40 साल की इस महिला ने कैसे विदेशी पुरुषों को फुसलाकर रूस के लिए जंग लड़ने भेजा

    • Author, नवाल अल-मुग़ाफ़ी
    • पदनाम, सीनियर इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेशन कॉरेस्पॉन्डेंट
    • Author, शीदा किरन
    • पदनाम, बीबीसी आई इन्वेस्टिगेशन्स

एक वीडियो में उमर का पासपोर्ट किनारों से जलता हुआ दिखता है और एक महिला को रूसी भाषा में बोलते हुए सुना जा सकता है, "यह तो अच्छी तरह जल रहा है."

उमर, 26 साल के सीरियाई मज़दूर हैं जो पिछले नौ महीने से रूस की यूक्रेन वाली जंग के मोर्चे पर तैनात थे. वहीं उनके फ़ोन पर यह वीडियो क्लिप पहुंची.

महिला की आवाज़ को उमर पहचानता था. यह पोलिना अलेक्ज़ान्द्रोवना अज़ार्निख की थीं. उमर कहते हैं कि उसी महिला ने उन्हें लड़ाई के लिए सेना में भर्ती कराया था. महिला ने उमर को लालच दिया था कि अच्छी कमाई होगी और रूसी नागरिकता भी मिलेगी, लेकिन अब वह गुस्से में थी.

यूक्रेन से भेजे गए कई वॉइस नोट्स में उमर (अपनी सुरक्षा के लिए नकली नाम से बोलते हुए) ने बताया कि कैसे वह जंग के बीच फंस गए और डरे हुए हैं.

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उनका कहना है कि अज़ार्निख ने वादा किया था कि अगर वह 3,000 डॉलर दे दें, तो उनको लड़ाई में नहीं भेजा जाएगा. लेकिन उमर के मुताबिक उन्हें सिर्फ़ दस दिन की ट्रेनिंग के बाद सीधे युद्ध में उतार दिया गया. इस पर उन्होंने पैसे देने से इनकार कर दिया और जवाब में अज़ार्निख ने उनका पासपोर्ट जला दिया.

उमर कहते है कि उन्होंने एक मिशन में जाने से मना करने की कोशिश की तो कमांडरों ने धमकी दी कि उन्हें मार देंगे या जेल में डाल देंगे. उमर कहते हैं, "हमें धोखा दिया गया… यह औरत ठग है और झूठी है."

बीबीसी आई की जांच में सामने आया है कि 40 साल की पूर्व शिक्षिका अज़ार्निख, टेलीग्राम चैनल के ज़रिए अक्सर ग़रीब देशों के नौजवानों को रूस की सेना में भर्ती होने के लिए फुसलाती हैं.

मुस्कुराते हुए बनाए गए उनके वीडियो मैसेज और जोशीले पोस्ट 'एक साल के कॉन्ट्रैक्ट' और 'मिलिट्री सर्विस' का ऑफ़र देते हैं.

'विरोध करने वालों को धमकाती थी'

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने लगभग 500 मामलों की पहचान की है, जिनमें इस महिला ने 'इन्विटेशन' बताकर कुछ दस्तावेज़ लोगों को दिए. इनके आधार पर लोग रूस में दाख़िल होकर सेना में शामिल हो सके.

ये लोग ज़्यादातर सीरिया, मिस्र और यमन से आए पुरुष थे, जिन्होंने भर्ती के लिए महिला को अपने पासपोर्ट की जानकारी भेजी थी.

लेकिन कई भर्ती हुए लोग और उनके रिश्तेदारों ने बीबीसी को बताया कि अज़ार्निख ने उन्हें यह कहकर गुमराह किया था कि उन्हें सीधी लड़ाई में नहीं भेजा जाएगा. और यह नहीं बताया था कि वे एक साल बाद भी वहां से नहीं निकल पाएंगे. जो अज़ार्निख का विरोध करते थे, वह उन्हें धमकाती थीं.

बीबीसी ने जब अज़ार्निख से संपर्क किया तो उन्होंने इन सारे आरोपों को ख़ारिज कर दिया.

बारह परिवारों ने हमें बताया कि उनके नौजवान बच्चे, जिन्हें अज़ार्निख ने भर्ती किया था, अब तक या तो मारे जा चुके हैं या लापता हैं. रूस के भीतर, सरकार ने जबरन भर्ती बढ़ा दी है. कैदियों को सेना में शामिल किया गया है और यूक्रेन में चल रहे अभियान को बनाए रखने के लिए लगातार बड़े-बड़े बोनस ऑफ़र किए हैं, हालांकि रूस को इसका भारी नुक़सान उठाना पड़ा है.

नेटो के मुताबिक़, 2022 में शुरू हुई इस जंग के बाद से रूस के दस लाख से ज़्यादा सैनिक मारे गए या घायल हुए हैं. सिर्फ़ दिसंबर 2025 में ही 25 हज़ार सैनिक मारे गए.

बीबीसी न्यूज़ रशिया की शोक-संदेशों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अन्य रिकॉर्ड पर आधारित रिसर्च से पता चलता है कि पिछले साल यूक्रेन में रूसी सैनिकों की मौतें पहले से कहीं तेज़ी से बढ़ीं.

वैसे, यह तय करना मुश्किल है कि कितने विदेशी रूस की सेना में शामिल हुए हैं. बीबीसी रशिया के विश्लेषण में विदेशी सैनिकों की मौत और चोटों का भी अध्ययन किया गया है. इससे पता चलता है कि कम से कम 20 हज़ार लोग भर्ती हुए होंगे. इनमें क्यूबा, नेपाल और उत्तर कोरिया जैसे देशों के लोग भी शामिल हैं.

यूक्रेन को भी भारी नुक़सान हुआ है और उसने भी विदेशी लड़ाकों को अपनी सेना में लिया है.

'चारों तरफ़ लाशें ही लाशें थीं'

उमर का अज़ार्निख से पहला संपर्क मार्च 2024 में तब हुआ, जब वह 14 दूसरे सीरियाई युवकों के साथ मॉस्को एयरपोर्ट पर आ फंसे थे. उनके पास बमुश्किल कुछ पैसे थे. सीरिया में नौकरियां कम और बेहद कम वेतन वाली थीं. उमर कहते हैं कि वहां एक रिक्रूटर (भर्ती करने वाले) ने उन्हें रूस में तेल के ठिकानों की सुरक्षा का सिविल काम ऑफ़र किया था. वे मॉस्को पहुंचे तो पता चला कि उन्हें धोखा दिया गया है.

उमर के अनुसार ऑनलाइन विकल्पों की तलाश करते हुए उनमें से एक ने अज़ार्निख का चैनल देखा और उन्हें मैसेज किया.

कुछ ही घंटों में वह एयरपोर्ट पर उनसे मिली और उन्हें ट्रेन से पश्चिमी रूस के ब्रायंस्क भर्ती केंद्र ले गई. उमर के मुताबिक़, वहां अज़ार्निख ने उन्हें रूसी सेना में एक साल के कॉन्ट्रैक्ट ऑफ़र किए. इसमें मासिक वेतन लगभग 2,500 डॉलर और साइन-अप बोनस 5,000 डॉलर था. यह ऐसी रकम थी जिसके बारे में वे सीरिया में सिर्फ़ सपने देख सकते थे.

उमर कहते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट रूसी भाषा में थे, जिसे उनमें से कोई नहीं समझता था. महिला ने उनके पासपोर्ट ले लिए और वादा किया कि वह रूसी नागरिकता दिला देंगी. साथ ही कहा कि अगर वे अपने साइन-अप बोनस से 3,000 डॉलर (2,227 पाउंड) उन्हें दे दें, तो उनको लड़ाई में नहीं भेजा जाएगा.

उमर कहते हैं कि लगभग एक महीने के भीतर ही उन्हें मोर्चे पर भेज दिया गया. जबकि उन्हें सिर्फ़ दस दिन की ट्रेनिंग दी गई थी और कोई सैन्य अनुभव नहीं था.

उन्होंने बीबीसी की इन्वेस्टिगेटिव टीम को भेजे गए एक वॉइस नोट में कहा, "सौ फ़ीसदी हम यहां मरने वाले हैं."

मई 2024 में उन्होंने कहा, "बहुत सारी चोटें, बहुत सारे धमाके, लगातार गोलाबारी. अगर धमाके से नहीं मरोगे तो, आप पर गिरने वाला मलबा मार देगा."

अगले महीने उन्होंने कहा, "चारों तरफ़ लाशें ही लाशें हैं… मैंने खुद लाशों पर पैर रखा है, ख़ुदा मुझे माफ़ करें."

उन्होंने यह भी कहा, "अगर कोई मर जाता है तो, मैंने अपनी आंखों से देखा है कि ये उसे कचरे के बैग में डालकर पेड़ के नीचे फेंक देते हैं."

क़रीब एक साल बाद उमर को पता चला कि अज़ार्निख ने उन्हें यह नहीं बताया था कि दरअसल 2022 का एक रूसी फ़रमान सेना को यह अधिकार देता है कि जब तक जंग ख़त्म न हो सैनिकों के कॉन्ट्रैक्ट अपने आप बढ़ा दिए जाएं.

उमर ने कहा, "अगर उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट बढ़ा दिया तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा, या अल्लाह."

हालांकि, उनका कॉन्ट्रैक्ट बढ़ा दिया गया था.

हमने आठ विदेशी लड़ाकों से बात की, जिनमें उमर भी शामिल हैं, जिन्हें अज़ार्निख ने भर्ती किया था. साथ ही उन 12 पुरुषों के परिवारों से भी, जो अब लापता हैं या मारे जा चुके हैं.

कई लोगों का मानना है कि अज़ार्निख ने भर्ती हुए युवकों को गुमराह किया या उनका शोषण किया. उनका कहना है कि ये लोग जानते थे कि वे सेना में भर्ती किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सीधे मोर्चे पर भेजा जाएगा. उमर की तरह कई महसूस करते थे कि उन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिली या वे सोचते थे कि एक साल बाद वापस लौट सकेंगे.

मिस्र के यूसुफ़ (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी को बताया कि उनके बड़े भाई मोहम्मद ने 2022 में रूस के येकातेरिनबुर्ग शहर में यूनिवर्सिटी में पढ़ाई शुरू की थी. लेकिन उन्हें फ़ीस भरने में मुश्किल हो रही थी.

यूसुफ़ कहते हैं कि मोहम्मद ने परिवार को बताया था कि पोलिना नाम की एक रूसी महिला ने ऑनलाइन उनकी मदद शुरू की थी, जिसमें उनके लिए रूसी सेना में काम करने का प्रस्ताव भी शामिल था. मोहम्मद को ऐसा लगा कि इससे वह अपनी पढ़ाई जारी रख पाएंगे.

यूसुफ़ कहते हैं, "उन्होंने रहने की जगह, नागरिकता और मासिक खर्चों का वादा किया था."

"लेकिन अचानक उन्हें यूक्रेन भेज दिया गया. उन्होंने खुद को जंग में शामिल पाया."

यूसुफ़ के अनुसार उनके भाई मोहम्मद की आख़िरी कॉल 24 जनवरी 2024 को आई थी. लगभग एक साल बाद, यूसुफ़ को टेलीग्राम पर एक रूसी नंबर से मैसेज मिला, जिसमें मोहम्मद की लाश की तस्वीरें थीं. परिवार को बाद में पता चला कि उनकी मौत लगभग एक साल पहले ही हो चुकी थी.

'कुछ तो पागल हो गए'

हबीब एक और सीरियाई हैं, जिन्होंने रूस की सेना के लिए काम किया था. वह कहते हैं कि अज़ार्निख रूस की सेना के लिए "सबसे अहम रिक्रूटर्स में से एक" बन गई थीं.

वह कैमरे पर आने को तैयार थे, लेकिन सुरक्षा कारणों से नकली नाम से बात की. हबीब कहते हैं कि उन्होंने और अज़ार्निख ने "करीब तीन साल तक रूस के लिए वीज़ा इन्विटेशन पर साथ काम किया."

उन्होंने और कोई विवरण नहीं दिया और हम उनकी भूमिका की पुष्टि नहीं कर पाए. 2024 के सोशल मीडिया की एक तस्वीर में वह अज़ार्निख के साथ दिखाई देते हैं.

अज़ार्निख रूस के दक्षिण-पश्चिमी वोरोनेज़ क्षेत्र की रहने वाली हैं. वह पहले एक फ़ेसबुक ग्रुप चलाती थीं, जिसमें अरब छात्रों को मॉस्को पढ़ाई के लिए आने में मदद की जाती थी. इसके बाद 2024 में उन्होंने अपना टेलीग्राम चैनल शुरू किया.

हबीब कहते हैं कि ज़्यादातर विदेशी यह सोचकर नौकरी करने आए थे कि उन्हें किसी संयत्र की सुरक्षा करनी होगी या चेकपॉइंट पर खड़ा रहना होगा.

उनके अनुसार, "जो अरब यहां आ रहे हैं, वे तुरंत मर रहे हैं. कुछ तो पागल हो गए, लाशें देखना बहुत मुश्किल है."

हबीब बताते हैं कि उमर और सीरियाई युवकों के उस समूह से उनकी मुलाक़ात एक सैन्य ट्रेनिंग साइट पर हुई थी.

"उन्होंने उन्हें नागरिकता, अच्छी तनख़्वाह और सुरक्षित रखे जाने का वादा किया था. लेकिन यहां पर एक बार कॉन्ट्रैक्ट पर साइन कर दिया तो निकलने का कोई रास्ता नहीं है."

वह कहते हैं, "किसी को हथियार चलाना तक नहीं आता था. अगर उन पर गोली चलती तो वे जवाब में गोली चलाते भी नहीं… और अगर तुम गोली नहीं चलाओगे तो मारे जाओगे."

"पोलिना यह जानते हुए उन लोगों को ले जाती थी, कि वे मरने वाले हैं."

हबीब का कहना है कि उन्हें "हर भर्ती किए गए व्यक्ति पर सेना से 300 डॉलर मिलते थे."

बीबीसी इसकी पुष्टि नहीं कर पाया है, हालांकि अन्य भर्ती हुए लोगों ने भी कहा कि उन्हें लगता है हबीब को भुगतान मिलता था.

'कुछ भी मुफ़्त नहीं होता'

2024 के मध्य से की जाने वाले अज़ार्निख की पोस्टों में यह साफ़ दिखने लगा कि भर्ती हुए लोगों को 'लड़ाई में हिस्सा लेना होगा' और उनमें विदेशी लड़ाकों के मारे जाने का ज़िक्र भी था.

अक्तूबर 2024 के एक वीडियो में वह कहती हैं, "तुम सब अच्छी तरह जानते थे कि तुम जंग में जा रहे हो. तुम सोचते थे कि रूसी पासपोर्ट मिल जाएगा, कुछ नहीं करना होगा और पांच सितारा होटल में रहोगे?... कुछ भी मुफ़्त में नहीं होता."

2024 के एक और मामले में, बीबीसी ने एक वॉइस मैसेज सुना जो अज़ार्निख ने एक ऐसी महिला को भेजा था, जिनका बेटा सेना में था. अज़ार्निख ने कहा कि उस औरत ने "रूसी सेना के बारे में कुछ बहुत बुरा पब्लिश किया है."

अज़ार्निख ने गाली-गलौज करते हुए बेटे की जान की धमकी देते हुए औरत को चेतावनी दी, "मैं तुम्हें और तुम्हारे सारे बच्चों को ढूंढ निकालूंगी."

बीबीसी ने अज़ार्निख से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं. शुरू में उन्होंने कहा कि अगर बीबीसी रूस आए तो वो इंटरव्यू देंगी, लेकिन सुरक्षा कारणों से बीबीसी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया.

बाद में, जब फ़ोन पर उनसे पूछा गया कि क्या भर्ती हुए लोगों से गैर-लड़ाकू भूमिकाओं का वादा किया गया था, तो उन्होंने कॉल काट दी.

बाद में भेजे गए वॉइस नोट्स में उन्होंने कहा कि हमारा काम 'प्रोफ़ेशनल नहीं' है और मानहानि का केस करने की धमकी दी.

बीबीसी ने रूस के विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय से भी उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

इससे पहले मार्च 2022 में राष्ट्रपति पुतिन ने मध्य-पूर्व से पुरुषों की भर्ती का समर्थन किया था. उनका कहना था कि वे विचारधारा से प्रेरित हैं, पैसों से नहीं. उन्होंने कहा था, "ऐसे लोग हैं जो स्वेच्छा से आना चाहते हैं, ख़ासकर पैसों के लिए नहीं, बल्कि मदद करने के लिए."

'नकद प्रोत्साहन'

इस मामले पर नज़र रख रहे पत्रकारों और शोधकर्ताओं का कहना है कि अज़ार्निख जैसे लोग रूस की सेना के लिए अनौपचारिक भर्ती नेटवर्क का हिस्सा हैं.

बीबीसी को दो और टेलीग्राम अकाउंट मिले हैं, जो अरबी में रूस की सेना में शामिल होने के ऑफ़र दे रहे थे. एक अकाउंट पर इन्विटेशन डॉक्यूमेंट और नामों की सूची दिखाई गई थी, जबकि दूसरे ने 'एलीट बटालियन' में शामिल होने के लिए बड़े साइन-अप बोनस का विज्ञापन किया था.

सितंबर में, केन्या पुलिस ने कहा कि उन्होंने एक संदिग्ध 'ट्रैफ़िकिंग सिंडिकेट' का भांड़ाफोड़ किया है, जो नौकरी के ऑफ़र देकर केन्याई युवकों को फुसलाता था, लेकिन उन्हें यूक्रेन की लड़ाई में भेज देता था.

इंस्टीट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ वॉर में एक शोधकर्ता कैटरीना स्टेपानेन्को ने बीबीसी को बताया कि रूस में कुछ स्थानीय और नगरपालिका अधिकारी ऐसे एचआर प्रोफ़ेशनल्स और स्थानीय लोगों को 4,000 डॉलर तक के नकद प्रोत्साहन दे रहे हैं, जो रूसियों या विदेशियों को सेना में भर्ती कराते हैं.

उनका कहना है कि शुरू में रूस ने बड़ी संस्थाओं जैसे वागनर प्राइवेट मिलिट्री ग्रुप और जेल सिस्टम का इस्तेमाल किया था, लेकिन 2024 से वह 'स्थानीय लोगों और छोटी कंपनियों' को भी भर्ती के लिए इस्तेमाल कर रहा है.

वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि भर्ती के पहले वाले तरीक़ों से अब उतने लोग नहीं मिल पा रहे हैं."

इस बीच, हबीब अब सीरिया लौट चुके हैं. उनका कहना है कि कई कमांडरों को रिश्वत देकर उन्होंने अपना कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कराया.

उमर को आख़िरकार रूसी नागरिकता मिल गई और वह भी सीरिया लौट आए हैं. जिन दो सीरियाई युवकों के साथ वह सेना में रहे, उनके परिवारों के अनुसार वह अब मारे जा चुके हैं.

अज़ार्निख के बारे में उमर कहते हैं, "वह हमें सिर्फ़ नंबर या पैसे के रूप में देखती हैं, वह हमें इंसान नहीं समझतीं."

"जो उन्होंने हमारे साथ किया, हम उसके लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगे."

अतिरिक्त रिपोर्टिंग ओल्गा इव्शिना, गेहाद अब्बास, अली इब्राहिम, विक्टोरिया अराकेलियान और रायन मारूफ़

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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