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चीन-रूस संबंध: पुतिन के युद्ध के लिए कितनी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं शी जिनपिंग
- Author, लौरा बिकर
- पदनाम, चीन संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
चीन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं. उनकी यात्रा से पहले चीन ने दोनों देशों के बीच मजबूत होते संबंधों की तारीफ की है.
पिछले करीब दो साल से रूस, यूक्रेन के साथ लड़ाई लड़ रहा है, इस बीच चीन, रूस के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी की तरह सामने आया है.
एक तरफ जहां पश्चिमी देश रूस-यूक्रेन युद्ध की निंदा कर रहे हैं, वहीं चीन ने एक बार भी ऐसा नहीं किया है. इसके उलट प्रतिबंधों से घिरे रूस के लिए वह मददगार बनकर उभरा है.
अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का बड़े पैमाने पर सामना कर रहे रूस के साथ चीन ने अपना व्यापार जारी रखा है.
हालांकि ऐसा लगता है कि पुतिन चीन से और अधिक चाहते हैं, लेकिन क्या चीन इसकी कीमत चुकाने को तैयार है?
संतुलन बनाने की कोशिश
शायद यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि पिछले हफ्ते पांचवी बार राष्ट्रपति की कुर्सी संभालने के बाद पुतिन ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चीन को चुना है.
चीन की सरकारी मीडिया से बात करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि दो दिवसीय राजकीय यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब दोनों देशों के रिश्ते अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं.
उन्होंने कहा कि उनकी रूची चीनी मार्शल आर्ट और दर्शन में भी है और कहा कि उनके परिवार के कुछ लोग चीनी भाषा मैंडेरिन सीख रहे हैं.
पुतिन ने कहा, “मुश्किल अंतरराष्ट्रीय स्थितियों में भी हमारे संबंध मजबूत हो रहे हैं.”
एक तरफ पुतिन सार्वजनिक तौर पर चीन के साथ अपनी दोस्ती का बखान कर रहे हैं लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पास ऐसे समय पर में चिंता के अपने कारण हो सकते हैं.
अमेरिका ने हाल ही में चीन और हांगकांग स्थित बैंकों और उन कंपनियों पर नए प्रतिबंधों की घोषणा की है जो रूस के साथ व्यापार कर रही हैं. आरोप है कि ये बैंक और कंपनियां मौजूदा प्रतिबंधों को दरकिनार रूस की मदद कर रहे हैं.
हालांकि चीन, रूस को हथियार नहीं बेच रहा है. अमेरिका और बेल्जियम का मानना है कि वह रूस, युद्ध के लिए जरूरी तकनीक और सामान का निर्यात कर रहा है.
चीन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि यूरोपीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे को बढ़ावा देने में चीन मदद कर रहा है.
उनका कहना था कि यह अमेरिका के लिए लक्ष्मण रेखा है, लेकिन चीन का कहना है कि वह यूक्रेन को लेकर न्यूट्रल है और युद्ध से अलग कमर्शियल इस्तेमाल के सामानों का निर्यात करना नियमों को तोड़ना नहीं है.
बावजूद इसके पिछले हफ्ते फ्रांस की यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इन आरोपों का सामना करना पड़ा.
न सिर्फ यूरोपीय यूनियन अपने टैरिफ पर विचार कर रहा है बल्कि चीनी समर्थकों भी मुखर हो रहे हैं. वे शी जिनपिंग पर रूसी समकक्ष पर ज्यादा दबाव डालने की अपील कर रहे हैं.
और सच यह है कि चीन की सुस्त अर्थव्यवस्था उन देशों के दबाव को सहन नहीं कर सकती, जिनके साथ वह व्यापार करता है. घरेलु स्तर पर मांग कम होने की वजह से चीन को विदेशी बाजारों की जरूरत है.
इस सबके बीच संतुलन बनाना चीनी राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं है, जिसने उनके लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा कर दी है.
मुश्किल में चीन
यूक्रेन पर रूसी हमले से कुछ दिन पहले दोनों देशों के नेताओं ने सहयोग को और मजबूत करने के लिए एक ऐसी साझेदारी की घोषणा की थी जिसकी कोई सीमा न हो.
यह ऐसा था जैसे पश्चिम के खिलाफ अपने वैचारिक संघर्ष को मजबूत करते हुए चीन और रूस हाथ मिला रहे हों.
चीन को अभी भी लगता है कि रूस की मदद से वह अमेरिका आधारिक विश्व व्यवस्था को नया आकार दे सकता है. वह रूस को किसी कुंजी की तरह देखता है. दोनों देशों के बीच व्यापार फल-फूल रहा है. साइबेरिया पाइपलाइन के जरिए बड़े पैमाने पर रूसी ऊर्जा चीन के लिए फायदेमंद साबित हो रही है.
रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच रहा है, ऐसी स्थिति में जिस ‘लिमिटलैस’ सहयोग की बात चीन और रूस करते थे वो अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है. बीबीसी के विश्लेषण में पता चला है कि यह ‘लिमिटलैस’ शब्द अब सरकारी मीडिया से लगभग गायब हो गया है.
कार्नेगी एंडोमेंट के एक वरिष्ठ फेलो झाओ टोंग का कहना है कि चीन, रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को सीमाओं में बांध रहा है.
वे कहते हैं, “हालांकि चीन, पश्चिमी प्रभाव को कम करने के लक्ष्य का समर्थन करता है, लेकिन वह रूस की कुछ रणनीतियों से सहमत नहीं है. इसमें परमाणु हथियारों की इस्तेमाल करने को लेकर धमकी भी शामिल है.”
उनका मानना है कि चीन को अच्छी तरह से पता है कि बिना शर्त रूस को समर्थन देने के लिए उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी. यही वजह है कि विश्व स्तर पर अपने आप को बनाए रखने के लिए वह अपनी रणनीति में बदलाव कर रहा है.
यूरोप की अपनी हालिया यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने कहा कि उनके देश न ना तो यह संकट शुरू किया है और न ही वह इसका भागीदार है. यही बात चीन अपने नागरिकों से भी कहता आया है.
'यूक्रेनियों का खून बह रहा है'
रूस-यूक्रेन युद्ध में चीन तटस्थता की बात तो करता है लेकिन यूक्रेन के प्रति उसकी सहानुभूति उसके सरकारी मीडिया पर कई आसानी से दिखाई नहीं देती है.
चीन का सरकारी मीडिया अभी भी रूस के हमले को सही ठहराता है. उसका मानना है कि अमेरिकी नेतृत्व वाले नेटो के विस्तार को रोकने के लिए रूस ने यह कार्रवाई की है.
साल 2022 में यूक्रेन की राजधानी कीएव पर बड़े रूसी हमले हुए. जब इन्हें चीन के एक कलाकार जू वेक्सिन ने टीवी पर देखा तो उन्होंने इसका दस्तावेजीकरण करने की ठानी.
अमेरिका में अपने स्टूडियो से बात करते हुए उन्होंने बीबीसी को बताया, “मेरे पास हथियार नहीं है, लेकिन मेरे पास पैन है.”
उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की एक तस्वीर बनाई थी जो सोशल मीडिया खूब वायरल हुई थी.
वे कहते हैं, “युद्ध शुरू होने के बाद से मैं हर दिन पेंटिंग कर रहा हूं. मैं एक दिन के लिए भी नहीं रुका. जब मुझे कोविड हुआ, विदेश की यात्राएं की, तब भी मैंने हर दिन पेंटिंग बनाई.”
हालांकि उनकी किसी भी पेंटिंग पर चीन ने प्रतिबंध नहीं लगाया है लेकिन इसे लेकर लोगों ने जो कहा उससे उन्हें जरूर हैरानी हुई.
वेक्सिन ने कहा, “यह मेरे पिछले अनुभव से काफी अलग है. जब मैंने कोयला खदान में काम करने वालों को लेकर पेंटिंग बनाई, तो मुझे सकारात्मक टिप्पणियां मिलीं. यहां तक की सांस्कृतिक क्रांति को लेकर बनाई गई मेरी पेंटिंग को भी लोगों ने बहुत पसंद किया. शायद है कोई होगा, जिसने मेरे काम की आलोचना की.”
लेकिन इस बार उन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा. वे कहते हैं, “ठीक है, लेकिन मैंने अभी उन्हें ब्लॉक कर दिया है. मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे अनफ्रेंड कर दिया है, क्योंकि उनके विचार अलग हैं. ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं. मेरा मानना है कि मैं सही काम कर रहा हूं. मैं अपनी बेटी के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहता हूं.”
यह वीटा गोलोड जैसे यूक्रेनियन लोगों के लिए किसी उम्मीद की तरह है, जो चीन के लोगों की राय को प्रभावित करना चाहते हैं.
जब युद्ध शुरू हुआ तो वीटा, राजधानी कीएव में थीं. वे बहुत अच्छी मैंडेरिन(चीनी भाषा) बोलती हैं. ऐसे समय पर उन्होंने यह तय किया कि वे यूक्रेन की खबरों को चीनी भाषा में ट्रांसलेट कर सोशल मीडिया पर शेयर करेंगी.
चीन की यात्रा के दौरान बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “हम लोगों को इस युद्ध के बारे में सच्चाई बताना चाहते थे, क्योंकि हम जानते थे कि उस समय चीन में कोई भी यूक्रेनी मीडिया नहीं था.”
वीटा अब यूक्रेनी एसोसिएशन ऑफ सिनोलॉजिस्ट की अध्यक्ष हैं. वे कहती हैं, ''ईमानदारी से कहूं तो यह भावनात्मक रूप से मुश्किल था और इसमें बहुत समय लगा.”
वे कहती हैं, “करीब 100 लोगों की एक टीम ने आधिकारिक खबरों, राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के भाषणों और युद्ध क्षेत्र में फंसे आम यूक्रेनियों की कहानियों का अनुवाद किया.”
उनका कहना है कि वे चीन के स्कॉलर्स को यूक्रेन की यात्रा कराने को लेकर सोच रही हैं, ताकि वे यह देख पाएंगे कि इस युद्ध में हम कितना बर्बाद हुए हैं. इससे रूस पर दबाव बनाने में हमें मदद मिलेगी.
वीटा को यह मालूम है कि यह इतना आसान काम नहीं है, लेकिन वे ऐसी कोशिश करना चाहती हैं. उनका भाई यूक्रेनी सेना में मोर्चा पर लड़ रहा है जबकि माता-पिता बुचा के पास अपने होम टाउन में रह रहे हैं.
अब तक वीटा के काम को चीन ने प्रतिबंधित नहीं किया, जिसका मतलब है कि चीनी सरकार की कुछ सहनशीलता दिखाता है.
शांति के दूत शी जिनपिंग?
चीन में इससे अलग भी कई आवाजें हैं जो रूस के साथ उसकी 'असीमित दोस्ती' का समर्थन करते हुए दिखाई देती हैं.
फ़ुडन विश्वविद्यालय में रूसी और मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र के निदेशक फेंग युजुन ने हाल ही में द इकोनॉमिस्ट में लिखा था कि यूक्रेन में रूस की हार निश्चित है.
चीन में रहकर ऐसा कहने के लिए साहस चाहिए.
लेकिन फिर राष्ट्रपति शी ने यह सुझाव दिया कि वे शांति के रक्षक साबित हो सकते हैं. यानी वे रूस और यूक्रेन के बीच शांति करवा सकते हैं.
पिछले साल मार्च में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस की राजकीय यात्रा की थी. इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को फोन किया था.
चीनी राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा था कि चीन हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा है.
चीन ने 12 सूत्रीय शांति प्लान भी प्रकाशित किया था जो परमाणु हथियारों के इस्तेमाल करने के खिलाफ था.
बावजूद इसके राष्ट्रपति पुतिन और शी जिनपिंग इस हफ्ते मिल रहे हैं. ऐसी उम्मीद बेहद कम दिखाई देती है कि नीति में कोई बड़ा बदलाव होगा.
हालांकि पश्चिम इस गठबंधन को लेकर काफी असहज हो रहा है और चीनी राष्ट्रपति ने जो शांति रक्षक वाली भूमिका निभाने की बात कही थी, वह भी असफल रही है.
वे जब मिलेंगे तो रूस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की कीमत के बारे में सोच रहे होंगे.
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