वेस्ट बैंक में बसाए गए इसराइली क्यों निशाना बनाते हैं फ़लस्तीनी गांवों को

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- Author, जोल गंटर
- पदनाम, वेस्ट बैंक से
जब आबिद वादी एक जनाज़े में शामिल होने के लिए कपड़े पहन रहे थे, तब उनके फ़ोन पर एक मैसेज आया.
यह एक तस्वीर थी जो उन्हें उनके दोस्त ने फ़ॉरवर्ड की थी. इसमें कुछ नक़ाबपोश कुल्हाड़ियों, पेट्रोल के कनस्तर और चेनसॉ के साथ खड़े नज़र आ रहे थे.
इस तस्वीर पर हीब्रू और अरबी भाषा में लिखा था- “क़ुसरा गांव के नाली के सभी चूहों, हम तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं और हम तुम्हारा शोक नहीं मनाएंगे.”
आगे लिखा था – 'बदले का दिन आ रहा है.'
आबिद वादी वेस्ट बैंक के उत्तरी हिस्से में नबलस के पास बसे क़ुसरा गांव के रहने वाले हैं. उस रोज़ उनके गांव के चार युवकों का अंतिम संस्कार किया जाना था.
इनमें से तीन की मौत एक दिन पहले, बुधवार 11 अक्टूबर को उस समय हुई थी, जब वेस्ट बैंक में बसाए गए इसराइलियों ने गांव में घुसकर एक फ़लस्तीनी घर पर हमला किया था.
चौथे युवक की मौत उसके अगले दिन इसराइली सैनिकों के साथ हुई झड़प के दौरान गोली लगने से हुई थी.

इन चारों की मौत के बाद क़ुसरा गांव के बाशिंदे आधे घंटे की दूरी पर मौजूद अस्पताल से इनके शव लाने की तैयारी कर रहे थे. इसके लिए उन्हें इसराइलियों की बस्तियों से होकर गुज़रना था.
यहां आम दिनों में भी हिंसा का ख़तरा बना रहता था मगर हमास और इसराइल के बीच जंग छिड़ने के बाद तो आशंका और बढ़ गई थी.
वादी ने दोस्त की भेजी उस तस्वीर को देखने के बाद फ़ोन नीचे रखा और कपड़े पहनने लगे ताकि अस्पताल के फ़्रिज में रखे तीन लोगों के शवों को उनके घर लाने जा सकें.
वादी कहते हैं उन्हें उस धमकी से डर नहीं लगा क्योंकि उन्हें एसी धमकियों की आदत सी हो गई है.
लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि कुछ घंटों बाद कट्टरपंथी इसराइली जनाज़े को रोक देंगे और उनके भतीजे की गोली मारकर हत्या कर दी जाएगी.
क़ुसरा में अपने पुश्तैनी मकान के आंगन में छांव में बैठे वादी ने कहा, “अगर हम एक या दो दिन ठहर गए होते तो भी क्या फ़र्क पड़ता? क्या आपको लगता है कि वे लोग इस जगह को छोड़कर चले गए होते?”

वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा
संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय के अनुसार, हमास के घातक हमले के बाद का हफ़्ता वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनियों के लिए 2005 से लेकर अब तक सबसे ख़राब दौर रहा.
2005 से अब तक यहां इसराइली सेना या यहां बसाए गए इसराइलियों के हाथों 75 फ़लस्तीनियों की मौत हो चुकी है और रोज़ाना हिंसा की तीन से आठ घटनाएं होती हैं.
फ़लस्तीनी अधिकारियों का कहना है कि गुरुवार 12 अक्टूबर को फ़लस्तीनी शरणार्थियों के एक कैंप पर हुए हमले और एक हवाई हमले से कम से कम 12 लोगों की मौत हुई है. वहीं इसराइली पुलिस का कहना है कि इस दौरान उनके एक अफ़सर की जान गई है.
इस हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इसराइल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्र में स्थिति क़ाबू से बाहर होने का ख़तरा बना हुआ है.
वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनियों का कहना है कि वेस्ट बैंक में बसाए गए इसराइली, दुनिया का ध्यान ग़ज़ा में मची तबाही पर केंद्रित होने का फ़ायदा उठाकर गांवों में घुस रहे हैं और फ़लस्तीनियों को खदेड़ रहे हैं या फिर मार रहे हैं.
वीडियो फ़ुटेज और गांववालों की आंखों-देखी के मुताबिक़, कम से कम तीन घटनाओं में हमले के वक़्त इसराइलियों ने या तो सेना की वर्दी पहनी हुई थी या फिर सैनिक भी उनके साथ थे.
क़ुसरा में क्या हुआ
क़ुसरा में सबसे पहले जिन तीन लोगों की जान गई, वे गांव के बाहरी इलाक़े में एक मकान में रह रहे परिवार को बचाने गए थे.
कई गांव वालों ने बीबीसी को बताया कि इसराइली इनके घर पर पत्थर बरसा रहे थे. उन्होंने बताया कि इसके बाद इसराइलियों ने इस परिवार की मदद के लिए आए पड़ोसियों पर गोली चला दी.
इसमें तीन युवाओं- हसन अबु सोरौर (16), ओबैदा अबु सोरौर (17) और मुसाब अबु रेदा (25) की मौत हो गई और अन्य कई गंभीर रूप से घायल हो गए.
21 साल के मोथ ओदेह की इसके अगले दिन सैनिकों के साथ हुई झड़प के दौरान मौत हुई थी.
रात को हुए हमले में घायल होने वालों में उस मकान में रहने वाली छह साल की बच्ची और उसके पिता भी शामिल हैं.
पास के क्लीनिक में मृतकों और घायलों को देखने वाले दो लोगों ने बताया कि बच्ची को पेट में और पिता को चेहरे में गोली मारी गई थी.
क्लीनिक में घायलों की मदद कर रहे आमिर ओदेह इसराइली सैनिकों से झड़प के दौरान मारे गए मोथ ओदेह के चचेरे भाई हैं.
17 साल के ओबैदा के पिता सैद को उसकी मौत की ख़बर आमिर ओदेह को ही देनी पड़ी थी.
मंगलवार को क़ुसरा में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “मैंने उन्हें बताया कि आपके बेटे को हल्की चोटें आई हैं. मैं उन्हें फ़ोन पर दर्द भरी ख़बर नहीं देना चाहता था.”
पास ही खड़े सैद ने कहा, “मैं अस्पताल की ओर भागा. उन्होंने बताया था कि मेरा बेटा ज़ख़्मी है लेकिन मैं उसे तलाश नहीं पाया.”
आंखों में आंसू लिए सैद कहते हैं, “मैंने कहा कि मैं अपने बेटे को देखना चाहता हूं. मैं कमरे में दाख़िल हुआ और देखा कि अल्लाह के करम से वह शहीद हो चुका था.”

जनाज़े वाले काफ़िले के दौरान हिंसा
अगले दिन इन चारों मृतकों का अंतिम संस्कार होना था. आबिद वादी ने नक़ाबपोश लोगों की तस्वीर को अपने दिमाग़ से निकाला और शवों को अपने गांव ला रहे जनाज़े में शामिल हो गए.
जब एंबुलेंस और कारें नबलस-रामल्लाह सड़क से गुज़र रही थीं, यहां बसाए गए कट्टरपंथी इसराइलियों ने हमला कर दिया.
वीडियो फ़ुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इन लोगों ने काफ़िले पर पथराव किया. जनाज़े में शामिल कुछ लोगों ने भी वापस पत्थर फेंके. इसके जवाब में इसराइलियों और सैनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी.
भगदड़ और अंधाधुंध गोलीबारी के बीच आबिद वादी अपने भाई इब्राहिम और उनके बेटे से बिछड़ गए. इब्राहिम 63 साल के स्थानीय नेता हैं जो फ़तह के साथ जुड़े हैं. इब्राहिम के बेटे अहमद 24 साल के थे जो क़ानून की पढ़ाई कर रहे थे.
इस झड़प के एक हिस्से की वीडियो फ़ुटेज में अहमद और दूसरे लोग गोलीबारी से दूर भागते नज़र आ रहे हैं. इसके बाद अहमद गोलियों से छलनी होकर सड़क पर गिर गए थे.
वादी कहते हैं, “मुझे बताया गया कि भतीजे को दो गोलियां लगी थीं. एक पेट में और दूसरी गर्दन में. मेरे भाई को उनकी कमर से ऊपर दिल के पास गोली मारी गई थी.”
उन्होंने कहा, “जनाज़े वाले काफ़िले में किसी के पास हथियार नहीं था. आमतौर पर हम अपनी कारों पर फ़लस्तीनी झंडा लगाते हैं लेकिन हमने तो डर के मारे ऐसा भी नहीं किया था.”

ख़ाली होते फ़लस्तीनी गांव
क़ुसरा के बाशिंदों ने बीबीसी को बताया कि गांव में दहशत फैली हुई है. ज़ैतून (ऑलिव) चुनने का सीज़न शुरू हो गया है जो गांववालों की कमाई का ज़रिया है. मगर गोली मारे जाने के डर से ये लोग बाहरी इलाक़े में नहीं जा पा रहे.
इस साल इसराइली सैनिकों द्वारा की जा रही हिंसा में भी काफ़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि यह तेज़ी हमास के हमले से पहले से ही देखने को मिल रही है.
जनवरी से अगस्त के बीच ही हर महीने 100 से ज़्यादा घटनाएं सामने आईं और क़रीब 400 लोगों को उनकी ज़मीन से बेदख़ल कर दिया गया.
इसराइली मानवाधिकार संगठन बत्सेलेम ने बीबीसी को बताया कि उसने पाया है कि 'यहां बसाए गए इसराइलियों ने हमास के हमले के बाद से संगठित होकर वेस्ट बैंक में ज़मीन कब्ज़ाना शुरू कर दिया है क्योंकि पूरी दुनिया और इस क्षेत्र के लोगों का ध्यान ग़ज़ा और उत्तरी इसराइल पर केंद्रित है.'
बत्सेलेम के आंकड़ों के मुताबिक़, हमास के हमले के बाद के पहले छह दिन में 46 अलग-अलग घटनाओं में इसराइलियों ने वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों को धमकाया, उन पर हमला किया या उनकी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया.
बत्सेलेम के प्रवक्ता रॉय येलिन ने कहा, “चरवाहों के कई परिवार और कई समुदाय पिछले हफ़्ते इसराइलियों की धमकियां मिलने के बाद यहां से भाग चुके हैं."

यहां बसाए गए इसराइलियों ने यहां के बाशिंदों को एक मियाद बताई है और कहा है कि अगर वे यहां से नहीं गए तो उन्हें नुक़सान पहुंचाया जाएगा. कुछ गांव तो पूरी तरह ख़ाली हो चुके हैं.
ऐसा ही एक गांव है वादी अल-सिक़ जो रामल्लाह के पास है. पहले यहां फ़लस्तीनी बद्दू समुदाय के क़रीब 200 लोग रहते थे.
वादी अल-सिक़ के 48 वर्षीय किसान अब्दुल रहमान काबना कहते हैं, “हम कई महीनों से दिन रात इसराइलियों के हमलों और उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं. लेकिन जंग छिड़ने के बाद हमले बढ़ गए हैं."
इस गांव से भगाए गए तीन लोगों ने हमें बताया कि नौ अक्टूबर को क़रीब 60 इसराइलियों ने उनके समुदाय पर हमला किया. इनमें कई ने सेना की वर्दी पहनी हुई थी. उन्होंने हथियारों से हमला किया और धमकाया.
एक ने कहा, "इसके बाद उन्होंने हमें अपनी भेड़ों के साथ जाने के लिए एक घंटे का समय दिया और कहा कि अगर हमने ऐसा नहीं किया तो मार डालेंगे."
एक अन्य विस्थापित, 35 साल के अली अरारा ने बताया, “लोग बचने के लिए 10 किलोमीटर से भी ज़्यादा पैदल चले. इसराइलियों ने हमारे घर से सबकुछ चुरा लिया. मेरी बेटी डर गई थी. उन्होंने हमें पीटा और सबकुछ छीन लिया.”

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पूरे इलाक़े में ऐसा ही माहौल
बेत्सेलेम और वेस्ट बैंक में हिंसा पर नज़र रखने वाले एक अन्य इसराइली मानवाधिकार समूह येश दिन के मुताबिक़, जो कुछ वादी अल-सिक़ में हुआ, सात अक्टूबर के बाद वैसा ही इस पूरे इलाक़े में कई सारे समुदायों के साथ किया गया.
सबसे ज़्य़ादा चौंकाने वली घटना पिछले हफ़्ते कैमरे में भी क़ैद हुई. हेब्रों के पास अल-तुवानी नाम के फ़लस्तीनी गांव में घुसे एक इसराइली ने एक निहत्थे फ़लस्तीनी को बेहद क़रीब से पेट में गोली मार दी.
जब ये सब हो रहा था, तब एक इसराइली सैनिक चुपचाप सब देखता हुआ नज़र आया.
तीन लोगों ने बताया कि यह घटना तब हुई जब दो हथियारबंद इसराइलियों और एक सैनिक ने गांव के बाहरी इलाक़े में एक घर पर हमला किया.
हमें यह बताने वालों में इस घर के मालिक 36 साल के मुसाब रबाई भी शामिल थे. उन्होंने कहा, “तीन इसराइली हथियारों से लैस होकर मेरे घर आए. एक ने सेना की वर्दी पहनी हुई थी. एक ने मुझे धक्का देने के बाद बंदूक से मेरे सिर पर वार किया. उसने कहा कि वह मुझे गोली मार देगा.”
रबाई मदद के लिए चिल्लाए तो पड़ोसी मदद के लिए आए. इनमें चार बच्चों के पिता ज़करिया अदरा भी थे.
अदरा के चचेरे भाई बसेल ने इस घटनाक्रम का वीडियो रिकॉर्ड किया है जिसमें रबाई को कथित तौर पर पीटने वाले इसराइली और सैनिक को फ़लस्तीनियों पास खड़ा देखा जा सकता है.
अचानक एक हथियारबंद इसराइली अदरा के पास आया, उनपर राइफ़ल से वार किया और कुछ फ़ुट दूर से उनके पेट में गोली मार दी.
जबकि वीडियो में इस पूरे वाक़ये के दौरान अदरा शांति से खड़े नज़र आ रहे थे.
परिवार के अनुसार, अदरा अस्पताल में हैं और उनकी हालत गंभीर है. उनके चचेरे भाई बसेल कहते हैं, “वह बच गए हैं लेकिन गोली ने उनके पेट के अंदर गंभीर नुक़सान किया है.”
मुसाब रबाई, जिनके घर पर हमला किया गया था, कहते हैं कि गोली मारे जाने की घटना से कई दिन पहले से ही इसराइली धमकियां दे रहे थे और संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे.
वह बताते हैं, “शनिवार के बाद से ही वे गांव के पास हथियारों से लैस होकर खड़े हैं और बुलडोज़र की मदद से पेड़ों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं. गांव के लोग बारी-बारी से जागकर पहरा दे रहे हैं ताकि हमले के समय कोई तो जगा हुआ हो."

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प्रतिक्रिया से इनकार
बीबीसी ने वेस्ट बैंक में आकर बसे इसराइलियों के प्रमुख संगठन येशा काउंसिल से इस बारे में प्रतिक्रिया लेनी चाही लेकिन उसने इनकार कर दिया.
बिन्यामिन काउंसिल के कार्यकारी प्रमुख मोती योगेव इस इलाक़े में बसाए गए इसराइलियों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं.
उन्होंने कहा कि हिंसा कर रहे इसराइली उनके समुदाय के 'कुछ ख़राब लोग हैं जिनका उनके समुदाय के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है' और उनके साथ 'बाक़ी अपराधियों जैसा ही सलूक' होना चाहिए.
इसराइली सेना और इसराइली पुलिस ने भेजे गए कई सवालों पर प्रतिक्रिया नहीं दी.
पूर्व इसराइली नेता और अब शांति के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट डोव खेनिन कहते हैं, “इस हिंसा में सबसे ज़्यादा त्रासद बात यह है कि इन अतिवादी इसराइलियों पर इसराइल की सेना कोई कार्रवाई नहीं करती."
वह कहते हैं कि यह हिंसा एक मक़सद से की जा रही है. वह मक़सद है- "इन फ़लस्तीनियों को उनके घरों से भगाकर उनसे छुटकारा पाना.”

ख़तरनाक बन सकते हैं हालात
बहुत से फ़लस्तीनियों को डर है कि अब वेस्ट बैंक के हालात पहसे से और ख़राब होंगे.
इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतार बेन ग्वीर ने पिछले हफ़्ते एलान किया था कि सरकार इसराइली आम नागरिकों के लिए 10 हज़ार राइफ़ल ख़रीदेगी.
ये हथियार वेस्ट बैंक में बसाए गए इसराइलियों को भी मिलेंगे. ऐसा हुआ तो इसराइल के कब्ज़े वाले इस इलाक़े में हथियारबंद इसराइलियों और सेना के बीच फ़र्क करना मुश्किल हो जाएगा.
मकान के अहाते में बैठे आबिद वादी के आसपास उनके भाई और पिछले हफ़्ते जान गंवाने वाले चार अन्य लोगों की तस्वीरों के पोस्टर लगे हैं.
दस हज़ार बंदूकें दिए जाने की ख़बर को लेकर सिर हिलाते हुए आबिद वादी कहते हैं, “इससे क़ुसरा के लोगों के लिए कुछ नहीं बदलेगा. हमने यहां बसाए गए इसराइलियों के हाथ में हमेशा से बंदूक देखी है. वे काफ़ी पहले से हमें गोली मार रहे हैं.”
वह कहते हैं कि बदलाव बस इतना हुआ है कि अब इसराइली पहले से ज़्यादा आक्रामक और कट्टर हो गए हैं.
वादी कहते हैं, “फ़ार्महाउस जलाए जा रहे हैं, जैतून के पेड़ काटे जा रहे हैं, कारों को नुक़सान पहुंचाया जा रहा है और ज़मीन छीनी जा रही है.”
"ये तो हमारे गांव के हाल हैं. अगर आप अगले गांवों का रुख़ करेंगे तो वहां भी हर किसी में ग़ुस्सा और दर्द पाएंगे. आप देखेंगे कि इस सबका कोई अंत नहीं है."
(इस रिपोर्ट में अल्ला बदारना ने सहयोग दिया है. तस्वीरें जोल गंटर की हैं.)
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