BBC ISWOTY- पारुल परमार: शारीरिक अक्षमताओं को हराकर बनीं वर्ल्ड पैरा बैडमिंटन की क्वीन

पारुल परमार

भारत की पारुल दलसुखभाई परमार ने उम्र और शारीरिक अक्षमताओं को आड़े नहीं आने दिया और पैरा बैडमिंटन की डब्ल्यूएस एसएल3 (महिलाओं की सिंगल स्टैंडिंग) कैटेगरी में दुनियाभर में पहली रैकिंग पर पहुंच गईं.

वे पिछले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से इस पोज़िशन पर अपना दबदबा कायम किए हुए हैं.

दूसरे किसी भी पेशे के मुक़ाबले किसी भी खेल में खिलाड़ियों का लंबे वक्त तक टिके रहना आसान नहीं होता है. अपनी उम्र के 40वें पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते चंद ही एथलीट ऐसे बचते हैं जो कि सक्रिय रूप से खेल जगत में इस मुक़ाम पर बने रह पाते हैं.

इस लिहाज़ से पारुल दलसुखभाई परमार एक सुपरवुमन के जैसी हैं. 47 साल की उम्र में भी वे पैरा बैडमिंटन की डब्ल्यूएस एसएल3 कैटेगरी में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनी हुई हैं.

इस कैटेगरी में उनका दबदबा ऐसा है कि परमार इस कैटेगरी में दुनिया की दूसरे नंबर की खिलाड़ी और हमवतन मानसी गिरीशचंद्र जोशी से क़रीब 1,000 पॉइंट्स आगे हैं.

मौजूदा वक्त में परमार 3,210 अंकों के साथ वर्ल्ड रैंकिंग में सबसे ऊपर हैं, जबकि जोशी 2,370 अंकों के साथ दूसरे पायदान पर हैं.

परमार के बेहतरीन खेल के चलते उन्हें 2009 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

पारुल परमार

चुनौतियों को अवसर में बदला

परमार गुजरात के गांधीनगर से आती हैं. कम उम्र में ही उन्हें पोलियो हो गया था.

जब वे केवल तीन साल की थीं तब उनकी ज़िंदगी में एक और बुरा हादसा हुआ. वे झूले से गिर गई थीं और इसकी वजह से उनकी गर्दन की हड्डी में बुरी चोट आई. साथ ही इस हादसे में उनका दाहिना पैर भी फ्रैक्चर हो गया था.

उसके बाद उन्हें रिकवर होने में लंबा वक्त लगा. उनके पिता एक बैडमिंटन खिलाड़ी थे जो कि स्थानीय जिमखाना क्लब में खेलने जाते थे.

डॉक्टरों ने सलाह दी कि परमार को एक्सरसाइज़ और कुछ एक्टिविटी करने की जरूरत है. ऐसे में पारुल के पिता उन्हें अपने पिता अपने साथ क्लब लेकर जाने लगे. यहां पारुल अपने पिता को बैडमिंटन खेलते हुए देखती थीं.

बाद में वे पड़ोस के बच्चों के साथ बैडमिंटन खेलने लगीं. शुरुआत में वे केवल बैठी रहती थीं और बच्चों को खेलता देखती थीं. लेकिन, बाद में धीरे-धीरे उन्होंने भी खेलना शुरू कर दिया.

इस तरह से उनके बैडमिंटन के साथ लगाव की यात्रा शुरू हुई. बैडमिंटन में उनके स्किल को पहली बार स्थानीय कोच सुरेंद्र पारेख ने देखा. पारेख ने उन्हें बैडमिंटन खेलने और प्रैक्टिस करने की सलाह दी.

पारुल परमार

मज़बूत सपोर्ट सिस्टम

परमार कहती हैं कि उन्हें सफलता की राह पर आगे बढ़ाने के लिए उनके माता-पिता और भाई-बहनों ने बहुत मदद की है.

उनके भाई-बहन खुशी-खुशी अपनी जरूरतों को छोड़कर उनके टूटे रैकेट को बदलने को तरजीह देते थे.

उनके परिवार का मकसद था कि उन्हें वह सब मुहैया कराया जाए जिससे वे अपने बैडमिंटन के करियर में आगे बढ़ सकें.

वे कहती हैं कि खेल जगत में उनकी यात्रा में कभी भी किसी ने उन्हें अपाहिज होने या उनमें किसी तरह की कमी होने का अहसास नहीं होने दिया.

एक बार स्कूल में एक टीचर ने उनसे पूछा था कि वे क्या बनना चाहती हैं. उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था और उन्होंने ये सवाल अपने पिता से पूछा. उन्होंने बिना हिचके कहा कि वे एक बेहतरीन बैडमिंटन खिलाड़ी बनेंगी.

आगे चलकर परमार ने न सिर्फ़ अपने पिता की बल्कि खुद अपनी उम्मीदों से भी बढ़कर प्रदर्शन किया और सफलता हासिल की.

परमार को शुरुआत में ये पता नहीं था कि पेशेवर रूप से भी पैरा बैडमिंटन होता है. वे कहती हैं कि वे भाग्यशाली हैं कि उन्हें मजबूत सपोर्ट सिस्टम का फायदा मिला.

न केवल उनके परिवार ने बल्कि उनके साथी खिलाड़ियों ने उनकी आर्थिक मदद की ताकि वे अलग-अलग टूर्नामेंट्स में हिस्सा लेने के लिए ट्रैवल कर पाएं.

हालांकि, वे कहती हैं कि ज्यादातर दिव्यांग लोगों को परिवार और समाज से इस तरह का सपोर्ट नहीं मिल पाता है.

बड़ी सफलताएं

परमार ने 2007 में वर्ल्ड पैरा के सिंगल्स और डबल्स दोनों ख़िताब जीते थे. बाद में उन्होंने 2015 और 2017 में भी वर्ल्ड चैंपियनशिप भी जीतीं. 2014 और 2018 में उन्होंने एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड मैडल जीते. वे इन पूरे वर्षों के दौरान इस कैटेगरी में नेशनल चैंपियन रही हैं.

परमार टोक्यो पैरा ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं. वे कहती हैं कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लमहा वह था जब उन्हें 2009 में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के हाथों अर्जुन अवॉर्ड मिला था.

वे कहती हैं कि अपनी शुरुआती जिंदगी में उन्होंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी वे एक दिन इस मुकाम को हासिल कर पाएंगी.

(ये प्रोफाइल बीबीसी के ईमेल से भेजे गए सवालों पर पारुल परमार के जवाबों पर आधारित है.)

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