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बीएमसी चुनाव ठाकरे बंधुओं के लिए सर्वाइवल का सवाल क्यों है?
- Author, प्रवीण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में क़रीब चार साल की देरी के बाद गुरुवार को वोट डाले गए.
इससे पहले 2017 में बीएमसी के चुनाव हुए थे. इसके बाद साल 2022 में चुनाव होने थे. लेकिन चार साल की देरी के बाद बीएमसी चुनाव के लिए 15 जनवरी को वोट डाले गए.
बीएमसी में क़रीब एक करोड़ तीन लाख मतदाता हैं और वोटिंग के लिए 10, 232 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे.
बीएमसी में 227 कॉर्पोरेटर चुने जाते हैं और किसी भी दल को अपना मेयर बनाने के लिए 114 कॉर्पोरेटर की ज़रूरत होती है. इन चुनावों में इस बार 1700 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर लगी हुई है.
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किसके कितने उम्मीदवार
बीते तीन दशक से बीएमसी में शिव सेना का ही दबदबा रहा है. हालांकि, शिव सेना के दो धड़ों में बँटने के बाद बीएमसी का यह पहला चुनाव है. शिव सेना, बीजेपी के साथ मिलकर बीएमसी चुनाव लड़ रही है.
शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) 2024 के विधानसभा चुनाव में महज़ 21 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी. वहीं राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) बीएमसी में एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर रही है.
हालांकि 2017 के बीएमसी चुनाव में एमएनएस के कॉर्पोरेटर्स की संख्या 28 से सिमटकर सात रह गई थी. 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एमएनएस का एक भी विधायक जीत दर्ज नहीं कर पाया.
लेकिन अब 20 साल बाद बीएमसी चुनाव के लिए ठाकरे बंधु (उद्धव और राज ठाकरे) एक साथ आए हैं.
227 वॉर्ड वाली बीएमसी में बीजेपी 137 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. वहीं शिव सेना के 90 उम्मीदवार मैदान में हैं. एनसीपी इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है और उसने 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
वहीं शिव सेना (यूबीटी) 163 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और एमएनएस ने 52 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं.
कांग्रेस के 143 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं और वंचित बहुजन आघाड़ी ने 46 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं.
ठाकरे बंधुओं को क्यों साथ आना पड़ा?
2017 में हुए बीएमसी चुनाव में सबसे ज़्यादा फ़ायदा बीजेपी को हुआ था.
बीजेपी के कॉर्पोरेटर्स की संख्या 31 से 82 तक पहुंच गई थी. हालांकि, शिव सेना के काॉर्पोरेटर्स की संख्या में भी थोड़ा इजाफा हुआ था और उनके 84 कॉर्पोरेटर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे थे.
चुनाव के बाद शिव सेना और बीजेपी साथ आए थे, पर मेयर पद शिव सेना के हिस्से ही आया था.
बीबीसी मराठी के संपादक अभिजीत कांबले के मुताबिक बीएमसी चुनाव ठाकरे बंधुओं के लिए वर्चस्व की लड़ाई की तरह है.
वह कहते हैं, "ठाकरे बंधुओं के लिए बीएमसी का चुनाव ख़ास है. राज ठाकरे को 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कोई सफलता नहीं मिली. उद्धव ठाकरे की पार्टी को भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. उद्धव ठाकरे की पार्टी के लिए बीएमसी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बीएमसी से इनके दल की ताक़त में इजाफा हुआ है. शिव सेना की शुरुआत शहरों से हुई और मुंबई ने उसमें सबसे अहम भूमिका निभाई है."
2019 के विधानसभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे बीजेपी से अलग हो गए. इसके बाद उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के साथ आए. लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे को कांग्रेस और शरद पवार के साथ रहकर कोई ख़ास फायदा नहीं मिला.
कांबले कहते हैं, "विधानसभा चुनाव में तो उद्धव ठाकरे का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. हाल ही में राज्य में जो भी नगर पालिका के चुनाव हुए उनमें भी उद्धव ठाकरे की पार्टी ख़ास प्रदर्शन नहीं कर पाई."
"उद्धव ठाकरे के लिए अब कहीं न कहीं यह सर्वाइवल की लड़ाई बन चुकी है. राज्य की राजनीति में उद्धव ठाकरे का भविष्य काफी हद तक इन चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा."
राज ठाकरे साल 2005 में शिवसेना से अलग हो गए थे. साल 2006 में उन्होंने अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया था.
2007 में हुए बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे ने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई और उनके सात कॉर्पोरेटर्स ने जीत दर्ज की. इसके बाद 2009 के विधानसभा चुनाव में एमएनएस का ग्राफ़ और आगे बढ़ा और राज ठाकरे की पार्टी के 13 विधायक चुने गए.
2012 के बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी की ताक़त में और इजाफ़ा हुआ. उनके कॉर्पोरेटर्स की संख्या सात से 28 तक पहुंच गई.
लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव से राज्य में राज्य ठाकरे की पार्टी का ग्राफ़ कम होने लगा और उनका महज़ एक ही विधायक जीत दर्ज कर पाया.
2017 के बीएमसी चुनाव में भी राज ठाकरे की पार्टी के कॉर्पोरेटर की संख्या 28 से सात पर आ गई. 2019 के विधानसभा चुनाव में भी राज ठाकरे का एक ही विधायक जीत दर्ज कर पाया.
2024 के विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी कोई सफलता नहीं मिली.
अभिजीत कांबले मानते हैं कि 2024 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद ये बीएमसी का चुनाव राज ठाकरे के लिए भी सर्वाइवल की लड़ाई बन गया है.
वह कहते हैं, "राज ठाकरे को अब लगता है कि उद्धव ठाकरे के साथ आकर वह अपनी राजनीति को बचा सकते हैं और राज्य की राजनीति में भी ठाकरे बंधुओं का रिवाइवल हो सकता है. अगर वे यह चुनाव हार जाते हैं तो ठाकरे परिवार की महाराष्ट्र की राजनीति में पकड़ कमजोर हो जाएगी."
"फिर बीजेपी का राज्य की सत्ता में एकतरफ़ा दबदबा हो सकता है. ठाकरे परिवार के हाथ में कोई भी सत्ता नहीं बचेगी. बीएमसी चुनाव के बाद अगले विधानसभा चुनाव तक ठाकरे बंधुओं के पास राज्य की राजनीति में अपनी ताकत दिखाने का और कोई बड़ा मौका नहीं होगा."
मुंबई में बीजेपी कितनी बड़ी चुनौती
2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी पहली बार राज्य में अपना सीएम बनाने में कामयाब रही थी. लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के साथ आने की वजह से बीजेपी सत्ता से दूर हो गई थी.
2022 में शिव सेना के दो धड़ों में बंटने की वजह से बीजेपी की सत्ता में वापसी तो हुई, पर सीएम पद एकनाथ शिंदे को मिला.
लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और सीएम पद को वापस पा लिया. हालांकि बावजूद इसके बीएमसी चुनाव के लिए बीजेपी ने शिंदे को अपने साथ रखा है.
अभिजीत कांबले के मुताबिक अब मुंबई में ठाकरे बंधुओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी ही है.
वह कहते हैं, "बीजेपी की ताक़त मुंबई में काफी बढ़ चुकी है. शिंदे ज़्यादा मज़बूत नहीं है मुंबई में. दोनों दलों ने अपना फ़ायदा देखा है, इसलिए साथ आए हैं. इन्हें साथ आने से फ़ायदा होगा."
कांबले मानते हैं कि मराठी के मुद्दे पर ठाकरे बंधु बीजेपी को चुनौती दे रहे थे. इसलिए बीजेपी ने शिंदे को अपने साथ रखा.
वह कहते हैं, "बीजेपी की नॉर्थ इंडियन, गुजराती और दक्षिण भारतीय वोटर पर पकड़ है. लेकिन उन्हें मराठी वोटर्स को अपने साथ लाने के लिए शिंदे की ज़रूरत महसूस हुई."
कांग्रेस और बाकी दल कहां हैं?
महाराष्ट्र की राजनीति की तरह बीएमसी में भी कांग्रेस का ग्राफ़ लगातार कमज़ोर हुआ है.
बीएमसी में कांग्रेस के कॉर्पोरेटर्स की संख्या 51 से घटकर 31 रह गई थी. वहीं एनसीपी की बीएमसी में कोई ख़ास मौजूदगी नहीं रही है.
कांग्रेस ने बीएमसी चुनाव के लिए प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ गठबंधन किया है.
अभिजीत कांबले कहते हैं, "मुस्लिम और दलित मराठी वोटर्स कांग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ जा सकते हैं. लेकिन अजित पवार की एनसीपी के पास सिर्फ नवाब मलिक ही बड़े नेता है. शरद पवार की एनसीपी के साथ मुंबई में कोई बड़ी भूमिका नहीं है."
"कांग्रेस एक फ़ैक्टर है. उनकी ताकत वैसे तो लगातार कम हो रही है लेकिन अगर मुस्लिम और दलित वोट उनके साथ आते हैं तो वह महत्वपूर्ण फ़ैक्टर बनकर उभर सकते हैं."
अभिजीत कांबले हालांकि मानते हैं कि सीधी टक्कर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन और ठाकरे बंधुओं के बीच ही है.
वह कहते हैं, "सीधी टक्कर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के बीच ज़रूर है. लेकिन कांग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी के गठबंधन को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.