सांडे का तेल: 'मर्दाना कमज़ोरी' के इलाज में जान गंवाने वाला मासूम जानवर

- Author, उमर दराज़ नंगियाना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लाहौर
पाकिस्तान के गरम रेगिस्तानी इलाक़ों में रेत पर रेंगता ये मासूम सा जानवर सांडा कहलाता है.
शिकारी और परिंदों से बचते इसके दिन गुज़रते हैं लेकिन ये ख़ुद को इंसान से नहीं बचा पता. दूसरे हर जानवर की तरह इसमें भी चर्बी पाई जाती है इसकी चर्बी पर इंसान की ख़ास नज़र है.
इसलिए ये आपको लाहौर की गलियों, चौराहों में सड़क किनारे या फिर ठेलों, दुकानों पर बैठा मिलेगा. मगर सांडा वहां ख़ुद से नहीं आता है. रेगिस्तान से पकड़ कर लाया जाता है.
यहां ये चल फिर नहीं सकता क्योंकि इसकी कमर की हड्डी तोड़ दी जाती है. इसके बाद इसकी ज़िंदगी के दिन गिने चुने होते हैं.
फ़ुटपाथों पर मजमा लगाए या फिर बड़ी-बड़ी दुकानों पर 'सांडे के शुद्ध तेल' की शीशियां सजाए सांडे के उन शिकारियों को ग्राहक मिलने की देर है, वो चाकू की मदद से इसका नरम पेट चीरते हैं और अंदर मौजूद चर्बी निकाल लेते हैं.
ये सब कुछ ग्राहक की नज़रों के सामने किया जाता है. ताकि उसको तसल्ली हो की ये 'असली तेल' है.

सांडे के तेल में ऐसा क्या है?
अंदरूनी लाहौर में ऐसे बहुत से इलाक़े हैं जहाँ आपको सांडे के तेल की दुकानें मिल जाएंगी. उनमें से कुछ तो कई दशकों से मौजूद हैं. मोहिनी रोड, बिलालगंज, भाटी दरवाज़ा, मछली मंडी और पीर मक्की बाज़ार जैसे इलाक़ों में सांडे के तेल का कारोबार खुले आम होता है.
लेकिन उन दुकानों पर मौजूद ख़रीदार बात करने से कतराते हैं. वो डरते हैं कि उनके किसी जानने वाले को पता न चल जाए. ठोकर नियाज़ बेग में एक पुल के नीचे कुछ सांडे लिए बैठे एक विकलांग व्यक्ति के पास एक नौजवान मौजूद था.
पतुकी से आए इस नौजवान ने अपना नाम मोहम्मद यासीन बताया. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो अपने किसी दोस्त के लिए सांडे का तेल लेने आये थे.
"ये मैंने पहले भी अपने एक दोस्त को भिजवाया था तो उसको थोड़ा फ़ायदा हुआ है. अब उसने फिर मुझे दुबई से कहा है कि उसे शुद्ध सांडे का तेल चाहिए. तो मैंने यहां अपनी आँखों के सामने निकलवाया है."
वो समझाते हैं कि सांडे के तेल में एफ्रोडेसियाक विशेषताएं हैं. यानी ये मर्दाना ताक़त को बढ़ाता है. वो कहते हैं, "ये लिंग की कमज़ोरी के लिए है. मर्दाना कमज़ोरी के लिए लिंग की मालिश करते हैं."

'मर्दाना कमज़ोरी' का इलाज
मोहम्मद यासीन की उम्र 20 से 30 साल के बीच की है. वो पढ़े लिखे भी नहीं हैं.
ऐसे में सवाल ये है कि उन्हें सांडे के तेल के बारे में ये जानकारी कहां से मिली है? इसके लिए आप भाटी गेट के इलाक़े में स्थित किसी भी सांडे वाले के पास चले जाएं.
वो इसके बारे में बात करना शुरू करते हैं तो लोगों की एक भीड़ उनके आस पास जमा हो जाती है. ऐसे ही एक तेल बेचने वाले ने वन विभाग के डर से पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बीबीसी से बात की.
उनके पास एक दर्जन से अधिक टूटी हुई कमर वाले सांडे थे. उनका दावा था कि ये तेल बदन के दर्द, फालिज और पुट्ठों की कमज़ोरी के अलावा 'मर्दाना कमज़ोरी' के इलाज के लिए फायदेमंद है. मर्दाना कमज़ोरी के लिए लिंग पर इसकी मालिश होती है. उनके अनुसार ये जानकारी उनके बाप दादा से उन तक पहुंची है. उनका ख़ानदान यही कारोबार करता है.
उनकी रेहड़ी पर सिर्फ़ सांडे और तेल की शीशियां ही मौजूद नहीं थी. एक पिटारी में एक सांप मौजूद था. जबकि दो सांप नीचे एक डब्बे में छुपा कर रखे गए थे. एक मर्तबान में जोंक मौजूद था और कई मर्तबान कई प्रकार की चर्बियों से भरे हुए थे.
उन्होंने बताया कि ये चर्बियां शेर, रीछ, सांप, मेंढक और ऐसे ही दूसरे जानवरों की थी. जिन्हें सांडे के तेल में डालकर एक ख़ास तेल तैयार किया जाता है. इससे सांडे के तेल का प्रभाव बढ़ जाता है. ये तेला ज़्यादा गरम होता है.
उनके अनुसार इन जानवरों की चर्बियां बेचने वाले भी मौजूद हैं जिनसे उन्हें ये आसानी से मिल जाती है. ये ग्राहक पर निर्भर करता है कि उसे क्या चाहिए. जो उनकी डिमांड होती है हम तैयार कर देते हैं.
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'ज़्यादातर तो जवान बच्चे ही आ रहे हैं'
सांडे का तेल ख़रीदने के लिए उनके पास हर उम्र के लोग आते हैं. मगर ज़्यादातर नौजवान बच्चे आते हैं. उन्होंने बताया, "बच्चे ये इंटरनेट वग़ैरह देख कर भाटी चले आते हैं तेल लेने. ख़ुद बड़े हुए नहीं, लेकिन तेल लेलो."
ये कह कर वो हंस देते हैं. वो और उन जैसे सांडे का कारोबार करने वाले लोगों ने मर्दाना कमज़ोरी या इरेक्टाइल डिस्फंक्शन के संबंध में ग्राहक को डरा देने वाली कहानियां सुनाते हैं.
उनका कहना यही होता है कि ज़्यादा सेक्स या फिर सेक्स के दौरान की जाने वाली ग़लतियां इस कमज़ोरी की वजह बनती हैं. ऐसे तमाम दावों का संबंध मेडिकल साइंस और उसमें रिसर्च से है जबकि ऐसे ज़्यादातर लोग अनपढ़ होते हैं.
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क्या सांडे का तेल वास्तव में फायदेमंद है?
प्रोफ़ेसर डॉक्टर मुज़म्मिल ताहिर लाहौर के आयुर केयर अस्पताल में यूरोलॉजिस्ट हैं और लाहौर ही के शेख़ ज़ियाद अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष रह चुके हैं.
बीबीसी से बात करते हुए उनका कहना था कि सांडे के तेल के कथित फायदों के सम्बन्ध में की जाने वाली बातें मनगढंत हैं.

'अगर आप सांडे के तेल में निकलने वाली चर्बी की मेडिकल जांच करें तो आपको पता चलेगा कि ये किसी भी जीव में पाई जाने वाली दूसरी चर्बी की तरह है और इसमें कोई ख़ास बात नहीं है'.
उनका कहना था कि तिला में भी कोई ऐसी ख़ासियत नहीं है जो किसी भी तरह की यौन कमज़ोरी का इलाज कर सके.
बल्कि हमने बहुत से ऐसे लोग देखे हैं जो जलने के बाद हमारे पास आते हैं.जिस जगह वो तिला लगते हैं वो जगह जल जाती है. फिर प्लास्टिक सर्जरी करानी पड़ती है.
'इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की अधिकतर कोई वजह ही नहीं होती'.
डॉक्टर मुज़म्मिल का कहना था कि जिस इरेक्टाइटिक डिस्फंक्शन का सांडे के तेल से इलाज करने का दवा किया जाता है. 90 फ़ीसद मामलों में ये किसी शारीरिक अंग की वजह से नहीं होता है.
जिन लोगों में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन हों, उनकी अगर साइकोथेरेपी की जाए तो 60 से 70 फ़ीसद लोग वैसे ही ठीक हो जाएंगे.
बाक़ी कुछ को दवाओं की ज़रूरत पड़ती है वो उससे ठीक हो जाते हैं.
उनका कहना था कि मेडिकल साइंस ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि हर तरह की बीमारियों का इलाज संभव है. डॉक्टर मुज़म्मिल के अनुसार, सांडे को बिना वजह मार दिया जाता है और ले दे कर ये सब पैसे का खेल है'.

सांडे ही क्यों?
डॉक्टर मुज़म्मिल के अनुसार, पकिस्तान और भारत के कई इलाक़ों के अलावा सांडों को दुनिया के दूसरे कई इलाक़ों में भी इन्ही ग़लत धारणाओं की वजह से मारा जा रहा है. जबकि पकिस्तान से उसका तेल अरब और दूसरे देशों में भी भेजा जाता है.
कई जगह पर उसके यौन अंगों को खाया भी जाता हैं और इसका मीट भी इस्तेमाल होता है. इस सब के पीछे यही सोच काम करती है कि सांडा यौन कमज़ोरियों का इलाज है.
उनका कहना था कि कारोबार में शामिल ज़्यादातर लोग ख़ुद भी अनपढ़ होते हैं और कम पढ़े लोगों को बेवक़ूफ़ बनाकर पैसा बनाते हैं.
उनका कहना था की सदियों से सांडे के बारे में ये धारणा पाई जाती है कि ये छोटा सा जानवर है जिसमें बेपनाह ताक़त पाई जाती है और ये रेगिस्तान के बहुत ही गरम मौसम में भी ज़िंदा रह लेता है. इसी वजह से माना गया कि इसकी चर्बी में बेमिसाल ताक़त होगी.
'बस जो बात सदियों से चल पड़ी है उसको ये लोग चलाये जा रहे हैं. इस पर बहुत शोध हो चुका है जिसमें ये साबित हो चुका है कि सांडे की चर्बी में ऐसी कोई ताक़त नहीं होती है.

सांडे के तेल के कारोबार से कितना पैसा मिलता है?
सांडे का तेल बेचने वाले व्यक्ति ने बताया, ''इसके तेल की आम शीशी 150 से 500 के बीच बिकती है. उनका कहना था कि स्पेशल तिला महंगा भी बिकता है. ये उस पर निर्भर करता है कि ग्राहक को इसमें किस तरह की चर्बी चाहिए.
स्पेशल तिला तीन हज़ार से चार हज़ार तक भी बिक जाता है. जिस तरह की ग्राहक की मांग हो उस तरह का तैयार करके उसको दे देते हैं. उनका कहना था कि एक सांडे को मारकर उसकी चर्बी में से कितना तेल निकलेगा, ये उसके शरीर पर निर्भर करता है.
किसी में से एक तोला तो किसी में से दो तोला भी निकल जाता है.''

ये बातें जब वो शख़्स हमें बता रहा था, तब उन्होंने अचानक पड़े सांडे को उठा कर डब्बे में डालना शुरू कर दिया.
उनका कहना था कि वन विभाग के लोग आ रहे थे.
वो कहते हैं, 'सांडा नहीं रख सकते न हम. वो जुर्माना लगाते हैं या फिर ठेला उठा कर ले जाते हैं.'
मगर शहर के अंदर कितनी ही जगह मौजूद हैं, जहाँ दर्जनों सांडे रोज़ाना खुले आम मारे जा रहे हैं.

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