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रूस के ख़िलाफ़ जंग में यूक्रेन की अब क्या है हालत, अमेरिकी हथियार कितनी कर पाएंगे मदद? - दुनिया जहान
यूक्रेन में चल रहा युद्ध एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है. रूस ने उत्तर-पूर्वी यूक्रेन पर अपने हमले तेज़ कर दिए हैं.
रूसी सेना ने यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर ख़ारकीएव के बाहरी इलाक़ों में बड़े पैमाने पर हमले किए हैं.
यहाँ स्थितियां बेहद कठिन हैं. वो लगातार रूसी गोलीबारी की चपेट में हैं. हथियारों की कमी से जूझ रही यूक्रेन की सेना किसी तरह मोर्चा संभाल रही है.
अप्रैल में अमेरिकी संसद, यूक्रेन को 60 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने के लिए एक बिल पारित कर चुकी है.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन सहायता पैकेज के हथियारों की सप्लाई के साथ ही यूक्रेन पहुंचे थे.
ज़ेलेंस्की ने ब्लिंकन से कहा कि एयर डिफेंस सबसे बड़ी समस्या है और उन्हें ख़ारकीएव के लिए दो पैट्रियट्स (सिस्टम) की ज़रूरत है, क्योंकि वहां लोगों पर हमला हो रहा है.
हथियारों की सप्लाई में जो समय लग रहा है उससे यूक्रेन की स्थिति नाज़ुक हो गई है.
तो इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि अगर वक़्त रहते यूक्रेन को अमेरिकी हथियार मिल गए तो क्या वो रूस को जवाब दे पाएगा?
निशाने पर हथियारों के भंडार
पिछले कुछ महीनों के दौरान यूक्रेनी सेना रूसी सेना के मिसाइल हमलों को रोकने में कई बार विफल रही है.
देश के पूर्वी क्षेत्र में ख़ारकीएव शहर के रेल यातायात सहित कई ढांचागत सुविधाओं को रूसी मिसाइल हमलों से भारी नुक़सान पहुंचा है.
पिछले कुछ महीनों के दौरान यूक्रेन की सेना की जो स्थिति कमज़ोर हुई है, उसके कई कारण हैं.
एक कारण यह है कि पिछले साल रूस पर जवाबी हमले के दौरान यूक्रेनी सेना रूसी सेना की सप्लाई लाइन को तोड़ने में विफल रही और रूस अधिक सैनिक और हथियार क्षेत्र में लाने में कामयाब हो गया.
साथ ही रूसी सेनाओं ने यूक्रेन पर हमले के लिए ग्लाइड बमों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है जिन्हें रोकने का सबसे प्रभावी तरीक़ा उन विमानों को निशाना बनाना है जिनसे यह बम गिराए जाते हैं.
यूक्रेन के पास ऐसा करने के लिए हथियारों की कमी हो गई है, जिससे यूक्रेन के शहरों पर मिसाइल हमले का ख़तरा बढ़ गया है.
सैन्य थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस के बर्लिन स्थित वरिष्ठ शोधकर्ता गुस्ताव ग्रेसेल मानते हैं कि जब तक यूक्रेनी सेना विशाल रूसी सेना की क्षमता को घटा नहीं पाएगी उसके लिए इस हमले का जवाब देना बहुत मुश्किल है.
वे कहते हैं कि यूक्रेन की सेना को ऐसा करने के लिए अगले साल तक हथियारों की सप्लाई के आश्वासन की ज़रूरत है.
ग्रेसेल का मानना है कि यूक्रेन के पास हथियारों की कमी से रूसी सेना को काफ़ी फ़ायदा हुआ है. वो कुछ छोटे इलाकों पर कब्ज़ा करने में कामयाब रही है, जिससे यूक्रेन का मनोबल प्रभावित हो रहा है साथ ही वो यूक्रेन के सैन्य हथियार उत्पादन को निशाना बनाने में भी सफल रही है.
गुस्ताव ग्रेसेल ने बताया कि यूक्रेन ने अपने सैन्य हथियारों के कारखानों को रूसी हमलों से बचाने और हथियारों की सप्लाई जारी रखने के लिए कारखानों को छोटे कारखानों में तब्दील कर कई ऐसे ठिकानों पर ट्रांसफर कर दिया जहां उन्हें निशाना बनाना मुश्किल है.
वे कहते हैं कि जब रूस यूक्रेन के हथियार बनाने वाली कारखानों को ध्वस्त नहीं कर पाया तो उसने यूक्रेन के बिजली संयंत्रों पर मिसाइल हमले करना शुरू कर दिया, क्योंकि यूक्रेन के पास बिजली उत्पादन संयंत्रों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हथियार नहीं थे.
ग्रेसेल कहते हैं, "दुर्भाग्यवश मार्च और अप्रैल में रूस ने यूक्रेन के कई बिजली उत्पादन प्लांट क्षतिग्रस्त कर दिए, क्योंकि यूक्रेन के पास पर्याप्त हवाई प्रतिरक्षा हथियार नहीं बचे थे."
बिजली की कमी के कारण यूक्रेन की अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि उसकी हथियार उत्पादन क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही थी. रूस की रणनीति यह है कि यूक्रेन को पश्चिमी देशों पर ज़्यादा से ज़्यादा निर्भर बना दिया जाए.
गुस्ताव ग्रेसेल ने कहा, "रूस जानता है कि इस युद्ध की कमज़ोर कड़ी यूक्रेन नहीं बल्कि पश्चिमी देश हैं. अगर यूक्रेन को लगातार पश्चिम से ज़्यादा से ज़्यादा आर्थिक और सैन्य सहायता की ज़रूरत पड़ेगी तो किसी समझौते या उसके आत्मसमर्पण की संभावना बढ़ जाएगी."
छह महीनों के लंबे इंतज़ार के बाद 24 अप्रैल को यूक्रेन के सबसे बड़े समर्थक अमेरिका ने उसे 60 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक सहायता देने के लिए एक क़ानून पारित किया. यूक्रेन लंबे समय से इसकी मांग कर रहा था.
अमेरिका की सैन्य सहायता
वॉशिंगटन डीसी स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में यूरोप रशिया एंड यूरेशिया प्रोग्राम के निदेशक मैक्स बर्गमन का मानना है कि 60 अरब डॉलर की अमेरिकी सहायता का यूक्रेन में युद्ध पर गहरा असर पड़ेगा.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है यूक्रेन में युद्ध की तस्वीर काफ़ी बदल जाएगी, क्योंकि यूक्रेनी सेना के पास हथियार और गोला-बारूद ख़त्म हो रहे थे. हवाई प्रतिरक्षा के लिए ज़रूरी हथियारों की कमी से भी वह जूझ रहा था. अमेरिकी सहायता से यह कमी जल्द ही पूरी हो जाएगी."
वे कहते हैं, "पैसे मंज़ूर होने के बाद होगा यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी सेना के भंडार से हथियार और गोला-बारूद लेकर विमानों या समुद्र के रास्ते उसे यूक्रेन पहुंचा सकते हैं. उम्मीद है कि जल्द ही यह हथियार यूक्रेन को मिल जाएंगे."
60 अरब डॉलर का यह सहायता पैकेज काफ़ी बड़ा है. पिछले दो सालों में अमेरिका ने यूक्रेन को 40 अरब डॉलर की सहायता दी है. अब इस विशाल पैकेज की मंज़ूरी के बाद अमेरिका सीधे अपने हथियार निर्माता कंपनियों से हथियार ख़रीदकर यूक्रेन को सौंप सकता है.
मैक्स बर्गमन ने कहा, "अब स्थिति यह है कि हमें नए सिरे से यूक्रेन के लिए हथियार बनाने पड़ेंगे और हथियार कंपनियों से ख़रीदकर यूक्रेन को देने होंगे जो कि अपने सैन्य भंडारों से उसे हथियार देने के मुक़ाबले महंगा पड़ता है."
वे कहते हैं, "पिछले दो सालों से अमेरिका और यूरोपीय देश अपने सैन्य भंडारों से हथियार निकाल कर यूक्रेन को सप्लाई कर रहे थे, लेकिन अब हम ख़ासतौर पर यूक्रेन के लिए हथियार बनाएंगे जिससे आने वाले समय में यूक्रेन की स्थित काफ़ी मज़बूत होगी."
अमेरिकी सहायता पैकेज में पैट्रियट मिसाइल और हायमार रॉकेट तो शामिल हैं ही मगर साथ ही अब यूक्रेन सोवियत काल की हथियार टेक्नोलॉजी के बजाय नेटो देशों द्वारा इस्तेमाल होने वाली सैन्य टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करेगा जो कि इस सहायता पैकेज के कारण ही संभव हो पा रहा है.
मैक्स बर्गमन बताते हैं, "यह कहा जा रहा था कि युद्ध और भड़कने के डर से अमेरिका यूक्रेन को आधुनिक टेक्नोलॉजी वाले एडवांस हथियार नहीं दे रहा है जो कि सच नहीं है."
अब यूक्रेन के सामने चुनौती है कि वह इन अत्याधुनिक हथियारों को इस्तेमाल करने के लिए लोगों को अपनी सेना में भर्ती करे.
इसे ध्यान में रखते हुए यूक्रेन ने एक नए क़ानून के मसौदे को मंज़ूरी दे दी है जिसके तहत सेना में अनिवार्य भर्ती के लिए न्यूनतम आयु को 27 वर्ष से घटाकर 25 वर्ष कर दिया जाएगा. यूक्रेन को उम्मीद है कि वो पांच लाख लोगों को सेना में भर्ती कर पाएगा.
मैक्स बर्गमन का कहना है कि यूक्रेन का यह लक्ष्य होना चाहिए कि 2024 में वो अपनी ज़मीन का नियंत्रण बनाए रखे और नए सैनिकों को अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दे ताकि अगले साल वो अपनी खोई हुई ज़मीन पर दोबारा क़ब्ज़ा करने के लिए रूस पर बड़ा जवाबी हमला कर सके.
पुतिन की योजना
यूक्रेन को सहायता पैकेज मंज़ूर करने में अमेरिका ने छह महीने लगा दिए और इस देरी के कारण यूक्रेनी सेना कमज़ोर पड़ गई.
लंदन के किंग्स कॉलेज में युद्ध रणनीति अध्ययन विभाग में शोधकर्ता डॉक्टर मरीना मिरोन का कहना है कि रूस ने इस देरी का फ़ायदा उठाया.
वे कहती हैं, "सहायता पैकेज को मंज़ूरी मिलने में हुई देरी से रूस को निश्चित ही फ़ायदा हुआ है. रूसी रणनीतिकार जनवरी से ही जानते थे कि अमेरिका यह पैकेज मंज़ूर कर देगा. इसलिए उन्होंने इस देरी का इस्तेमाल अपनी सेना की तैयारी में किया."
मिरोन कहती हैं, "रूस की कोशिश है कि यूक्रेन को यह सहायता मिलने से पहले उसकी सेना को इतना कमज़ोर कर दिया जाए कि इस पैकेज से उसे ख़ास फ़ायदा ना हो."
रूस की सैनिक रणनीति क्या है?
डॉक्टर मरीना मिरोन की राय है कि रूस कई मोर्चों पर यूक्रेनी सेना को उलझाना चाहता है. इस समय यूक्रेन के पास बड़ी समस्या सैनिकों की किल्लत की है. आख़िरकार पश्चिम से मिलने वाले अत्याधुनिक हथियारों को इस्तेमाल करने के लिए लोगों की ज़रूरत पड़ेगी.
उन्होंने कहा कि इसलिए रूसी सेना कई मोर्चों पर हमले कर रही है.
ऐसा अनुमान है कि यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर ख़ारकीएव पर लगातार बम हमलों के बाद रूसी सेना शहर पर क़ब्ज़ा कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो यूक्रेन के सहयोगी देशों के सामने इस युद्ध को लेकर कई मुश्किल सवाल खड़े हो जाएंगे.
डॉक्टर मरीना मिरोन का मानना है कि अगर रूस ख़ारकीएव पर कब्ज़ा कर लेता है और यूक्रेनी सेना को अन्य मोर्चों पर नुक़सान पहुंचाता है तो यूक्रेन पश्चिमी सैनिकों की मदद के बिना इससे उबर नहीं पाएगा.
डॉक्टर मरीना मिरोन मानती हैं कि इस युद्ध में यूक्रेन और रूस के सैन्य उपकरणों को बड़ा नुक़सान पहुंचा है. रूस उत्तर कोरिया से हथियार प्राप्त करने की ख़बरों का खंडन करता रहा है मगर इसमें कोई शक नहीं है कि उसे चीन से बड़ी संख्या में ड्रोन और ईरान से मिसाइलें मिल रही हैं.
मिरोन कहती हैं, "अगर रूस जीत भी जाता है तो उसे जीते हुए इलाक़ों का नियंत्रण करना पड़ेगा, उसका पुनर्निर्माण करना होगा, जिसके लिए पैसों की ज़रूरत होगी. सैनिक जीत हासिल करना राजनीतिक विजय से बहुत अलग है. युद्ध जीतने का अर्थ यह नहीं है कि आप उससे शांति भी प्राप्त कर लेंगे."
मदद में भेदभाव का आरोप
ओल्गा ओनुच की राय है कि अधिकांश यूरोपीय सहयोगी उनकी यह बात पूरी तरह समझते हैं. उन्हें इस मुद्दे को उठाते रहना पड़ेगा लेकिन बेहतर होगा अगर यह काम उन्हें अकेले ना करना पड़े.
प्रोफ़ेसर ओल्गा ओनुच के अनुसार लातिन अमेरिका के कई देश मानते हैं कि यूक्रेन रूस की उपनिवेशवादी आक्रामकता का शिकार हुआ है. ब्राज़ील और भारत, अमेरिका के सहयोगी होने के बावजूद खुलकर यूक्रेन के समर्थन में नहीं आ रहे थे मगर अब उनकी सोच में भी परिवर्तन आ रहा है और इसका श्रेय यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को जाता है.
वे कहती हैं कि युद्ध की वजह से यूक्रेन में चुनाव टल गए हैं. ऐसे में उनके नेतृत्व की वैधता पर भी सवाल उठता है कि क्या उन्हें यूक्रेनी जनता का समर्थन प्राप्त है?
प्रोफ़ेसर ओल्गा ओनुच का मानना है कि ज़ेलेंस्की की लोकप्रियता कुछ कम तो हुई है, लेकिन वो अभी भी इतने लोकप्रिय हैं कि अगर आज राष्ट्रपति चुनाव हुए तो वो आसानी से जीत जाएंगे.
अमेरिकी सहायता पैकेज से उन्हें राजनीतिक तौर पर कुछ मदद तो मिलेगी लेकिन अमेरिका में चुनाव के बाद अगर रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार राष्ट्रपति बनता है तो भविष्य में शायद दोबारा ऐसी सहायता ना मिले.
ज़ेलेंस्की पर कितना भरोसा
हमने यूक्रेन में युद्ध को प्रभावित करने वाली कई बातों की चर्चा की लेकिन इसे व्यापक विश्व राजनीति के संदर्भ में देखना भी ज़रूरी है.
13 अप्रैल को ईरान ने इसराइल पर मिसाइल और ड्रोन से एक बड़ा हमला किया. यह हमला रूस द्वारा यूक्रेन पर किये गए बड़े मिसाइल और ड्रोन हमलों से तीन गुना बड़ा था, लेकिन अमेरिका, यूके, जॉर्डन और इसराइली सेना के बीच समन्वय के ज़रिए इसे लगभग नाकाम कर दिया गया.
यूके की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में यूक्रेनी राजनीति की प्रोफ़ेसर ओल्गा ओनुच कहती हैं कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने यह मुद्दा उठाया है कि अमेरिका और यूके ने जिस प्रकार इसराइल की मदद की उस प्रकार रूस के हमले से बचाव के लिए यूक्रेन की मदद नहीं की.
वे कहती हैं, "उनकी बात सच है. इसराइल को दी गई सहायता और यूक्रेन की मिली सहायता में अंतर है. इसी प्रकार की कार्रवाई 24 फ़रवरी 2022 को भी की जा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि अमेरिका और यूके ने सोचा कि वो यूक्रेन की वायु सीमा की सुरक्षा करने की क्षमता नहीं रखते या उस दिशा में क़दम उठाना नहीं चाहते."
ओनुच कहती हैं, "हर रोज़ रूसी मिसाइलों और ड्रोन हमलों से परेशान यूक्रेनी जनता जानती है कि अमेरिका, यूके और दूसरे देश रूसी मिसाइलों और ड्रोन हमलों को रोक सकते हैं जैसा कि उन्होंने इसराइल के लिए किया."
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की यह दलील देते रहे हैं कि यूक्रेन पर रूसी हमला केवल यूक्रेन ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप और लोकतंत्र के लिए भी ख़तरा है. क्या वो पश्चिमी देशों को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं ताकि यूक्रेन को मदद जारी रहे?
युद्ध के बाद की शांति
क्या इस संभावना की वजह से युद्ध में कोई समझौता हो सकता है?
प्रोफ़ेसर ओल्गा ओनुच ख़ुद यूक्रेनी हैं और उनका जवाब वैसा ही है जैसा देश के किसी नागरिक का अपनी ज़मीन किसी दूसरे देश को सौंपने की संभावना पर हो सकता है.
वे कहती हैं, "जो लोग सोचते हैं कि अपनी भूमि गंवा कर शांति पाई जा सकती है वो ग़लत सोचते हैं. दो बातें हो सकती हैं. कुछ देर के लिए युद्ध थम सकता है, लेकिन समाप्त नहीं होगा. रूस फिर से ज़मीन हड़पने की कोशिश करेगा जैसा कि वो पहले कई बार कर चुका है."
ओनुच कहती हैं, "अगर ज़बरदस्ती यूक्रेन पर ज़मीन के बदले में कोई समझौता थोपा गया तो देश के भीतर कलह छिड़ जाएगी. रूसी क़ब्ज़े वाले क्षेत्र में ऐसा संघर्ष अभी से चल रहा है. अगर समझौता न्यायपूर्ण नहीं हुआ तो शांति नहीं आ पाएगी."
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य सवाल की ओर- अगर वक़्त रहते यूक्रेन को अमेरिकी हथियार मिल गए तो क्या वो रूस को जवाब दे पाएगा?
कई मायनों में अमेरिकी सहायता मिलने में देर हो चुकी है. लगातार रूसी बमबारी से यूक्रेनी जनता का मनोबल बुरी तरह प्रभावित हुआ है और यूक्रेनी सेना को बड़ा नुक़सान उठाना पड़ा है, लेकिन यूक्रेन के युद्ध जीतने की संभावना इस बात पर निर्भर है कि कितनी जल्दी ये हथियार यूक्रेन पहुंचते हैं और कितने प्रभावी तरीक़े से उनकी रणभूमि में तैनाती हो पाती है.
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