लेबनान में आम लोग हिज़्बुल्लाह को कैसे देखते हैं, धर्म की क्या है भूमिका?

हिज़्बुल्लाह

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इमेज कैप्शन, लेबनान का शिया हथियारबंद ग्रुप हिज़्बुल्लाह को लेकर लोगों की राय बँटी हुई है
    • Author, कैरीन टोर्बे
    • पदनाम, बीबीसी अरबी, बेरुत

लेबनान में हिज़्बुल्लाह की भूमिका को लेकर गहरे विभाजन के बीच इसराइल से जंग जारी है.

हिज़्बुल्लाह एक शिया चरमपंथी समूह है. इसने ग़ज़ा के समर्थन में पिछले साल आठ अक्टूबर को इसराइली सैन्य ठिकानों पर हमला करने का फ़ैसला किया था.

हालांकि लेबनान में हिज़्बुल्लाह समर्थक और हिज़्बुल्लाह के विरोधियों के बीच स्पष्ट विभाजन को आसानी से कम नहीं किया जा सकता.

सालों से हिज़्बुल्लाह के बारे में अलग-अलग विचार, देश में होने वाले हर राजनीतिक बहस का केंद्रीय मुद्दा रहे हैं.

हिज़्बुल्लाह के साथ या ख़िलाफ़ होना, सार्वजनिक और निजी बातचीत का मुख्य मुद्दा था.

लेबनान एक ऐसा देश है, जहाँ विचार और बोलने की आज़ादी, इस इलाक़े में स्थित बाक़ी देशों के मुक़ाबले कहीं अधिक है.

लेबनान के एक नागरिक के तौर पर मुझे याद नहीं आता कि हिज़्बुल्लाह के राजनीतिक प्रभाव और इसके हथियारों के जख़ीरे को लेकर कितनी बहसों का गवाह रहा हूँ.

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लेबनान की जनता क्या सोचती है?

हिज़्बुल्लाह

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इमेज कैप्शन, लेबनान में कई ऐसे ग्रुप हैं जो हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण की मांग करते रहे हैं

देश के सबसे ताक़तवर और सबसे प्रमुख राजनीतिक समूह के प्रति लोगों के नज़रिए को पारिभाषित करने की जहाँ तक बात है तो इसकी कई परतें हैं.

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लेबनान में कई धार्मिक समूह हैं और यहाँ धार्मिक पहचान का लोगों की राजनीति पर बहुत गहरा असर है.

हिज़्बुल्लाह के अधिकांश समर्थक शिया मुस्लिम हैं और इसके आलोचकों और विरोधियों में अधिकांश संख्या ग़ैर शिया लोग हैं, जिनमें सुन्नी मुस्लिम और ईसाई हैं.

लेकिन यह केवल एक हद तक ही सही है.

अलग-अलग धर्म और विचारों से जुड़े यहाँ ऐसे कई समूह हैं, जो हिज़्बुल्लाह का पूरी तरह विरोध करते हैं.

इनमें से अधिकांश को ईरान का प्रॉक्सी माना जाता है और ईरान ही तय करता है कि लेबनान जंग या शांति में से कौन सा रास्ता अख़्तियार करेगा और यह देश की सरकार को नज़रअंदाज़ करता है.

कई ग्रुप हिज़्बुल्लाह की शक्तिशाली सेना को ख़त्म करने की मांग करते हैं.

लेकिन कुछ ऐसे ग्रुप भी हैं जो कई मुद्दों पर हिज़्बुल्लाह से सहमत नहीं हैं लेकिन इसके हथियारों के जख़ीरों का समर्थन करते हैं.

हाल फ़िलहाल तक इसकी मुख्य राजनीतिक सहयोगी पार्टी कभी सबसे बड़ी ईसाई पार्टी हुआ करती थी- फ़्री पैट्रियाटिक मूवमेंट.

सालों तक इन ग्रुपों में एक दूसरे को समर्थन करने का एक व्यावहारिक समझौता था.

इसके माध्यम से फ़्री पैट्रियटिक पार्टी (एफ़पीएम) को एक क़ीमती शिया राजनीतिक सहयोगी जबकि हिज़्बुल्लाह को एक ईसाई सहयोगी मिला, जो इसके तुरंत हथियार छोड़ने की मांग नहीं उठाता था.

हालांकि यह समझौता टूटा चुका है लेकिन ये दिखाता है कि लेबनान में अलग-अलग समूह किस तरह धार्मिक विचारधारा से अलग एक गठबंधन बना सकते हैं.

राष्ट्रीय सेना की स्थिति

लेबनान की सेना

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इमेज कैप्शन, लेबनान की सेना के पास संसाधन बहुत कम है और वह पश्चिमी देशों की मदद पर निर्भर है

एक तरफ़ कुछ लोग हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण की मांग करते हैं जबकि दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी हैं जो इसकी लड़ाई की ताक़त की वजह से इसके समर्थक हैं.

हिज़्बुल्लाह की सैन्य ताक़त और लेबनान की राष्ट्रीय सेना की अपेक्षाकृत कमज़ोरी का मतलब है कि इसके घेरे से बाहर रहने वाले भी मानते हैं कि इस ग्रुप का हथियारबंद रहना ज़रूरी है.

1982 में इसराइल ने लेबनान पर आक्रमण किया था और 2000 तक उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर कब्ज़ा रखा था. आज भी इसके कुछ हिस्सों पर नियंत्रण है.

लेबनान में हिज़्बुल्लाह की सेना ही एकमात्र ऐसी ताक़त है जो इसराइली सेना से भिड़ने की क्षमता रखती है.

लेबनान की सेना के पास संसाधनों का अभाव है. हथियारों और गोला बारूद के लिए वह अमेरिका और पश्चिमी देशों पर निर्भर है, जो कि पुराने पड़ चुके हैं.

इन हालात को देखते हुए लेबनान में अधिकांश लोग हिज़्बुल्लाह का समर्थन करते हैं और पार्टी के प्रति आम तौर पर सहानुभूति नहीं रखने वाले भी समर्थन करते हैं और इसी वजह से हिज़्बुल्लाह अपनी लड़ाकू क्षमता को बरक़रार रखे हुए है.

हिज़्बुल्लाह के प्रति एकजुटता क्यों?

हिज़्बुल्लाह

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इमेज कैप्शन, शिया मुसलमानों में हिज़्बुल्लाह का आधार है जबकि बड़ी संख्या में इसके विरोधी ग़ैर-शिया हैं

लेबनान में सहानुभूति, विरोध और गठबंधनों का पहले से मौजूद जटिल जाल, संकट गहराने के दौरान बदल सकता है क्योंकि इसराइल के साथ सीमापार गोलीबारी पिछले कुछ दिनों में बढ़ी है.

इन हालात में लोग अपने आपसी मतभेद किनारे रख देते हैं.

यहां तक कि हाल ही में हिज़्बुल्लाह के सदस्यों को निशाना बनाते हुए किए गए पेजर और वॉकी टॉकी हमलों से पीड़ितों के प्रति उन लोगों ने भी एकजुटता ज़ाहिर की जिन्होंने ग़ज़ा के समर्थन में इसराइल के ख़िलाफ़ हमला शुरू करने के हिज़्बुल्लाह के फ़ैसले की तीखी आलोचना की थी और देश को एक ख़तरनाक़ संकट में घसीटने का उस पर आरोप लगाया था.

वायरलेस कम्युनिकेशन में बड़े पैमाने पर हुए धमाकों में हज़ारों लोग घायल हुए और कई मारे गए. इसके लिए इसराइल को दोषी ठहराया गया. हालांकि इसराइल ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली.

लेकिन जब इसराइल ने दक्षिणी लेबनान और बेका वैली पर भारी हवाई बमबारी शुरू की तो, हिज़्बुल्लाह के प्रति एकजुटता में बढ़ोतरी ही हुई. इसके अलावा इसराइल ने दक्षिणी बेरुत के बाहरी भीड़भाड़ इलाक़े को भी निशाना बनाया.

इस हमले में बहुत से नागरिक मारे गए, जिनमें कई बच्चे भी शामिल हैं और हज़ारों लोगों को इलाक़ा छोड़कर जाना पड़ा.

हिज़्बुल्लाह

अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेरुत में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉ जमील मुवाद ने कहा, “यह एक स्वाभाविक एकजुटता थी.”

“मेरी समझ से इसराइल के ख़िलाफ़ एक व्यापक भावना है और यह भावना हिज़्बुल्लाह विरोधी ग्रुपों में भी है.”

उन्होंने कहा, “बहुत से लोग कह रहे हैं कि फ़िलहाल आपसी मतभेदों को एक किनारे रख देना चाहिए. इसराइल जो अत्याचार कर रहा है, उसके मद्देनज़र यह केवल विचारधारात्मक या राजनीतिक सवाल ही नहीं बल्कि नैतिक सवाल भी है.”

लेकिन हिज़्बुल्लाह को लेकर मतभेद ख़ासा बना हुआ है और ऐसा लगता है कि इसराइल इसे और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

इसराइली लड़ाकू विमानों ने पूरे दक्षिणी लेबनान और बेका वैली पर बमबारी की है और इसराइली प्राधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने लेबनान की जनता के नाम एक संदेश में कहा, “इसराइल की जंग आपसे नहीं है. यह हिज़्बुल्लाह के साथ है.”

लेबनान के अंदर हिज़्बुल्लाह कितना समर्थन बनाए रख पाता है, सीमा पर जंग के भड़कने या शांत होने में यह एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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