जब भारतीय फ़ुटबॉल टीम ने दक्षिण कोरिया के साथ एक लाख दर्शकों को भी हराया

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
4 सितंबर, 1962. जकार्ता का सेनायान स्टेडियम. स्टेडियम में मौजूद एक लाख से ऊपर दर्शक पूरी तरह से भारत के ख़िलाफ़ थे.
दूसरी स्पर्धाओं में भाग ले रहे भारतीय खिलाड़ी वापस भारत लौट चुके थे, क्योंकि फ़ुटबॉल का फ़ाइनल प्रतियोगिया के अंतिम दिन समापन समारोह से तुरंत पहले खेला जा रहा था.
भारत के फ़ाइनल तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं था. वो अपना पहले ही लीग मैच दक्षिण कोरिया से 0-2 से हार गया था. फिर उसने जापान को 2-0 और थाईलैंड को 4-1 से हराया.
थाईलैंड के ख़िलाफ़ मैच में एशिया के सर्वश्रेष्ठ रक्षक जरनैल सिंह अपने प्रतिद्वंदी से टकरा गए और उनके सिर में गंभीर चोट आई. उनके माथे पर दस टांके लगे. भारत को दस खिलाड़ियों से ही खेलना पड़ा, क्योंकि उस ज़माने में सब्स्टिट्यूशन का नियम नहीं हुआ करता था.
'बेयर फ़ुट टू बूट्स- द मैनी लाइव्स ऑफ़ इंडियन फ़ुटबॉल' के लेखक नोवी कपाडिया बताते हैं, "दक्षिण वियतनाम के ख़िलाफ़ सेमी फ़ाइनल में कोच रहीम ने घायल बैक जरनैल सिंह को सेंटर फ़ॉर्वर्ड की पोज़ीशन में खिलाकर बहुत बड़ा जुआ खेला. जरनैल रक्षण में खेल नहीं सकते थे, क्योंकि उनके माथे पर पट्टी बंधी हुई थी. इस वजह से वो हेडर नहीं मार सकते थे.''

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कपाडिया बताते हैं, "रहीम जानते थे कि जरनैल को खिलाकर उन्हें एक तरह का मनोवैज्ञानिक फ़ायदा मिलेगा, क्योंकि अधिकतर एशियाई खिलाड़ी तगड़ी डीलडौल के कारण जरनैल से खौफ़ खाते थे और उनके सामने आने से डरते थे. इसके अलावा जरनैल ने अपने फ़ुटबॉल करियर की शुरुआत भी एक सेंटर फ़ॉर्वर्ड के रूप में की थी. ये रणनीति काम आई और जरनैल ने चुन्नी गोस्वामी के थ्रू पास की मदद से भारत की ओर से दूसरा गोल किया."
कोच ने कहा मुझे तोहफ़ा चाहिए
भारत का फ़ाइनल मैच दक्षिण कोरिया से था. मैच से एक दिन पहले रात को चुन्नी गोस्वामी, पी.के. बैनर्जी, जरनैल सिंह, बालाराम, फ्रैंको और त्रिलोक सिंह टहलने के लिए बाहर निकले. जब वो सीढ़ियाँ उतर रहे थे, तो उन्हें अँधेरे में कुछ रोशनी सी दिखाई दी.
पी.के. बैनर्जी याद करते हैं, "हम रोशनी देखकर रुक गए. हमें लगा कि कोई भूत है. जब हम पास गए तो देखा कि हमारे कोच रहीम दोनों हाथों का कप बना कर चारमिनार सिगरेट पी रहे हैं. रहीम को हम लोगों की शक्ल देखकर लग गया कि हम सब तनाव में हैं. हमें सोने के लिए कहने के बजाए रहीम ने कहा कि चलो मैं भी तुम्हारे साथ टहलने चलता हूँ. चलते-चलते रहीम ने कहा, "कल मुझे आप लोगों से एक तोहफ़ा चाहिए. आप लोग सोना जीत लो." हमने पहली बार अपने कोच को इतना जज़्बाती होते देखा था."

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पूरा स्टेडियम भारत के ख़िलाफ़
जकार्ता में मेज़बान इंडोनेशिया ने इसराइल और ताइवान को खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित नहीं किया था. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति में भारत के प्रतिनिधि गुरुदत्त सोंधी ने इंडोनेशिया की आलोचना करते हुए कहा था कि खेलों में राजनीति का कोई स्थान नहीं है और उसे इसराइल और ताइवान को एशियाई खेलों के लिए आमंत्रित करना चाहिए था.
उनका इतना कहना था कि पूरा इंडोनेशियाई प्रेस, सरकार और यहाँ तक कि सारे दर्शक भी भारत के ख़िलाफ़ हो गए. हालत इतनी बिगड़ी कि भारत के जरनैल सिंह को बस की ज़मीन पर बैठ कर स्टेडियम जाना पड़ा, ताकि दर्शक उन्हें पहचानकर उन पर पत्थर बरसाना न शुरू कर दें.

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भारतीय राष्ट्रगान का अपमान
टीम में जान फूंकने के लिए कोच रहीम ने सारे खिलाड़ियों से राष्ट्र गान 'जन गण मन' गवाया. हाफ़ टाइम में उन्होंने उसे दोबारा गाया.
फ़ाइनल मैच को याद करते हुए एक बार जरनैल सिंह ने नोवी कपाडिया को बताया था, "उस दिन स्टेडियम में एक लाख से अधिक लोग मौजूद थे. हमें गेंद मिलते ही वो हमारे ख़िलाफ़ चिल्लाना शुरू कर देते थे. यहाँ तक कि उन्होंने हमारे राष्ट्र गान का भी अपमान किया. हमारे हाफ़ में गेंद आते ही इतना शोर मचना शुरू हो जाता था कि रेफ़री की सीटी तक सुनाई नहीं देती थी. इसके विपरीत जब हम कोरियाई गोल पर हमला करते थे तो पूरे स्टेडियम में पिन ड्रॉप सन्नाटा छा जाता था.'

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पाकिस्तानी हाकी टीम समर्थन में आई
उस टीम के एक सदस्य अरुण घोष बताते हैं कि दर्शकों में हमारे विरोध के बावजूद हमें ये देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि पाकिस्तान की हॉकी टीम हमारे समर्थन में चिल्ला रही थी. ये वही टीम थी, जिसने एक दिन पहले फ़ाइनल में भारतीय हॉकी टीम को 2-0 से हराया था. मैच के बाद कुछ पाकिस्तानी हॉकी खिलाड़ियों ने मैदान में आकर हमें कंधे पर उठा लिया था.
नोवी कपाडिया कहते हैं, "मैच से एक दिन पहले कोच रहीम ने टीम को सिखाया था कि वो ऑफ़ साइड ट्रैप से बचें, क्योंकि इतने शोर में रेफ़री की सीटी उन्हें सुनाई नहीं देगी. उन्होंने इस मैच में भी घायल जरनैल सिंह को सेंटर फ़ॉरवर्ड खिलाया. उसकी वजह ये थी कि अगर वो पूरी ताकत से अपना पैर भर उठा देते थे तो वो कोरियाई खिलाड़ियों के सिर तक आता था.
भारतीय खिलाड़ी इतने जुनून में थे कि उनमें से बहुत से लोग अपनी चोटों को भूल कर मैदान में खेलने उतरे. पीटर थंगराज को चोट के बावजूद प्रौद्युत बर्मन की जगह गोलकीपर के रूप में उतारा गया, क्योंकि रहीम को लगा कि उनके ऊंचे कद से नाटे कोरियाई खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ भारत को लाभ होगा."

जरनैल सिंह हुए ख़ूनोख़ून
राइट बैक त्रिलोक सिंह पूरे मैच के दौरान असहनीय दर्द में थे, क्योंकि उनके पैर की सबसे छोटी उंगली का नाख़ून टूट गया था. जब भी वो कोई शॉट लगाते या गेंद को रोकते उन्हें बहुत तकलीफ़ होती, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी.
मैच ख़त्म होते-होते जरनैल सिंह के सिर में बंधी पट्टी ज़मीन पर आ गिरी थी और उनके सिर के घाव से फिर ख़ून बह निकला था. लेकिन उन्होंने भी मैदान नहीं छोड़ा.

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एशिया का ब्राज़ील
रहीम ने इस मैच में यूसुफ़ ख़ाँ को पीछे खेलने वाले फ़ॉरवर्ड के रूप में इस्तेमाल किया था. भारत ने 3-3-4 सिस्टम से अपनी टीम उतारी थी, जबकि कोरियाई टीम परंपरागत 3-2-5 सिस्टम से खेल रही थी. 17वें मिनट में पी.के. बैनर्जी ने कोणीय शॉट लगा कर भारत को 1-0 से आगे कर दिया था.
तीन मिनट बाद जरनैल सिंह ने स्कोर 2-0 कर दिया. दूसरे हाफ़ में दक्षिण कोरिया ने एक गोल उतारा. आख़िरी दस मिनट में उन्होंने बराबरी के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, लेकिन अरुण घोष, त्रिलोक सिंह और पीटर थंगराज ने उन्हें कोई मौका नहीं दिया.

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एशियाई खेल के प्रबंधक भारत से इतने खिन्न थे कि मेडल सेरेमनी में भारत के सिर्फ़ ग्यारह खिलाड़ियों को ही स्वर्ण पदक दिया गया. बीस मिनट बाद उन्होंने अपनी गलती सुधारी और रिज़र्व के पाँच खिलाड़ियों को भी स्वर्ण पदक दिए गए.
1951 के बाद ये पहला मौका था जब भारतीय फ़ुटबॉल टीम ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था. इससे बेहतर फ़ुटबॉल टीम भारत ने आज तक नहीं उतारी है. यही कारण था कि उस ज़माने में भारत को 'एशिया का ब्राज़ील' कहा जाता था.

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भारत आने के नौ महीनों के भीतर इस जीत के सूत्रधार कोच रहीम का देहावसान हो गया. वो चेन स्मोकर थे और उन्हें फेफड़े का कैंसर था. एक फ़ुटबॉल समीक्षक ने बाद में कहा कि 'रहीम के साथ ही भारतीय फ़ुटबॉल भी कब्र में चला गया.'
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