वाणिज्य होता था. दिलमुन उस समय मोती के लिए दुनियाभर में मशहूर था. तब यमन को साबा या सेबा के नाम से जाना जाता था. इसी तरह जॉर्डन का नाम नाबातायेन था.
लेकिन अरब घाटी के लोग हमेशा खुद को अल-अरब या अरबों का द्वीप कहते थे. लेकिन यह नहीं पता चल सका कि वे खुद को अरब क्यों कहते थे. हालांकि उनमें से ज्यादातर रेगिस्तान के खानाबदोश थे. उनको बद्दू कहा जाता था.
बद्दू समुदाय के लोग इस्लाम से पहले के समाज में कई गुटों या जातियों में बंटे थे. इन सबका अपना अलग शासन और रीति-रिवाज था.
जेम्स वेनब्रांट ने लिखा है कि ईसा पूर्व से लेकर दूसरी शताब्दी तक इनमें से ज्यादातर गुटों पर रोम का शासन था. हालांकि बाद में उन्होंने इस अधिकार को मानने से इंकार कर दिया. बद्दू जनजाति के लोगों ने तीसरी शताब्दी में एकजुट होकर एक बड़ा आदिवासी संघ बनाया जिससे उनकी ताकत और बढ़ गई. उन्होंने पांचवीं शताब्दी में सीरिया, फ़लस्तीन और यरुशलम पर हमले भी किए.
मुसलमानों के कब्जे़ में कब आया मक्का

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इस्लाम धर्म के प्रचार के बाद साल 630 में मक्का मुसलमानों के कब्ज़े में आया. उसी समय से मदीना से इस्लाम का प्रचार शुरू हुआ और विभिन्न इलाके मुसलमानों के नियंत्रण में आने लगे.
इस्लाम के आख़िरी पैग़ंबर मोहम्मद के निधन तक लगभग पूरा अरब क्षेत्र मुसलमानों के नियंत्रण में आ चुका था. उस समय तक अरब के बद्दू गुट इस्लाम के छाते के नीचे आ गए थे. उन्होंने आपस में मारपीट छोड़कर इस्लाम धर्म के चौतरफ़ा प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया.
अगले एक सौ साल के भीतर इस्लाम धर्म स्पेन, भारत समेत दुनिया के तमाम हिस्सों में फैल गया. लेकिन उसके साथ ही इस्लामी साम्राज्य का केंद्र या राजधानी अरब इलाके से हट कर पहले दमिश्क और फिर बगदाद हो गया.
उस समय अरब इलाका हेजाज़ और नजद नामक दो हिस्सों में बंटा था. पश्चिमी तट वाला इलाका हेजाज था. उसमें मक्का, मदीना और जेद्दा जैसे शहर हैं. विभिन्न दौर में उमाइद, अब्बासिद, मिस्त्र और ऑटोमन ने इस इलाके पर शासन किया है.
रेगिस्तान और पर्वतीय इलाका नजद के नाम से जाना जाता था. वहां खानाबदोश और युद्धप्रेमी बद्दू जनजाति के लोग रहते थे. इस इलाके में रियाद जैसे शहर हैं. इस इलाके पर कभी विदेशी ताकत का शासन नहीं रहा. यह लोग हमेशा खुद को आज़ाद मानते रहे हैं.
उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य
साल 1557 में उस्मानी शासक सुलेमान सलीम प्रथम के हाथों सीरिया और मिस्र में सत्तारूढ़ मामलुकों की पराजय के बाद तुर्कों ने हेजाज़ पर नियंत्रण हासिल कर लिया.
सुल्तान सलीम ने खुद को मक्का का रक्षक घोषित कर दिया. सुल्तान सलीम ने बाद में लाल सागर के किनारे बसे दूसरे अरब इलाकों तक तुर्की साम्राज्य का विस्तार किया. लेकिन इसके बावजूद अरब का एक बड़ा हिस्सा आज़ाद ही रह गया.
पहले और दूसरे दौर का सऊदी राष्ट्र

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मुहम्मद बिन सऊद ने 1744 में सऊदी अरब में पहला राष्ट्र स्थापित किया. उस समय वे अरब के धार्मिक नेता मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की मदद से रियाद के पास दिरिया नामक इलाके में रहने वाली एक जनजाति के प्रमुख थे. उन्होंने उस्मान के शासन से अलग होकर दिरिया अमीरात नामक एक साम्राज्य बनाया था, जो इतिहास में पहला सऊदी राज्य था. हालांकि वह एक शहरी राज्य जैसा था.
जेम्स वेनब्रांट ने ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ सऊदी अरेबिया’ नामक पुस्तक में लिखा है, मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब को अपने आदर्श का प्रचार करने के लिए सैन्य समर्थन की ज़रूरत थी. उधर, मोहम्मद बिन सऊद को स्वाधीन अरब राष्ट्र के गठन के लिए धार्मिक समर्थन की ज़रूरत थी. उन दोनों ने मिल कर नजद को एकजुट करने की पहल की.
मोहम्मद इब्न सऊद के उत्तराधिकारी अब्दुल अल-अज़ीज़ ने बाद में ऑटोमन शासकों को पराजित कर इराक़ के कर्बला समेत कुछ इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया. उस समय विवाह के ज़रिए नजद और हेजाज़ में एकता हुई.
इसके बाद साल 1803 में एक जानलेवा हमले में उनके निधन के बाद पुत्र सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ ने मक्का और मदीना पर भी कब्ज़ा कर लिया था. लेकिन तुर्क लोगों के निरंतर हमले के कारण वह राष्ट्र कायम नहीं रह सका.
साल 1818 में दिरिया पर फिर तुर्कों का कब्ज़ा हो गया. सात महीने चले अवरोध के अंत में अब्दुल्ला इब्ने सऊद ने मिस्र के सैन्य कमांडर इब्राहिम पाशा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. बाद में कॉन्स्टेंटिनोपल में उनका सिर कलम कर दिया गया.
तुर्की के इब्ने अब्दुल्ला इब्ने मुहम्मद इब्ने सऊद ने दूसरी बार सऊदी राष्ट्र की स्थापना की थी. वे दिरिया अमीरात के अंतिम शासक अब्दुल्ला के चचेरे भाई थे.
पहले सऊदी राष्ट्र के पतन के बाद उन्होंने अल सऊद परिवार के कई अन्य सदस्यों के साथ भाग कर रेगिस्तान में एक जनजाति के पास शरण ली थी.
मादाबी अल रशीद ने ‘ए हिस्ट्री आफ सऊदी अरेबिया’ नामक पुस्तक में लिखा है, “उन्होंने 1823 में तुर्की और मिस्र के खिलाफ युद्ध शुरू किया और रियाद और दिरिया पर दोबारा कब्जा कर लिया. उन्होंने रियाद को राजधानी बनाते हुए नजद अमीरात नामक दूसरे सऊदी राष्ट्र की घोषणा कर दी. लेकिन वह भी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सके. एक चचेरे भाई ने 1834 में उनकी हत्या कर दी. इसके बाद 1891 में दूसरे सऊदी राष्ट्र का भी पतन हो गया. उसके अंतिम शासक अब्दुल रहमान बिन फ़ैसल ने अपने बेटे अब्दुल अज़ीज़ के साथ मूररा नामक एक बद्दू जनजाति के पास शरण ली थी.”
मौजूदा सऊदी अरब

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अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल रहमान बिन फ़ैसल, जो इब्ने सऊद के नाम से ही ज्यादा लोकप्रिय हैं, ने साल 1902 में रियाद पर कब्ज़े के बाद तीसरी बार सऊदी राष्ट्र की स्थापना की थी. हालांकि उसे अलग राष्ट्र के तौर पर मान्यता नहीं मिली.
इतिहासकार जेम्स वेनब्रांट ने लिखा है, “इब्ने सऊद के रियाद पर कब्ज़े के लिए जाते समय उनके साथ महज़ 40 लोग थे. लेकिन रियाद के रास्ते में बद्दू जनजाति के कई लोग उनके साथ हो गए. उस समय मक्का और मदीना समेत सउदी अरब के ज्यादातर हिस्सों पर ऑटोमन शासकों का कब्जा था.”
उधर, हेजाज़ इलाके पर शरीफ हुसैन नामक एक शासक का नियंत्रण था तो नजद पर इब्ने सऊद का. लेकिन उसे नजद में रशीदियों के ख़िलाफ़ युद्ध जारी रखना पड़ रहा था.
उस समय ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और रूस समेत कई विदेशी ताकतें उस इलाके को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास कर रही थीं. पहला विश्व युद्ध शुरू होने के बाद शरीफ हुसैन ब्रिटिशों के साथ हो गए. उस समय ब्रिटिश सेना ने ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई में अरबों की सहायता की. उन्होंने प्रशिक्षण देने के अलावा हथियारों की सप्लाई भी शुरू की.
पहले विश्व युद्ध में पराजय के बाद सऊदी अरब ऑटोमन शासकों के हाथ से निकल गया. लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद एक गोपनीय समझौते के तहत ब्रिटेन और फ्रांस ने मध्य-पूर्व के विभिन्न इलाकों को आपस में बांट लिया था. उस समय अरब इलाकों पर नियंत्रण के लिए शरीफ हुसैन और इब्ने सऊद में लड़ाई शुरू हो गई.
मादाबी अल रशीद ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि इब्ने सऊद ने पहले रशीदियों को पराजित कर नजद पर कब्जा कर लिया. इसके बाद 1924 में हज यात्रियों पर हमले का आरोप लगा कर उन्होंने हेजाज़ में भी सैन्य अभियान शुरू किया.
इस बीच, ब्रिटेन के साथ शरीफ हुसैन के संबंधों में दरार पड़ने लगी थी. ब्रिटिश सहायता नहीं मिलने के बाद शरीफ अकाबा भाग गए. उसके बाद हेजाज़ और नजद पर इब्ने सऊद का नियंत्रण हो गया.
साल 1926 में मक्का-मदीना और जेद्दाह पर नियंत्रण के बाद अब्दुल अज़ीज़ बिन सऊद ने खुद को हेजाज़ का बादशाह घोषित कर दिया. वे पहले से ही नजद के सुल्तान थे. उन्होंने अगले साल जनवरी में नजद और हेजाज़ को मिला कर ‘किंगडम ऑफ नजद एंड हेजाज़’ बनाने का एलान कर दिया.
उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ समझौते के तहत इसके लिए मान्यता भी हासिल कर ली. उस समय वह अपनी उपाधि इमाम बताया करते थे. लेकिन सरकारी कामकाज में उनको बादशाह ही कहा जाता था.
राजकीय सऊदी अरब कब बना
इसके बाद उन्होंने अरबों को अपनी पारंपरिक जीवनशैली बदलने का आदेश दिया. इब्ने सऊद ने बद्दू जनजातियों के आपसी झगड़े, हमले और लूटपाट पर पाबंदी लगा दी. 18 सितंबर 1932 को इब्ने सऊद ने एक शाही फरमान जारी कर हेजाज़ और सऊद को एक देश घोषित कर दिया.
उसके बाद 23 सितंबर को उन्होंने शाही आदेश जारी किया कि अब से अरब इलाका अल मामलाकातूल अराबिया आस-सउदिया या राजकीय सऊदी अरब के नाम से जाना जाएगा. लेकिन उस समय तक सऊदी अरब के ज्यादातर लोग खानाबदोश जीवन-यापन के अभ्यस्त थे. उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी.
लेकिन तेल की खोज के बाद उस इलाके की तस्वीर बदल गई. सऊदी अरब में 1922 से तेल की खोज शुरू हुई थी.
कार्ल एश विटसेल ने एक अमेरिकी नागरिक चार्ल्स क्रेन की सहायता से 1932 में सऊदी अरब आकर तेल की खोज में सर्वेक्षण शुरू किया.
उसके बाद 1935 से ड्रिलिंग शुरू हुई और 1938 में पहली बार तेल का उत्पादन शुरू हुआ.
उसके बाद से ही सऊदी अरब का चेहरा बदलने लगा.
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