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ग्वादर में चीन के कामगारों पर हमले क्यों, पाकिस्तान के इस शहर की क्या है अहमियत
चीन ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान के पोर्ट सिटी ग्वादर में चीनी इंजीनियरों के काफिले पर हुए हमले की निंदा की है.
पाकिस्तान स्थित चीनी दूतावास ने इसे 'चरमपंथी हमला' बताते हुए पाकिस्तान से इसकी जांच करने और ऐसे कदम उठाने को कहा है जिससे भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों.
रविवार को हुए हमले के बाद ‘बीबीसी उर्दू’ ने चीन के सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ के हवाले से बताया है कि हमले में किसी चीनी नागरिक के घायल होने की ख़बर नहीं है.
पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने ग्वादर में हुए हमले को चरमपंथी हमला करार दिया और दो चरमपंथियों के मारे जाने की जानकारी दी.
हालांकि उन्होंंने चीनी इंजीनियरों के काफिले पर हमले का कोई जिक्र नहीं किया है.
जबकि बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने एक बयान जारी कर हमले की जिम्मेदारी ली है.
चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को शिनजियांग प्रांत से जोड़ने की परियोजना पर काम कर रहा है.
ये चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पसंदीदा प्रोजेक्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का अहम हिस्सा है.
चीन दशकों से पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने की कोशिश कर रहा है.
बलूचिस्तान के कई जनजातीय इलाकों में चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का विरोध हो रहा है.
इस इलाके में चीनी विशेषज्ञों और कामगारों पर पहले भी हमले होते रहे हैं.
बलोच अलगाववादियों का कहना है कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की परियोजनाओं के बहाने यहां के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है.
उनका कहना है कि पाकिस्तान सरकार जिस हिसाब से यहां के प्राकृतिक संसाधन का दोहन कर रही है उस अनुपात में यहां का विकास नहीं हो रहा है.
पाकिस्तान का बलूचिस्तान सूबा एशिया में सोने, तांबे और गैस के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इसके बावजूद इसे पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा सूबा माना जाता है. और स्थानीय लोग इसके लिए सरकार की बेरुखी को ज़िम्मेदार मानते हैं.
आबादी के लिहाज़ से बलूचिस्तान पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा सूबा है. लेकिन अब तक पाकिस्तान की सरकारों पर पंजाब सूबे से आने वाले राजनेताओं का दबदबा रहा है.
क्या है ग्वादर पोर्ट की अहमियत
दरअसल ग्वादर होरमुज जल डमरुमध्य के नजदीक है. ये अरब सागर से तेल सप्लाई का अहम रास्ता है.
जेएनयू इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने बीबीसी से ग्वादर की अहमियत पर बात करते हुए बताया था,’’, "चीन को मध्य एशिया से बहुत ज़्यादा ऊर्जा के स्रोत की ज़रूरत होती है. उसकी चिंता थी कि सिंगापुर के पास मलक्का जल डमरुमध्य के पास से भविष्य में ऊर्जा के स्रोत को लाने में परेशानी हो सकती है. इसलिए चीन अलग-अलग रास्तों की तलाश में रहा है और उसी में से एक रास्ता उसने ग्वादर बंदरगाह का चुना.''
स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, ''इसकी शुरुआत 90 के दशक में हो चुकी थी. चीन ने शुरुआत में तेल आयात के लिए इसकी उपयोगिता समझी थी, बाद में इसका दायरा बढ़ाया गया और आगे चल कर दूसरे एनर्जी और पॉवर प्रोजेक्ट जोड़े गए. इस पूरी परियोजना को सीपीईसी का नाम दिया गया."
स्वर्ण सिंह ने बताया था कि इस परियोजना का काम अब तक पूरा नहीं हुआ है और इसके लिए कुछ हद तक बलोच लोगों की बग़ावत ज़िम्मेदार है.
बलूचिस्तान में चीन के निवेश पर बड़ी आपत्ति ये है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान और ख़ासतौर पर ग्वादर के भविष्य का फ़ैसला करते हुए बलूचिस्तान प्रांत के नेतृत्व को विश्वास में लेना तो दूर की बात, सूचना तक नहीं दी.
स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, बलूच अलगावादियों की तरफ़ से बार-बार ये दलील दी जाती है कि सीपीईसी में भी ऐसा ही होगा कि बलूचिस्तान के संसाधनों पर पाकिस्तान की संघीय सरकार या फिर दूसरे समृद्ध प्रांत जैसे पंजाब को फ़ायदा मिलेगा.
वहीं, स्थानीय लोगों की सोच ये है कि यहां चीन का पूरी तरह प्रभाव हो जाएगा. इसके बाद बलूचिस्तान वासियों को अपने प्राकृतिक और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल करने का मौक़ा नहीं मिलेगा.
चीन की रणनीति का हिस्सा?
बलूचिस्तान में चीन की दिलचस्पी नई नहीं है. उसकी नज़र शीत युद्ध के ज़माने से भी पहले से इस इलाक़े पर रही है.
बीबीसी उर्दू मुताबिक, "चीन ने हमेशा से अपनी पश्चिमी सीमाओं पर रणनीतिक नज़र रखी है. यूरोप, ईरान और मध्य एशिया के दूसरे देशों तक पहुंचने के लिए ये अहम रहा है. ये नई बात नहीं है. चीन ने कारोबारी और अन्य रणनीतिक कारणों से हमेशा ही पश्चिमी सीमाओं के पार देखा है."
बीबीसी उर्दू मुताबिक,"लंबे समय से अमरीका ने दक्षिण पूर्वी चीन में अपना नौसैनिक बेड़ा तैनात कर रखा है. चीन के लिए ये एक अहम कारोबारी रूट है. कुछ लोगों को लगता है कि मलक्का जलडमरूमध्य में अमेरिका की इस मौजूदगी से चीन के व्यापारिक हितों पर असर पड़ता है."
चीन की पूर्वी समुद्री सीमा की तरफ़ जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश हैं तो पश्चिम में पाकिस्तान जैसा ऐतिहासिक साझीदार देश है.
अगर चीन समंदर के रास्ते अपना माल बाहर भेजने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता चाहता है तो बलूचिस्तान उसके लिए सबसे बेहतर और शायद सबसे आख़िरी दांव है.
पाकिस्तान का फायदा
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस प्रोजेक्ट से केवल चीन को ही फ़ायदा होने वाला है. पाकिस्तान भी इस प्रोजेक्ट के लिए उतना ही बेकरार है.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक , "पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जिसके पास न तो अच्छी रेल सुविधाएं हैं, न ही अच्छे अस्पताल, स्कूल और हेल्थ सेंटर. पिछले 40 सालों में पाकिस्तान में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बहुत कम निवेश हुआ है. पाकिस्तान के पास केवल एक बंदरगाह है. कराची का बंदरगाह. वो भी सौ साल से भी ज़्यादा अरसे पहले औपनिवेशिक दौर में बना था."
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर में जिन परियोजनाओं पर काम चल रहा है, इस्लामाबाद में बैठी सरकार के पास उतने आर्थिक संसाधन नहीं हैं कि वो अपने बूते इन्हें पूरा कर सके.
लेकिन चीन के इस निवेश को लेकर पाकिस्तान में एक किस्म के तनाव का माहौल भी है. अलग-अलग तबके इसका विरोध कर रहे हैं.
कुछ को लगता है कि उन्हें किनारे कर दिया गया है और विरोध कर रहे कुछ लोगों के पास विचारधारा से जुड़ी वजहें भी हैं.
भारत को घेरने की कोशिश?
ग्वादर पाकिस्तान का तीसरा अहम बंदरगाह है. ग्वादर बंदरगाह तीन क्षेत्रों यानी मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को जोड़ेगा. ये भारत के मुकाबले पाकिस्तान को रणनीतिक फायदा दिला सकता है.ये बंदरगाह अन्य दो पाकिस्तानी बंदरगाहों की तुलना में भारतीय पहुंच से बहुत दूर है.
ये भी माना जा रहा है कि ग्वादर बंदरगाह भारत को रणनीतिक तौर पर घेरने में चीन की मदद कर सकता है. इसकी भौगोलिक स्थिति भारत को घेरने के बिल्कुल मुफीद है. हालांकि भारत वहां से 170 किलोमीटर दूर ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है. भारत के इस कदम को ग्वादर पर चीन का जवाबी कदम माना जाता है.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का इतिहास
इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पहली बार 1970 के दशक की शुरुआत में वजूद में आई थी. ये वो दौर था जब पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के पहले शासन में बलूचिस्तान में पाकिस्तान की हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र बग़ावत शुरू की गई थी.
हालांकि, सैन्य तानाशाह ज़ियाउल हक़ की सत्ता पर क़ब्ज़े के बाद बलूच क़ौम परस्त लीडरों से बातचीत हुई. और इसका नतीजा ये निकला कि सशस्त्र बग़ावत के ख़ात्मे के बाद बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी भी पृष्ठभूमि में चली गई.
फिर पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन में बलूचिस्तान हाई कोर्ट के जज जस्टिस नवाज मिरी के क़त्ल के आरोप में क़ौम परस्त लीडर नवाब खैर बख़्श मिरी की गिरफ़्तारी के बाद साल 2000 से बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में सरकारी प्रतिष्ठानों और सुरक्षा बलों पर हमलों का सिलसिला शुरू हुआ.
वक़्त गुज़रने के साथ-साथ हमलों में न सिर्फ़ इज़ाफ़ा हुआ बल्कि इनका दायरा बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में फैल गया है.
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