चीन की 150 देशों वाली परियोजना का 10 साल बाद हाल

    • Author, सिल्विया चैंग, हॉन्ग कॉन्ग से
    • पदनाम, अतिरिक्त रिपोर्टिंग बैंकॉक से बुई थु, जकार्ता से अस्टुडेस्ट्रा अजेंग्रास्त्री, पाकिस्तान से सहर बलोच

चीन बाक़ी दुनिया के साथ दो नए ट्रेड रूट स्थापित करने की अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना (बीआरआई) की दसवीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है. इस मौक़े पर 130 देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों ने चीन पहुंचना शुरू कर दिया है.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति 17 और 18 अक्टूबर को बीजिंग में आयोजित किए जा रहे इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.

इतने ज़्यादा देशों का इसमें शामिल होना संकेत है कि खरबों डॉलर की इस परियोजना का दुनिया पर कितना ज़्यादा असर है और चीनी कंपनियों ने विदेश में कितना ज़्यादा निवेश किया है.

पिछले एक दशक में दुनिया की तीन चौथाई आबादी वाले 150 देश इस परियोजना में शामिल हुए हैं. हालांकि, इस परियोजना को सफलता और असफलता, दोनों का सामना करना पड़ा है.

बेल्ट एंड रोड का मक़सद?

विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने तेज़ी से बढ़ती अपनी अर्थव्यवस्था में उभर रही ज़्यादा उत्पादन और महंगी मज़दूरी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बेल्ड एंड रोड परियोजना शुरू की थी.

चीन अपने तीस ख़रब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार से इस परियोजना के लिए फ़ंड देता है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू हेम्पशर के राजनीतिक विज्ञान विभाग में प्रोफ़सर लॉरेंस सी रियर्डन कहते हैं कि यह रक़म उसने 1980 में ज़्यादा खुली विकास नीति अपनाने के बाद से जुटाई है.

देश के अंदर मांग कम होने के कारण चीनी निर्माण कंपनियां विदेशों में परियोजनाएं तलाशती रही हैं.

चीनी वस्तुओं के लिए बाज़ार को बढ़ाने और देश की धाक जमाने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2012 में सत्ता में आने के बाद से ही बेल्ट एंड रोड परियोजना को प्राथमिकता दी है.

चीन की सरकारी कंपनियां निर्यात में निवेश करने वाली कंपनियों से फंड जुटाती हैं. इन्होंने मिलकर दुनिया के दक्षिणी हिस्से में कई परियोजनाएं मंज़ूर की हैं.

विदेशों में प्रॉजेक्ट कैसे चुनता है चीन?

बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के अलावा अब डिजिटल तकनीक, सुरक्षा और सतत विकास पर भी काम किया जाने लगा है.

आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि अब तक चीन बीआरआई के तहत 3000 से ज़्यादा परियोजनाओं में निवेश कर चुका है.

अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टिट्यूट (एईआई) के मुताबिक़, चीन से सबसे ज़्यादा निवेश हासिल करने वाले शीर्ष 15 देश हैं- इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सिंगापुर, रूस, सऊदी अरब, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, पेरू, लाओस, इटली, नाइजीरिया, इराक़, अर्जेंटीना और चिली.

चीन का कहना है कि वह आर्थिक ज़रूरतों के आधार पर परियोजनाओं का चयन करता है. मगर आलोचकों का कहना है कि उसका मक़सद दुनिया पर पकड़ बनाने के लिए चीन केंद्रित मॉडल तैयार करना है.

यूरेशिया ग्रुप में पूर्वी एशियाई मामलों के विशेषज्ञ जेरेमी चैन कहते हैं, “बीआरआई के तहत निवेश करते समय भू-राजनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं पर उतना विचार तो किया ही जाता है जितना कि आर्थिक पहलुओं पर होता है.”

चैन कहते हैं कि चीन से सबसे ज़्यादा फंड लेने वाले 15 देशों में इकलौता इटली ही है जिसने संयुक्त राष्ट्र महासभा में चीन के पक्ष में सबसे कम बार वोट किया है. अब इटली ने बीआरआई छोड़ने के संकेत दिए हैं.

अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टिट्यूट के आंकड़े दिखाते हैं कि बीआरआई के तहत होने वाली फंडिंग ज़्यादातर उन देशों में जाती है, जिनसे रिश्ते मज़बूत करने से चीन को रणनीतिक तौर पर ज़्यादा फ़ायदा होगा. जैसे कि इंडोनेशिया और पाकिस्तान.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात- ये दो संपन्न खाड़ी देश बेल्ट एंड रोड परियोजना से सबसे ज़्यादा फंड पाने वाले शीर्ष के सात देशों में शामिल हैं. तेल का उत्पादन करने वाले इन देशों में निवेश करना चीन के लिए पश्चिमी देशों की नीतियों, जैसे कि अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों आदि से मुक़ाबला करने में मददगार साबित हो सकता है.

सफलता के उदाहरण

बीआरआई की कुछ परियोजनाओं ने अच्छा काम किया है. इसका कारण बहुत साधारण है. कई देशों को सड़कों और रेलवे जैसे बेहतर आधारभूत ढांचे की ज़रूरत होती है.

इंडोनेशिया में हाल ही में देश की पहली तेज़ रफ़्तार रेल सेवा का उद्घाटन हुआ है, जिसका नाम है- वूश. यह राजधानी जकार्ता को लोकप्रिय पर्यटन स्थल बांडुंग से जोड़ती है. दोनों शहरों के बीच की दूरी 350 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार से महज 40 मिनट में तय की जा सकती है, जिसमें पहले तीन घंटे लगते थे.

कुछ का कहना है कि वूश की कोई ज़रूरत नहीं थी क्योंकि पहले से ही वहां सड़क मार्ग और सस्ती ट्रेनें थीं. लेकिन इंडोनेशिया रीसर्च इंस्टीट्यूट (आईएनडीईएफ़) में शोधकर्ता तौहीद अहमद कहते हैं, “इंडोनेशिया में बहुत से लोग बीआरआई की परियोजनाओं के पक्ष में हैं.”

लाओस में राजधानी विएंतिएन को चीन के युन्नान प्रांत से जोड़ने वाली रेल सेवा का उद्घाटन साल 2021 में हुआ था. इस रेल सेवा ने विएंतिएन से चीन के साथ लगती सीमा तक पहुंचने का समय अब सिर्फ़ तीन घंटे कर दिया है. इससे यात्री अब एक ही दिन में विएंतिएन से कनमिंग पहुंच सकते हैं.

बेल्ट एंड रोड की सफलता के और भी कई उदाहरण हैं. जैसे कि ग्रीस का पीरियस बंदरगाह जिसे अक्सर यूरोप का ‘ड्रैगन का सिर’ कहा जाता है.

इस बंदरगाह के 60 फ़ीसदी हिस्से पर अब चीन की सरकारी स्वामित्व वाली एक कंपनी का नियंत्रण है. अब इस बंदरगाह में जहाज़ों से भारी मात्रा में आने वाले कंटेनरों का प्रबंधन किया जा रहा है.

नाकामयाबी के उदाहरण

बेल्ट एंड रोड के कई प्रॉजेक्ट नाकाम भी हुए हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मायामी में राजनीतिक विज्ञान की प्रोफ़ेसर जून ट्यूफ़ेल ड्रेयर कहती हैं कि ‘इस परियोजना को ख़राब प्लानिंग का नुक़सान उठाना पड़ रहा है. जैसे कि ऐसी परियोजनाओं के लिए ऋण दे दिया जाता है जो कमाई के मामले में व्यावहारिक नहीं होतीं या फिर निर्माण करते समय सही से देखरेख नहीं की जाती.’

वैश्विक आर्थिक मंदी, बढ़ती ब्याज़ दरों और ज़्यादा महंगाई के कारण कई देशों को चीन से लिया क़र्ज़ चुकाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. अरबों डॉलर के कर्ज़ चुकाए नहीं जा सके हैं जिससे विकास परियोजनाएं ठप हो गई हैं.

इसका एक उदाहरण श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह है. यहां सरकार ने 2020 में देश को दिवालिया घोषित कर दिया था. कर्ज़ न चुका पाने के कारण श्रीलंका ने इस बंदरगाह को 99 साल के लिए चीन को पट्टे पर दे दिया है.

बीआरआई के बड़े हिस्सेदारों में से एक, पाकिस्तान भी इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है. समय पर कर्ज़ न चुका पाने के चलते इस देश को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) से राहत मांगनी पड़ी है.

कई बार वहां पर देश की बिजली ग्रिड को जेनरेटर बंद करने पड़ते हैं ताकि ईंधन पर होने वाला खर्च कम किया जा सके.

चीन ने हाल ही में पाकिस्तान द्वारा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिए अतिरिक्त फ़ंड की मांग ठुकरा दी थी. राजनीतिक अस्थिरता, चीनी कामगारों को ख़तरे और पाकिस्तान की कर्ज़ चुकाने की क्षमता का हवाला देते हुए चीन ने यह फ़ैसला किया था.

अन्य कई देश, जिनमें इथियोपिया और केन्या भी शामिल हैं, इसी तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं.

वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि बीआरआई द्वारा दिए गए कुल कर्ज़ का 60 फ़ीसदी जिन देशों में है, वे आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं. इसी के चलते चीन पर उधार देकर ‘कर्ज़ के जाल में फंसाने वाली कूटनीति’ अपनाने के आरोप लगते हैं.

लोग क्या कहते हैं

सर्वे बताते हैं कि कई देश चीन के बढ़ते प्रभाव से सावधान होते जा रहे हैं.

पाकिस्तान में लोगों को शुरू में बीआरआई से बहुत उम्मीदें थीं. उन्हें लगता था कि इससे आर्थिक समृद्धि आएगी और व्यापार बढ़ेगा. लेकिन कुछ सालों बाद स्थानीय लोगों के जीवन में वैसा कोई बदलाव नहीं आया, जिसका पाकिस्तान और चीन ने वादा किया था.

पाकिस्तान के बंदरगाह वाले शहर ग्वादर के बाशिंदे इन दिनों बीआरआई की परियोजनाओं के विरोध में आ गए हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुख्य मरीन ड्राइव पर फ़ोर लेन रोड बनने के अलावा ज़्यादा कोई विकास नहीं हुआ है.

वियतनाम ने हनोई में एक बड़े शहरी रेलवे प्रॉजेक्ट के लिए चीन से 67 करोड़ डॉलर का कर्ज़ तो लिया है मगर उसने बीआरआई के तहत आधिकारिक तौर पर कोई नई परियोजना शुरू नहीं की है.

वियतनाम में 2011 में कैट लिन्ह-हा डोंग रेलवे प्रॉजेक्ट शुरू हुआ था मगर इसका काम बहुत धीमी रफ़्तार में हुआ और लागत भी बढ़ गई. यह परियोजना 2021 में पूरी हुई.

इसके निर्माण में लगने वाले समय ने पूरे देश की अन्य परियोजनाओं के लिए ग़लत उदाहरण पेश किया और लोगों का भरोसा भी कम हो गया. भले ही इस तरह की परियोजनाओं को पूरा करने में पश्चिमी देशों में इतना या इससे ज़्यादा समय क्यों न लगता हो.

ऐसा लगता है कि चीन इन चिंताओं से वाक़िफ़ है. राष्ट्रपति शी अब बीआरआई के तहत ‘छोटी और सुंदर’ परियोजनाओं की बात कर रहे हैं.

हाल के सालों में बीआरआई के नए प्रॉजेक्टों और विदेश में चीन के निवेश, दोनों में कमी आई है.

भविष्य में भी बेल्ट एंड रोड परियोजना को इन दोनों मामलों में चुनौतियों का सामना करना होगा.

प्रोफ़ेसर रियर्डन कहते हैं, “सवाल यह है कि एक पार्टी द्वारा चलाया जाने वाला चीन ऐसी विकास परियोजनाओं का विस्तार जारी रख सकता है या नहीं क्योंकि उससे क़र्ज़ लेने वाले देश इसे चुका नहीं पा रहे हैं."

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