लेबनान को कौन चलाता है और देश में हिज़्बुल्लाह कितना ताक़तवर?

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- Author, जेरेमी हॉवेल
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
लेबनान बीते क़रीब दो हफ्ते से इसराइल के निशाने पर है. लेबनान के अंदर इसराइल लगातार हमले कर रहा है. इन हमलों में एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है.
इसराइली सेना हवाई हमलों के साथ ही लेबनान पर ज़मीनी हमले भी कर रही है.
ताज़ा हालात के पीछे का कारण इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच जारी संघर्ष है.
हिज़्बुल्लाह को ईरान का समर्थन हासिल है. ये लेबनान में शिया इस्लामी राजनीतिक और शक्तिशाली सैन्य संगठन है.
हिज़्बुल्लाह लेबनान की सेना से ज़्यादा ताकतवर है और उसे इसका समर्थन हासिल है. इसके साथ ही हिज़्बुल्लाह के पास शिया मुस्लिम देशों का भी समर्थन है.
ये कोई आधिकारिक सरकारी संगठन तो नहीं है लेकिन लेबनान में बीते चार दशक में एक बड़ी शक्ति बन चुका है.

लेबनान पर किसका शासन
लेबनान की सत्ता वहां के विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच बँटी हुई है.
साल 1943 में फ़्रांस से आज़ादी मिलने के बाद एक संधि को मंज़ूरी दी गई. इसके बाद लेबनान में सभी धर्मों की मिलीजुली सरकार बनी.
इसके मुताबिक एक ईसाई व्यक्ति ही देश का राष्ट्रपति बनेगा, प्रधानमंत्री का पद सुन्नी मुसलमान को दिया जाएगा और संसद का स्पीकर एक शिया मुसलमान ही बन सकता है.
उस वक़्त लेबनान की आधी से ज़्यादा आबादी ईसाइयों की थी, यानी सुन्नी और शिया मुस्लिमों से अधिक.
हालांकि, बहुत से लोग कहते हैं कि अब ये संधि पुरानी हो चुकी है. क्योंकि देश में ईसाई, सुन्नी मुसलमान और शिया मुसलमान सभी की संख्या कुल आबादी का करीब 30-30 फ़ीसदी है.
संधि के समय ईसाई और मुस्लिम आबादी को संसद में बराबर सीट मिली थीं. कुल आबादी में सबसे अधिक संख्या मुस्लिम समुदाय की है. यानी शिया और सुन्नी मुसलमानों की कुल आबादी ईसाई धर्म को मानने वालों से अधिक है.
लेबनान में किसी एक पार्टी या धर्म को मानने वालों की सरकार नहीं बन सकी है. यहां सरकारें गठबंधन से बनती हैं. सभी बड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं.
यही कारण है कि सत्ता में उथल-पुथल भी देखने को मिलती है.

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लेबनान में हिज़्बुल्लाह की स्थिति कैसी है?
हिज़्बुल्लाह की स्थापना इसराइल के ख़िलाफ 1982 में एक शिया मुस्लिम संगठन के तौर पर की गई थी. हिज़्बुल्लाह का अर्थ अरबी में "ख़ुदा की पार्टी" है.
उस वक़्त लेबनान में गृह युद्ध चल रहा था. तब इसराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान पर क़ब्ज़ा किया हुआ था. हिज़्बुल्लाह को हथियार और पैसे से ईरान का साथ मिला हुआ है.
इस संगठन ने 1985 में अपनी स्थापना की आधिकारिक घोषणा की.
हिज़्बुल्लाह ने कहा कि वो ईरान की तरह ही लेबनान को भी एक इस्लामिक देश बनाना चाहता है. उसने दक्षिणी लेबनान और फलस्तीनी इलाकों से इसराइल के कब्ज़े को ख़त्म करने की कसम खाई.
2009 में हिज़्बुल्लाह ने एक घोषणापत्र जारी किया. इसमें लेबनान को मुस्लिम देश बनाने की बात नहीं कही गई.
हालांकि संगठन का इसराइल को लेकर रुख़ पहले की तरह ही था.

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जब 1990 में लेबनान का गृह युद्ध समाप्त हुआ, तब युद्ध में शामिल विभिन्न गुटों ने अपनी सेनाओं को भंग कर दिया. लेकिन हिज़्बुल्लाह ऐसे ही बना रहा.
उसने कहा कि दक्षिणी लेबनान में इसराइल से लड़ने के लिए उसकी ज़रूरत है.
इसराइल ने साल 2000 में उस इलाके़ से अपनी सेनाओं को वापस बुला लिया और हिज़्बुल्लाह ने इसे अपनी जीत बताया.
हिज़्बुल्लाह ने 1992 से संसद में अपने उम्मीदवार भेजना शुरू कर दिया था. उसके कई सांसद लेबनान की संसद में हैं और सरकार में भी कई मंत्री हैं.
हिज़्बुल्लाह शिया आबादी वाले लेबनान के इलाकों में स्कूल, स्वास्थ्य समेत अन्य सामाजिक सेवाएं प्रदान करता है.
लेबनान की अन्य पार्टियां भी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराती हैं. लेकिन हिज़्बुल्लाह का नेटवर्क इनके मुकाबले काफी बड़ा माना जाता है.

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लेबनान में हिज़्बुल्लाह कैसे ताकतवर बना?
हिज़्बुल्लाह की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना है.
वो अपने लड़ाकों की संख्या एक लाख बताता है.
हालांकि स्वतंत्र तौर पर किए गए अनुमानों में इन लड़ाकों की संख्या 20 हज़ार से 50 हज़ार के बीच बताई जाती है.
अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक़, हिज़्बुल्लाह के पास मौजूद रॉकेट और मिसाइलों की संख्या 1 लाख 20 हज़ार से 2 लाख के बीच है.
इसे दुनिया की सबसे ताकतवर गैर-सरकारी सेनाओं में से एक माना जाता है. ऐसा भी कहा जाता है कि हिज़्बुल्लाह की सेना लेबनान की सेना से अधिक ताकतवर है.
लेबनान की सरकार की कमज़ोरी का फायदा भी हिज़्बुल्लाह को मिलता है.
उदाहरण के तौर पर इस देश के पास साल 2022 से कोई राष्ट्रपति नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर सहमति ही नहीं बन पाई है कि किसे राष्ट्रपति बनाया जाए.
केंद्र सरकार इतनी मज़बूत नहीं है कि हिज़्बुल्लाह को उसका एजेंडा आगे बढ़ाने से रोक सके.
लेबनान पर बढ़ते इसराइली हमलों के बीच छह अक्तूबर को पीएम नाजिब मिकाती ने सीज़फ़ायर को लेकर दूसरे देशों से समर्थन देने की बात कही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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