महिला क्रिकेटरों के संघर्ष के वो क़िस्से, जो आपको भावुक करेंगे और चौकाएँगे भी

महिला क्रिकेट विश्व कप टीम इंडिया

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    • Author, शारदा उगरा
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत की युवा महिला क्रिकेटरों ने हाल ही में आईसीसी अंडर-19 टी-20 वर्ल्ड कप जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े टूर्नामेंट में देश को पहली कामयाबी दिलाई है.

ये जीत इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारत ने अपेक्षाकृत मज़बूत मानी जाने वाली इंग्लैंड की महिला टीम को हराया है.

बीते महीने ही क्रिकेट के सबसे बड़े माने वाले बाज़ार में महिला आईपीएल की शुरुआत की घोषणा कर दी गई है.

अभी इस टूर्नामेंट में एक भी गेंद का खेल नहीं हुआ है, लेकिन इसे लेकर चर्चा का दौर शुरू हो चुका है.

वीमेंस प्रीमियर लीग (डब्ल्यूपीएल) की टीम और उसके मीडिया राइट्स में जिस तरह का निवेश देखने को मिला है, वह वीमेन क्रिकेट इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा निवेश है.

अब वह समय नहीं रहा और ना ही आने वाले दिनों में ऐसा होगा कि महिला क्रिकेट को पुरुषों की उदारता वाली नजरों से देखा जाएगा, क्योंकि महिला क्रिकेटरों ने अपने हिस्से की एक-एक इंच ज़मीन के लिए संघर्ष किया है और उसे हासिल किया है.

भारतीय महिला क्रिकेट का इतिहास 1970 के दशक में शुरू हुआ. लेकिन इससे काफ़ी पहले 1745 में आधिकारिक तौर पर महिलाओं का पहला क्रिकेट मैच खेल गया था.

इंग्लैंड वीमेंस क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना 1927 में हुई और इंग्लैंड की महिला टीम ने टीम ने इसके सात साल बाद 1934 में ऑस्ट्रेलिया का पहली बार दौरा किया.

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इमेज कैप्शन, 'चकदा एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर झूलन गोस्वामी

ट्रेन के सेकेंड क्लास में सफ़र

महिला क्रिकेटरों के संघर्षों की कई कहानियाँ हैं, ख़ासकर भारत में.

1970 और 1980 के दशक के अंत तक भारत की इंटरनेशनल टीम को ट्रेन में सेकेंड क्लास में सफ़र करना पड़ता था. जबकि उस दौर में शांता रंगास्वामी और डायना एडुलजी जैसी लीजेंड क्रिकेटर भी टीम में थीं.

इन खिलाड़ियों को अपने किट बैग के साथ ट्रेन में सफ़र करना होता था और कई बार सभी टिकट आरक्षित भी नहीं होते थे.

खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधा का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि दो टीमों को एक बड़े स्कूल के प्रेयर हॉल में फ़र्श पर गद्दे बिछाकर ठहराया जाता था.

दो टीमों के बीच रस्सी खींच कर उस पर चादर टांग कर दीवार बना दी जाती थी.

आज यक़ीन करना भले ही मुश्किल हो लेकिन वह दौर भी महिला क्रिकेट ने देखा है, जब खिलाड़ियों को बोर्ड से पहली बार मैच फ़ीस लेने के लिए वर्ल्ड कप मैच में हिस्सा नहीं लेने की धमकी देनी पड़ी थी.

जब महिला क्रिकेट की देखरेख का ज़िम्मा बीसीसीआई ने संभाला, तो भी स्थिति बहुत नहीं बदली, टीम के खिलाड़ियों को पुरुष खिलाड़ियों के स्पांसर के बनाए गए ड्रेस में से बाक़ी बचे कपड़ों में खेलना होता था.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड के एक चुने हुए अध्यक्ष ने भारत की पूर्व कप्तान डायना एडुलजी को कहा था, "अगर मेरा बस चलता तो मैं महिला क्रिकेट होने ही नहीं देता."

मौजूदा समय में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और वेस्टइंडीज़ ने भी महिला क्रिकेट को बढ़ावा देना शुरू किया है, लेकिन मैदान में भारतीय क्रिकेटरों ने अपने दमदार प्रदर्शन से फैंस का दिल कई मौक़ों पर जीता है.

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दो बड़े टूर्नामेंट के फ़ाइनल खेल चुकी है टीम

महिला क्रिकेट में आईसीसी के दो बड़े आयोजनों में भारतीय टीम फ़ाइनल तक पहुँच चुकी है.

2017 के वीमेंस वर्ल्ड कप और 2020 के टी-20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम फ़ाइनल तक पहुंची थी और ये हमेशा अहम पड़ाव के तौर पर याद किए जाते रहेंगे.

इन दोनों कामयाबी से भारतीय खिलाड़ियों को कहीं ज़्यादा एक्सपोज़र मिला. भारत की शीर्ष महिला खिलाड़ियों को वीमेंस बिग बैश टूर्नामेंट और इंग्लैंड में केआईए सुपर लीग और वीमेंस हंड्रेड में खेलने का मौक़ा मिला.

महिला क्रिकेट में सभी आयु वर्ग के खिलाड़ियों को अपना अपना संघर्ष झेलना होता है, अपने धैर्य और भरोसे से वह संघर्ष करती हैं लेकिन हाल फ़िलहाल के दिनों में पुरुष वर्चस्व वाले इस खेल में महिला क्रिकेटर नया इतिहास लिख रही हैं.

कई मायनों में क्रिकेट में नया मुकाम महिला क्रिकेटरों ने ही सबसे पहले लिखा है.

शुरुआत, आज के क्रिकेट की एक मूलभूत बात से करते हैं. क्रिकेट में आजकल आपने गेंदबाज़ों को ओवर आर्म गेंदबाज़ी करते देखते हैं.

लेकिन आपको ये जानकर अचरज हो सकता है कि पहली बार 15 जुलाई, 1822 को केंट के जॉन विलिस ने जब ओवर आर्म गेंद फेंकी थी, तो उसे नो बॉल क़रार दिया गया था.

इससे पहले क्रिकेट में अंडर आर्म गेंद ही डाली जाती थी. लेकिन विलिस को ये ओवर आर्म गेंद फेंकने का आइडिया उनकी बहन से मिला था.

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ओवर आर्म गेंद फेंकने का चलन

भाई को अंडर आर्म गेंद फेंकते वक्त क्रिस्टिना विलिस का हाथ भारी भरकम स्कर्ट से बार बार फंसता था, लिहाजा उन्होंने कंधे से ऊपर हाथ लेकर गेंदबाज़ी शुरू कर दी.

जब उनके भाई की गेंद को नो बॉल क़रार दिया गया, तो उन्होंने नाराज़ होकर मैच छोड़ दिया था.

लेकिन 1864 में क्रिकेट में ओवर ऑर्म गेंदबाज़ी को मान्य कर दिया गया.

एक टेस्ट मैच में शतक बनाने और 10 विकेट झटकने का कारनामा सबसे पहले किस क्रिकेटर ने दिखाया था?

इस सवाल के जवाब में अधिकांश लोगों का जवाब होता है इयन बॉथम और इसे सही भी मान लिया जाता है.

जबकि यह ग़लत है. यह कारनामा टेस्ट क्रिकेट में सबसे पहली बार ऑस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेटर बेट्टी विल्सन ने दिखाया था.

1948 से 1958 के बीच ऑस्ट्रेलिया की ओर से खेलने वाली विल्सन को फ़ीमेल ब्रैडमैन तक कहा जाता था.

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इमेज कैप्शन, ऑस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेटर बेट्टी विल्सन

टेस्ट में शतक और 10 विकेट का कारनामा

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 1958 में खेली अपनी अंतिम क्रिकेट सिरीज़ के दौरान उन्होंने एक टेस्ट में ऑफ़ स्पिनर के तौर पर 11 विकेट चटकाए और शतक भी जमाया.

वैसे एक टेस्ट की दोनों पारियों को मिलाकर 100 रन और 10 विकेट हासिल करने का कारनामा ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एलन डेविडसन ने बॉथम से 22 साल पहले कर दिखाया था. डेविडसन ने यह कारनामा विल्सन से दो साल बाद ही किया था.

वनडे क्रिकेट में पहला दोहरा शतक किसके नाम है?

हमलोग भले सचिन तेंदुलकर के बहुत बड़े फैंस हों और ग्वालियर में उनकी पारी को कितना ही याद करें लेकिन सच्चाई यही है कि वनडे क्रिकेट में पहला दोहरा शतक ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बिलंडा क्लार्क ने 1997 के वर्ल्ड कप में मुंबई में डेनमार्क के ख़िलाफ़ लगाया था.

सचिन तेंदुलकर ने 13 साल बाद ये कारनामा दिखाया था.

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इमेज कैप्शन, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बिलंडा क्लार्क

हर चार साल पर होने वाले क्रिकेट वर्ल्ड कप को लेकर भी बहुत उत्साह होता है.

इस साल अक्तूबर-नवंबर में भारत में ही वर्ल्ड कप होना है और उसको लेकर बातचीत अभी से हो रही है.

लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पहली बार वर्ल्ड कप क्रिकेट का आयोजन पुरुष क्रिकेट में नहीं हुआ था, यहाँ भी शुरुआत महिला क्रिकेटरों ने ही की थी.

पहली बार महिला वर्ल्ड कप क्रिकेट का आयोजन इंग्लैंड में 1973 में हुआ था.

यह आयोजन इंग्लैंड की कप्तान राचेल हेयो फ्लिंट के प्रायोजक तलाशने के चलते हुआ था.

उन्होंने कारोबारी जैक हेवार्ड को महिला क्रिकेट में 40 हज़ार पाउंड लगाने के लिए भी तैयार किया था.

विकिपीडिया में यह जानकारी बिल्कुल दुरुस्त है कि महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप खेल की दुनिया का सबसे पुराना वर्ल्ड चैंपियनशिप है.

1973 के महिला वर्ल्ड कप का फ़ाइनल लॉर्ड्स में खेला गया था.

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इमेज कैप्शन, लंदन का लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड

दिलचस्प यह है कि लॉर्ड्स मैदान का संचालन करने वाले मेरीलेबोन क्रिकेट क्लब (एमसीसी) 1999 तक महिलाओं को सदस्यता नहीं देता था.

भारतीय टीम पहले वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले सकी थी. लेकिन दूसरे वर्ल्ड कप की मेज़बानी 1978 में भारत ने की थी.

इस आयोजन में भारत, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के तौर पर चार ही देशों ने हिस्सा लिया था.

इसके नौ साल बाद भारत को पुरुष वर्ल्ड कप की संयुक्त मेज़बानी हासिल हुई थी.

भारत में 1978 में हुआ था वर्ल्ड कप

इसके मैच पटना, जमशेदपुर, कलकत्ता और हैदराबाद में खेले गए थे.

विदेशी महिला क्रिकेटरों को देखने के लिए 25 से 30 हज़ार दर्शकों की भीड़ जुटती थी, और ये दर्शक खिलाड़ियों से उनका ऑटोग्राफ़ तक मांगते थे.

तब खिलाड़ियों के कपड़े नदी के किनारे धुलते थे और उन्हें पत्थरों पर सुखाया जाता था.

इसके बाद दो बार, यानी 1997 और 2013 में भारत ने वर्ल्ड कप का आयोजन किया.

ऐसे एतिहासिक तथ्य यहीं समाप्त नहीं होते.

महिला क्रिकेट ने ही इंटरनेशनल टी-20 क्रिकेट की शुरुआत की थी.

अगस्त, 2004 में इंग्लैंड की महिला टीम ने न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ होवे, ससेक्स में पहला अंतरराष्ट्रीय टी-20 मुक़ाबला खेला था.

इंग्लिश क्रिकेट बोर्ड ने 2003 में टी-20 क्रिकेट को इंटर काउंटी क्रिकेट के तौर पर शुरू किया था.

2005 से पहले तक दुनिया भर में महिला क्रिकेट का संचालन इंटरनेशनल वीमेंस क्रिकेट काउंसिल करती थी. इसकी स्थापना 1958 में हुई थी. 2005 में इसका विलय इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) में हो गया था.

वैसे पुरुषों का पहला इंटरनेशनल टी-20 मैच फरवरी, 2005 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बीच खेला गया था.

इतना ही नहीं, 2008 में क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने जब पिंक बॉल का ट्रायल शुरू किया, तो सबसे पहले क्वींसलैंड और वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की महिला टीमों के बीच पिंक बॉल से प्रदर्शनी मैच खेला गया था.

अब पुरुष टेस्ट मैचों के लिए पिंक बॉल का इस्तेमाल होता है.

ऐसे में आप लोगों के लिए मेरी एक सलाह है, जब भी वीमेंस टी-20 वर्ल्ड कप के मैच के लिए अपना टीवी सेट खोलिए, तो पहली गेंद देखने के वक्त महिला क्रिकेट और महिला खिलाड़ियों के खेलते रहने की ज़िद और खेल के सम्मान में खड़े हो जाइएगा, तालियाँ बजाइएगा.

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