कुछ जानवरों में हंसी-मज़ाक़ की आदत कैसे विकसित हो गई?

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- Author, जैस्मिन फॉक्स-स्केली
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हमें लगता है कि हंसी-मज़ाक़ करने की आदत एक ऐसी ख़ूबी है, जो सिर्फ़ इंसानों में पाई जाती है. लेकिन, कुछ जानवर भी ऐसे हैं जो हंसी-मज़ाक़ या मसखरी के ज़रिए अपने बीच के रिश्तों को मज़बूती देते हैं.
जब आप ये सोचते हैं कि वो कौन सी ख़ूबी है, जो हमारी प्रजाति को दूसरे जानवरों से अलग करती है, तो शायद अंतर वाली इस फ़ेहरिस्त में हंसी-मज़ाक़ करने की आदत सबसे ऊपर आती है.
हमें हंसना पसंद है. इस हद तक कि कॉमेडी का लुत्फ़ उठाना मानो हमारी नस्ल की रगों में समाया हुआ है. जिन नवजात बच्चों को इस दुनिया में आए हुए महज़ तीन महीने बीते होते हैं, वो भी खिलखिलाते हैं. जब उनके मां-बाप मज़ाक़िया चेहरे बनाते हैं, तो छोटे बच्चों तक को बहुत मज़ा आता है. आठ महीने का होते होते नवजात बच्चे ख़ुद अपनी शक्ल, बदन और आवाज़ का ऐसा इस्तेमाल करना सीख जाते हैं, जिससे बड़ों को भी हंसी आ जाए.
इसके बाद बहुत जल्दी ही मां-बाप ये महसूस करते हैं कि उनका बच्चा पूरी तरह से मसखरे में तब्दील हो गया है. बच्चे जान-बूझकर ऐसी चीज़ों से खेलना शुरू कर देते हैं, जिनके बारे में उन्हें मालूम होता है कि ऐसा नहीं करना चाहिए और ऐसी शैतानियां करते वक़्त अक्सर बच्चों की शक्ल पर शैतानी मुस्कुराहट तारी होती है.
हालांकि, एक नई स्टडी में पता चला है कि इस धरती पर किसी से हंसी मजाक़ करने के मामले में इंसानी नस्ल अकेली नहीं है. कई जानवर भी आपस में शरारतें करते हैं. एक दूसरे से मसखरी करते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया लॉस एंजेलिस की रिसर्चर इज़ाबेल लॉमर ने अपने साथियों के साथ मिलकर बड़े बंदरों के बीच आपसी बर्ताव और हरकतों के 75 घंटों के वीडियो देखे.
वानरों की ये प्रजातियां धरती पर इंसान के सबसे क़रीबी रिश्तेदार हैं. इनमें ओरांगउटान, चिंपांज़ी, बोनोबोस और गोरिल्ला शामिल हैं. इस स्टडी में शामिल सारे जानवर चिड़ियाघरों में रह रहे थे. इन वीडियो में उनकी रोज़मर्रा की आदतों को रिकॉर्ड किया गया था.
जानवरों में चिढ़ाने की आदत

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इन सभी नस्लों के जानवरों को एक दूसरे से शरारत करते, एक दूसरे को चिढ़ाते हुए देखा गया. रिसर्चरों ने इन ओरांगउटान, चिंपांज़ी, बोनोबोस और गोरिल्ला की एक-दूसरे से शरारत करने वाली 18 अलग-अलग हरकतों को दर्ज किया. इनमें से पांच सबसे ज़्यादा दोहराई गई आदतों में कोंचना, मापना, अपने साथी के आने जाने की राह में अड़ंगा लगाना, अपने बदन को दूसरे पर दे मारना और दूसरों के शरीर के अंगों को खींचना शामिल है.
कुछ जानवरों को तो बार-बार अपने साथियों के चेहरे के सामने अपना शरीर या फिर किसी और चीज़ को हिलाते देखा गया. वहीं कुछ ओरांगउटान बार-बार अपने साथियों के बाल खींचते पाये गए.
कुत्तों को बड़ी तेज़ी से कूदने और फिर अचानक भाग जाने जैसे करतब दिखाने के लिए तैयार किया जा सकता है.
इस स्टडी की लेखिका इज़ाबेल लॉमर कहती हैं, ''हमने इन जानवरों को देखा कि अक्सर कोई किशोर उम्र वाला बंदर उस वक़्त किसी वयस्क के पीछे से अचानक कूद पड़ता था, जब वो अपने साथी के बालों में जुएं तलाश रहा होता था, या फिर दोनों एक साथ बैठे होते थे. कई बार ये किशोर उम्र जानवर अपने से बड़ों को कोंच देते थे या फिर पीठ पर धप्पा मार देते थे और कई बार वो अचानक कूदकर उन्हें चौंका देते थे.''
इज़ाबेल बताती हैं, ''इसके बाद ये छोटे जानवर अपने बड़ों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते थे. आमतौर पर इस शरारत का शिकार होने वाला बड़ा जानवर बच्चों की हरकतों की अनदेखी कर देता था. फिर वो बार बार वही शरारतें और चिढ़ाने वाली हरकतें दोहराते थे. उनकी हरकतें ऐसी हो जाती थीं, जिनकी अनदेखी कर पाना मुश्किल हो जाता था. कई बार तो ये बच्चे अपने बड़ों के शरीर पर अपना पूरा बदन ही दे मारते थे, ताकि उनका ध्यान अपनी तरफ़ खींच सकें.''
रिसर्चरों के मुताबिक़, ओरांगउटान, गोरिल्ला और चिंपांज़ी जैसे दूसरे जानवरों के बीच चिढ़ाने वाला ये बर्ताव, इंसानों के छोटे बच्चों जैसा ही था. ये हरकतें वो जान-बूझकर, खिझाने और ग़ुस्सा दिलाने के लिए कर रहे थे और वो ऐसा बार-बार, लगातार कर रहे थे. इसमें कई बार चौंका देने वाला खिलंदड़पन शामिल होता था, जिसमें वो अपनी शरारत के शिकार वयस्क जानवर की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते देखे गए.
इसको अगर हम इंसानों के बच्चों के बर्ताव से मिलाएं, तो ऐसा ही है कि कोई बच्चा जीभ निकालकर बड़ों को चिढ़ाए और फिर भाग जाए और देखे कि बड़े उसकी हरकत का क्या जवाब देते हैं.
बहुत से वैज्ञानिकों का मानना है कि जानवरों के बीच ऐसा मसखरापन हमारी जानकारी से कहीं ज़्यादा आम है.
इंसान के चार जंगली रिश्तेदार

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चिढ़ाने का ये तरीक़ा शायद और पेचीदा मज़ाक़िया हरकतों की बुनियाद बनता होगा.
इज़ाबेल लॉमर कहती हैं, ''इंसानों के बीच हंसी मज़ाक़ करने के लिए काफ़ी जटिल ज्ञानात्मक क्षमताओं की ज़रूरत होती है. आपको थियरी ऑफ माइंड (यानी किसी और के नज़रिए से दुनिया देखने की क़ुव्वत) की ज़रूरत होती है. आपको सामाजिक नियम क़ायदों की जानकारी होनी चाहिए और अपनी हरकतों के जवाब में दूसरों की प्रतिक्रिया का भी अंदाज़ा होना चाहिए और इस बात की समझ भी होनी चाहिए कि किस तरह आप दूसरों की उम्मीदों को धता बता सकते हैं.''
इंसानों के चारों दूसरे बड़े जंगली रिश्तेदार यानी ओरांगउटान, बोनोबोस, चिंपांज़ी और गोरिल्ला खेल-खेल में शरारतें करने में सक्षम होते हैं. इससे पता चलता है कि आज से लगभग 13 लाख साल पहले जब हम दोनों के साझा पूर्वज इस धरती पर रहा करते थे, तो उनके अंदर भी हंसी मज़ाक़ करने की आदत पायी जाती रही होगी.
हालांकि, बहुत से वैज्ञानिकों का ये मानना है कि जानवरों के बीच हंसी-मज़ाक़ की ये आदत कहीं ज़्यादा बड़े पैमाने पर पाई जाती हैं. मिसाल के तौर पर अपनी किताब 'दि डिसेंट ऑफ मैन' में जीव वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने लिखा है कि कुत्तों में भी मसखरेपन की आदतें हो सकती हैं.
वो लिखते हैं, ''अगर डंडे का कोई टुकड़ा या फिर ऐसा ही कोई सामान किसी कुत्ते की तरफ़ फेंका जाए, तो अक्सर वो उसे कुछ दूर तक उठाकर ले जाता है और फिर उसे अपने पास रखकर ज़मीन पर बैठ जाता है और तब तक इंतज़ार करता है, जब तक कुत्ते का मालिक उससे वो डंडा लेने के लिए उसके पास नहीं जाता. जैसे ही मालिक उसके क़रीब पहुंचता है, तो कुत्ता उस डंडे को फिर से उठाकर जीत के भाव से भाग जाता है. वो ऐसी हरकत बार-बार दोहराता है और ऐसा लगता है कि ये मज़ाक़ दोहराने से उसे ख़ूब मज़ा आता है.''
जानवरों में खेलने-कूदने की आदत

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भेड़िये और कुत्तों से जुड़ी और दूसरी प्रजातियों के जानवरों में भी खेल-कूद की ऐसी आदतें पाई जाती हैं.
कुत्ते पालने वाले किसी भी शख़्स ने ये भी देखा होगा कि खेल-कूद के दौरान कुत्ते गहरी सांस लेकर गुर्राहट की आवाज़ निकालते हैं, जो लगभग हंसी जैसी मालूम देती है. 2005 में की गई एक स्टडी में जानवरों के बर्ताव की विशेषज्ञ पैट्रिशिया सिमोनेट ने कुत्तों के शेल्टर होम में ऐसी ही रिकॉर्ड की गई आवाज़ों को सुनाया. उन्होंने देखा कि शेल्टर होम के कुत्ते बड़े ध्यान से कुत्तों की ये ‘हंसी’ वाली आवाज़ सुन रहे थे और इससे उनका तनाव काफ़ी कम हुआ था.
अमेरिका के बोल्डर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो में इकोलॉजी और जैविक विकास के मानद प्रोफ़ेसर मार्क बेकॉफ कहते हैं कि उन्होंने कई दशकों तक ऐसे आंकड़े जुटाए हैं, जो दिखाते हैं कि कुत्ते उसी तरह की शरारतें वाला बर्ताव करते हैं, जैसा इज़ाबेल लॉमर और उनकी टीम ने गोरिल्ला, ओरांगउटान, चिंपांज़ी और बोनोबोस में देखा है.
मिसाल के तौर पर जब किसी ऐसे कुत्ते के साथ खेलने की कोशिश की जाती है, जिसका मन न हो, तो वो एक छलांग लगाने वाला हाव-भाव बनाता है और फिर अचानक भाग जाता है.
मार्क बेकॉफ़ कहते हैं, ''मैंने कुत्तों, लोमड़ियों, जंगली बिल्लियों और जंगली भेड़ियों को ऐसी हरकतें करते हुए देखा है.''
बेकॉफ़ कहते हैं कि सच तो ये है कि अपने करियर के दैरान उन्होंने बहुत से जानवरों के स्टैंड-अप कॉमेडियन और मसखरों जैसा बर्ताव करने के क़िस्से सुने हैं. शरारतें करने वाले इन जानवरों में घोड़े, एशियाई काले भालू और लाल तोते शामिल हैं.
हंसी-मज़ाक़ का आनंद लेते चूहे

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इस बीच दूसरे रिसर्चरों ने पाया है कि डॉल्फिनें भी खेल-कूद के वक़्त ख़ुशी जताने वाली आवाज़ें निकालती हैं. हाथी भी खेलते समय शोर मचाते हुए चिंघाड़ते हैं. कुछ तोतों को मज़े के लिए दूसरे जानवरों से छेड़खानी करते देखा गया है. मसलन घरेलू कुत्ते को सीटी बजाकर हैरान परेशान करना.
सुबूत तो इस बात के भी हैं कि चूहे भी हंसी-ठट्ठा करना पंसद करते हैं. पिछले एक दशक या इससे भी ज़्याद वक़्त से अमेरिका की नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में रिसर्च एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेफरी बर्गडॉर्फ़ चूहों को गुदगुदी करके ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. जब चूहों को गुदगुदी की जाती है, तो वो ख़ुशी से सीटी बजाने वाली वैसी ही आवाज़ निकालते हैं जैसे कोई खिलखिलाकर हंस रहा हो. इसके बाद वो गुदगुदी कराने के लिए बार-बार क़रीब आते हैं.
यही नहीं, बर्लिन की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों द्वारा की गई एक अलग स्टडी के मुताबिक़, गुदगुदी करने के बदले में चूहों को लुका-छिपी खेलने के लिए भी प्रशिक्षित किया जा सकता है. अब बर्गडॉर्फ़ और उनकी टीम इस रिसर्च के नतीजों का इस्तेमाल डिप्रेशन के इलाज के लिए करने में जुटी है.
जेफरी बर्गडॉर्फ़ कहते हैं, ''हमने ये सीखा है कि जब जानवर अपनी अभिव्यक्ति आवाज़ निकालकर करते हैं, तो वो बहुत सतर्क होते हैं.''
गुदगुदाने पर चूहों को खिलखिलाने वाली आवाज़ निकालते पाया गया है.
जेफरी बर्गडॉर्फ़ बताते हैं, ''मेरे सुपरवाइज़र [न्यूरोसाइंटिस्ट जाक पैंकसेप] हमेशा ये कहते थे कि खेल-कूद दिमाग़ की खाद है और ये बात सच है. उनके दिमाग़ इस बात से जुड़ते हैं. खेल-कूद से दिमाग़ में तंत्रिकाओं के नए कनेक्शन बनते हैं, और नई चेतना पैदा होती है. और इसीलिए मुझे लगता है कि जब हम हंसी मज़ाक़ और शरारत के मूड में होते हैं, तो शायद हम अपना बेहतरीन बर्ताव कर रहे होते हैं और वो हमारे व्यक्तित्व का सबसे अच्छा प्रदर्शन होता है.''
हालांकि, चूहे भले ही गुदगुदी किया जाना पसंद करते हैं. लेकिन, क्या उनकी तेज़ आवाज़ वाली खिलखिलाहट इस बात का सुबूत है कि उनके अंदर हंसी मज़ाक़ की क्षमता होती है. जानवरों के हंसी मज़ाक़ करने की आदत के ज़्यादातर सबूत मोटे तौर पर सीमित तजुर्बे वाले हैं. इनको लेकर बड़े पैमाने पर कोई स्टडी नहीं की गई है.
कोई जानवर एक ख़ास तरह का बर्ताव क्यों करता है, ये बात समझ पाना भी मुश्किल होता है. तो इज़ाबेल लॉमर की स्टडी में शामिल गोरिल्ला, चिंपांज़ी और ओरांगउटान एक मज़ाक़ कर रहे थे या फिर वो अपना तनाव कम कर रहे थे. खेल-कूद का आग़ाज़ कर रहे थे या फिर वो सिर्फ़ दूसरों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश कर रहे थे?
दोस्त बनाने का सबसे बेहतर तरीक़ा क्या हो सकता है?

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मार्क बेकॉफ़ कहते हैं, ''क्या मैं ये मानता हूं कि जानवरों में हंसी-मज़ाक़ की आदत होती है. हां, मुझे लगता है कि उनमें खिलंदड़पन होता है.''
लेकिन वो ये भी मानते हैं कि ये बात साबित कर पाना मुश्किल है.
बेकॉफ़ कहते हैं, ''मिसाल के तौर पर मैंने ऐसे कई परिवारों को देखा है, जहां दो कुत्ते साथ रहते हैं. जब उन्हें खाना खिलाने का वक़्त होता है, तो एक कुत्ता दौड़कर बाहर के दरवाज़े पर जाता है और भौंकता है. इसके बाद दूसरा कुत्ता दौड़कर ये देखने जाता है कि वहां कौन है. जबकि पहला वाला कुत्ता वापस आकर दोनों का खाना खा लेता है. तो आप ये कह सकते हैं कि पहले वाले कुत्ते ने ये सीख लिया है कि ज़्यादा खाना कैसे हासिल किया जाए."
लेकिन, सवाल ये है कि मज़ाक़ की आदत, जानवरों के विकास की प्रक्रिया में कौन सी भूमिका अदा करती है. इंसानों में तो ये माना जाता है कि हंसी-मज़ाक़ से दो इंसानों के बीच संबंध बनता है. आख़िर दोस्त बनाने का इससे बेहतर तरीक़ा क्या हो सकता है कि दो लोग एक जोक आपस में शेयर करें.
क्या ये मुमकिन है कि हंसी मज़ाक़ जानवरों में भी यही भूमिका अदा करे?
इस सवाल के जवाब में इज़ाबेल कहती हैं, ''इंसानों में तो हंसी मज़ाक़ दूरियां कम करने का ज़रिया बन सकता है. ये सामाजिक दूरियों को कम करता है और रिश्तों को मज़बूत बनाता है.''
वो कहती हैं, ''हमें ये नहीं मालूम कि गोरिल्ला, चिंपांज़ी और ओरांगउटान जैसे जानवरों के बीच भी हंसी मज़ाक़ यही भूमिका अदा करता है. लेकिन, ये मुमकिन है. पक्के तौर पर इसका पता लगाने के लिए हमें ऐसे जानवरों और दूसरी प्रजातियों के अन्य समूहों पर रिसर्च करनी होगी.''
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