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पाकिस्तान में चीनी नागरिकों पर कौन और क्यों कर रहा है हमले?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन ने पाकिस्तान के कराची शहर में तीन चीनी नागरिकों की हत्या पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए.
पाकिस्तान की कराची यूनिवर्सिटी के कनफ़्यूशियस सेंटर में बीते मंगलवार हुए आत्मघाती धमाके में तीन चीनी शिक्षकों की मौत हो गई है. इस धमाके में एक पाकिस्तानी ड्राइवर की भी मौत हुई है और अन्य व्यक्ति घायल हुआ है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ ने चीनी दूतावास पहुँचकर इस हमले में मरने वाले चीनी नागरिकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई है.
इससे पहले उन्होंने ट्वीट कर लिखा था, ''कराची में चीनी नागरिकों और अन्य की मौत से मुझे गहरा दुख हुआ है. पीड़ित परिजनों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना. मैं आतंकवाद की इस कायरतापूर्ण कार्रवाई की कड़ी निंदा करता हूँ. दोषियों को निश्चित रूप से न्याय के कटघरे में लाया जाएगा.''
हमले के बाद पाकिस्तान स्थित चीनी दूतावास ने कहा है कि पाकिस्तान सरकार ये सुनिश्चित करे कि चीनी नागरिकों के साथ दोबारा ऐसा सलूक न हो.
लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है, जब पाकिस्तान में चीनी नागरिकों को निशाना बनाया गया हो.
पाकिस्तान में चीनी नागरिक कब-कब निशाना बनाए गए -
- 26 अप्रैल, 2022 को कराची आत्मघाती बम धमाके में तीन चीनी नागरिकों की मौत
- 14 जुलाई, 2021 को ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में बम धमाके में दस चीनी नागरिकों की मौत
- 14 जुलाई, 2021 को ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में बम धमाके में 26 अन्य चीनी नागरिक घायल हुए
- 28 जुलाई, 2021 में कराची में चीनी नागरिक की गाड़ी पर गोलियां बरसाई गईं
- 11 मई, 2019 को ग्वादर के पांच सितारा होटल पर चरमपंथियों का हमला हुआ जिसमें चीनी लोग ठहरे हुए थे
- 23 नवंबर, 2018 में चीनी वाणिज्य दूतावास पर हमला, चार लोगों की मौत
- 11 अगस्त, 2018 में दालबंदीन, बलुचिस्तान में हुए आत्मघाती में तीन चीनी इंजीनियर घायल हुए
- फरवरी - 2018 में कराची में दो चीनी नागरिकों पर गोलियां चलाई गयीं, एक चीनी नागरिक की सिर पर गोली मारकर हत्या
- मई - 2017 में क्वेटा से अगवा करने के बाद चीनी दंपति की हत्या
- जुलाई - 2007 में पेशावर में तीन चीनी नागरिकों की हत्या
कराची में बम विस्फोट कैसे हुआ?
पाकिस्तान, चीन के साथ गहरी दोस्ती का दावा हमेशा करता है. लेकिन ये भी सच है कि पाकिस्तान पहुँचने वाले चीनी नागरिकों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं पिछले कुछ सालों में बढ़ी हैं.
मंगलवार कराची यूनिवर्सिटी के कन्फ़्यूशियस सेंटर के बाहर जिस आत्मघाती बम धमाके को अंजाम दिया गया है, उसमें तीन चीनी शिक्षकों की मौत हुई है.
इस हमले को उस वक़्त अंजाम दिया गया जब शिक्षकों को लेकर जा रही बस कन्फ़्यूशियस सेंटर की ओर मुड़ रही थी.
आत्मघाती धमाके की सीसीटीवी फुटेज़ देखने से पता चलता है कि आत्मघाती हमलावर मौक़े पर पहले से मौजूद थीं और जैसे ही बस सेंटर की ओर मुड़ी, महिला ने ख़ुद में विस्फोट कर लिया.
इस धमाके में सेंटर के नवनियुक्त निदेशक एवं दो शिक्षकों की मौत हो गई है. इसके साथ ही वैन के पाकिस्तानी ड्राइवर की भी विस्फोट में मौत हो गई है.
शारी बलोच उर्फ़ बरमश को बलोच लिबरेशन आर्मी की आत्मघाती हमलावर बताया जा रहा है
पाकिस्तान के अलगाववादी संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी की मजीद ब्रिगेड ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
संगठन ने बताया है कि इस हमले को शारी बलोच नामक महिला ने अंजाम दिया था और ये पहला मौक़ा है, जब इस संगठन की ओर से किसी महिला ने आत्मघाती बम धमाके को अंजाम दिया है.
लेकिन ये पहली बार नहीं हुआ है जब चीनी नागरिकों के ख़िलाफ़ हमले में बलूच अलगाववादियों का नाम आया हो.
इससे पहले नवंबर, 2018 में कराची के क्लिफ़्टन इलाक़े में स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी भी बलूच लिबरेशन आर्मी ने ली थी. और अगस्त 2018 में बीएलए ने दालबंदीन के क़रीब आत्मघाती हमला करने की ज़िम्मेदारी भी ली थी.
पाकिस्तान सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
चीन के सरकार समर्थित अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने कराची हमले के बाद प्रकाशित अपनी संपादकीय में कहा है कि "पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान ने चीनी नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की है लेकिन समस्या के मूल कारणों का निदान किए बिना हमेशा चूक होती रहेगी."
लेकिन सवाल ये है कि पाकिस्तान की नई सरकार समस्या के मूल कारणों का निदान कैसे करेगी?
पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ सरकार बनाने के बाद चीन और पाकिस्तान के बीच संबंध ख़राब होने के लिए इमरान ख़ान सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया चुका है.
उन्होंने कहा था, "चीन हमेशा से पाकिस्तान का दोस्त रहा है. ये दोस्ती हुकूमतों की दोस्ती नहीं, आवाम की दोस्ती है. पिछली सरकार ने इस दोस्ती को कमज़ोर करने के लिए जो कुछ भी कुछ किया वह बहुत तकलीफ़देह दास्तान है. हम सीपेक पर और तेज़ी से काम करेंगे."
लेकिन सवाल ये उठता है कि पाकिस्तान की नई सरकार चीनी नागरिकों की सुरक्षा की चुनौती से कैसे निपटेगी.
क्योंकि चीन ने पाकिस्तान में अपने नागरिकों एवं सीपेक परियोजना की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान से एक अलग सुरक्षाबल तैयार करने की मांग की थी.
इसके बाद पाकिस्तान ने इस मांग को स्वीकार करते हुए एक स्पेशल सिक्यॉरिटी डिविज़न का गठन किया जो चीनी लोगों, चीनी सामान एवं परियोजनाओं की सुरक्षा करती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अब शहबाज़ शरीफ़ की गठबंधन सरकार ऐसा क्या करेगी जिससे चीन की चिंताओं का निराकरण हो सके.
बीबीसी उर्दू के संवाददाता सकलेन इमान बताते हैं, "सबसे पहले हमें ये समझने की ज़रूरत है कि पाकिस्तान में इस तरह के नीतिगत फ़ैसले सरकारें नहीं, आर्मी लेती है और चीन के प्रति उसके रुख में कोई परिवर्तन नहीं है. इमरान ख़ान पर उनके कार्यकाल में सीपेक परियोजना का काम धीमी गति से होने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन उसकी वजह आईएमएफ़ से जुड़ी शर्तें और पाकिस्तान की ख़राब आर्थिक हालत रही है.
अगर कल कराची में हुए बलूच आत्मघाती बम धमाके की बात करें तो ये काफ़ी चिंताजनक है क्योंकि बलूच आक्रामकता में एक तरह का बदलाव आता दिख रहा है. ये पहला मौका है जब उनकी ओर से किसी महिला ने आत्मघाती धमाके को अंजाम दिया है. अब तक इस तरह की चुनौतियां दूसरे चरमपंथी संगठनों की ओर से आया करती थीं. लेकिन देखना ये होगा कि बलूच अलगाववादी ताकतों का ये रुख बरकरार रहता है या नहीं.
वहीं, अगर मूल कारणों के निदान की बात करें जिसका ज़िक्र ग्लोबल टाइम्स के एडिटोरियल में किया गया है तो हमें ये समझना होगा कि सरकार की ओर से बलूच अलगाववादियों को मुख्यधारा में लाने की कोशिशें हुई हैं. लेकिन समस्या ये है कि ऐसी कोशिशें अपेक्षाकृत रूप से कम हुई हैं और जब हुई हैं तब बहुत सफल नहीं हुई.
एक धड़ा अगर सरकार से संवाद करने की तरफ़ बढ़ता है तो दूसरा ज़्यादा चरमपंथी रुख अख़्तियार कर लेता है. लेकिन अगर बलूच आक्रामकता पर सरकार की प्रतिक्रिया देखें तो ज़्यादतर मौकों पर हिंसा की प्रतिक्रिया हिंसा से दी गयी है जिसके चलते समाधान के रास्ते निकलते नहीं दिखते."
ऐसे में सवाल उठता है कि पाकिस्तानी सरकार चीन की ओर से की जाती मांगों को पूरा कैसे करेगी.
सकलेन इमाम कहते हैं, "चीन हमेशा से चीनी नागरिकों के ख़िलाफ़ हमलों के बाद पाकिस्तान से ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की मांग करता रहा है. इससे पहले इस तरह के बयान स्टेंडर्ड प्रोसीज़र जैसे होते थे. लेकिन अब जब पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन को चीन और रूस की ओर से संदेह भरी नज़र से देखा जा रहा है तब चीन की ओर से इस तरह की मांगों का ख़ास मतलब है. इसका दबाव नए प्रधानमंत्री पर नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी सेना पर है जिसे पाकिस्तान के राजनीतिक शब्दावली में 'इस्टेबलिशमेंट' कहा जाता है."
लेकिन सवाल ये उठता है कि बलूच अलगाववादी चीनी नागरिकों के प्रति आक्रामक क्यों हैं.
चीन के ख़िलाफ़ क्यों हैं बलूच अलगाववादी
चीन पाकिस्तान में 62 अरब डॉलर का निवेश करके एक आर्थिक गलियारा तैयार कर रहा है जिसे अंग्रेजी में चाइना-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर कहा जाता है.
ये आर्थिक गलियारा चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का एक अहम अंग है.
इसके तहत चीन दशकों से पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में पड़ने वाले ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने की कोशिश कर रहा है.
जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडी के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने कुछ समय पहले बीबीसी के साथ बातचीत में सीपेक के महत्व को समझाया था.
उन्होंने कहा था, "चीन को मध्य एशिया से बहुत ज़्यादा ऊर्जा के स्रोत की ज़रूरत होती है. उसकी चिंता थी कि सिंगापुर के पास मलक्का जल संधि के पास से भविष्य में ऊर्जा के स्रोत को लाने में परेशानी हो सकती है. इसलिए चीन अलग-अलग रास्तों की तलाश में रहा है और उसी में से एक रास्ता उसने ग्वादर बंदरगाह का चुना.''
''इसकी शुरुआत 90 के दशक में हो चुकी थी. चीन ने शुरुआत में तेल आयात के लिए इसकी उपयोगिता समझी थी, बाद में इसका दायरा बढ़ाया गया और आगे चल कर दूसरे एनर्जी और पॉवर प्रोजेक्ट जोड़े गए. इस पूरी परियोजना को सीपेक का नाम दिया गया."
स्वर्ण सिंह ने बताया था कि इस परियोजना का काम अब तक पूरा नहीं हुआ है और इसके लिए बलूच लोगों की बग़ावत ज़िम्मेदार है.
बलूचिस्तान में चीन के निवेश पर मूलभूत आपत्ति ये है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान और ख़ासतौर पर ग्वादर के भविष्य का फ़ैसला करते हुए बलूचिस्तान प्रांत के नेतृत्व को विश्वास में लेना तो दूर की बात, सूचना तक नहीं दी.
पाकिस्तान का बलूचिस्तान सूबा एशिया में सोने, तांबे और गैस के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इसके बावजूद इसे पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा सूबा माना जाता है. और स्थानीय लोग इसके लिए सरकार की बेरुखी को ज़िम्मेदार मानते हैं. आबादी के लिहाज़ से बलूचिस्तान दूसरा सबसे बड़ा सूबा है. लेकिन अब तक पाकिस्तान की गद्दी पर पंजाब सूबे से आने वाले राजनेताओं का दबदबा रहा है.
स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, बलूच अलगावादियों की तरफ़ से बार-बार ये दलील दी जाती है कि सीपीईसी में भी ऐसा ही होगा कि बलूचिस्तान के संसाधनों पर पाकिस्तान की संघीय सरकार या फिर दूसरे समृद्ध प्रांत जैसे पंजाब को फ़ायदा मिलेगा.
वहीं, स्थानीय लोगों की सोच ये है कि चीन क़ब्ज़ा करेगा और बलूचिस्तान वासियों को अपने प्राकृतिक और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल करने का मौक़ा नहीं मिलेगा.
इस वजह से वहाँ के लोग सीपेक का विरोध करते आए हैं. और ये लड़ाई सिर्फ़ बलूच की आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं है.
तेजी से बदल रही है ग्वादर की तस्वीर
हालाँकि, विशेषज्ञ इसके लिए ग्वादर की तेजी से बदलती तस्वीर को भी ज़िम्मेदार ठहराते हैं. बंदरगाह में नयी मशीनें लगने के साथ-साथ सड़कों, नई इमारतों और कॉलोनियों का निर्माण हो रहा है.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, तमाम विकासशील परियोजनाओं के बावजूद ग्वादर के रहने वाले पीने के पानी की बूँद-बूँद को तरस रहे है.
ग्वादर शहर को साफ़ पानी उपलब्ध कराने वाले इकलौते भंडार आकड़ डैम से साल में कुछ हफ़्ते ही पानी मिल पता है. बाकी दिनों में ग्वादर के लोग हक़ीक़त में पानी की बूँद-बूँद को तरसते रहते हैं.
स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, बलूचिस्तान के रहने वालों को लगता है कि वहाँ पैदा होने वाले रोज़गार के अवसर में स्थानीय लोगों को नौकरियों और अन्य आर्थिक अवसरों में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा.
और बलूचिस्तान में पनप रहे असंतोष की बानगी पिछले साल हुए एक विरोध प्रदर्शन में नज़र आई थी.
पिछले साल नवंबर महीने में बलुचिस्तान प्रांत के ग्वादर शहर में सैकड़ों महिलाओं ने कथित रूप से चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था. हालांकि, चीन ने इस आंदोलन के सीपेक के ख़िलाफ़ होने के दावे को ख़ारिज किया था.
लेकिन इसे ग्वादर शहर के इतिहास में महिलाओं की सबसे बड़ी रैली कहा गया था.
'ग्वादर को हक़ दो' नाम से चलाए गए इस आंदोलन के नेता मौलाना हिदायत-उर-रहमान के अलावा बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी रैली को संबोधित किया था.
इनमें से कुछ महिलाओं का कहना था कि वे मजबूर होकर अपने घरों से बाहर निकलीं, क्योंकि ट्रॉलरों के ज़रिये अवैध रूप से मछली पकड़ने और ईरान सीमा पर व्यापार पर प्रतिबंध के बाद उनके पतियों का रोज़गार ख़त्म हो गया है.
इस मौक़े पर एक महिला नफ़ीसा बलोच ने कहा था कि "यहां बेइंतिहा ज़ुल्म है. हम भूखे हैं, बेरोज़गार हैं, हमारे पास स्वास्थ्य और शिक्षा तक की पहुंच नहीं है. यहां न पानी है न बिजली."
ग्वादर के वरिष्ठ पत्रकार बहराम बलोच ने बीबीसी उर्दू से बात करते हुए कहा था कि जिन समस्याओं के लिए ग्वादर में ये धरना दिया जा रहा है उनसे ग्वादर की पूरी आबादी प्रभावित है.
उन्होंने कहा था कि ग्वादर के लोगों के पास रोज़गार के दो प्रमुख स्रोत हैं- मछली पकड़ना और ईरान के साथ सीमा व्यापार.
उन्होंने कहा था कि, "फिलहाल, ये दोनों सेक्टर तबाह हो गए हैं. मछली पकड़ने के काम को अवैध तरीक़े से ट्रॉलरों के ज़रिये मछली पकड़ने वालों ने तबाह कर दिया है, जबकि ईरान के साथ सीमा व्यापार को टोकन सिस्टम के नाम पर सरकार की तरफ़ से लगाई जाने वाली पाबंदियों ने तबाह कर दिया है. इसी तरह लोग बड़ी संख्या में चेकपोस्टों से प्रभावित हैं."
हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने इस पर बयान देते हुए कहा था कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ग्वादर क्षेत्र में चीन विरोधी प्रदर्शनों की रिपोर्ट आधारहीन हैं. वहां पर चीनी ट्रॉलर्स नहीं हैं और न ही मछलियां पकड़ रहे हैं."
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का इतिहास
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पहली बार 1970 के दशक की शुरुआत में वजूद में आई थी. ये वो दौर था जब पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के पहले शासन में बलूचिस्तान में पाकिस्तान की हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र बग़ावत शुरू की गई थी.
हालांकि, सैन्य तानाशाह ज़ियाउल हक़ की सत्ता पर क़ब्ज़े के बाद बलूच क़ौम परस्त लीडरों से बातचीत हुई. और इसका नतीजा ये निकला कि सशस्त्र बग़ावत के ख़ात्मे के बाद बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी भी पृष्ठभूमि में चली गई.
फिर पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन में बलूचिस्तान हाई कोर्ट के जज जस्टिस नवाज मिरी के क़त्ल के आरोप में क़ौम परस्त लीडर नवाब खैर बख़्श मिरी की गिरफ़्तारी के बाद साल 2000 से बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में सरकारी प्रतिष्ठानों और सुरक्षा बलों पर हमलों का सिलसिला शुरू हुआ.
वक़्त गुज़रने के साथ-साथ हमलों में न सिर्फ़ इज़ाफ़ा हुआ बल्कि इनका दायरा बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में फैल गया है.
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