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महाराष्ट्रः निकाय चुनावों में बीजेपी बड़ी जीत की ओर मगर कांग्रेस के इस हाल की वजह क्या रही?
- Author, ओंकार करम्बेलकर
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
महाराष्ट्र में 29 नगर निगमों के चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने ख़ासी बढ़त बना ली है.
अब तक के रुझानों और घोषित परिणामों के अनुसार, बीजेपी, उसके बाद एकनाथ शिंदे की शिवसेना और फिर अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने हर जगह अपनी पकड़ मजबूत की है.
इसमें भी बीजेपी और एकनाथ शिंदे के गठबंधन का फॉर्मूला सफल होता दिख रहा है. हालांकि अभी तक पूरे परिणाम सामने नहीं आए हैं, लेकिन पूरी तस्वीर स्पष्ट है.
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में बीजेपी को भारी बढ़त मिलने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिक्रिया दी है.
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उन्होंने एक्स पर लिखा, "धन्यवाद महाराष्ट्र! राज्य की उत्साही जनता ने एनडीए के जन कल्याण और सुशासन के एजेंडे को अपना आशीर्वाद दिया है! विभिन्न नगर निगम चुनावों के परिणाम दर्शाते हैं कि महाराष्ट्र की जनता के साथ एनडीए का रिश्ता और मजबूत हुआ है."
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य में 29 नगर निगमों में से 25 में बीजेपी या गठबंधन सत्ता में आ रहा है. रुझानों को देखते हुए इसमें कोई शक नहीं कि बृहन्मुंबई नगर निगम में सत्तारूढ़ गठबंधन को बहुमत मिलेगा.
फडणवीस ने कहा, "हिंदुत्व और विकास को अलग नहीं किया जा सकता. इसीलिए हिंदुत्व की भावना हमें जनता तक ले आई है. हमारा हिंदुत्व व्यापक है. इसीलिए हमें व्यापक समर्थन मिला है."
अजीत पवार को झटका
अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को इन चुनावों में भारी झटका लगा है. पुणे ज़िले की दोनों नगरपालिकाओं के 'संरक्षक' कहे जाने वाले अजीत पवार के गढ़ में भाजपा ने पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में बढ़त हासिल की है.
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि भले ही ठाकरे बंधु एक साथ आ गए लेकिन इसके बावजूद मेयर महायुति से ही कोई होगा.
लेकिन इस चुनाव में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को लगा है. ऐसा लगता है कि जिन पार्टियों का कभी विभिन्न नगरपालिकाओं में दबदबा था, अब वो टूट चुका है.
अधिकांश नगरपालिकाओं में अब गठबंधन और गठजोड़ की राजनीति अनिवार्य हो गई है.
कई क्षेत्रों में बंटी हुएराजनीतिक परिदृश्य को एकजुट करके सत्ता हासिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
इसीलिए चुनाव पूर्व गठबंधन अहम हो गए हैं. परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि कौन किसके साथ और कब हाथ मिलाता है.
यह सिर्फ हाथ मिलाने की बात नहीं है, बल्कि इसमें ज़मीनी स्तर पर वास्तविक काम करना भी शामिल है.
शिंदे गुट से समझौते का फ़ायदा
इन चुनावों में बीजेपी और शिवसेना के शिंदे गुट के बीच के गठबंधन को उतार चढ़ाव वाला माना जाता रहा है.
ठाणे, कल्याण डोंबिवली, मीरा-भयंदर और नवी मुंबई में दोनों गुटों के नेताओं ने एक-दूसरे की जमकर आलोचना की. लेकिन पूरी संभावना है कि कोई वरिष्ठ नेता इस पर ज़रूर नज़र रख रहा होगा कि यह मामला एक सीमा से आगे न बढ़े.
इसमें कोई शक नहीं कि इस समझौते से बीजेपी को बहुत फ़ायदा हुआ है. बीजेपी ने मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, कल्याण-डोम्बिवली और सोलापुर में बड़ी सफलता हासिल की है.
शिंदे समूह को भी अपने आकार के अनुसार इसका लाभ मिला है.
हालांकि, अब परिणामों से यह स्पष्ट हो गया है कि यह समझ अन्य मोर्चों पर नहीं दिखी.
नगरपालिका चुनावों से पहले, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की एमएनएस एक साथ आईं. उन्होंने मराठी मुद्दे को एकमात्र केंद्र बनाकर बातचीत, टिकट वितरण और चुनाव प्रचार शुरू किया. हालांकि उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्हें निश्चित रूप से लाभ हुआ.
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्होंने मुंबई में मराठी लोगों के अस्तित्व के मुद्दे को हवा देकर एक माहौल बनाया.
कांग्रेस के लिए उस एमएनएस के साथ गठबंधन में बने रहना संभव नहीं था, जिसने स्पष्ट और दृढ़ रुख़ अपनाते हुए कहा था कि वह प्रवासियों को मुंबई में प्रवेश नहीं करने देगी. या फिर गठबंधन तय करते समय इन विकल्पों पर विचार ही नहीं किया गया.
गठबंधन से अलग हुई कांग्रेस
जब दोनों भाई मुंबई में एक साथ आए, तो कांग्रेस के पास गठबंधन तोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने स्पष्ट रुख़ अपनाया कि चुनावों में एमएनएस के साथ गठबंधन असंभव है. अकेली रह गई कांग्रेस ने प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया.
लेकिन मुंबई में इनका क्या होगा? इसके संकेत मतदान से पहले ही दिखने लगे थे. सीटों के बंटवारे में वंचित बहुजन अघाड़ी ने कांग्रेस से 62 सीटों की मांग की. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने उन्हें सीटें दे भी दीं. हालांकि, वंचित अघाड़ी ने इनमें से 16 सीटों के लिए आवेदन नहीं किया.
एक तरफ़ तो हर सीट के लिए गठबंधनों के बीच लड़ाई-झगड़े और बहसें होती रहती हैं, कभी-कभी तो ये संबंध टूटने की कगार तक पहुंच जाते हैं. लेकिन सीट बंटवारे के बाद सहयोगी दल की ओर से इतने अधिक उम्मीदवार न उतारना बहुत ही अनोखा मामला है.
इसी से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि मुंबई में दोनों दल कितने क़रीब हैं और उन्हें कितना वोट मिलेगा. और ठीक यही हुआ भी.
वंचित बहुजन अघाड़ी के प्रवक्ता सिद्धार्थ मोकाले ने कहा कि हमें एहसास हुआ कि इन सीटों पर ग़लत उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया था और हम ग़लत उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर कोई अलग क़दम नहीं उठाना चाहते थे. हालांकि, यह स्पष्ट था कि इस गठबंधन में कोई बनावटी भावना नहीं थी.
बाद में चुनाव प्रचार के दौरान यह बात सामने आई कि वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता प्रकाश आंबेडकर और मुंबई में कांग्रेस के नेता असल में एक साथ मिलकर प्रचार नहीं कर रहे थे.
इसीलिए नतीजे घोषित होने से पहले सिद्धार्थ मोकाले ने कांग्रेस से पूछा कि 'क्या हमने गठबंधन में मिलकर चुनाव लड़ा था या अलग-अलग?'
उन्होंने आरोप लगाया, "वोट मांगते समय कांग्रेस नेताओं ने वीडियो में वंचितों का ज़िक्र नहीं किया."
कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने भी उन्हें जवाब दिया. उन्होंने कहा, "वंचितों को लेकर कुछ ग़लतफहमी हुई थी. हमने उनके उम्मीदवारों को विजयी बनाने की अपील भी की थी."
इन सब बातों से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस, जिसने कभी मुंबई में महापौर पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा किया था, अब और भी कमज़ोर पड़ जाएगी. ऐसा लगता है कि कांग्रेस को मुंबई में लगभग 13 सीटें ही मिलेंगी.
कांग्रेस की इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं, जैसे कि बीजेपी की तरह चुनावों जैसा लगातार सक्रिय होने वाले तंत्र का नदारद होना, केंद्र में नेताओं से मार्गदर्शन का अभाव और प्रदेश अध्यक्ष का अकेले संघर्ष करना.
लातूर में कांग्रेस की जीत
इन नतीजों में कांग्रेस को सबसे स्पष्ट जीत मराठवाड़ा के लातूर में मिली है. यहां कांग्रेस ने स्पष्ट जीत हासिल की है और देशमुख परिवार के सामने बीजेपी के प्रयास पूरी तरह विफल साबित हुए हैं.
कांग्रेस और वंचित बहुजन अघाड़ी ने 70 में से 47 सीटें जीती हैं. बीजेपी को केवल 22 सीटों से ही संतोष करना पड़ेगा.
इसमें कोई शक नहीं कि लातूर में विलासराव देशमुख के बारे में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण द्वारा दिए गए बयान का भी इस नतीजे पर असर पड़ा.
हालांकि चव्हाण ने बाद में माफ़ी मांग ली, लेकिन उन्हें इस ग़लती का ख़ामियाजा भुगतना पड़ा और लंबे समय तक मीडिया और चुनाव प्रचार में उनका नाम आता रहा.
अपनी ग़लती से कोल्हापुर गंवाया
ऐसी उम्मीद थी कि कांग्रेस एक और नगर निगम कोल्हापुर में सफलता हासिल करेगी.
अब तक के नतीजों से पता चलता है कि इस चुनाव में कांग्रेस को 34 सीटें मिल रही हैं, शिवसेना यूबीटी को-1, बीजेपी को 26, शिंदे समूह को 14, अजीत पवार समूह को 4 सीटें और जनसुराज को एक सीट मिल रही हैं.
यहां कांग्रेस उद्धव ठाकरे को अपने साथ लेकर चली, लेकिन फायदा होने के बजाय, उसे नुकसान ही उठाना पड़ा.
यहां कांग्रेस से कुछ ग़लती हुई. कांग्रेस के पूर्व नेता विक्रम जर्ग के बेटे अक्षय यहां से खड़े होने वाले थे लेकिन गठबंधन में जब यह सीट शिवसेना को मिली तो उन्होंने जनसुराज पार्टी से नामांकन दाखिल करके चुनाव जीता.
कुछ ऐसा ही शरंगधर देशमुख के मामले में भी हुआ. कांग्रेस के स्थानीय प्रभावशाली नेता के रूप में जाने जाने वाले शरंगधर देशमुख शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए और चुनाव जीत गए.
कई झटकों का सामना करने के बावजूद, कांग्रेस विदर्भ में एक जगह, यानी चंद्रपुर में सफलता हासिल करने में कामयाब रही है.
चंद्रपुर में कांग्रेस के 23 उम्मीदवार विजयी हुए हैं. उनके सहयोगी जन विकास को 3 सीटें मिली हैं, जबकि शिवसेना यूबीटी को को 6 सीटें मिली हैं.
कांग्रेस बीजेपी को 21 सीटों पर रोकने में सफल रही है. शेष सीटों में से एमआईएम, बसपा, वंचित बहुजन अघाड़ी और शिंदे सेना और निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं.
ओवैसी की पार्टी को कामयाबी
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का नाम महाराष्ट्र में नया नहीं है. शुरुआत में इस पार्टी ने मराठवाड़ा की कुछ सीटों पर मामूली पैठ बनाई, लेकिन 2014 में इसने सबको चौंका दिया.
वारिस पठान बायकुला से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और इम्तियाज जलील (तत्कालीन) औरंगाबाद सेंट्रल निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए.
2019 में, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से पहले, जलील औरंगाबाद से सांसद भी बने थे. इससे पहले, एमआईएम और वंचित बहुजन अघाड़ी ने भी गठबंधन किया था. इसलिए, यह पार्टी नई नहीं है.
उसी साल हुए विधानसभा चुनावों में, इसके उम्मीदवार मालेगांव सेंट्रल और धुले सिटी निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित हुए थे.
इम्तियाज़ जलील 2024 के लोकसभा चुनाव में हार गए थे. इस बीच, मालेगांव सेंट्रल के विधायक मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल खालिक ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और विधायक बने.
अब तक, एआईएमआईएम ने अमरावती नगर निगम में 9 सीटें, मुंबई में 4, छत्रपति संभाजी नगर नगर निगम में 15, जालना में 2, परभणी में 1, सोलापुर में 8, अकोला में 3 और ठाणे में 5 सीटें जीती हैं. पूरे नतीजे आने के बाद और भी बदलाव देखने को मिलेंगे.
मुंबई में, समाजवादी पार्टी के अबू आज़मी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नवाब मलिक जैसे दो महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी के बावजूद, एआईएमआईएम ने जीत हासिल की है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.