भारत की झूलन, पाकिस्तान की सना: देश अलग-अलग, सफ़र एक जैसा

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी संपादक
मैं ये लिखने में थोड़ा सा शर्मसार महसूस कर रही हूं कि क्रिकेट फ़ैन होते हुए भी बतौर दर्शक मैंने पहला महिला क्रिकेट मैच 2016 में देखा. टीवी पर तो महिला क्रिकेट के बहुतेरे मैच देखे हैं लेकिन ग्राउंड पर जाकर महिला क्रिकेट मैच देखने का ये पहला मौका था.
मुक़ाबला था भारत और पाकिस्तान के बीच. कांटे की टक्कर चल रही थी. हारते-हारते मैच में अचानक भारत का पलड़ा भारी हो गया. वजह पांच फ़ीट 11 इंच की झूलन गोस्वामी की गेंदबाज़ी और मिताली राज का कैच.
ख़ैर ऐन वक़्त पर बारिश हो गई और डकवर्थ लुईस से पाकिस्तान ने मैच जीत लिया. तमाम दर्शकों की तरह बारिश में भी भीग चुकी थी.
दिल्ली की उस भीड़ में कुछ पाकिस्तानी फ़ैन भी थे. पता नहीं मैं उनके पास गई या वो पहले मेरे पास आए और बोले कि पाकिस्तानी टीम और हमारी कैप्टन सना मीर ने मैच जीत लिया पर आपकी झूलन ने तो भारत को बस जितवा ही दिया था अगर बारिश न आती.
ये बात 2016 की है और 2022 में भी भारत की महिला क्रिकेटर झूलन का जलवा दुनिया भर में यूं ही बरकरार है.
ज़रा कल्पना कीजिए, बंगाल के इस छोटे से गांव की जिसका नाम चकदा है. ये नाम भी शायद आपने पहले न सुना हो. कोई 25-30 साल पहले का दृश्य है.
गांव में अपने घर के आंगन में सब लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं, जैसे अक्सर गांव-मोहल्लों में होता है. और छोटी सी झूलन उन लड़कों की बॉल गर्ल है जिसका काम सिर्फ़ बाहर गई गेंद को उठाकर लाना है और भाइयों को देना है.

इमेज स्रोत, Hannah Peters/Getty Images
लेकिन उस लड़की ने हार नहीं मानी और अकेले प्रैक्टिस करती रहीं. लड़कों के गैंग में इज़्ज़त पाने के लिए ऑल राउंडर बनने की पुरज़ोर कोशिश में लग गई. यही लड़की आगे चलकर क्रिकेट की धुरंधर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों में से एक झूलन गोस्वामी बनी.
भारत के चकदा से कोई 2,000 किलोमीटर दूर पाकिस्तान में रावलपिंडी और गुजरांवाला की गलियों में क्रिकेट खेलती थीं सना. लड़कियों की तो कोई टीम होती नहीं थी, तो वो लड़कों के टोलों में ही खेला करतीं. जैसे झूलन को बस बॉल उठाने का काम मिला हुआ था.
वैसे ही सना को गली के लड़कों ने बस फ़ील्डिंग का काम दे दिया - कि कोने में खड़े रहो और फ़ील्डिंग करो. चूंकि सना का भाई टीम में होता था तो गली क्रिकेट में आख़िरी ओवर सना को मिल जाता.
सना बताती हैं, "मैंने गलियों में खेलकर ही क्रिकेट सीखा. हम शाम को टेपबॉल से क्रिकेट खेलते थे. वहां बस एक स्ट्रीट लैंप होता था. शाम को स्पिन ही खेलते थे क्योंकि एक लैंप की रोशनी में फास्ट बॉल तो नज़र ही नहीं आती थी. यूं तो लड़के मुझसे बस फील्डिंग करवाते लेकिन मेरा बड़ा भाई मुझसे अकसर आख़िरी ओवर डलवा देता था. लड़कों के साथ ही खेलते और महिला क्रिकेट मैच तो कभी देखे ही नहीं थे."

फ़ैक्ट बॉक्स - सना मीर, गेंदबाज़
पूर्व पाकिस्तानी कप्तान
आईसीसी नंबर वन, वनडे- 2018
अंतरराष्ट्रीय मैच- 226

यही सना आगे चलकर दुनिया की बेहतरीन गेंदबाज़ और पाकिस्तानी टीम की कप्तान बनीं.
ये कोरी कल्पना या सुने सुनाए किस्से नहीं है बल्कि सना मीर और झूलन गोस्वामी की आपबीती है जो उन्होंने बीबीसी हिंदी और उर्दू के साझा पॉडकास्ट 'बात सरहद पार' के दौरान बताई. एक दूसरे से ज़िंदगी और क्रिकेट के सफ़र पर बातें करते हुए उन्होंने कई लम्हों को दोबारा जिया.

इमेज स्रोत, Matthew Lewis-ICC/ICC via Getty Images
अगल देश, सफ़र एक जैसा
भारत और पाकिस्तान को आज़ाद हुए 75 साल हो चुके हैं- इस दौरान कई लकीरें खिंच गईं, बंटवारे हो गए लेकिन कुछ चीज़ों को तकसीम नहीं किया जा सकता है, जिसमें एक है दोनों मुल्क़ों में क्रिकेट को लेकर जुनून.
ये महिला खिलाड़ी औरतों के जूझारुपन, हौसले, हिम्मत, दरियादिली और मोहब्बत का भी प्रतीक हैं, ख़ासकर भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में जहां आज भी पुरुष और औरतें एक पायदान पर नहीं हैं.
ख़ैर बात क्रिकेट की छिड़ी है तो झूलन, सना और उनके सफ़र पर लौटते हैं जो जुदा होते हुए भी एक सा है. क्रिकेट के मैदान पर ये दोनों एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी रहीं लेकिन मैदान के बाहर दोस्त, साथी और एक दूसरे के लिए प्रेरणा का कारण भी.

फ़ैक्ट बॉक्स - झूलन गोस्वामी
आईसीसी प्लेयर ऑफ़ द ईयर- 2007
आईसीसी नंबर वन, वनडे- 2016
अंतरराष्ट्रीय विकेट - 350 से ज़्यादा विकेट
महिला क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट

2002 से भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा रहीं झूलन गोस्वामी की गिनती दुनिया की सबसे तेज़ महिला गेंदबाज़ों में होती है. 2007 में झूलन को आईसीसी वूमन प्लेयर ऑफ़ द ईयर का अवॉर्ड मिला. उससे दो साल पहले यानी 2005 में ही सना ने पाकिस्तान के लिए खेलना शुरू किया था.
साल बीतते गए और दोनों खिलाड़ी अपने हुनर को निखारती रहीं. 2016 में आईसीसी ने जब वनडे रैंकिंग निकाली तो झूलन दुनिया फ़तह करते हुए नंबर-1 गेंदबाज़ घोषित हुईं. बीबीसी पॉडकास्ट में सना बताती हैं कि जब झूलन गोस्वामी वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर-1 हुईं तो उन्हें पहली बार लगा कि एशिया से उनकी जैसी गेंदबाज़ भी ऐसा कर सकती हैं.

इमेज स्रोत, Michael Steele/Getty Images
भारत की झूलन को देख एक सपना पाकिस्तान की सना के मन में समा गया. आख़िर वो दिन आया जब 2018 में वो पाकिस्तान की पहली महिला क्रिकेटर बनीं जो आईसीसी रैकिंग में नंबर वन गेंदबाज़ घोषित हुईं, जैसे कभी झूलन बनी थीं. बिल्कुल तू चल मैं आई की तर्ज पर.
क्रिकेट मैदान पर एक दूसरे को आउट करने का एक भी मौका न चूकने वाली दो परस्पर विरोधी खिलाड़ी, पर मैदान के बाहर एक दूसरे के लिए ग़ज़ब की कद्र और तारीफ़.
यूँ तो सना मीर, झूलन गोस्वामी की तारीफ़ें करती नहीं थकतीं लेकिन बातों-बातों में बीबीसी पॉडकास्ट में सना ने बताया कि कैसे पांच फ़ीट 11 इंच की झूलन की गेंदों का सामना करने में उनको पसीने आ जाते थे.
"आप कहती हैं कि आपकी डीसेंट हाइट है. ये अंडरस्टेटमेंट है. आपकी फ़ेंकी गेंद पर नज़र डालने के लिए हमारा सिर हिल जाता था. आपके ख़िलाफ़ बैटिंग करना कितना मुश्किल था हमें पता है", सना हँसते हुए बताती हैं.
इत्तेफ़ाक से दोनों 1992 के वर्ल्ड कप से ऐसी मुतासिर हुई कि ख़ुद क्रिकेटर बन गईं..

बंगाल के मेरे गाँव में ख़ास खेल का माहौल नहीं था. शुरुआती दिनों में मैं फ़ुटबॉल को लेकर पागल थी. लेकिन 1992 वर्ल्ड कप का बहुत असर रहा मेरे करियर पर. उस वक़्त सचिन सर जब ग्राउंड पर उतरते थे, सचिन की जो लहर आई, हम सब उसमें बह गए. उस वक़्त एक विज्ञापन आया था कि ईट क्रिकेट, स्लीप क्रिकेट, ड्रीम क्रिकेट. उस लाइन ने मुझे बहुत प्रभावित किया. और मैं क्रिकेट में आ गई."
- झूलन गोस्वामी, भारतीय क्रिकेटर

झूलन तब कोई दस बरस की थीं. संयोग देखिए कि इसी वक़्त पाकिस्तान में छह साल की सना भी टीवी पर 1992 का वर्ल्ड कप देख रही थीं.
उस दिन को याद करते हुए सना बीबीसी पॉडकास्ट में बताती हैं, "पाकिस्तान ने 1992 का वर्ल्ड कप जीता तो घर पर सब नाचने कूदने लगे. मुझे तब ज़्यादा तो समझ में नहीं आया पर मैं भी उनके साथ शामिल हो गई. जब बाहर निकले तो देखा कि गलियों, सड़कों पर जश्न ही जश्न है. बस क्रिकेट से जुड़ाव यहीं से शुरू हुआ."
दोनों खिलाड़ियों की ज़िंदगियों और करियर के तार कितने जुड़े हुए से रहे- सरहद पार दोनों एक ही समय पर एक नायाब सफ़र के लिए तैयार हो रही थीं.

इमेज स्रोत, Hannah Peters/Getty Images
हालांकि ऐसा नहीं है कि मैच खेलते वक़्त भारत और पाकिस्तान की महिला टीमों के बीच टक्कर कोई कम हो जाती है. बल्कि सना बताती हैं, "जब भी भारत के ख़िलाफ़ खेली तो मैंने पाया कि दोनों ओर खिलाड़ियों के बीच इंटेन्सिटी किसी अलग ही स्तर की थी. मुझे याद है कि इंडिया के साथ मैच था. बहुत जोश था कि इंडिया को हराना है लेकिन हम वो मैच हार गए. मेरी दुआ थी कि मेरी पहली विकेट मिताली राज जैसी बेहतरीन गेंदबाज़ की हो. जब मैंने मिताली को आउट किया तो मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था. दोनों देशों के बीच क्रिकेट को लेकर पुरानी हिस्ट्री रही है. लेकिन ये सब ग्राउंट तक ही सीमित होता था. ग्राउंड के बाहर नहीं."
इस बात का सुबूत तो इसी साल हुए महिला वर्ल्ड कप में ही देखने को मिला जब भारत और पाकिस्तान के बीच मैच के बाद कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थीं. पाकिस्तानी टीम की कप्तान बिस्माह मारूफ़ की बेटी के साथ भारतीय खिलाड़ियों की तस्वीरें हर जगह थीं.
झूलन कहती हैं, "हालत ये थी कि क्रिकेट मैच के पहले तो हम एक दूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे. लेकिन जैसे ही मैच ख़त्म हुआ तो भारतीय टीम की की लड़कियां बिस्माह की बेटी साथ खेलने लग गई. बिस्माह की बेटी ज़्यादातर टाइम इंडियन कैम्प में ही थी. भारत की एकता बिष्ट तो पूरा टाइम बच्ची के साथ ही थीं. मैंने एकता से कहा कि मैं बिसमाह को बोल देती हूं कि अपना बच्चा दे दो और तुम जुगाड़ कर लो दूसरा. बच्ची एकता ले कर जाएगी. ये दोस्ती अलग है जो दूसरी किसी टीम के साथ नहीं हो सकती."

मैंने पाकिस्तान की गलियों में खेलकर ही क्रिकेट सीखा. हम शाम को टेपबॉल से क्रिकेट खेलते थे. वहाँ बस एक स्ट्रीट लैंप होता था. शाम को स्पिन ही खेलते थे क्योंकि एक लैंप की रोशनी में फास्ट बॉल तो नज़र ही नहीं आती थी. लड़कियों की टीम होती नहीं थी, गली की लड़के मुझसे अपनी टीम में बस फील्डिंग करवाने का काम करते थे लेकिन मेरा बड़ा भाई मुझसे अकसर आख़िरी ओवर डलवा देता था. इसी बहाने मुझे खेलने का मौका मिल जाता. महिला क्रिकेट मैच तो कभी देखे ही नहीं थे मैंने.
- सना मीर, पाकिस्तानी क्रिकेटर

एक पाकिस्तानी महिला क्रिकेटर की नन्ही बच्ची के साथ भारतीय महिला क्रिकेटरों की वो तस्वीर कितना कुछ बयां कर गई थी- दोस्ती, खेल भावना, खिलंदड़पन, मासूमियत, मोहब्बत, डटे रहने का जज़्बा और सबसे बढ़कर उम्मीद. उम्मीद कि आने वाला कल और भी बेहतर होगा.
बेहतर इसलिए क्योंकि जैसे कि सना और झूलन दोनों ने पॉडकास्ट में कहा, आज भी बहुत सी लड़कियाँ छोटे कस्बों, गलियों से होते हुए, कई मुश्किलों को झेलते हुए एक खिलाड़ी होने का सफ़र तय कर पाती हैं. झूलन और सना मीर दोनों ने अपने अपने देश में जब क्रिकेट खेलना शुरू किया तो महिला क्रिकेट की कोई पूछ नहीं थी.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
झूलन और सना मिसाल हैं
इन महिला खिलाड़ियों की उपल्बधि ये नहीं है कि इन्होंने रिकॉर्ड बनाए और नंबर वन बनीं बल्कि उससे भी बड़ा हासिल ये है कि ऐसे माहौल में इन्होंने महिला क्रिकेट को एक मकाम दिलाया जब महिला क्रिकेट के लिए न पैसे थे, न सुविधाएँ, न मार्केटिंग, न दर्शक और न कोई कवरेज.
आपस की बातचीत में दोनों खिलाड़ियों ने इन तमाम अड़चनों का ज़िक्र किया है. झूलन कहती हैं कि हालात पहले से बहुत बेहतर हुए हैं. सरकारें आगे आई हैं, लेकिन आज भी महिला क्रिकेट उस प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं पहुंचा है जहां उसे होना चाहिए.
वहीं सना अपनी बात कुछ यूं रखती हैं, "पाकिस्तान में इतनी तरक्की ज़रूर हुई है कि अब लोगों को पता है कि लड़कियां भी क्रिकेट खेलती हैं. पहले तो लोगों को पता भी नहीं होता था कि महिला क्रिकेट टीम कोई मैच खेलकर आई है. मैच होते भी थे तो बहुत अरसे के बाद. अभी पाकिस्तान में देखिए कि स्कूल क्रिकेट बहुत कम है. अगर घरेलू स्तर पर लड़कियों के लिए मौके नहीं होंगे तो हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ जाएंगे. महिला क्रिकेट की मार्केंटिंग आप तभी कर सकते हैं जब आपको अपने प्रोडक्ट पर भरोसा हो. मार्केटिंग करने वालों को इस सोच से पार पाना है कि लड़कियां वो हासिल नहीं कर सकती हैं जो लड़के कर सकते हैं. हम तो इसी सोच से जूझते रहे हैं कि लड़कियों पर पैसा क्यों लगाएं."
लेकिन झूलन और सना जैसी खिलाड़ी मिसाल हैं कि कोई आप पर कोई भरोसा करें न करें, अगर आपको ख़ुद की काबिलियत और मेहनत पर यक़ीन है तो क्रिकेट क्या, ज़िंदगी का हर मैदान फ़तह किया जा सकता है.

इमेज स्रोत, Christopher Lee-ICC/ICC via Getty Images
वो झूलन जो बचपन में क्रिकेट खेलते लड़कों की सिर्फ़ बॉल गर्ल थी, चकदा गाँव की वही झूलन अब लोगों की हीरो हैं जिसकी कहानी दुनिया फ़िल्मी पर्दे पर भी देखेगी. नाम वही- चकदा एक्सप्रेस. कुछ ऐसा ही दर्जा पाकिस्तान में सना मीर का है जो अब पाकिस्तान की चंद महिला कमेंटेटर में शुमार हो चुकी हैं.
और ये लिखते-लिखते मुझे बार-बार दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला का वो भींगा मैदान और भारत-पाक मैच याद आ रहा है जिसका ज़िक्र शुरू में किया था. और याद आ रहा है वो पाकिस्तानी फ़ैन जिसने कहा था कि आपकी झूलन ने तो लगभग भारत को जीता ही दिया था.
और ये लेख लिखते-लिखते उस पाकिस्तानी फ़ैन के साथ वो तस्वीर भी ढूंढ ही निकाली जो लैपटॉप की किसी ड्राइव में दबी पड़ी थी.

ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














