अनंत अंबानी: रिलायंस समूह के प्राइवेट चिड़ियाघर को लेकर क्या सवाल उठ रहे हैं और क्यों?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रिलायंस समूह ने गुजरात के जामनगर में ‘वनतारा’ नाम की विशाल योजना की घोषणा की है जिसका मक़सद वन्य जंतुओं की देखभाल और संरक्षण बताया गया है.
इस परियोजना के प्रमुख अनंत अंबानी की इस पहल को रिलायंस ग्रुप के प्राइवेट ज़ू की संज्ञा दी जा रही है. इसकी वजह ये है कि वहाँ हाथियों सहित कई दूसरे तरह के वन्यजीवों को रखा जा रहा है.
भारत की अदालतों में इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ जनहित याचिकाएं भी दायर की गई हैं.
इनमें से एक याचिका में अनंत अंबानी के प्री-वेडिंग कार्यक्रम में देश-विदेश से आए मेहमानों को वन्य जीव दिखाए जाने पर आपत्ति जताई गई है.
वहीं, एक अन्य याचिका में देश के अलग-अलग कोनों से जानवरों को जामनगर भेजे जाने पर आपत्ति दर्ज कराई गई है.

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रिलायंस के वनतारा में क्या होगा?

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रिलायंस समूह ने बताया है कि इस पहल के तहत जामनगर में तीन हज़ार एकड़ में एक फैसिलिटी तैयार की गई है जिसका एक बड़ा क्षेत्र हाथियों के लिए होगा.
हाथियों के लिए विशेष रूप से बनाए गए इस केंद्र में 200 से ज़्यादा हाथियों को रखा जाएगा.
इन हाथियों की देखरेख में 500 से ज़्यादा प्रशिक्षित कर्मचारियों को लगाया गया है. इनमें जानवरों के डॉक्टरों से लेकर बायोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट आदि शामिल है.
वहीं अन्य जानवरों के लिए 650 एकड़ में बचाव और पुनर्वास केंद्र बनाया गया है.
इसमें भारत के साथ-साथ दुनिया भर से बचाए गए जानवरों के लिए इलाज और पुनर्वास जैसे इंतज़ाम किए जाएंगे. इस केंद्र में 2100 से ज़्यादा कर्मचारियों को तैनात किया गया है.
रिलायंस समूह ने बताया है कि इस रेस्क्यू सेंटर में 300 से ज़्यादा तेंदुए, बाघ, शेर और जैगुआर आदि हैं.
इसके साथ ही 300 से ज़्यादा हिरन और 1200 से ज़्यादा सरीसृप जैसे मगरमच्छ, सांप और कछुए हैं.
इस तरह कुल 43 प्रजातियों के जानवरों की संख्या 2000 से ज़्यादा है.
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क्या ये भारत का पहला प्राइवेट ज़ू है?

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इसमें एक तरफ़ 'राधा कृष्णा एनिमल वेलफेयर ट्रस्ट' है जिसके जिम्मे हाथियों को बचाने से लेकर उनके देखरेख की ज़िम्मेदारी है.
वहीं, दूसरी ओर बाकी जानवरों की देखभाल के लिए ग्रीन्स ज़ूऑलॉजिकल, रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर खोला गया है.
इस केंद्र को ही केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की ओर से मिनी ज़ू की श्रेणी में मान्यता दी गई है. और इसका संचालन 10 मार्च, 2021 को गठित जीज़ेडआरआरसी सोसाइटी की ओर से किया जा रहा है.
सोशल मीडिया पर रिलायंस समूह के इस प्रोजेक्ट को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखी जा रही है.
कुछ लोग इसे भारत का पहला प्राइवेट ज़ू बताते हुए इसके औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं.
हालांकि पूर्व आईएफ़एस अधिकारी ब्रजराज शर्मा मानते हैं कि भारत में प्राइवेट ज़ू कोई नया विचार नहीं है.
वह बताते हैं, “भारत में निजी चिड़ियाघर पहले से चलते आ रहे हैं. टाटा समूह से जुड़ा जमशेदपुर स्थित ज़ू इसका एक उदाहरण है. इसके साथ ही कई डियरपार्क हैं जिनका रखरखाव निजी स्तर पर किया जाता है.”
लेकिन सवाल उठता है कि भारत में इस तरह के चिड़ियाघर कैसे खोले जा सकते हैं.
भारत में चिड़ियाघरों को मान्यता देने वाली संस्था केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के मैंबर सेक्रेटरी रहे ब्रजराज शर्मा इसका जवाब देते हैं.
वह कहते हैं, “भारत में किसी भी तरह का चिड़ियाघर खोलने या उसे चलाने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से मान्यता लेना ज़रूरी है."
"ये मान्यता मिलने के बाद चिड़ियाघरों को साल 2009 में संशोधित किए गए चिड़ियाघर मान्यता नियमों के तहत चलाना होता है.”
जानवरों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करता है?

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लेकिन सवाल ये उठता है कि चिड़ियाघरों में जानवरों की देखरेख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी किस पर आती है.
इसका जवाब देते हुए शर्मा कहते हैं, “केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण नियमित रूप से सभी चिड़ियाघरों का मुआयना करता है."
"अगर वे मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं तो उन्हें सुधार करने के लिए कहा जाता है, किसी भी चिड़ियाघर की मान्यता स्थाई नहीं होती है यानी मान्यता रद्द हो सकती है.”
लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर चिड़ियाघर में हाथी या बाघ जैसे संरक्षित जानवरों की मौत होती है तो उस स्थिति में जांच से लेकर जानवर के शव को जलाने या दफ़नाने की ज़िम्मेदारी किसकी होगी.
हाथी या बाघ के मरने पर क्या?

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रिलायंस समूह की ओर से जारी एक वीडियो में एक दाँत वाला हाथी भी नज़र आता है.
हाथियों को भारतीय वन्यजीव संरक्षण क़ानून, 1972 के तहत शेड्यूल – 1 में बाघों के स्तर का संरक्षण देने का प्रावधान दिया गया है.
सवाल उठता है कि अगर किसी हाथी या बाघ की मौत होती है तो उस स्थिति में उसके दाँतों और नखों का नियमों के मुताबिक़ अंत कैसे होगा?
ये सवाल इसलिए है क्योंकि भारतीय वन्य विभाग के लिए हाथी दांत जैसी चीज़ों का व्यापार रोकना बड़ी प्राथमिकता रहा है.
इस सवाल पर ब्रजराज शर्मा कहते हैं, “इसके लिए एक तय प्रक्रिया है. अगर किसी शेड्यूल – 1 जानवर की मौत होती है तो चिड़ियाघर को राज्य के चीफ़ वाइल्डलाइफ वॉर्डन और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ जानकारी देनी होती है."
"हाथियों के मामले में सामान्य रूप से दांतों को शरीर से अलग नहीं किया जाता है. पूरे शरीर को ही जलाया जाता हैं. हालांकि अगर जानवर को कोई संक्रामक बीमारी है तो उस स्थिति में उसे पोस्ट मार्टम के बिना ही दफ़नाया जाता है.”
एक आशंका ये भी है कि एक निजी चिड़ियाघर में कोई अनुचित गतिविधि होती है तो उस स्थिति में वन विभाग क्या कर सकता है.
इस पर शर्मा कहते हैं, “अगर कभी कुछ ऐसा होता है तो वन विभाग के शीर्ष अधिकारी संबंधित ज़ू के ख़िलाफ़ जांच करने से लेकर कार्रवाई करने जैसे कदम उठा सकते हैं."
क्या हैं सीमाएँ?

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इस तरह की पहल का समर्थन करने वालों की मानें तो ये एक अच्छा विचार है.
वे अफ़्रीका से लेकर पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हैं जहां निजी स्तर पर इस तरह और इससे बड़े पार्कों को चलाया जा रहा है.
हालांकि, वन विभाग से जुड़े एक शीर्ष अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहते हैं, "इसमें दो राय नहीं है कि वन विभाग के पास संसाधन सीमित हैं. निजी स्तर पर बचाव, इलाज और पुनर्वास जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं."
"इस प्रक्रिया में जंगलों में रहने वाले जीवों को निजी चिड़ियाघरों में लाने से बचा जाना चाहिए. अगर जंगलों में रहने वाले जीवों को लाया भी जाता है तो इलाज के बाद उन्हें जंगलों में छोड़ना सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे असली जंगल में लौट सकें."
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