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पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतुआ समुदाय की चिंता बढ़ी
- Author, इल्मा हसन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, कोलकाता
पश्चिम बंगाल में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और मतुआ समुदाय एक बार फिर गहरे असमंजस में है.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत वोटर लिस्ट में नामों के सत्यापन ने इस समुदाय में डर बढ़ा दिया है.
एक ओर नागरिकता के बारे में इनमें से कई लोग अनिश्चय में हैं. दूसरी ओर, यह भी डर है कि कहीं वे मतदाता बनने से भी छूट न जाएँ.
इन सबके बीच, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मतुआ समुदाय तक पहुँच बढ़ाने और उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिशों में जुटी हुई है.
मतुआ समुदाय को बीजेपी के लिए एक अहम मतदाता आधार माना जाता है.
हालाँकि अब यह चर्चा भी हो रही है कि क्या नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और अब एसआईआर की प्रक्रिया ने उनके भरोसे को डगमगाना शुरू कर दिया है?
मतुआ समुदाय कौन हैं और एसआईआर से चिंता क्यों?
मतुआ समुदाय की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ इस डर को और बढ़ा देती हैं.
मतुआ एक प्रमुख अनुसूचित जाति समुदाय है. यह समुदाय मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों का समूह है.
इन्होंने धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न के बाद भारत में शरण ली थी.
पश्चिम बंगाल में इनकी आबादी का अनुमान क़रीब दो करोड़ तक लगाया जाता है. इसकी वजह से यह समुदाय राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के तहत ड्राफ़्ट मतदाता सूचियों से 58 लाख से ज़्यादा लोगों के नाम हटाए गए हैं.
कोलकाता स्थित शोध संस्था साबर इंस्टिट्यूट के आँकड़ों के मुताबिक़, ड्राफ़्ट मतदाता सूची से मतुआ बहुल 15 विधानसभा सीटों में क़रीब 2.4 लाख मतदाताओं के नाम हटे हैं.
इनमें से क़रीब 40% के नाम मृत बताए गए लोगों के थे. लगभग 39% लोग पलायन कर गए हैं और लगभग 22% का पता नहीं चल पाया.
इनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की बताई जा रही है, जिनकी पहचान 'अनमैप्ड' के रूप में की गई है.
'अनमैप्ड' उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी मतदाता का रिकॉर्ड किसी पते या मतदान क्षेत्र से सही तरह से जोड़ा नहीं जा पाता.
इससे मतुआ समुदाय में मताधिकार को लेकर डर और गहरा हो गया है.
लोगों को आशंका है कि अगर इस बार उनका नाम मतदाता सूची में नहीं आया और सीएए की प्रक्रिया में देरी हो गई, तो उन्हें स्थानीय निवासी नहीं माना जाएगा.
उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कई इलाक़ों में फैले मतुआ परिवारों का कहना है कि उन्हें अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी नागरिकता की स्थिति क्या है और क्या वे 2026 के चुनाव में मतदान कर पाएँगे?
इनका दावा है कि वे पहले के चुनावों में वोट दे चुके हैं.
मतुआ बहुल इलाक़ों के लोगों से बातचीत के दौरान यह सवाल बार-बार सामने आता है कि अगर नागरिकता संशोधन क़ानून की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है तो क्या उन्हें 'अस्थायी नागरिक' माना जा रहा है?
मतुआ समुदाय, नागरिकता और बीजेपी
बीजेपी ने चुनावी वादे के तौर पर कहा था कि जो लोग दशकों से यहाँ रह रहे हैं और हाल के सालों में धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हैं, उन्हें नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के तहत नागरिकता दी जाएगी.
इस बीच, विधानसभा चुनाव से पहले, सीएए की धीमी गति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पश्चिम बंगाल बीजेपी इकाई कई रैलियों और बैठकों के ज़रिए मतुआ समुदाय में बढ़ते असंतोष को शांत करने की कोशिश कर रही है.
ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के संजय बिस्वास ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह बातें कर रहे हैं, लेकिन जो वादा किया गया था, वह पूरा नहीं हुआ. मतुआ समुदाय के लिए कोई समाधान नहीं निकल रहा है. हमारी मांग साफ़ है- हमें नागरिकता चाहिए. सिर्फ़ बयानों से कुछ नहीं होगा. जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं हैं, वे इस बार वोट नहीं दे पाएँगे, इसका डर है."
संजय बिस्वास के मुताबिक़, "एसआईआर में बहुत सारे लोगों के नाम नहीं आए हैं. जाँच के बाद भी नाम नहीं आएगा, क्योंकि लोगों के पास सभी दस्तावेज़ नहीं हैं.''
उनका कहना है, "समुदाय में बहुत डर है. सीएए के ज़रिए नागरिकता मिलेगी या नहीं, यह भी तय नहीं है. क़रीब 50 हज़ार लोगों ने सीएए के लिए आवेदन किया है, लेकिन सिर्फ़ 400 लोगों को ही अब तक प्रमाणपत्र मिला है."
दूसरी ओर, बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी का कहना है कि 60 हज़ार लोगों ने सीएए के तहत आवेदन किया है. इनमें से 1,000 लोगों को नागरिकता प्रमाणपत्र मिल चुके हैं.
बीबीसी इन आँकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता है.
मतुआ समुदाय के लिए यह स्थिति इसलिए भी तकलीफ़देह है, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया था.
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की आबादी कम से कम 30 विधानसभा सीटों और 11 लोकसभा सीट पर निर्णायक भूमिका निभाती है.
साल 2019 लोकसभा चुनाव में मतुआ बहुल इलाक़ों में बीजेपी का वोट शेयर औसतन 41.5 % रहा.
बंगाँव सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार और मतुआ नेता शांतनु ठाकुर ने एक लाख से ज़्यादा वोटों से जीत हासिल की थी.
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भी मतुआ बहुल क्षेत्रों से बीजेपी को काफ़ी वोट मिले. हालाँकि, साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वोट प्रतिशत में थोड़ी गिरावट आई.
सीएए को बीजेपी ने मतुआ समुदाय के लिए ऐतिहासिक क़दम बताया था. इसे दशकों पुराने नागरिकता के सवाल का हल माना गया.
लेकिन क़ानून लागू होने के बावजूद इस प्रक्रिया की धीमी रफ़्तार और ज़मीनी स्तर पर स्पष्टता की कमी ने उस उम्मीद को अनिश्चितता में बदल दिया है.
इस समुदाय के जो लोग साल 1971 से पहले या उसके आसपास भारत आए, इनमें से कई को नागरिकता क़ानूनों या स्थानीय प्रक्रियाओं के ज़रिS नागरिकता मिली है. उनके नाम मतदाता सूची में दर्ज हुए.
पिछले दिनों बातचीत में कई इलाक़ों के मतुआ परिवारों का कहना था कि उन्हें सीएए के तहत आवेदन करने के लिए तो प्रोत्साहित किया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इस बीच उनके मताधिकार का क्या होगा.
राणाघाट में मतुआ समुदाय के नरोत्तम बिस्वास का कहना है, "पहले कहा गया था कि हिंदुओं को डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अब दस्तावेज़ माँगे जा रहे हैं. हमने इन्हें इतना वोट दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ. जो हिंदू हैं, जो मतुआ हैं, उनकी इतनी जाँच क्यों की जा रही है. अगर इतना वोट देने के बाद भी हमें अवैध माना जा रहा है, तो फिर इसका मतलब क्या है. अगर हमारा वोट ही अवैध है, तो ये लोग हमारे वोट से चुनाव कैसे जीत सकते हैं.''
उनके मुताबिक़, ''मतुआ समुदाय का झुकाव पहले बीजेपी की तरफ़ ज़्यादा था. सीएए के लिए कहना होता है कि नागरिकता बांग्लादेशी है. अगर नागरिकता बांग्लादेशी है, तो अब तक वोट कैसे पड़े. ये लोग सिर्फ़ आश्वासन देते हैं चुनाव के लिए और कुछ नहीं."
मतुआ समुदाय को भरोसा दिलाने की बीजेपी की कोशिश
पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई कई रैलियों में बीजेपी ने मतुआ समुदाय को भरोसा दिलाने की कोशिश की है.
उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे मतुआ बहुल इलाक़ों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक मंचों से कहा, "सीएए के तहत शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी. किसी को भी डरने की ज़रूरत नहीं है."
अमित शाह ने यह भी कहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून के बारे में फैलाया जा रहा डर ग़लत है और यह क़ानून किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं बनाया गया है.
हालाँकि, इन भाषणों में एसआईआर प्रक्रिया या मतदाता सूची से नाम हटने पर उठ रही आशंकाओं पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पश्चिम बंगाल की सभाओं में कहा था, "सीएए किसी की नागरिकता छीनने का क़ानून नहीं है, बल्कि यह उन लोगों को नागरिकता देने का क़ानून है, जो सालों से अत्याचार झेलते रहे हैं."
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि जिन लोगों को नागरिकता का अधिकार मिलना चाहिए, उन्हें हर हाल में मिलेगा.
प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में एसआईआर या मतुआ समुदाय में वोट से वंचित होने की आशंकाओं पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की.
राज्य में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने मतुआ बहुल इलाक़ों के लगातार दौरे किए हैं.
वे स्थानीय बैठकों में दावा करते रहे हैं, "मतुआ समाज को अगर स्थायी समाधान कोई दे सकता है, तो वह सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी है."
मतुआ समुदाय में बेचैनी तब और बढ़ गई, जब बीजेपी के केंद्रीय नेता लाल सिंह आर्य ने पश्चिम बंगाल में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, "जो भी बांग्लादेश से अवैध रूप से आया है, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, उसका नाम मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए."
इस बयान को मतुआ समुदाय ने अपनी नागरिकता और मताधिकार पर सीधा सवाल मानकर देखा. हालाँकि, पार्टी ने बाद में इन टिप्पणियों से दूरी बनाई और सफ़ाई दी.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, "पार्टी इन बयानों का समर्थन नहीं करती है. यह भाजपा का आधिकारिक रुख़ नहीं है."
बीबीसी ने मतुआ समुदाय की चिंता पर राज्य के कई बीजेपी नेताओं से बात करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो पाई.
क्या मतुआ समुदाय की नाराज़गी का असर होगा?
विश्लेषकों का मानना है कि मतुआ समुदाय का यह असमंजस इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में असर डाल सकता है.
'प्रतीची इंस्टीट्यूट' के रिसर्चर सबीर अहमद ने बीबीसी से कहा, "मतुआ समुदाय बीजेपी के लिए एक मज़बूत वोट बैंक रहा है. नागरिकता संशोधन क़ानून के बारे में किए गए पुराने वादे के चलते उन्होंने पार्टी का समर्थन किया था. इस बार यह समर्थन बदल सकता है. आँकड़े दिखाते हैं कि मतुआ बहुल इलाक़ों में बड़ी आबादी अब भी 'अनमैप्ड' है. उन्हें नागरिकता तो मिलेगी, लेकिन इसमें समय लगेगा. यह प्रक्रिया अगले कुछ महीनों में पूरी होने वाली नहीं है.''
उनके मुताबिक़, "इसी वजह से मतुआ समुदाय एसआईआर के तहत सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है और सबसे अधिक असुरक्षित स्थिति में है. बीजेपी ने उन्हें केवल आश्वासन दिए हैं, लेकिन उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए अब तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है."
दूसरी ओर, पहले सीएए और अब एसआईआर के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक तौर पर आक्रामक रुख़ अपनाया है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार यह आरोप लगाती रही हैं कि एनआरसी, सीएए और अब एसआईआर के ज़रिए बीजेपी लोगों को डराने की राजनीति कर रही है.
तृणमूल का दावा है कि पश्चिम बंगाल में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को मताधिकार से वंचित नहीं होने दिया जाएगा.
मतुआ समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता कपिल कृष्ण कहते हैं, "समस्या अब भी बनी हुई है. एसआईआर में बहुत सारे नाम इसलिए हटाए गए हैं, क्योंकि साल 2002 की सूची में नाम नहीं थे. ऐसे लोग वोट नहीं कर पाएँगे. लोग बहुत चिंतित हैं.''
''कई लोगों ने सीएए के फ़ॉर्म भर दिए हैं, लेकिन अब तक प्रमाणपत्र नहीं मिला है. नागरिकता के लिए आवेदन करने का एक ही तरीक़ा बताया जा रहा है, ख़ुद को बांग्लादेशी घोषित करना. कोई ऐसा क्यों करेगा. लोगों के पास दशकों पुराने दस्तावेज़ नहीं हैं, तो वे यह सब कैसे पूरा करेंगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.