हमास के हमले के वो छह घंटे: सात अक्टूबर को किस तरह हुआ था, इसराइल के सैनिक अड्डे पर क़ब्ज़ा

- Author, एलिस कडी
- पदनाम, यरूशलम
इसराइल पर हमास के सात अक्टूबर के हमले को एक साल बीत गए हैं.
एक साल बाद आज भी इसराइल के भीतर देश के इतिहास के इस सबसे भयानक हमले को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.
उस दिन इसराइल की ताक़तवर सेना हमास के हमले से हैरान रह गई थी और बहुत कम वक़्त के भीतर हमलावर अपने मक़सद में कामयाब हो गए थे.
ग़ज़ा की सीमा की निगरानी करने वाली इसराइली सेना की एक चौकी पर उस दिन क्या हुआ था, इस बारे में सेना की तरफ़ से पीड़ित परिवारों को जो जानकारियां दी गई हैं, उनको बीबीसी ने सुना है.
सात अक्टूबर की सुबह हमास के हथियारबंद लड़ाकों ने ग़ज़ा सीमा पर इसराइल के नहाल ओज़ सैनिक अड्डे पर क़ब्ज़ा कर लिया था और ख़बरों के मुताबिक़ इस अड्डे पर इसराइल के 60 से ज़्यादा सैनिक मारे गए थे. वहीं बाक़ी लोगों को हमास ने बंधक बना लिया था.
वैसे तो इसराइल की सेना ने अब तक किसी आधिकारिक जांच के नतीजे नहीं जारी किए हैं कि आख़िर सात अक्टूबर को हुआ क्या था.
लेकिन, सेना की तरफ़ से उस दिन मारे गए सैनिकों के परिजनों को काफ़ी कुछ जानकारी दे दी गई है. इनमें से कुछ ने सेना से मिली ये जानकारी बीबीसी से साझा की है.

लोगों से मिली ये जानकारियां सात अक्टूबर के हमले को लेकर इसराइली सेना के आधिकारिक बयान के बाद की सबसे प्रामाणिक सूचना है.
उस दिन की घटनाओं की दूसरी कड़ियां जोड़ने की कोशिश में हमने हमास के हमले से बाल-बाल बचे लोगों से भी बात की.
हमने मारे गए लोगों के संदेश देखे हैं और हमले के वक़्त उसकी जानकारी दे रहे लोगों की आवाज़ की रिकॉर्डिंग भी सुनी है.
इन सबकी मदद से हमने हमास के उस हमले की रफ़्तार और क्रूरता का एक ख़ाका खींचने की कोशिश की है.
अपनी इस पड़ताल में बीबीसी ने पाया है कि:
- ग़ज़ा में क्या हो रहा है, इस पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सीमा पर बनी नहाल ओज़ की सैनिक चौकी में तैनात युवा महिलाओं की थी. लेकिन उनके सिवा और भी बहुत से सैनिकों ने सात अक्टूबर के हमले से पहले ग़ज़ा सीमा पर संदिग्ध गतिविधियां होते देखी थीं.
- सैनिकों ने देखा था कि हमले से ठीक पहले हमास की गतिविधियां अचानक से एकदम रुक गई थीं.
- इसराइल के बहुत से सैनिक हमले के वक़्त बिना हथियारों के थे. आधिकारिक प्रोटोकॉल के मुताबिक़ हमले के वक़्त इन सैनिकों को आगे बढ़ने के बजाय वहीं पर डटे रहने का हुक्म दिया गया था.
- ग़ज़ा की निगरानी के लिए लगे कुछ उपकरण उस दिन या तो काम नहीं कर रहे थे, या फिर हमास ने उनको बड़ी आसानी से नष्ट कर दिया था.
हमने उस दिन के हमले की जो जानकारियां जुटाई हैं, उनसे कई सवाल खड़े होते हैं.
इनमें से एक सवाल ये भी है कि सीमा के इतने क़रीब बनी सैनिक चौकी में हथियारबंद सैनिकों की तादाद इतनी कम क्यों थी?
हमले की ख़ुफ़िया जानकारी और चेतावनियां मिलने के बाद भी इनसे निपटने के लिए और अधिक क़दम क्यों नहीं उठाए गए थे?
हमले के शिकार सैनिकों की मदद के लिए और सैनिक टुकड़ियां भेजने में इतना ज़्यादा वक़्त क्यों लगा था? क्या इस सैनिक अड्डे की बनावट ही ऐसी थी, जिसकी वजह से यहां तैनात लोगों की हिफ़ाज़त नहीं हो सकी?
हमने अपनी पड़ताल के नतीजों को इसराइल के सैन्य बलों के सामने रखा. इस पर इसराइली सेना ने कहा कि अभी, नहाल ओज़ की सैनिक चौकी समेत दूसरी तमाम जगहों पर सात अक्टूबर की घटनाओं और उससे पहले के हालात की विस्तार से जांच की जा रही है.
सात अक्टूबर को शरोन (वास्तविक नाम नहीं) ने नहाल ओज़ पर अपनी शिफ़्ट की शुरुआत सुबह चार बजे से की थी. ये चौकी ग़ज़ा सीमा पर लगी बाड़ से लगभग एक किलोमीटर दूर है.
शरोन, इस सैनिक चौकी की सिर्फ़ महिलाओं वाली उस सैनिक इकाई की सदस्य थीं, जिसे हिब्रू ज़बान में तत्ज़पिटानियोट कहा जाता है.
इन महिलाओं का काम सीमा पर लगी बाड़ के कैमरों में क़ैद फुटेज पर रिकॉर्डिंग के समय ही नज़र रखना और किसी गड़बड़ी या असामान्य बात का पता लगाना था.
सैनिक चौकी के वॉर रूम या हमाल में ये महिलाएं पालियों में काम करती थीं और चौबीसों घंटे ग़ज़ा पर कैमरों के ज़रिए निगाह रखती थीं.
हमाल असल में एक ऐसा कमरा है, जिसमें खिड़कियां नहीं होतीं. इसका दरवाज़ा बहुत मज़बूत होता है. यही नहीं हमाल की दीवारों में धमाके बर्दाश्त करने की भी क्षमता होती है. इनकी सुरक्षा के लिए बेहद सख़्त नियम क़ायदे बने हुए हैं.
इसराइली सेना (आईडीएफ़) ने इस चौकी पर तैनात रहे सैनिकों के परिजनों को बताया है कि 7 अक्टूबर को यहां तैनात बहुत से कर्मचारियों के पास हथियार नहीं थे.
आईडीएफ़ की ऑपरेशन डिविज़न के पूर्व प्रमुख जनरल इस्राएल ज़िव ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने अपनी नौकरी के दिनों में ये कभी भी नहीं देखा कि सीमावर्ती इलाक़ों में सैनिकों की तैनाती बिना हथियारों के हो.
जनरल ज़िव कहते हैं कि, ‘ये बात तो समझ से परे है… सैनिक की तो पहचान ही उसका हथियार है.’
सात अक्टूबर को नहाल ओज़ की चौकी पर जो हथियारबंद सैनिक थे, उनमें पैदल सेना की एक टुकड़ी भी शामिल थी, जिसका ताल्लुक़ इसराइली सेना की गोलानी ब्रिगेड से था.
बीबीसी ने पहले ये बताया था कि तत्ज़पिटानियोट सीमावर्ती बाड़ के उस पार होने वाली संदिग्ध गतिविधियों में इज़ाफ़े की तरफ़ ध्यान दिलाया था.
अब हमारे पास इस बात की पक्की जानकारी है कि निगरानी करने वाली महिला सैनिकों की इस जानकारी की तस्दीक़, चौकी पर तैनात अलग-अलग टुकड़ियों की सैनिकों ने भी की थी.
हालांकि, सात अक्टूबर के हमले के कुछ दिनों पहले सीमावर्ती इलाक़ों में शक पैदा करने वाली एक ख़ामोशी सी पसर गई थी.
नहाल ओज़ पर तैनात तोपख़ाने के एक सैनिक ने उन दिनों को याद करते हुए हमें बताया, ‘'ऐसा कुछ नहीं दिखा था, जो हमें डराने वाला लगे. सबको ये ज़रूर लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है. ये बात समझ से परे थी.’
जनरल इस्राएल ज़िव कहते हैं कि जो कुछ भी हो रहा था, उसे समझने में इसराइली सेना की नाकामी की सबसे बड़ा कारण तो उसका ‘अहंकार’ था.
इसराइली सेना को लगता था कि हमास उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता है और अगर वो हिम्मत जुटा भी ले तो उनमें ऐसा कर पाने की क्षमता नहीं है.
जनरल ज़िव ने कहा कि 6 अक्टूबर की रात हम ये मानकर सोए थे कि सीमा के उस पार कोई बिल्ली है, लेकिन जब सवेरा हुआ तो पता चला कि वो तो आदमख़ोर बाघ था.
सात अक्टूबर की सुबह 5.30 बजे गोलानी ब्रिगेड के सैनिकों ने सीमावर्ती बाड़ के इस पार गाड़ी से गश्त लगाने की तैयारी शुरू की.
वो हर सुबह सूरज उगने से पहले ये काम किया करते थे. उस दिन उनके अधिकारियों ने सैनिकों को कुछ देर रुकने और गश्त को थोड़ी देर बाद शुरू करने को कहा.
इनमें से तीन सैनिकों ने बीबीसी को बताया कि एंटी टैंक मिसाइलों के हमले का ख़तरा है, इसलिए वो गश्त को फ़िलहाल टाल दें.
एक सैनिक ने उस दिन अधिकारियों से मिले हुक्म को याद करते हुए बताया, ‘'हमें चेतावनी दी गई थी. हमको सरहद पर लगी बाड़ के ठीक पास से गुज़रने वाले रास्ते से दूर रहने के लिए कहा गया था.’'
गोलानी ब्रिगेड के एक और सैनिक, 21 बरस के शिमोन मलका ने कहा कि ऐसी चेतावनी बड़ी असामान्य बात थी.
हालांकि, ये कोई पहली बार भी नहीं हुआ था. इसलिए सैनिक इस चेतावनी को लेकर बहुत ज़्यादा चिंतित नहीं हुए थे.

इसराइली सेना के पूर्व जनरल ज़िव कहते हैं कि सेना के प्रोटोकॉल में ये बात आम है कि कभी किसी हमले की आशंका होने पर सैनिकों को पीछे रहने को कहा जाता है ताकि दुश्मन उन्हें ‘निशाना न बना सके’.
हालांकि, वो ये भी कहते हैं कि हमास ने इसराइली सेना के इस प्रोटोकॉल को समझ लिया और इसका अपने हक़ में इस्तेमाल किया.
पूर्व इसराइली जनरल ने कहा कि सैनिक अड्डे में ऐसे ठिकाने बनाए जाने चाहिए थे ताकि गोलानी ब्रिगेड के सैनिक वहाँ सुरक्षित रहकर हमले का जवाब दे सकते.
जनरल ज़िव कहते हैं कि सैनिकों की हिफ़ाज़त के बड़े आसान तरीक़े हैं ताकि वो छिप सकें और साथ ही साथ ऐसी स्थिति में भी हों कि हमले का जवाब दे सकें. दुश्मन पर से उनकी नज़र बिल्कुल भी न हटे.
जब गोलानी ब्रिगेड, सीमा पर लगी बाड़ से दूर रहकर अगले आदेश का इंतज़ार कर रही थी, तभी शरोन ने हमास के लड़ाकों को इसराइली सीमा की तरफ़ बढ़ते देखा. हालांकि, शरोन ने कहा कि ये भी एक आम बात थी, क्योंकि ‘वो भी पालियों में ही काम करते हैं.’
6.20 बजे: रॉकेट से हमला
सुबह 6.20 बजे तक हमास ने इसराइल पर रॉकेट दाग़ने शुरू कर दिए थे. लेकिन, शरोन कहती हैं कि फ़ौरी तौर पर ये रॉकेट हमले भी ख़तरनाक नहीं लगे. शरोन ने इससे पहले भी हमास के रॉकेट हमले देखे थे और उनके अड्डे पर भी ऐसे रॉकेट हमलों से महफ़ूज़ रखने के पूरे इंतज़ाम थे.
वो कहती हैं कि, ‘आमतौर पर पांच मिनट तक रॉकेट दाग़े जाते रहते हैं. फिर सब शांत पड़ जाता है.’
हालांकि, इस बार रॉकेट का हमला बंद नहीं हुआ था.
6.30 बजे: हमास के लड़ाकों ने सीमा पर बाड़ तोड़ी
शरोन बताती हैं कि सुबह के लगभग 6.30 बजे वो हमास के लड़ाकों को साफ़तौर पर अपने क़रीब आते देख रही थीं.
तत्ज़पिटानियोट ने वॉकी टॉकी पर ज़मीनी टुकड़ियों को फ़ौरन ये संदेश भेजकर सावधान किया.
वॉर रूम यानी हमाल में तैनात एक युवती ने वायरलेस पर घबराई हुई आवाज़ में एलान किया कि सभी चौकियां सावधान. चार लोग बाड़ की तरफ़ दौड़ते हुए आ रहे हैं. मैं इनमें से दो लोगों को साफ़तौर पर हथियारों से लैस देख रही हूँ जो बाड़ की तरफ़ दौड़ लगा रहे हैं.
ठीक उसी वक़्त शिमोन मलका ने अपने वायरलेस पर रॉकेट हमले के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक कोड वर्ड सुना. उनके कमांडर ने हुक्म दिया कि वो अपनी जीप से नामेर नाम के इसराइली सेना की एक बख़्तरबंद गाड़ी में छलांग लगाएं और बाड़ की तरफ़ आगे बढ़ें.
लेकिन, शिमोन को बाड़ में कोई घुसपैठ नहीं दिखाई दी और उन्हें लगा कि ये तो एक अभ्यास भर है.
लोहे की इस तथाकथित दीवार को लंबे समय से इसराइल के तमाम आम नागरिक और सैनिक अभेद्य मानते आए थे. फिर भी, सीमा पर बनी चौकियां कई जगह से इसमें सेंध लगने की जानकारी दे रही थीं.
शरोन कहती हैं कि उस दिन नहाल ओज़ पर तैनात तमाम तत्ज़पिटानियोट महिलाओं ने देखा कि सीमा पर लगी बाड़ के जिस हिस्से की निगरानी उनके ज़िम्मे थी, उस हिस्से में दो से पांच जगहों पर बाड़ काटकर घुसपैठ की गई थी.
उन्होंने हमास के लड़ाकों को ये बाड़ काटकर इसराइल में दाख़िल होते हुए देखा था.
रिटायर्ड जनरल ज़िव कहते हैं कि हमास के लड़ाके जितनी आसानी से बाड़ को पार करके इसराइली सीमा में दाख़िल हो गए, उससे अभेद्य कही जाने वाली इस दीवार की कमज़ोरियां खुलकर उजागर हो गईं.
वो कहते हैं कि, ‘जैसा कि आपने भी देखा कि दो भरे हुए ट्रक आकर इस दीवार को आसानी से गिरा सकते थे.
उनके आगे ये सुरक्षा घेरा कुछ भी नहीं था. अगर बाड़ के 50 से 60 मीटर अंदर की ओर बारूदी सुरंगें भी बिछी होतीं, तो उससे भी बस इतना होता कि हमास के हमले को कुछ घंटों के लिए टाल दिया जाता.’
इसराइली सेना ने मारे गए सैनिकों के परिजनों को हमले के बारे में जो जानकारी दी है और जिसको परिजनों ने बीबीसी से साझा किया है.
उसके मुताबिक़ छह बजकर 40 मिनट से कुछ पहले नहाल ओज़ की निगरानी चौकी पर रॉकेट से हमला हुआ, जिससे उसको काफ़ी नुक़सान पहुँचा.
इसराइली सेना ने सैनिकों के रिश्तेदारों को बताया कि हमले की ख़बर होते ही हमाल यानी चौकी के वॉर रूम से स्नाइपर यानी निशानेबाज़ का निगरानी करने वाले सिस्टम को एक्टिव किया गया. इसके एक अधिकारी ने सीमा में दाख़िल हो रहे हमास के एक हथियारबंद लड़ाके पर दूर से निशाना लगाने की कोशिश भी की.
पैदल सेना के अधिकारी भी हमाल में तैनात तत्ज़पिटानियोट के पास पहुंच गए. शरोन उस दिन को याद करके बताती हैं कि एक अधिकारी तो पायजामा पहने हुए ही वॉर रूम पहुंच गए थे.
और तभी, जब हमास के लड़ाके निगरानी करने वाले कैमरों पर लगातार गोली चला रहे थे, तब हमाल के अंदर लगे कैमरों के मॉनिटर की स्क्रीन एक के बाद एक बंद होने लगीं.
जनरल ज़िव कहते हैं कि, इस हमले से कुछ हफ़्तों पहले तक सीमा पर हमास के लड़ाके इन कैमरों के सामने ही अपनी गतिविधियां चला रहे थे. उन्होंने एक रणनीति के तहत ऐसा किया था ताकि उनकी गतिविधियां इसराइली सैनिकों को ‘आम बात’ लगें.
तत्ज़पिटानियोट जहाँ काम कर रही थीं, वहाँ से महज़ 100 मीटर की दूरी पर ग़ज़ा की निगरानी करने के लिए इसराइली सेना का एक और उपकरण लगा हुआ था.
जिसे बलून कहते हैं. ग़ज़ा और इसराइल की सीमा पर ऐसे कई ‘जासूसी ग़ुब्बारे’ लगे हुए हैं.
नहाल ओज़ के पास लगे ग़ुब्बारे से निगरानी के लिए एलरॉय समेत पाँच सैनिक तैनात थे.
एलरॉय के पिता रफी बेन शितरिट ने बीबीसी को बताया कि सात अक्टूबर की सुबह उनके बेटे की नींद रॉकेट के धमाकों और सायरन की आवाज़ से खुली थी.
बाद में इसराइली सेना ने शुरुआती जांच की और जानकारियां एलरॉय के परिवार से साझा की थीं.
नहाल ओज़ सीमा पर लगा ग़ुब्बारा ग़ज़ा के भीतर तक निगरानी कर सकता था. ये माना जाता था कि ये ग़ुब्बारे चौबीसों घंटे लगातार काम करते हैं.
लेकिन, सात अक्टूबर को सीमा पर लगे तीन ग़ुब्बारे काम नहीं कर रहे थे, उनमें से एक नहाल ओज़ का भी था.

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रफी बेन शितरिट ने कहा कि नहाल ओज़ वाला ग़ुब्बारा काम नहीं कर रहा था और किसी को इसकी फ़िक्र नहीं थी. उन्हें बताया गया था कि इसको रविवार को ठीक कर लिया जाएगा.
वो कहते हैं कि, ‘ऐसा माहौल था जैसे कि हमास डरा हुआ है और अगर कुछ होता भी है तो हद से हद आतंकवादी घुसपैठ होगी या कुछ आतंकवादी हमला कर देंगे.’
वहीं, अपनी निगरानी चौकी में शरोन लगातार मोर्चे पर तैनात सैनिकों से बात कर रही थीं.
उस दिन के बारे में शरोन कहती हैं कि, ‘मैं रोती जा रही थी और बात करती जा रही थी.’
शरोन ने कहा कि जब इस भयानक हमले के दौरान कुछ महिलाएं विचलित हो रही थीं और घबराहट में अपने काम पर ध्यान नहीं दे पा रही थीं, तब चौकी पर तैनात कमांडिग ऑफिसर ने फटकारते हुए ‘ख़ामोश’ कहा था.
वहीं, बाड़ के पास पहुंच चुके शिमोन ने बताया कि वो वायरलेस पर मिल रहे आदेशों का पालन कर रहे थे. वो अब भी ये नहीं समझ पा रहे थे कि, जिस महिला की आवाज़ उन्हें सुनाई दे रही थी वो इस क़दर घबराई हुई क्यों थी.
शिमोन कहते हैं कि, ‘मैं उस तनाव को महसूस तो कर रहा था, पर मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.’
जब शिमोन की टुकड़ी उस जगह पहुंच गई, जहां जाने के लिए तत्ज़पिटानियोट ने उन्हें कहा था, तब उन्होंने हमास के ट्रक को बाड़ तोड़कर घुसते हुए देखा.
शिमोन बताते हैं कि, ‘वो हम पर गोली चलाने लगे. वहां पर शायद पांच ट्रक थे.’
सैनिकों ने जवाबी फायरिंग की और मोटरसाइिकल पर आए लड़ाकों पर अपनी बख़्तरबंद गाड़ी चढ़ा दी.
7:00 बजे: वॉर रूम पहुँचे हमास के लड़ाके
सुबह 7:00 बजे के थोड़ी ही देर बाद वो लम्हा आ गया, जिसका डर सबको था. मगर इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. हमास के हथियारबंद लड़ाके नहाल ओज़ के हमाल यानी वॉर रूम के दरवाज़े तक पहुंच गए थे.
शरोन को याद है कि तब उन्हें कहा गया था कि, ‘फौरन उठो, आतंकवादी दरवाज़े तक आ गए हैं.’
तत्ज़पिटानियोट को अपनी कुर्सियों को छोड़कर वॉर रूम के भीतर बने एक दफ़्तर में जाने के लिए कहा गया.
रिटायर्ड जनरल ज़िव कहते हैं कि सेना के बड़े अधिकारियों ने सैनिक अड्डों की हिफ़ाज़त करने पर बहुत अधिक दिमाग़ नहीं लगाया. इसके बजाय उनका ज़ोर बाहर गश्त लगाने वाली टुकड़ियों पर था.
वो कहते हैं, ‘उस दिन की पूरी तबाही में ये एक बड़ी वजह रही थी क्योंकि जब दुश्मन ने चौकी तक पहुंचकर उन्हें चौंका दिया, तो उसके बाद के हालात के लिए कमांडर तैयार नहीं थे. उनकी सुरक्षा का पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखर गया.’
7.20 बजे: बम से बचाने वाले कमरे पर हमला
लगभग सात बजकर 20 मिनट पर हमाल के बाहर बने उस ठिकाने पर हमला किया गया, जिसे सुरक्षा कवच या बॉम्ब शेल्टर कहा जाता है.
उस जगह के भीतर पनाह लेने वालों में वो महिला सैनिक या तत्ज़पिटानियोट भी शामिल थीं, जिनकी उस दिन ड्यूटी नहीं थी.
उनकी हिफ़ाज़त ‘चार महिला योद्धा’ कर रही थीं. ये जानकारी, सुबह सात बजकर 38 मिनट पर वहां पनाह लेने वाली एक तत्ज़पिटानियोट ने व्हाट्सऐप पर भेजी थी. बीबीसी ने ये मैसेज देखा है.
उस बॉम्ब शेल्टर में पनाह लेने वालों की तरफ़ से इसके बाद कोई मैसेज नहीं भेजा गया.
इसराइली सेना ने उनके परिजनों को बताया कि, ये ‘महिला योद्धा’ उस ठिकाने पर तैनात इकलौती हथियारबंद सैनिक थीं और उन्होंने हमास के लड़ाकों को तब तक बॉम्ब शेल्टर में दाख़िल होने से रोक रखा था, जब तक ग्रेनेड के धमाके से उनकी कमांडर की मौत नहीं हो गई और बाक़ी लोग ज़ख़्मी नहीं हो गए.
इस ग्रेनेड हमले की वजह से जो अफ़रा-तफ़री फैली, उसका फ़ायदा उठाकर 10 सैनिक वहां से भाग निकले और उन्होंने ख़ुद को रिहाइशी बैरकों में बंद कर लिया. इन 10 सैनिकों के अलावा, बॉम्ब शेल्टर में छिपे बाक़ी सभी लोगों को या तो हमास ने मार डाला या फिर बंधक बना लिया था.
शिमोन और उनके कमांडर अपने अड्डे की तरफ़ लौट पड़े थे. लेकिन, उन्हें अब भी इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि कितना बड़ा हमला हुआ है.
इसराइली सेना ने बाद में नहाल ओज़ में मारे गए एक सैनिक के परिवार को बताया था कि उस सैनिक अड्डे को निशाना बनाने की शुरुआत ड्रोन हमले से की गई थी.
इसके बाद चार दिशाओं से हमास के लगभग 70 लड़ाकों ने नहाल ओज़ पर हमला किया था और जैसे जैसे समय बीता, वहां पर हमास के और लड़ाके पहुंचते गए थे.

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ग़ज़ा चौकी से हज़ारों लड़ाके इसराइल की सीमा में दाख़िल हुए थे.
शिमोन ने बताया कि जब वो अपने अड्डे की तरफ़ लौट रहे थे, तब जाकर उन्हें अंदाज़ा हुआ कि ये हमला कितना बड़ा था.
वो कहते हैं कि, ‘जब हम अपने बेस पर पहुंचे, तो सब कुछ जल चुका था.’
हमाल के भीतर जिस ऑफिस में लगभग 20 सैनिक छिपे हुए थे, उन्होंने एक दूसरे को तसल्ली देकर शांत करने की कोशिश की.
इस बीच, वो बार-बार मदद के लिए अपने अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे.
शरोन कहती हैं कि, "मुझे लगता है कि उनमें से किसी ने शायद कुछ ऐसा कहा था कि, ‘कोई मदद नहीं आएगी. कोई यहां नहीं पहुंच सकता है’ और मुझे याद है कि तब मेरे अधिकारी ने कहा था कि, ‘हमें मदद नहीं चाहिए, हमें यहां से निकाले जाने की ज़रूरत है.’’
8.00 बजे: इसराइली ड्रोन पहुंचे
सुबह 8.00 बजे से कुछ पहले ज़िक नाम का इसराइली ड्रोन वहाँ पहुँचा था. लेकिन, इसराइली सेना के मुताबिक़ उनके इस ड्रोन को इसराइली सैनिकों और हमास के लड़ाकों के बीच फ़र्क़ कर पाने में मुश्किलें आ रही थीं.
इसका नतीजा ये हुआ कि ये ड्रोन अपने असली निशाने पर बहुत धीमी रफ़्तार से हमला कर पा रहा था.
लगभग इसी दौरान हमाल के ऊपर हमला शुरू हो गया. बहुत ज़बरदस्त गोलीबारी हुई. जिनके पास हथियार थे, उन्होंने इमारत के दरवाज़ों पर मोर्चा लिया और हमास को भीतर आने से रोकने की हर मुमकिन कोशिश की. ये लड़ाई लगभग चार घंटे तक चलती रही थी.
शिमोन बताते हैं कि इस लड़ाई के दौरान हमास के लड़ाकों की संख्या उनके साथियों के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा थी. और, बाहर से कोई मदद आने के आसार नहीं दिख रहे थे.
सब कुछ बहुत अस्पष्ट, धुंधला सा था.
सुबह लगभग 9.00 बजे गोलानी ब्रिगेड ने नहाल ओज़ के अड्डे के डाइनिंग रूम की तरफ़ बढ़ना शुरू किया. तत्ज़पिटानियोट ने बताया था कि ज़्यादातर हथियारबंद लड़ाके वहीं पर छिपे हुए थे.
बाद में इसराइली सेना ने सैनिकों के रिश्तेदारों को बताया था कि सात अक्टूबर को इसराइल के हर 25 सैनिकों के मुक़ाबले में हमास के 150 हथियारबंद लड़ाके थे.
जनरल ज़िव कहते हैं कि, ‘उस दिन हमास ने झुंड के झुंड में हमला बोला था.’
वो बताते हैं कि, ‘उस दिन हमास के लड़ाके 70 से ज़्यादा जगहों से दाख़िल हुए थे. लगभग तीन हज़ार आतंकवादी थे…. उनको पता था कि उनके पास वो संसाधन नहीं, जो इसराइल के पास हैं. इसीलिए, उन्होंने भारी संख्या को अपना हथियार बनाया था.’
इसराइली मीडिया के मुताबिक़ इसी दौरान बनाए गए एक वीडियो में नहाल ओज़ में तैनात नौजवान निगरानी अधिकारियों को देखा गया था, जिन्हें हमास के हथियारबंद लड़ाकों ने बंधक बनाया था.
इस वीडियो में एक महिला के हाथ बंधे हुए हैं और उसका चेहरा दीवार की तरफ़ है. उससे एक लड़ाके को ये कहते सुना जा सकता है कि, ‘तुम सब कुत्ते हो… हम तुम्हें कुचल डालेंगे.’
19 बरस की नामा लेवी ने एक दिन पहले ही इस अड्डे पर काम करना शुरू किया था. इस वीडियो में वो ख़ून से सना चेहरा लिए हुए गुहार लगाती सुनाई दे रही हैं कि, ‘फ़लस्तीन में उनके भी कई दोस्त रहते हैं.’
वीडियो में महिलाओं को पास में खड़ी गाड़ी तक घसीटकर ले जाते और फिर गाड़ी को वहां से जाते देखा जा सकता है.
नामा की मां के लिए ये सब देख पाना बर्दाश्त के बाहर है. नामा की मां डॉक्टर ऐतलेट लेवी कहती हैं कि, ‘वो ज़ख़्म, वो घाव. मेरी बेटी जो कह रही थी और आतंकवादी उससे जो बोल रहे थे. वो सब लम्हे बेहद भयावाह थे.’
जनरल ज़िव कहते हैं कि नहाल ओज़ चौकी पर तैनात तत्ज़पिटानियोट ने ‘बहुत बहादुरी दिखाई. ग़लती सिस्टम की थी. कमांडरों की थी. तत्ज़पिटानियोट की कोई ग़लती नहीं थी.’
9.45 बजे: इसराइल के हेलिकॉप्टर पहुंचे
सेना के अधिकारियों ने शोक मना रहे परिजनों को बताया कि हमास का हमला शुरू होने के तीन घंटे से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद इसराइली सेना के हेलिकॉप्टर ने हमास के लड़ाकों पर गोली चलानी शुरू की थी. इस हेलिकॉप्टर ने नहाल ओज़ पर 12 बार गोलीबारी की थी.
शिमोन और उनके कमांडर समेत छह लोग नहाल ओज़ के सैनिक अड्डे से पैदल चलकर बाहर आए. वो कहते हैं कि उनके ऊपर ‘चारों तरफ़ से गोली चलाई जा रही थी.’
ऑटोमैटिक हथियारों की आवाज़ के बीच कभी कभार एक गोली चलने की आवाज़ भी आती थी. जिससे पता लगता था कि हमास का कोई स्नाइपर या सटीक निशानेबाज़ भी उन पर गोली चला रहा था. जिसे वो लोग देख नहीं पा रहे थे.
शिमोन कहते हैं कि, ‘जब भी वो स्नाइपर गोली चलाता था, तो मेरे किसी न किसी दोस्त के सिर में गोली लगती थी.’
सिमोन कहते हैं कि अपने साथ लड़ रहे सैनिकों में से सिर्फ़ वही थे, जो उस हमले में बच निकले और वो भी स्नाइपर की गोली से बाल बाल ही बचे थे.
शिमोन ने बताया कि, ‘एक गोली मेरे सिर के बिल्कुल बगल से गुज़र गई थी… मैंने वो गोली अपने पास कंक्रीट से टकराते सुनी और उससे जो गर्मी निकली वो भी मैंने महसूस की.’
शिमोन ने बताया कि उस वक़्त तक उनके वायरलेस ने भी काम करना बंद कर दिया था.
जनरल ज़िव इसे एक ‘ज़बरदस्त तूफ़ानी हमला’ क़रार देते हैं.
वो समझाते हुए कहते हैं कि, ‘कई घंटों तक सैनिकों के पास कोई बैकअप, कोई मदद नहीं पहुंच सकी. क्योंकि किसी को पता ही नहीं था कि असल में हो क्या रहा है और मदद कहां भेजी जाए.’
शिमोन इस मौक़े से बचकर निकल गए और फिर एक निशानेबाज़ सैनिक के ठिकाने पर जा पहुंचे. इसके बाद वो सैनिकों की उस टुकड़ी में शामिल हो गए, जिसे इसराइलियों के किब्बुत्ज़ की हिफ़ाज़त के लिए भेजा गया था.
11 बजे: वॉर रूम पर भी हमला
वहीं, हमाल या वॉर रूम में 11 बजे के आस पास बहुत अहम घटनाएं हुईं.
बिजली काट दी गई थी. इसका नतीजा ये हुआ कि दरवाज़ों के ताले खुल गए थे. क्योंकि वो बिजली वाले सिस्टम से खुलते और बंद होते थे. इसराइली सेना ने, सैनिकों के परिजनों को जो जानकारी दी उसके मुताबिक़, बिजली काट देने की वजह से वॉर रूम खुल गया था. हमास के लड़ाकों ने वॉर रूम के भीतर ग्रेनेड फेंके और अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
सेना ने परिजनों को बताया कि गोलानी ब्रिगेड के एक सैनिक के साथ छूरे से आमने सामने की लड़ाई में हमास का एक लड़ाका मारा गया था.
जनरल ज़िव कहते हैं कि उस समय तक सैनिक अपनी हिफ़ाज़त के लिए वॉर रूम के तालों के भरोसे रह गए थे. क्योंकि सेना का जो सुरक्षा घेरा था वो तो पहले ही नाकाम हो चुका था.
इसराइली सेना ने मारे गए सैनिकों के परिजनों को जो जानकारी दी, उसके मुताबिक़ ‘आतंकवादियों ने वॉर रूम में एक ज्वलनशील पदार्थ फेंका और फिर उसमें आग लगा दी.’

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शरोन उस दिन को याद करते हुए बताती हैं कि, ‘धुआं बहुत ज़्यादा था. सबने खांसना शुरू कर दिया. उनके दम घुट रहे थे. लोग बेहोश होकर गिरने लगे थे.’
एक सैनिक की मां कहती हैं कि उन्हें इसराइली सेना ने बताया कि, ‘हमले के दौरान हमास ने एक ज़हरीला पदार्थ इस्तेमाल किया था. हालांकि बाक़ी लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी. और कुछ ने कहा कि इसराइली सेना ने बाद में अपनी इस जानकारी में कुछ बदलाव किया था.’
12:30 बजे: शरोन और दूसरे लोग भी भागे
उस दिन वहां मौजूद लोगों के मुताबिक़, दोपहर को लगभग 12.30 बजे हमाल में मौजूद शरोन समेत सात लोग टटोलते हुए टॉयलेट की खिड़की तक पहुंचे और वहां से बाहर निकल गए.
बाहर निकलकर शरोन समेत उन सातों लोगों ने बाक़ी लोगों के बाहर निकलने का इंतज़ार किया. लेकिन, कोई बाहर नहीं आया. उस दिन नहाल ओज़ में तैनात तत्ज़पिटानियोट में से अकेले शरोन ही थीं, जो बच सकी थीं. इस इकाई की एक और युवा महिला की जान भी बच गई थी. जो वहां पर तैनात थी मगर सुबह उनकी ड्यूटी नहीं थी.
7 अक्टूबर का दिन ख़त्म होते होते इसराइली सेना ने हालात पर क़ाबू पा लिया था. उस सैनिक अड्डे पर फिर से नियंत्रण कर लिया था. लेकिन, उस दिन वहां तैनात बहुत से सैनिकों की जान नहीं बचाई जा सकी थी. नहाल ओज़ में तैनात सात तत्ज़पिटानियोट को बंधक बनाकर ग़ज़ा ले जाया गया था. वहां पर एक की हत्या कर दी गई थी. एक को सैनिकों ने छुड़ा लिया और पांच अभी भी हमास के क़ब्ज़े में हैं.

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उस दिन पूरे इसराइल में 300 से ज़्यादा सैनिकों समेत लगभग 1200 लोग मारे गए थे और 251 को बंधक बना लिया गया था. हमास द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, उसके बाद से ग़ज़ा में इसराइली सेना के सैन्य अभियान की वजह से 41 हज़ार से ज़्यादा फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं.
नहाल ओज़ में मारे गए लोगों में ग़ुब्बारे से निगरानी करने वाले एलरॉय और उनके चार साथी भी शामिल थे, जिन्होंने हमास के साथ लंबी लड़ाई लड़ी थी. एलरॉय के पिता ने बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी इसराइली सेना ने दी थी.
एलरॉय और उनके साथी, दस लड़ाकों को मारने में सफल रहे थे. लेकिन, उन पांच लोगों की तुलना में हमास के लड़ाकों की संख्या कहीं ज़्यादा थी. और, दोपहर को लगभग ढाई बजे एलरॉय और उनके साथियों के शव एक मोबाइल शेल्टर से बरामद हुए थे.
नहाल ओज़ के सैनिक अड्डे के वॉर रूम को वहां तैनात सैनिकों की सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर तैयार किया गया था. मगर, हमास के हमलावरों ने उसे तबाह कर दिया था.
तस्वीरों और वीडियो में इस जले हुए वॉर रूम और उन काली पड़ चुकी कंप्यूटर स्क्रीन्स को देखा जा सकता है, जिस पर तत्ज़पिटानियोट बड़ी सतर्कता के साथ ग़ज़ा की निगरानी का काम करती थीं. वहां की राख़ से हड्डियों के टुकड़े भी बरामद किए गए थे.
हमले में बच गए, मारे गए या फिर बंधक बनाए गए लोगों के परिजनों को ऐसे बहुत से सवालों के जवाब नहीं मिल सके हैं कि आख़िर ये सब हुआ कैसे. क्या गड़बड़ी हुई. किसकी ग़लती थी.
जॉन डॉनिसन और नॉओमी श्रेबेल-बॉल की रिपोर्टिंग के साथ
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित




















