ट्यूनीशियाः अरब क्रांति के 10 साल बाद लोगों को क्या हासिल हुआ?

ट्यूनीशिया में बड़ी संख्या में युवा बेरोज़गार हैं.

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    • Author, राना जवाद
    • पदनाम, उत्तरी अफ्रीका संवाददाता

ट्यूनीशिया के ग़रीबों और रसूख़दारों से लेकर इन दोनों के बीच में मौजूद तबके…मेरी जिनसे भी बात हुई उनमें से कइयों ने अक्सर मुझसे यही सवाल पूछा, "ईमानदारी से बताइए, क्या आपको वाक़ई लगता है कि आज चीजें बेहतर हैं?"

हाँ, ये सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि आख़िर "बेहतर' होने का क्या पैमाना है?

10 साल पहले ट्यूनीशिया में जो घटनाएं घटी थीं, उन्हें आज हम 'अरब स्प्रिंग' के नाम से जानते हैं. इस दफ़ा इसकी बरसी पर चार दिन का राष्ट्रीय लॉकडाउन लगा दिया गया ताकि कोविड-19 संक्रमण के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाई जा सके.

इसकी अगली रात देश भर के एक दर्जन से ज़्यादा कामकाजी इलाकों में युवाओं और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं.

शुरुआत में यह साफ़ नहीं हो सका कि ये झड़पें किस वजह से हुईं. ये विरोध प्रदर्शन थे या दंगे, इसे लेकर भी नागरिकों और अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास है.

कुछ लोगों का कहना है कि ग़रीबी, भूख और ग़ुस्साए युवाओं के कारण ऐसा हुआ.

इनमें से 600 से ज़्यादा को बाद में गिरफ़्तार कर लिया गया, जिनमें से बड़ी तादाद में किशोर हैं.

ट्यूनीशिया में बड़ी संख्या में युवा बेरोज़गार हैं.

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अगले दिन दर्जनों प्रदर्शनकारी राजधानी ट्यूनिस पहुँच गए और गिरफ़्तारियों का विरोध शुरू हो गया. भीड़ क्रांतिकारी नारे लगाने लगी और शासन के अंत का आह्वान किया जाने लगा.

ट्यूनीशिया के कुछ लोग मौजूदा हालात पैदा होने की पहले से इसका आशंका जता रहे थे. देश में संसदीय और राष्ट्रपति चुनाव दो साल से भी कम वक्त पहले हुए हैं.

इस बात को लेकर कोई शक़ नहीं है कि लोग वित्तीय और सामाजिक रूप से परेशान हैं. साथ ही, अहम सरकारी सेवाएं भी कमज़ोर पड़ रही हैं.

हालिया वर्षों में हर साल नागरिकों की ओर से विरोध प्रदर्शन हुए हैं. आमतौर पर इनमें नौकरियों और बेहतर वेतन जैसी माँगें शामिल होती हैं.

गुजरे 10 वर्षों में यह पूरा इलाका कई तरह के भ्रमों और संघर्षों का शिकार रहा है.

किसी दिन ऐसा लगता है कि सब ठीक हो गया और अगले ही रोज ऐसा लगने लगता है कि ये तो नुकसान है. किसी साल जऱा सी भी उम्मीद बाद में निराशा में बदल जाती है.

ट्यूनीशिया इस उथलपुथल के एक नरम चक्र में फँसा रहा है.

राजनीतिक और लोकतांत्रिक बदलावों से शुरुआत में ट्यूनीशिया को जो हासिल हुआ, उसमें बाद में पैदा होने वाली आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सका था.

हक़ीक़त यह है कि जब पूर्व राष्ट्रपति जाइन अल-आबिदीन बेन अली को सत्ता से बेदख़ल किया गया तो अर्थव्यवस्था भी धराशायी हो गई और तब से यह उबर नहीं पाई है.

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कौन है इसका ज़िम्मेदार?

लोग एक ऐसे सिस्टम को इसका ज़िम्मेदार मानते हैं जिसमें भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है.

लोग संसद में जारी राजनीतिक विरोध को भी इन हालात का ज़िम्मेदार मानते हैं जिसके कारण कई सरकारें नाकाम हो गईं.

ट्यूनीशिया में गुजरे 10 वर्षों में 12 सरकारें आई हैं और आपसी सहमति वाली राजनीति तो लंबे वक्त पहले ही दफ़्न हो चुकी है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के कर्जों की शर्तों ने आर्थिक दबाव बना रखा है.

वेतन को लेकर चल रही रस्साकशी की वजह से स्वास्थ्य, परिवहन और प्राकृतिक संसाधन संभालने वाले सेक्टरों में हड़तालें और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

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लोग क्या चाहते हैं?

खाद्य उत्पादों का आयात करने वाले एक ट्यूनीशियाई कारोबारी ने हाल ही में मुझसे कहा था, "हमें एक बीच का रास्ता चाहिए. एक ऐसा मज़बूत नेता चाहिए जो आज़ादी का समर्थन करे. ये संसद और एक-दूसरे से लड़ती-झगड़ती पार्टियाँ देश को अपाहिज बना रही हैं."

राजधानी के सबसे ज्यादा घनी आबादी और ग़रीब तबके की रिहायश वाले एताधमन में भी लोगों की यही राय है.

इसी इलाके में युवा सड़कों पर उतर आए थे और पुलिस के साथ भिड़ गए थे.

27 साल के वाइल नागरिक समाज के कार्यकर्ता हैं. वो कहते हैं, "कुछ लोग अब कह रहे हैं कि संसदीय प्रणाली खत्म होनी चाहिए. राष्ट्रपति के पास कोई ताकत नहीं है. वो देश के प्रतीक भर रह गए हैं."

मुझे ताज़्ज़ुब हो रहा था. मैं एक ऐसे इलाके के लड़के से बात कर रहा था जो साल 2011 की क्रांति के दौरान अहम केंद्र रहा था. इस इलाके एक बेहद शक्तिशाली राष्ट्रपति का तख़्तापटल कर दिया गया था.

अब यहीं का एक युवा कह रहा है कि राष्ट्रपति के पास और शक्तियां होनी चाहिए.

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उसने कहा, "यह सही है कि अब हमारे पास ज्यादा आज़ादी है लेकिन हमने पाया है कि हमारे सपने सच नहीं हो पाए हैं."

इसी इलाके के एक अरबी पढ़ाने वाले शिक्षक चोकरी अल-लाबिदी के साथ मेरी वीडियो कॉल पर बात हुई.

अल-लाबिदी भी 2011 में सत्ता के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरे थे और उन्होंने भीड़ की अगुवाई भी की थी.

मैंने पाया कि वो हालिया उथल-पुथल से खुश नहीं हैं. उन्होंने कुछ प्रदर्शनकारियों को 'हिंसक' बताया, जिनकी कोई उचित मांगें नहीं हैं.

अल-लाबिदी कहते हैं कि लोगों का रुझान गलत चीजों पर ज़्यादा ध्यान देने का है और जो चीजें बेहतर हुई हैं उन्हें वो नहीं देख रहे हैं.

वो कहते हैं, "लोग जो बदलाव चाहते हैं, उसमें अब ज़्यादा वक्त नहीं है."

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मैंने उनसे पूछा कि अब क्या चीज़ें बेहतर हैं?

उनका जवाब था, "नगर निकायों के पास अब ज़्यादा ताकत है और उनके चुनाव होते हैं. लोगों को बोलने की आज़ादी है और किसी की भी ज़िम्मेदारी तय की जा सकती है. जवाबदेही बढ़ी है. यह सब पहले नहीं था."

अपने खाली वक्त में वो एक स्थानीय युवा समूह की अगुआई करते हैं और उन्हें इसमें कोई शक़ नहीं है कि देश में चीजें बढ़िया चल रही हैं.

अल-आबिदी कहते हैं, "मेरा आज़ादी में भरोसा है. जब तक आज़ादी है, यह बदलाव की गारंटी देता है और इससे गलतियाँ कम होने की गुंज़ाइश रहती है."

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