ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम को बुरी तरह से हराया, जानिए कहाँ रही कमज़ोरी

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय महिला क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वनडे सिरीज़ 3-0 से हार गई. इसने यह साबित किया कि टीम में अब भी बहुत सुधार की ज़रूरत है.
भारत अगर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका जैसी दिग्गज टीमों की ज़मात में शामिल होना चाहता है, तो उसे टॉप बल्लेबाज़ों और बाक़ी बल्लेबाज़ों के बीच जो अंतर है, उसे पाटना होगा.
ऑस्ट्रेलिया ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पर खेली गई सिरीज़ के तीसरे मैच में भारत को 190 रन से हराकर सिरीज़ पर 3-0 से कब्जा जमाया. भारत सिरीज़ हारा ही नहीं बल्कि वह दो मैचों में संघर्ष करते ही नज़र नहीं आया.
सिरीज़ का निर्णायक मोड़

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भारत सिरीज़ के दूसरे मैच में जीत के क़रीब पहुँचकर हारने से वह बराबरी पर आने में असफल हुआ. इसके साथ ही उसका मनोबल भी कमज़ोर हुआ. इसका असर तीसरे वनडे में देखने को मिला. इस मुक़ाबले में टीम कभी भी ऑस्ट्रेलिया से संघर्ष करती नहीं दिखी.
दूसरे वनडे में भारत के टॉप ऑर्डर के नहीं चल पाने पर भी रिचा घोष की जुझारू पारी से भारत जीत की तरफ़ बढ़ रहा था. रिचा घोष जब शतक से सिर्फ़ चार रन दूर थीं, तो वह अपनी धड़कनों पर क़ाबू नहीं रख सकीं. शतक पूरा करने के चक्कर में कैच होकर लौट गईं.
रिचा के आउट होने के समय भारत को जीत के लिए 37 गेंदों में 31 रन बनाने थे. पांच खिलाड़ी आउट होने बाक़ी थे. लेकिन रिचा के आउट होते ही टीम में हड़कंप मच गया.
वे बिना वजह लंबे शॉट खेलने के प्रयास में कैच होकर टीम को जीत से दूर करते चले गए. इस वक्त टीम में ऑलराउंडर के तौर पर शामिल की गईं दीप्ति शर्मा अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने में सफल नहीं हुईं.
दीप्ति रन के लिए गैप ही नहीं खोज पा रहीं थीं, जिसकी वजह से टीम पर दवाब बढ़ता चला गया. इस कारण ही भारत को तीन रन से यह मैच हारना पड़ा. भारत यदि इस मैच को जीत जाता तो सिरीज़ को जीतने के लिए संघर्ष करने की स्थिति में आ सकता था.
टीम को चाहिए मेंटल स्ट्रेंथ

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हम सभी जानते हैं कि मौजूदा दौर में खिलाड़ियों का शारीरिक रूप से मज़बूत होने के साथ मानसिक रूप से मज़बूत होना भी बेहद ज़रूरी है. भारतीय खिलाड़ियों में मानसिक मज़बूती की समस्या लंबे समय से देखी जा रही है.
भारत इस कमज़ोरी की वजह से ही 2022 के कॉमनवेल्थ गेम्स के फ़ाइनल में और पिछले साल टी-20 विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में हारा था. यह कमज़ोरी इस सिरीज़ के दौरान भी देखने को मिली.
भारतीय टीम के पहले तीन-चार बल्लेबाज़ों के जल्दी निकल जाने पर बाक़ी बल्लेबाज़ों के लिए चुनौतियों का सामना करना मुश्किल हो जाता है.
हड़बड़ाहट में बैटर्स की समझ में ही नहीं आता है कि किस तरह से संकट से निकला जाए. इसलिए खिलाड़ियों के मानसिक पक्ष पर काम करने की बहुत ज़रूरत है.
शॉट सिलेक्शन पर भी ध्यान देने की ज़रूरत

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अब हम तीसरे वनडे की ही बात करें तो इसमें ऑस्ट्रेलिया ने जब 339 रन का लक्ष्य रखा तो भारतीय शीर्ष बैटर्स को थोड़ी सजगता से खेलना चाहिए था.
लेकिन कई बार देखा गया है कि कई भारतीय बैटर्स पहले से मन बना लेते हैं कि उन्हें क्या शॉट खेलना है और कई बार गेंद वह शॉट खेलने वाली नहीं होती है. इस मैच में रिचा घोष और कप्तान हरमनप्रीत कौर दोनों इस समस्या के कारण ही आउट हुईं.
भारत ने वैसे तो ऑस्ट्रेलिया को 338 रन बनाने की छूट देकर पहले ही मैच पर से अपनी पकड़ ढीली कर ली थी. बाक़ी का काम भारत के प्रमुख बैटर्स के ग़ैर ज़िम्मेदाराना शॉटों को खेलने से हो गया.
गेंदबाज़ी में पैनापन लाने की ज़रूरत

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भारतीय गेंदबाज़ों ने अभी कुछ ही दिनों पहले दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच जीतने के दौरान जिस उम्दा गेंदबाज़ी का प्रदर्शन किया था, उससे लग रहा था कि भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ कभी ना सिरीज़ जीत पाने के रिकॉर्ड को सुधारने के लिए खेलती नजर आएगी.
लेकिन खेल लाल गेंद से सफ़ेद गेंद पर आते ही भारत के प्रदर्शन में सालों से दिखने वाली कमजोरियां साफ़ दिखने लगीं.
तीसरे वनडे के दौरान तो लगा कि दोनों टीमें अलग-अलग व्यवहार वाले विकेट पर खेल रहीं हैं. ऑस्ट्रेलिया की ओपनर लिचफील्ड और कप्तान एलिसा हीली के खेलते समय लग रहा था कि विकेट एकदम से बेजान है.
भारत की कोई भी गेंदबाज़ प्रभाव नहीं छोड़ पा रही थी. लिचफील्ड शतक लगाने के साथ रिकॉर्ड 189 रन की ओपनिंग साझेदारी निभाने में सफल हो गईं.
भारत ने जब 216 रन के स्कोर पर चार प्रमुख बैटर्स को लौटा दिया तो लगा कि पारी 270-280 के आसपास सिमट जाएगी. लेकिन भारतीय गेंदबाज़ इस महत्वपूर्ण मौक़े पर पुछल्ले बैटर्स पर लगाम नहीं लगा सके और उन्हें विशाल स्कोर बनाकर मैच को हाथ से बाहर जाने दिया.
भारत के गेंदबाज़ों ने टुकड़ों में ही अच्छा प्रदर्शन किया. दीप्ति शर्मा ने टेस्ट की ही तरह दूसरे वनडे में पांच विकेट निकालने का गौरव हासिल किया.
पर भारतीय टीम की दिक़्क़त यह रही है कि एक गेंदबाज़ चलता है तो बाक़ी से उसे सहयोग नहीं मिलता है, इससे सामने वाली टीम पर लगाम नहीं लगाई जा पाती है.
तीसरे वनडे में जब भारतीय बैटर्स उतरे तो लगा कि विकेट में स्पिनरों के लिए बहुत जान है.
भारतीय बैटर्स को वारेहम, एलना किंग और गार्डनर की फिरकी के सामने टिक ही नहीं पाए. इससे यह तो साफ़ है कि हमारे गेंदबाज़ स्थिति का फ़ायदा उठाने में सक्षम नहीं हैं.
भारत-ऑस्ट्रेलिया की फ़ील्डिंग में अंतर

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भारत को यदि वनडे क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका के समकक्ष खड़े होना है तो फ़ील्डिंग में बहुत सुधार करने की ज़रूरत है.
हमारे फ़ील्डर मैदान में बहुत मेहनत करते नज़र नहीं आती हैं. उन्हें ऑस्ट्रेलियाई फ़ील्डरों से सीखने की ज़रूरत है. वह अच्छी डाइव लगाकर आसानी से रन बनाने का मौका नहीं देती हैं. वहीं हमारे फ़ील्डरों की तरफ़ सीधी गेंद जाने पर भी ऑस्ट्रेलियाई बैटर्स रन लेने को दौड़ते दिखे.
भारतीय खिलाड़ियों को अपनी कैचिंग में भी बेहद सुधार की ज़रूरत है. भारत के दूसरा वनडे हारने में सात छूटे कैचों ने अहम भूमिका निभाई.
इसके विपरीत ऑस्ट्रेलिया के फ़ील्डरों ने तीसरे वनडे में कुछ बेहद शानदार कैच पकड़कर भारत पर दवाब बनाने में अहम भूमिका निभाई.
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