'संकट के बाद क़तर पहले से अधिक शक्तिशाली देश बन कर उभरा'

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सऊदी अरब के प्राचीन शहर अल-उला के हेरिटेज साइट के शांतिपूर्ण माहौल में इस हफ़्ते गल्फ़ कॉपरेशन काउंसिल (जीसीसी) देशों के बीच हुए "एकजुटता और स्थिरता" समझौते ने खाड़ी देशों के रिश्तों में एक नई गर्मजोशी पैदा कर दी है.
खाड़ी देशों के सालाना शिखर सम्मेलन में इस समझौते की घोषणा करते हुए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा, "ये समझौता हमारी खाड़ी, अरब और इस्लामी एकजुटता और स्थिरता की पुष्टि करता है."
इससे पहले उन्होंने क़तर के अमीर तमीम बिन हमद अल-थानी को सरेआम गले लगाकर (कोरोना महामारी के दौरान) उनका सम्मेलन में स्वागत किया. ये इस बात की तरफ़ इशारा था कि सऊदी अरब एक क़दम आगे बढ़ कर क़तर से सियासी रिश्ते बहाल करने का इच्छुक है.
खाड़ी के छह देशों के अलावा मिस्र, तुर्की और ईरान ने भी इस समझौते का स्वागत किया है. ईरान के विदेश मंत्री ने एक ट्वीट करके कहा, "दबाव और जबरन वसूली के ख़िलाफ़ दिलेरी से लड़ने के लिए क़तर को मुबारकबाद. हमारे अन्य अरब पड़ोसियों के लिए ईरान न तो (उनका) दुश्मन है और न ही (उनके लिए) ख़तरा. अब समय है एक मज़बूत क्षेत्र के लिए हमारी पेशकश को गंभीरता से लेने का."

इमेज स्रोत, Reuters
कुवैत और अमेरिका की सुलह में पहल
साढ़े तीन साल तक सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन और मिस्र ने क़तर की हवा, ज़मीन और समुद्र के रास्ते नाकाबंदी करके और कूटनीतिक रिश्ते तोड़ कर इस छोटे से खाड़ी देश पर ज़ोरदार दबाव बनाए रखा.
इन चारों देशों ने 2017 में तीस लाख से भी कम आबादी वाले तेल और गैस के भंडार से भरे देश क़तर के ख़िलाफ़ आरोप लगाया कि वो आतंकवाद का समर्थक है. उन्होंने क़तर से माँग की कि वो आतंकवाद का समर्थन करना बंद करे, ईरान से ज़रूरत से ज़्यादा संबंध न रखें और दोहा स्थित अल-जज़ीरा न्यूज़ चैनल पर प्रतिबंध लगाए. क़तर ने आतंकवाद का समर्थन देने के इलज़ाम को ग़लत बताया और न तो अल-जज़ीरा चैनल पर पाबंदी लगाई और न ही ईरान से संबंध कम किए.
अब चारों देश क़तर के साथ सियासी संबंध बहाल करने और इसके ख़िलाफ़ नाकाबंदी समाप्त करने पर राज़ी कैसे हुए?
कहा जाता है कि हाल के महीनों में, कुवैती और अमेरिकी मध्यस्थों ने गतिरोध को समाप्त करने के प्रयास किए हैं. ख़ास तौर से कुवैत परदे के पीछे काफ़ी महीने से दोनों पक्ष को मनाने में लगा हुआ था. बीबीसी के पश्चिमी एशिया विशेषज्ञ फ्रैंक गार्डनर कहते हैं, "ज़्यादातर कुवैत और कुछ हद तक अमेरिका की महीनों की अनथक कूटनीतिक कोशिशों के नतीजे में क़तर के ख़िलाफ़ नाकाबंदी उठ सकी है."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
ये ठीक है कि सुलह सफ़ाई की बातें कई महीनों से जारी थीं और जीसीसी देशों का शिखर सम्मेलन हर साल होता है, तो अचानक समझौता कैसे तय पाया? क्या अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति ट्रंप की हार इसका तत्काल कारण था?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिमी एशिया के मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा का जवाब है "हाँ".
उनका कहना है, "इसकी तत्काल वजह है ट्रंप का हारना और जो बाइडन का दो हफ़्तों के बाद सत्ता संभालना. बाइडन ने साफ़ कर दिया है कि ईरान के साथ वो परमाणु समझौते में कुछ शर्तों के साथ लौटना पसंद करेंगे. बाइडन ने सऊदी अरब को कड़ी चेतावनी दी है कि पत्रकार जमाल ख़शोज्जी की हत्या को वो एक मानवाधिकार का मामला घोषित करेंगे और उसमें छानबीन भी होगी. यमन में सऊदी अरब और अमीरात की सैन्य कार्रवाइओं की भी छान बीन होगी. उधर क़तर के अमीर थानी ने भी कुछ लचक दिखाई है जिससे मामला सुलझाने में आसानी हुई."

इमेज स्रोत, AFP
हालात बिगड़े क्यों थे?
क़तर के डटे रहने की एक बड़ी वजह थी उसका ये विश्वास कि वो चरमपंथ का समर्थक नहीं है. दरअसल इस्लामिक ब्रदरहुड या इख़्वान-उल-मुस्लिमीन मिस्र और सऊदी अरब की नज़र में एक चरमपंथी संगठन है जबकि क़तर, फ़लस्तीन और तुर्की इसे केवल एक कट्टर इस्लामी संस्था के रूप में देखते हैं.
क़तर चरमपंथ का समर्थन करने से इनकार करता है, उसने ग़ज़ा, लीबिया और अन्य जगहों पर राजनीतिक इस्लामवादी आंदोलनों का समर्थन किया है, विशेष रूप से पारंपरिक मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी संस्थाओं को जो खाड़ी के देशों की नज़रों में एक चरमपंथी संस्था है.
दूसरा यह कि क़तर पर ईरान से रिश्ते मज़बूत न करने के दबाव को वो अपने विदेशी पॉलिसी के ख़िलाफ़ एक प्रहार की तरह से देख रहा था. हालाँकि जीसीसी के एक सदस्य के नाते क़तर इस बात के लिए बाध्य हो सकता है कि वो ग्रुप की तयशुदा पॉलिसी पर अमल करे.
सही बात तो ये है कि क़तर और चारों देश, यानी सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र के बीच रिश्ते 2014 में उस समय ख़राब हो चुके थे जब इन चारों देशों ने अपने दूतों को कुछ महीनों के लिए वापस बुलाने जैसे क़दम उठाए थे. ये इस बात का संकेत था कि इनके बीच रिश्तों में खटास है.

इमेज स्रोत, Getty Images
दोस्तों का साथ
इस संकट के दौरान क़तर की ताक़त इसके दोस्त देशों का साथ भी थी. इस पूरे साढ़े तीन साल में तुर्की ने क़तर को व्यापक समर्थन दिया है. इससे पहले भी क़तर का झुकाव तुर्की की तरफ़ साफ़ नज़र आता था.
नाकाबंदी के एक साल पहले यानी 2016 में क़तर ने अस्थायी रूप से तुर्की को एक सैन्य अड्डा स्थापित करने की अनुमति दी थी. क़तर के इस क़दम ने सऊदी अरब और सयुंक्त अरब अमीरात को नाराज़ किया और इनकी तरफ़ से तीखी प्रतिक्रियाएँ भी देखने को मिलीं. लेकिन क़तर ने ऐसा करके शायद ये संदेश दिया कि क़तर एक छोटा देश ज़रूर है लेकिन इसके दोस्त बड़े और शक्तिशाली देश हैं.
बहरहाल बात इतनी आगे बढ़ी कि जून 2017 में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने क़तर के साथ राजनयिक संबंधों को तोड़ दिया. इन देशों ने अपने राजदूतों को वापस बुलाया, क़तर के राजदूतों को निष्कासित कर दिया और देश पर एक गंभीर आर्थिक नाकाबंदी लगा दी. क़तर को दी गयी मांगों में तुर्की के सैन्य अड्डे को तत्काल बंद करना शामिल था.

इमेज स्रोत, Reuters
इस साढ़े तीन साल की सियासी ड्रामे में जीत क़तर की हुई?
संकट से घिरे क़तर को अच्छी तरह पता था कि इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई स्वभाविक नहीं है और अंत में जीत उसकी होगी. नाकाबंदी ख़त्म करने के लिए क़तर के सामने असल में 13 शर्तें रखी गयी थीं. एक-दो को छोड़ कर क़तर ने एक भी शर्त नहीं मानी.
उदाहरण के तौर पर चार बड़ी शर्तें ये थीं- अल-जज़ीरा चैनल पर पाबंदी लगाना, ईरान से संबंध सीमित करना, चरमपंथी संगठनों पर अंकुश लगाना और उनका समर्थन ख़त्म करना और तुर्की के सैन्य अड्डे को बंद करना. क़तर ने इनमें से एक शर्त भी नहीं मानी.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि लड़ाई में जीत क़तर की हुई.
"ये क़तर की जीत है, क्योंकि क़तर के ख़िलाफ़ सऊदी अरब और यूएई ने मिलकर एक आर्टिफ़ीशियल संकट खड़ा किया था जिसे अधिक समय तक जारी नहीं रखा जा सकता था."
फ्रैंक गार्डनर के अनुसार साढ़े तीन साल की एकतरफ़ा नाकाबंदी ने क़तर के ख़लीफ़ा के लिए, क़तर की सरकार और क़तर के लोगों के लिए जीवन को मुश्किल बना दिया था, लेकिन नाकाबंदी क़तर की सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर न कर सकी.

इमेज स्रोत, Reuters
दूसरी तरफ़ सऊदी अरब और यूएई ने ये अंदाज़ा नहीं लगाया था कि क़तर अपनी सैन्य क्षमता इतनी ज़्यादा बढ़ा लेगा कि ये एक क्षेत्रीय ताक़त बन कर उभरे. संकट से पहले इसकी वायु सेना के पास केवल 12 फ़ाइटर जेट थे.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं अब इसके पास 250 के क़रीब विमान हैं. "उनके पास लगभग ढाई सौ विमान आए हैं. इसके अलावा ड्रोन्स ख़रीदे हैं. इसने अमेरिका से लेकर तुर्की, इसराइल, ईरान, फ़्रांस, बेल्जियम और जहाँ से भी मुमकिन हो सके वहां से हथियार ख़रीद कर उन्होंने अपनी ताक़त बढ़ाई है."
नाकाबंदी आर्थिक रूप से दोनों पक्ष के लिए नुक़सान दे रही है. प्रोफ़ेसर पाशा के अनुसार "अमीरात और सऊदी बैंकों ने मिलकर क़तर की करेंसी को कमज़ोर करने की कोशिश की जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली अल-जज़ीरा के 30 पत्रकारों के एकाउंट्स भी हैक किए गए लेकिन कुछ नहीं हुआ."
वो कहते हैं कि इस पूरे संकट से क़तर पहले से कहीं अधिक मज़बूत देश बन कर उभरा है. "उनकी कोशिश थी कि क़तर में एक कठपुतली सरकार बैठा कर इसे अपने मातहत कर लें लेकिन उन्हें इसमें नाकामी हासिल हुई. क़तर अब पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत देश बन कर उभरा है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














