फ़ीफ़ा के बैन से निराश भारत की महिला फ़ुटबॉलरों को अभी भी है उम्मीद

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    • Author, जान्हवी मुले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

''मैं वर्ल्ड कप को लेकर काफ़ी उत्साहित थी. मैंने टीम में जगह नहीं बनाई लेकिन खेल देखने जाती. यह हमारे देश के लिए प्रतिष्ठा की बात थी कि वर्ल्ड कप की मेज़बानी करता. लेकिन अब स्थिति उलट हो गई है और यह मेरे लिए निराश करने वाला है.''

मुंबई की 17 साल की महिला फुटबॉलर सई अपना दुख इन शब्दों में बयान करती हैं.

भारत को अंडर-17 महिला फुटबॉल वर्ल्ड कप की मेज़बानी का मौक़ा मिला था. सई की तरह सभी युवा फुटबॉलरों, ख़ास कर लड़कियों में इसे लेकर ख़ुशी का माहौल था. लेकिन अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल की शासकीय संस्था फीफा ने ऑल इंडिया फ़ुटबॉल फेडरेशन (AIFF) को निलंबित कर दिया है.

AIFF भारत में खेलों का संचालन निकाय है. अब अक्टूबर 2022 में भारत में अंडर-17 महिला फुटबॉल विश्व कप के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है.

फ़ीफ़ा ने कहा है कि AIFF में तीसरे पक्ष का अनुचित दख़ल है, इसलिए निलंबित करने का फ़ैसला लिया गया है.

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सई ने कहा, ''इस विश्व कप के कारण खेलों को काफ़ी प्रोत्साहन मिलता. सभी की नज़रें भारत और भारत के खिलाड़ियों पर रहेंगी. इस विश्व कप के कारण भारत की जो लड़कियाँ फुटबॉल खेलना चाहती थीं, वे प्रोत्साहित होतीं. इसके अलावा कई लोग इसे देखने के बाद फुटबॉल खेलने का फ़ैसला करतीं.''

सई कहती हैं कि यह विश्व कप काफ़ी प्रेरणादायी होता. लेकिन अब ऊहापोह की स्थिति है. सई की तरह कई खिलाड़ी अब फुटबॉल पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं लेकिन उन्हें लगता है कि इस तरह की चीज़ों का असर खेल पर बुरा पड़ता है.

लेकिन यह सब कैसे हुआ? क्या अभी कोई रास्ता बचा है कि भारत अक्टूबर में अंडर-17 महिला विश्व कप की मेज़बानी करे?

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फ़ीफ़ा ने AIFF को निलंबित क्यों किया?

फ़ीफ़ा के नियमों के मुताबिक़ संचालन बॉडी में स्वायत्तता का होना अनिवार्य है. यानी AIFF को किसी भी राजनीतिक दख़ल से मुक्त होना चाहिए. इसमें कोई क़ानूनी दख़ल भी नहीं होना चाहिए.

भारत कोई पहला देश नहीं है, जिसे इस नियम के कारण निलंबित किया गया है. बेनिन, कुवैत, नाइजीरिया और इराक़ को भी अतीत में इस नियम के उल्लंघन में निलंबित किया गया था.

पिछले साल पाकिस्तान के फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन को इसी नियम के तहत प्रतिबंधित किया गया था. जुलाई 2022 में पाकिस्तान से प्रतिबंध हटाया गया था. हालाँकि कीनिया और ज़िम्बॉब्वे पर यह प्रतिबंध अब भी है.

भारत में AIFF की कमान एक दशक से ज़्यादा समय तक फ़ीफ़ा काउंसिल के पूर्व सदस्य प्रफुल पटेल के पास रही है. पटेल सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं. वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता हैं.

पटेल AIFF के अध्यक्ष तीन बार रहे हैं. अध्यक्ष का कार्यकाल चार सालों के लिए होता है. नेशनल स्पोर्ट्स कोड के तहत पटेल अब AIFF के अध्यक्ष नहीं बन सकते हैं. 2020 में पटेल का टर्म पूरा होने के बावजूद अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर कोई नया चुनाव नहीं हुआ.

AIFF को लगता है कि ऐसा उसके संविधान में संशोधन के कारण हुआ. AIFF में दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन फुटबॉल दिल्ली इस मामले को अदालत में लेकर गया और आरोप लगाया कि प्रफुल पटेल को अवैध तरीक़े से पद पर बनाए रखा गया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मई महीने में AIFF को भंग कर दिया था और एक तीन सदस्यीय कमिटी की नियुक्ति की थी. इस कमिटी को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि AIFF के संविधान का संशोधन कर चुनाव कराया जाए.

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असर क्या होगा?

इसके जवाब में फ़ीफ़ा और एशियन फ़ुटबॉल कॉन्फेडरेशन (एएफ़सी) ने भारत में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था. यह प्रतिनिधिमंडल एएफ़सी के महासचिव विंडर जॉन के नेतृत्व में आया था. इस प्रतिनिधिमंडल ने भारत में फुटबॉल के अलग-अलग लोगों से बात की थी.

आख़िरकार फ़ीफ़ा ने भारत को निलंबित कर दिया. फ़ीफ़ा ने अपने बयान में कहा है, ''AIFF प्रशासन जब पूरी तरह से काम करने लगेगा तो प्रतिबंध हटा दिया जाएगा.''

मीडिया कंसल्टिंग फर्म ओर्मैक्स के अनुसार, भारत में 2.34 करोड़ लोग फुटबॉल देखते हैं. हाल के वर्षों में भारतीयों का फ़ुटबॉल के प्रति आकर्षण बढ़ा है. लेकिन फ़ीफ़ा के निलंबन से इस पर बुरा असर पड़ेगा. इस निलंबन का मतलब है कि भारत कोई अंतरराष्ट्रीय मैच की मेज़बानी नहीं कर पाएगा. भारत इन मैचों में हिस्सा नहीं ले सकता है. भारत के फ़ुटबॉल क्लब किसी विदेशी खिलाड़ी से समझौते नहीं कर सकते हैं. इस निलंबन का असर घरेलू टूर्नामेंट पर नहीं पड़ेगा.

लेकिन इसका सबसे ज़्यादा असर महिला फुटबॉल पर पड़ेगा. भारत अंडर-17 महिला फुटबॉल विश्व कप 2020 की मेज़बानी करने वाला था लेकिन कोविड महामारी के कारण इसे स्थगित करना पड़ा था.

इसके बाद इसे इस साल 11 से 30 अक्टूबर तक होना था. मेज़बान होने के नाते भारत के इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने का मौक़ा मिला था. इस निलंबन का मतलब है कि भारत की लड़कियाँ नहीं खेल पाएँगी.

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इमेज कैप्शन, पूर्व खेल मंत्री किरेन रिजिजू

उम्मीद अब भी ज़िंदा

फ़ुटबॉल की एक प्रशंसक अमिशा ख़ान कहती हैं कि उम्मीद अब भी ज़िंदा है. अमिशा कहती हैं, ''महिला फ़ुटबॉल को लेकर यहाँ बहुत जोश नहीं है लेकिन हाल के समय में चीज़ें बदली हैं. हम बाला देवी जैसी खिलाड़ियों को देखने के लिए उत्साहित थे. भारत में बड़ी संख्या में लोग फ़ुटबॉल से प्यार करते हैं. मुझे लगता है कि फ़ीफ़ा इस पर फिर से विचार करेगा. मुझे लगता है कि यह लंबे समय तक नहीं होगा.''

मुस्लिम बहुल इलाक़ा मुंबई के पास मुंबरा में युवतियों को फ़ुटबॉल की ट्रेनिंग देने वाला संगठग परचम की सह-संस्थापक सबाह ख़ान बताती हैं कि उनकी खिलाड़ियों में फ़ीफ़ा के फ़ैसले से निराशा है. वह कहती हैं, ''हाल ही उन्होंने हमें टूर्नामेंट के लिए पहला टिकट दिया था. यह टूर्नामेंट भारत की लड़कियों के लिए सुनहरा अवसर है. यह वर्ल्ड कप है और इससे खेलों में महिलाओं को प्रोत्साहन मिलेगा.''

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सबाह ख़ान बताती हैं, ''हमें उम्मीद है कि कुछ समाधान निकलेगा. हमने अभी सरेंडर नहीं किया है. अब भी वक़्त है. टिकट पहले ही बुक हो गए हैं. कोई भी टिकट अब बचा नहीं है. इसका मतलब है कि फुटबॉल में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है."

भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान रहे बाइचुंग भूटिया ने भी इसे लेकर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा है कि फ़ीफ़ा का फ़ैसला बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है.

बाइचुंग भूटिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, ''मुझे लगता है कि यह सही मौक़ा है कि हम अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करें. फ़ीफ़ा के 85 साल के इतिहास में पहली बार ऑल इंडिया फ़ुटबॉल फेडरेशन पर प्रतिबंध लगाया गया है. मुझे उम्मीद है कि चुनाव के बाद बैन हट जाएगा.''

इस बीच, फ़ीफ़ा ने ये भी कहा है कि वह "भारत के युवा मामलों और खेल मंत्रालय के संपर्क में है और कोई न कोई सकारात्मक नतीजा निकलेगा.''

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