एआर रहमान ने माना- बीते आठ सालों में उन्हें बॉलीवुड में काम मिलना बंद हो गया है

    • Author, हारून रशीद
    • पदनाम, बीबीसी एशियन नेटवर्क

कई बॉलीवुड फ़िल्मों में यादगार संगीत देने वाले ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने स्वीकार किया है कि 'बीते आठ सालों में बॉलीवुड में उन्हें काम मिलना बंद होता गया.'

बीबीसी के साथ एक विशेष साक्षात्कार में एआर रहमान ने अपने अब तक के संगीत सफ़र, बदलते सिनेमा, आगे की योजनाओं और समाज के मौजूदा माहौल पर खुलकर बात की.

नितेश तिवारी की आने वाली फ़िल्म 'रामायण' में उन्होंने एल्बम कम्पोज़ किया है. अलग धर्म से आने के बावजूद इस फ़िल्म के लिए म्यूज़िक कंपोज़ करने से जुड़े सवालों के भी उन्होंने जवाब दिए.

पिछले साल 'छावा' फ़िल्म आई थी जिसमें एआर रहमान ने संगीत दिया था. इस फ़िल्म को कई इतिहासकारों ने तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने वाला और विभाजनकारी बताया था. फ़िल्म रिलीज़ के समय महाराष्ट्र के कुछ जगहों पर हिंसा भड़क गई थी.

एआर रहमान ने भी इस साक्षात्कार में माना कि छावा एक 'बाँटने' वाली फ़िल्म थी.

इस साक्षात्कार में एआर रहमान ने अपने शुरुआती संघर्ष, पश्चिमी और भारतीय संगीत के बीच तालमेल बिठाने की चुनौतियों पर भी विस्तार से बातचीत की है.

'रोज़ा का ट्रैक बिना पूछे इस्तेमाल किया'

फ़िल्म एनिमल में रोज़ा फ़िल्म का एक साउंड ट्रैक बजता है जो नई पीढ़ी को एआर रहमान के संगीत से परिचय कराता है.

अब जब रहमान एनिमल में 'छोटी सी आशा' सुनते हैं, लोग इसे इंस्टाग्राम, टिकटॉक पर इस्तेमाल कर रहे हैं, यह हर जगह ट्रेंड कर रहा है. उन्हें कैसे लगता है कि 33 साल पहले बनाया गया कुछ, आज नई ज़िंदगी पा रहा है?

इस सवाल पर रहमान कहते हैं, ''यह नॉस्टैल्जिक है. उन्होंने मुझसे कभी पूछा भी नहीं. रिलीज़ के बाद उन्होंने कहा कि हम इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. ओरिजिनल रिकॉर्ड होने के बावजूद हम इसका एटमॉस मिक्स करने की कोशिश कर रहे हैं और यह अब भी बहुत अच्छा सुनाई देता है."

लेकिन 33 साल पहले इस साउंडट्रैक के रिलीज़ होने का दिन उन्हें आज भी याद है.

वह कहते हैं, ''रोज़ा करते समय मुझे बहुत निराशाएं मिली थीं. मेरा मन था कि ठीक है, यह कर लेता हूँ और फिर निकल जाऊँगा और अपने एल्बम बनाऊँगा. मुझे फ़िल्मों में नहीं रहना था क्योंकि मेरा पूरा बचपन फ़िल्मों में बीता था. क़िस्मत से सब कुछ वैसा बदल गया जैसा मैं चाहता था. डॉल्बी आया, फिर डीटीएस आया, साउंड बेहतर हुआ.''

''मैं थोड़ा निराशावादी था. लेकिन फिर सब बदल गया. इतनी तेज़ी से तकनीक आई. पाँच साल में डीटीएस डिजिटल और डॉल्बी आ गया. इससे मुझे सफलता और अवॉर्ड्स भी मिले, तो मैंने कहा ठीक है, छोड़ने से पहले थोड़ा और. और दस साल बाद मैंने कहा अब छोड़ने की बात बंद.''

रोज़ा का म्यूज़िक बनाते हुए अपने शुरुआती संघर्ष के बारे में उन्होंने कहा, ''जब मैंने 16 ट्रैक पर म्यूज़िक मिक्स करना शुरू किया, तब बाकी स्टूडियो में सिर्फ़ 3 ट्रैक थे. मुझे लगा यह संगीत टिकेगा और वैसा ही सुनाई देगा. इसमें गिरावट नहीं होगी. मुझे इसे डॉक्यूमेंट और स्टोर करना था, आर्काइव करना था. मेरे पास टेप्स के पैसे नहीं थे, इसलिए मुझे अपने सारे बैकग्राउंड स्कोर और पुराने गाने मिटाने पड़े. मेरे पास गानों की टेप्स हैं लेकिन स्कोर नहीं हैं. क्योंकि फ़िल्मों के लिए मुझे बहुत कम पैसे मिलते थे. जितना एक जिंगल के लिए मिलता था, उतना मुझे छह महीने की फ़िल्म के काम में मिलता था. लेकिन मैं समझ गया था कि मैं विकसित हो रहा हूँ."

बॉलीवुड में जगह बनाने की जद्दोजहद

क्या 'दिल से' तक आने के बाद ही पूरे भारत में एआर रहमान को पहचान मिली.

इस पर वह कहते हैं, ''मुझे लगता है रंगीला. राम गोपाल वर्मा मणि रत्नम के दोस्त थे. एक दिन आए और बोले मैं एक फ़िल्म कर रहा हूँ. उनकी शिवा बहुत बड़ी हिट थी. उन्होंने कहा मुझे आपका संगीत पसंद है और मैं आपके साथ काम करना चाहता हूँ. वह मणि रत्नम से बिल्कुल अलग थे. तीन फ़िल्मों के साथ भी, मैं अब भी आउटसाइडर था, लेकिन ताल हर घर में पहुँच गई. वह हर घर की रसोई तक पहुँची. आज भी ज़्यादातर उत्तर भारतीयों के खून में है, क्योंकि उसमें थोड़ा पंजाबी, हिंदी और पहाड़ी संगीत है.''

बीबीसी ने पूछा, ''यह दिलचस्प है कि रहमान खुद को 1999 तक आउटसाइडर कहते हैं, जबकि रोज़ा 1992 में आई थी और 7-8 साल तक आप बॉम्बे, रंगीला, दिल से, ताल जैसे देश के सबसे बड़े साउंडट्रैक बना रहे थे, फिर भी आपको नहीं लगा कि आप उस जगह से जुड़े हैं?"

रहमान कहते हैं, "मैं हिन्दी नहीं बोलता था. तमिल व्यक्ति के लिए हिंदी सीखना मुश्किल है क्योंकि हमें तमिल से बहुत लगाव है. लेकिन सुभाष घई ने कहा मुझे आपका संगीत पसंद है लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप ज़्यादा समय रहें, इसलिए हिंदी सीखिए. मैंने कहा ठीक है, मैं हिन्दी सीखूँगा और एक क़दम आगे जाकर उर्दू सीखूँगा, जो 60-70 के दशक की हिंदी संगीत की माँ है. फिर मैं अरबी सीख रहा था, जो उच्चारण में उर्दू से मिलती है. फिर मुझे पंजाबी में दिलचस्पी हुई, नुसरत के गानों और सुखविंदर के प्रभाव से.''

रहमान ने कहा, ''अजीब बात है कि मैंने कर्नाटक संगीत का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उसमें पहले से काफी काम किया था. किसी भी धुन को छूते ही लगता है कि यह पहले सुनी हुई है. इसलिए मैंने हिंदुस्तानी रागों को चुना, जैसे देश, पीलू, दरबारी. ये राग तमिल या दक्षिण भारतीय संगीत में ज़्यादा नहीं आए थे. यही वजह है कि यह उत्तर भारतीयों को ज़्यादा पसंद आया. यह एक सोच-समझकर लिया गया फैसला था कि कर्नाटक संगीत का इस्तेमाल न करूँ."

'छावा एक बांटने वाली फ़िल्म है'

बॉलीवुड में संगीत बनाते हुए एआर रहमान ने कई ऐसी रचनाएं दी हैं जो सदाबहार की श्रेणी में आती हैं.

हाल ही में एक फ़िल्म आई छावा, जिसमें उन्होंने म्यूज़िक डायरेक्टर की भूमिका निभाई. इस फ़िल्म के संगीत को भी काफ़ी सराहा गया.

हालांकि रिलीज़ के समय से यह फ़िल्म विवादों में घिरी रही और महाराष्ट्र के कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई.

बीबीसी एशियन नेटवर्क के साक्षात्कार में जब रहमान से पूछा गया कि क्या यह एक विभाजनकारी फ़िल्म थी? तो उन्होंने कहा, ''ये बाँटने वाली फ़िल्म है."

उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि इसने विभाजन को भुनाया है, लेकिन मुझे लगता है कि इसका मकसद बहादुरी को दिखाना है, क्योंकि मैंने निर्देशक से कहा था कि आपको इस फ़िल्म के लिए मेरी ज़रूरत क्यों है. उन्होंने कहा कि हमें इसके लिए सिर्फ़ आप ही चाहिए.''

रहमान ने कहा, ''मुझे लगता है कि इसमें बहुत कुछ है और इसका अंत भी देखने लायक है, लेकिन निश्चित रूप से मुझे लगता है कि लोग इससे कहीं ज़्यादा समझदार हैं. क्या आपको लगता है कि लोग फ़िल्मों से प्रभावित हो जाएंगे. लोगों के भीतर एक ज़मीर होता है, जो जानता है कि सच्चाई क्या है और चालबाज़ी क्या है.''

'रामायण' का संगीत देने में धार्मिक आस्था आड़े आई?

फ़िल्म निर्देशक नितेश तिवारी की फ़िल्म रामायण इसी साल के अंत में रिलीज़ होने वाली है और इसमें एआर रहमान ने म्यूज़िक दिया है.

जब उनसे पूछा गया कि इस फ़िल्म में संगीत देते हुए उनके सामने कभी अपनी आस्था का सवाल खड़ा हुआ?

इस सवाल पर उन्होंने कहा, ''मैं 'ब्राह्मण स्कूल' में पढ़ा हूँ. हर साल रामायण और महाभारत होती थी, इसलिए मैं कहानी जानता हूँ, किसी व्यक्ति के गुणों की कहानी. मैं हर अच्छी चीज़ को महत्व देता हूँ."

"ज्ञान वह है जो आप हर दिन, हर जगह सीख सकते हैं, हमें संकीर्णता और स्वार्थ से ऊपर उठना चाहिए.''

'जो क्रिएटिव नहीं हैं उनके पास पावर है'

कई फ़िल्मकारों और कलाकारों ने दावा किया है कि बॉलीवुड में तमिल समुदाय के प्रति भेदभाव का चलन देखा जाता रहा है. लेकिन 1990 के दशक में यह कैसा था?

इस सवाल पर रहमान कहते हैं, ''मुझे यह सब पता ही नहीं चला, या शायद मुझसे छुपाया गया. मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया."

हालांकि वो कहते हैं, "पिछले 8 सालों में शायद सत्ता का बदलाव हुआ है और जो रचनात्मक नहीं हैं, वे फैसले ले रहे हैं. शायद साम्प्रदायिक बात भी रही हो, लेकिन मेरे सामने किसी ने नहीं कहा."

"हां कुछ-कुछ बातें कानों तक पहुंचीं. जैसे आपको बुक किया था लेकिन दूसरी म्यूज़िक कंपनी ने फ़िल्म फंड की और अपने संगीतकार ले आए. मैं कहता हूँ ठीक है, मैं आराम करूँगा, परिवार के साथ समय बिताऊँगा. मैं काम की तलाश में नहीं हूँ. मैं चाहता हूँ कि काम मेरे पास आए. मैं चाहता हूँ कि मेरी मेहनत और ईमानदारी मुझे चीज़ें दिलाए. मुझे लगता है चीज़ों की तलाश करना अपशकुन है. जो मेरा है, ईश्वर मुझे दे देंगे.''

आगे की योजनाएं?

रहमान ने इस इंटरव्यू में अपनी आगे की योजनाओं के बारे में भी बात की है. उन्होंने बताया है कि वह अपनी पहुंच को और बढ़ाने के लिए किस तरह से पश्चिमी देशों के कलाकारों के साथ सहयोग करने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने बताया, "मैंने वर्चुअल मेटा बैंड सीक्रेट माउंटेन बनाया है. जहां डायवर्सिटी है. उसमें अमेरिकन कैरेक्टर है, आइरिश कैरेक्टर है, अफ़्रीकन, नॉर्थ इंडियन, साउथ इंडियन और चाइनीज़ कैरेक्टर है. पूरी दुनिया को एक साथ लाने की कोशिश है."

"लेकिन बात यह भी है कि अगर मैं इंडियन म्यूज़िक न करता तो क्या करता था. लेकिन मेरा म्यूज़िक पूरी तरह इंडियन नहीं है. जिस तरह से मैं म्यूज़िक प्रोड्यूस करता हूं, वह पूरी तरह से इंडियन नहीं है."

रहमान ने हॉलीवुड में इंडियन म्यूज़िक से जुड़ा काम नहीं करने की वजह के बारे में भी बताया है. उन्होंने कहा, "हॉलीवुड इंडियन स्टफ़ के बारे में जो भी कुछ होता है, वह मेरी प्राथमिकता नहीं रहता. क्योंकि इंडियन म्यूज़िक तो मैं कर ही रहा हूं. मैं और गहरा काम करना चाहता हूं. बैंड भी इस बारे में बेहद उत्साहित है, क्योंकि हमारे पास आज़ादी है और हमारे पास शिकायत करने जैसा कुछ भी नहीं है."

वेस्टर्न आर्टिस्ट के साथ सहयोग के बारे में वो कहते हैं, "वेस्टर्न आर्टिस्ट का इंडियन आर्टिस्ट के साथ सहयोग करना बहुत ही अच्छी बात है. नई जेरेशन के साथ अच्छी बात यह है कि उनके साथ वह बोझ नहीं है जो हमारे साथ था. वह किसी की परवाह नहीं करते."

अलका याग्निक के साथ 'तुम साथ हो' और सुखविंदर सिंह के साथ 'रमता जोगी' के कोलैब्रेशन को वह अपने सबसे अच्छे अनुभवों में से एक बताते हैं.

आशा भोसले के साथ 'तन्हा-तन्हा यहां पे जीना' कोलेब्रेशन को भी बेहतरीन बताते हैं.

वह कहते हैं, "आशा भोसले दिग्गज हैं. वह 90 की उम्र को पार कर चुकी हैं और अब भी गा रही हैं. ऐसे लिविंग लिजेंड को हमें क्यों नहीं सेलिब्रेट करना चाहिए. मैं उनके पास गया और कहा कि मैं आपके साथ एक और गाना करना चाहता हूं, उन्होंने कहा क्यों नहीं. हमने गाना प्रोड्यूस कर लिया है और वह इस साल आ रहा है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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