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महाराष्ट्र निकाय चुनावों में बीजेपी की बड़ी जीत के क्या हैं संदेश, अजित और शरद पवार सबसे मुश्किल में
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों के नतीजे सामने आ चुके हैं और इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की है.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दावा किया है कि गठबंधन ने 29 में से 25 नगर निगमों में जीत हासिल की है. उन्होंने इस नतीजे को भारी जनादेश बताया.
हालांकि राज्य निर्वाचन आयोग ने केवल 11 निगमों के नतीजों की घोषणा की थी और देर रात तक मतगणना जारी थी.
मुंबई में ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उद्धव ठाकरे की शिव सेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं, एकनाथ शिंदे की शिव सेना ने 29 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को 24 सीटें हासिल हुईं.
जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलिश्कर ने महाराष्ट्र निकाय के चुनावी नतीजों पर लिखा है, ''महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव दोनों एनसीपी के लिए अस्तित्व का संकट. इसके विपरीत, कांग्रेस और ठाकरे गुट के पास संघर्ष करने और टिके रहने की क्षमता को दिखाता है. कांग्रेस को झूठे अहंकार के बिना गठबंधन करना होगा. ठाकरे गुट से दूरी बनाना केवल हिंदुत्व को मज़बूत करेगा.''
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महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में इस बार कुल 29 नगर निगमों की 2,869 सीटों के लिए बीते 15 जनवरी को मतदान हुए.
चुनावी मुकाबले में छह प्रमुख राजनीतिक दल मैदान में थे - बीजेपी, शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट), शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), कांग्रेस, एनसीपी (अजित पवार गुट) और एनसीपी (शरद पवार गुट).
इसके अलावा एआईएमआईएम, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कई सीटों पर चुनाव लड़ा.
एआईएमआईएम ने पूरे महाराष्ट्र में 125 सीटें जीतकर या बढ़त हासिल कर, जिनमें मुंबई की आठ सीटें भी शामिल हैं, सबको चौंकाया.
पहली बार ठाकरे परिवार को देश के सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर से नियंत्रण गंवाना पड़ा, जिस पर वह 25 वर्षों से अधिक समय से शासन कर रहा था.
कई नगर निगमों में शरद पवार की पार्टी एनसीपी-एसपी खाता तक नहीं खोल सकी.
भिवंडी-निजामपुर में उनकी पार्टी को 12 सीटें मिलीं, जिससे कुल संख्या 15 तक पहुंची. मुंबई को छोड़कर अन्य स्थानों पर उद्धव ठाकरे की पार्टी को एकल अंक में ही सीटें मिलीं.
कांग्रेस का बीजेपी पर आरोप
अजित पवार की एनसीपी को भी भारी चुनावी नुक़सान उठाना पड़ा. पुणे और पिंपरी-चिंचवड में, जहाँ उन्होंने बीजेपी के ख़िलाफ़ अपने चाचा शरद पवार के साथ गठबंधन किया था, वहां भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
अजित पवार ने कहा कि वह जनता की इच्छा को सर्वोपरि मानते हैं.
कांग्रेस को भी कई निर्वाचन क्षेत्रों में क़रारा झटका लगा है. पार्टी ने दावा किया कि उसने 2,869 सीटों में से 350 सीटें जीती हैं.
चंद्रपुर में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
कांग्रेस ने कहा कि वह 10 अन्य नगर निगमों में संयुक्त रूप से सत्ता में रहेगी और बीजेपी पर फ़र्ज़ी मतदान के साथ धन वितरण के आधार पर जीत हासिल करने का आरोप लगाया.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "मुंबई का महापौर मराठी और हिंदू होगा. उन्होंने इस जीत को भारी जनादेश बताया, लेकिन साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को अहंकार से बचने की चेतावनी भी दी.
उन्होंने अपने विजय भाषण में कहा, "मैं महाराष्ट्र की जनता का इस भारी जीत के लिए आभार व्यक्त करता हूँ. हमने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. 29 में से 25 नगर निगमों में हमने क्लीन स्वीप किया है. मुंबई में भी, हालांकि गिनती अभी जारी है, हमें पूरा भरोसा है कि महायुति को पूर्ण बहुमत मिलेगा. हमने इस चुनाव में विकास के एजेंडे को सामने रखा. यह जनादेश इस बात का संकेत है कि लोग ईमानदारी चाहते हैं, लोग विकास चाहते हैं."
नतीजे क्या संदेश देते हैं?
शिवसेना में टूट के बाद यह पहली बार था, जब महाराष्ट्र नगर निकाय के चुनाव कराए गए. आख़िरी बार साल 2017 में बीएमसी के चुनाव हुए थे और तब नतीजे , शिवसेना के ही पक्ष में रहे थे.
बीते तीन दशक से महाराष्ट्र के सबसे अहम नगर निगम यानी बीएमसी पर शिव सेना का ही प्रभुत्व रहा है.
लेकिन पूरे चार साल के अंतराल पर जब इस बार चुनाव करवाए गए और अब नतीजे भी सामने हैं, तो साफ़ है कि बीजेपी ठाकरे बंधुओं पर भारी पड़ी है.
बीजेपी ने 2,784 में से 1,372 सीटें जीतकर और प्रमुख सीटों पर उपमुख्यमंत्री अजित पवार और एकनाथ शिंदे को पीछे छोड़कर, बीजेपी ने यह दिखा दिया है कि आने वाले तीन वर्षों में महायुति सरकार में उसी का दबदबा रहेगा.
क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य
महाराष्ट्र के बाक़ी हिस्सों में कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी है. लेकिन मुंबई में बीजेपी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उद्धव ठाकरे मुख्य विपक्षी के रूप में सामने आए.
नतीजे महायुति के भीतर संभावित शक्ति-संतुलन को दर्शाते हैं और साथ ही सामूहिक विपक्षी मोर्चे के रूप में महाविकास आघाड़ी के भविष्य पर भी सवाल खड़े करते हैं.
बीजेपी ने महाराष्ट्र की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस (315 सीटें) से चार गुना और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी एकनाथ शिंदे की शिव सेना (394 सीटें) से तीन गुना अधिक सीटें जीती हैं.
इन नतीजों ने न केवल आगे राज्य की राजनीति में शक्ति-संतुलन का संकेत दिया है बल्कि यह भी साफ़ किया है कि आने वाले चुनावों में मुख्य विपक्षी पार्टी कौन होगी.
इससे शरद पवार की एनसीपी और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य कमज़ोर दिखाई देता है.
नतीजों में शरद पवार की स्थिति कमज़ोर होती दिखी (36 सीटें), जिनकी पार्टी कई नगर निगमों में अपना खाता तक नहीं खोल सकी. जहां राज्य के अन्य हिस्सों में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी, वहीं मुंबई में उद्धव ठाकरे की ज़मीन अब भी मज़बूत है.
उनकी पार्टी बीजेपी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी और मराठी वोट बैंक को लेकर शिंदे को कड़ी चुनौती दी. मुंबई में बीजेपी ने 87 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि उद्धव ठाकरे की पार्टी को 65 सीटें मिलीं.
राज ठाकरे का घटता प्रभाव
लेकिन राज ठाकरे का राजनीतिक प्रभाव बीते कुछ वर्षों में हर संभव गठजोड़ आज़माने के बावजूद घटता गया है. उनकी पार्टी को मुंबई में केवल छह सीटें मिलीं, जो पूरे महाराष्ट्र में मिली 12 सीटों में शामिल हैं.
उनका सीमित चुनावी प्रभाव मुंबई महानगर क्षेत्र तक सिमट कर रह गया, जहां उन्होंने दो निगमों में पांच-पांच सीटें और एक अन्य निगम में एक सीट जीती. नासिक में, जहां कभी उनकी पार्टी का शासन रहा था, उन्हें सिर्फ एक सीट ही मिल सकी.
ठाकरे भाइयों ने 20 साल के अंतराल के बाद एकजुट होकर मराठी वोट बैंक को एकजुट करने का प्रयास किया था. यह भावनात्मक अपील मुंबई के मराठी मतदाताओं के कोर इलाकों दादर, माहिम और परेल में असरदार साबित होती दिखी.
इन इलाक़ों में दोनों चचेरे भाइयों ने शिंदे के उम्मीदवारों को हराकर उद्धव ठाकरे को मुंबई में बढ़त दिलाई. मुंबई में शिव सेना किसकी है, यह बीएमसी चुनाव के नतीजों से समझा जा सकता है.
हालांकि, राज्य के बाकी हिस्सों में उद्धव ठाकरे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. छह प्रमुख दलों में उनकी पार्टी पांचवें स्थान पर रही और कुल 149 सीटें ही जीत सकी.
राज ठाकरे 2005 में शिवसेना से बग़ावत कर अलग हो गए थे. तब बाल ठाकरे ज़िंदा थे. राज ठाकरे की बग़ावत के वक़्त बाल ठाकरे की उम्र लगभग 80 साल हो रही थी.
कहा जाता था कि बाल ठाकरे वाला तेवर राज ठाकरे में ही है और अपने चाचा की विरासत के असली दावेदार वही हैं. 2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया था और 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटों पर पार्टी को जीत मिली थी.
ऐसा लगा था कि राज ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे की विरासत सँभालने के लिए तैयार हैं लेकिन मराठी मानुष और उत्तर भारतीयों से नफ़रत की राजनीति 2009 से आगे नहीं बढ़ पाई.
नवंबर 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने 95 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और जीत केवल 20 सीटों पर मिली थी. वहीं उद्धव ठाकरे से बग़ावत कर बाल ठाकरे की विरासत पर अपनी दावेदारी पेश करने वाले पुराने शिव सैनिक एकनाथ शिंदे ने 81 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उन्हें 57 सीटों पर जीत मिली थी.
दूसरी तरफ़ राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस बार के चुनाव में पूरे महाराष्ट्र में 128 उम्मीदवार उतारे थे और एक को भी जीत नहीं मिली थी. यहाँ तक कि राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे माहिम विधानसभा क्षेत्र में केवल 31,611 वोट ही पा सके और तीसरे नंबर पर रहे था.
एनसीपी नेता अजित पवार, जिन्होंने पुणे और पिंपरी-चिंचवड नगर निगमों पर नियंत्रण वापस पाने के लिए सहयोगी बीजेपी के ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रचार किया था, को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा.
यह तब है, जब वह दो साल के अंतराल के बाद अपने चाचा शरद पवार के साथ फिर से जुड़े थे. जहां वरिष्ठ पवार विपक्ष में हैं, वहीं अजित पवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री हैं और बीजेपी के साथ सत्ता साझा कर रहे हैं.
उनकी पार्टी 158 सीटें जीतकर छह प्रमुख दलों में चौथे स्थान पर रही. उन्होंने कहा कि वह जनादेश को विनम्रता से स्वीकार करते हैं.
बीएमसी देश की सबसे बड़ी नगर निकाय है और इसका सालाना बजट कई राज्यों से भी ज़्यादा होता है.
ऐसे में मुंबई जैसे बड़े नगर निगम के नतीजों को राज्य की राजनीति का मूड इंडिकेटर माना जाता है और इन्हें अक्सर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले एक अहम संकेत के तौर पर देखा जाता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित