ग़ज़ा: चार साल के उमर बार-बार पूछ रहे हैं- अम्मी कहाँ हैं, दादी अम्मा कहाँ हैं?

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- Author, डेविड ग्रिटेन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
''अम्मी कहाँ हैं? दादी अम्मा कहाँ हैं? सब कहाँ हैं?''
नाज़ुक से शरीर पर बमबारी के ज़ख़्म लिए चार साल का बच्चा उमर ये सवाल ग़ज़ा के एक अस्पताल में पूछता है.
इस सवाल को सुनकर उमर के इकलौते ज़िंदा रिश्तेदार मोइन अबु रेज़क कहते हैं, ''जब उसने अपने परिवार के बारे में पूछा तो मैं जवाब नहीं दे पाया. मैंने गहरी सांस ली और बच्चों की तरह किसी दूसरे बारे में ही बात करके सवाल टालने की कोशिश की.''
ग़ज़ा के अल-अक़्सा अस्पताल में भर्ती उमर की हालत नाज़ुक है.
डॉक्टरों को उमर के बाएं हाथ को काटना पड़ा. उमर के दाएं पैर में अब भी ज़ख़्म है.
सीने और चेहरे पर भी ज़ख़्म हैं. उमर का जबड़ा चोटिल है और छोटे से शरीर पर काफ़ी सारी पट्टियां बंधी हुई हैं.
ये चोटें उस इसराइली हमले के बाद उमर को लगी हैं, जिसमें उमर के परिवार के 35 लोगों की जान चली गई. मरने वालों में उमर की मां, पिता और दादी भी शामिल हैं.

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उमर को है घरवालों का इंतज़ार
उमर के रिश्तेदार मोईन ने तय किया है कि इस बच्चे को इन मौतों के बारे में ना बताया जाए ताकि उसकी हालत कहीं और ना बिगड़ जाए.
फ़िलहाल उमर को मिस्र के रास्ते ग़ज़ा से बाहर निकालने की कोशिश हो रही है.
ऐसी पहल यूएई सरकार और रेड क्रिसेंट सोसाइटी की ओर से शुरू की गई है.
मोईन ने बीबीसी अरबी को बताया, ''उमर को घरवालों की मौत की बात ऐसे बतानी होगी ताकि उसे सदमा ना पहुँचे. या वो किसी ऐसी स्थिति में ना पहुँच जाए, जिस पर मैं काबू नहीं पा सकता.''
बीबीसी अरबी को भेजे कई वॉइस नोट के ज़रिए मोईन ये बातें बताते हैं.
वो कहते हैं- उमर जानता है कि उसने अपने घरवालों को नहीं देखा है और वो पूछता है- अम्मी कहाँ हैं, दादी कहाँ हैं, ये लोग कहाँ गए?
मोईन को उमर के लिए मेडिकल मदद मिलने की उम्मीद है लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि उमर को एंबुलेंस से मिस्र के बॉर्डर तक ले जाया जाएगा. ऐसा इसलिए भी क्योंकि सेंट्रल ग़ज़ा में काफ़ी बमबारी हो रही है.
इसराइली सेना ने ग़ज़ा को दो टुकड़ों में बाँट दिया है.
टैंक और सैनिक अब दक्षिणी शहर ख़ान युनूस की तरफ़ बढ़ रहे हैं.
दीर अल-बालाह के मुख्य हाईवे को युद्ध का मैदान घोषित कर दिया गया. इस कारण यहां फँसे लोगों के पास बाहर निकलने के रास्ते कम ही हैं.

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उत्तरी ग़ज़ा का हाल
उत्तरी ग़ज़ा में रह रहे काफ़ी फ़लस्तीनियों ने मिडिल एरिया में शरण मांगी है. इसराइली सेना ने इन लोगों को ये इलाक़ा ख़ाली करने को कहा था और दक्षिण की ओर बढ़ने के लिए बोला था.
ये आदेश युद्ध की शुरुआत में आया था.
ये युद्ध सात अक्तूबर को इसराइल पर हमास के किए हमले के बाद शुरू हुआ है. हमास के हमले में क़रीब 1200 लोगों की जान गई है. वहीं 240 लोगों को बंधक बनाया गया था.
इसके जवाब में इसराइल के किए हमलों में अब तक 18 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. चार साल का उमर उन 49 हज़ार लोगों में से एक है, जो इसराइली हमलों में घायल हुए हैं.
इसराइल का कहना है कि उसकी सेना हमास के चरमपंथियों को निशाना बना रही है. इनमें चरमपंथियों के ठिकाने भी शामिल हैं.
इसराइल के मुताबिक़, युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक 22 हज़ार से ज़्यादा लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है.

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जब उमर के परिवार पर हुआ हमला
बीबीसी अरबी से मोईन ने बताया कि उमर और उसका परिवार दीर अल-बालाह से उत्तर में नुसरत कैंप में दादी के घर गया हुआ था.
जब उमर का परिवार यहाँ मौजूद था, तब बिना किसी चेतावनी के इसराइल ने हमला किया और लोग मारे गए.
मोईन कहते हैं, ''हमने इस तरह की कोई मिसाइल कभी नहीं देखी थी. मिसाइल गिरी और पूरे इलाक़े को तबाह कर दिया. किस्मत से घर का एक हिस्सा खुला हुआ था, जिससे उमर नीचे गिरा. लेकिन उसका बांया हाथ इस कदर चोटिल हुआ कि उसे फौरन काटना पड़ा.''
वो बताते हैं, ''शनिवार को उमर का तीन यूनिट ख़ून बह गया था. उसका हिमोग्लोबिन भी 7.4 पर आ गया. ख़ून चढ़ाने के लिए उमर की सर्जरी की गई.''
मोईन बताते हैं कि अस्पताल में हालत काफ़ी ख़राब थी, उमर की हालत इतनी नाज़ुक होने के बाद भी उन्हें उसके लिए बेड नहीं मिल पा रहा था. इस वजह से अस्पताल के गलियारे में ही डॉक्टर्स और नर्सों ने उमर का इलाज किया.
वो कहते हैं, ''इलाज में लगने वाले ज़रूरी सामान सीमित हैं. अस्पतालों में पेन किलर नहीं हैं तो चुटकुले सुनाकर हँसाने की कोशिश की जाती है ताकि दर्द से ध्यान हटाया जा सके.''
मोईन बोले- ये तरीका कुछ ही बार काम करता है लेकिन हमारे पास कोई और तरीका नहीं है.
मोईन को उम्मीद है कि उमर को अलग गुरुवार तक रफाह बॉर्डर के पास ले जाया जा सकेगा, जहां से वो मिस्र के अस्पताल में इलाज के लिए जा सकेगा.

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एक बुरा सपना...
इसराइल की बमबारी में बचने वालों में लीना शाकोरा, उनके पति और तीन बच्चे भी शामिल हैं.
वो कहती हैं- हम अब भी एक बुरा सपना जी रहे हैं.
लीना ग़ज़ा शहर के शेख रादवान से भागकर दीर अल-बालाह के कृषि इलाके के एक घर में रह रही हैं.
लीना बीबीसी अरबी से कहती हैं- हम हर सुबह उठकर ये याद रखते हैं कि हम युद्ध में हैं. लोग भूखों मर रहे हैं. आपको आपके घर से निकाल देना प्रताड़ना है. पेट भरने के लिए खाना तक नहीं है.
वो कहती हैं, ''मेरा परिवार और 40 दूसरे लोग एक कमरे में हैं. इस कमरे की खिड़कियां धमाके में टूट गई हैं. एक तरह से मानिए कि हम खुले में बैठे हैं. बहुत सर्द है और लोग परेशान हैं.''
लीना कहती हैं कि उनके बेटों की पीठ में दर्द है क्योंकि वो पानी के गैलन को ढोकर थक गए हैं. ये पानी तक गंदा है क्योंकि तेल की कमी से वॉटर प्लांट काम नहीं कर रहे हैं. परिवार घटिया खाना खाने को मजबूर है.
वो बताती हैं- हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है कि हमें आटा मिल जाए ताकि हम कुछ बना सकें, अपना पेट भर सकें.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि वो रफाह के बाहर सामग्री मुहैया करवा पाने में असमर्थ हैं.
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