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'भारत में दो साल में 97 फ़ीसदी बढ़े नफ़रती भाषण', अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट का दावा
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित एक ग़ैर-सरकारी संस्थान ने भारत में नफ़रती भाषण या हेट स्पीच पर एक रिपोर्ट जारी की है.
'रिपोर्ट 2025, हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया' नाम की इस विस्तृत रिपोर्ट में चौंकाने वाले दावे किए गए हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2025 में भारत में कुल 1318 प्रत्यक्ष नफ़रती भाषण दर्ज किए गए. वहीं, 2024 की तुलना में यह 13 फ़ीसदी और 2023 की तुलना में 97 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी नफ़रती भाषण देने के मामले में शीर्ष पर हैं और सबसे ज़्यादा किसी राज्य में नफ़रती भाषण दर्ज किए गए हैं तो वह उत्तर प्रदेश है. बीजेपी ने इस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज किया है.
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उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकारें हैं. बीजेपी का कहना है कि अमेरिका या और कहीं की भी जो ऐसी विदेशी संस्थाएं हैं, वह देश में भ्रांति पैदा करने के लिए इस प्रकार की रिपोर्टों को सार्वजनिक करती हैं.
वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बढ़ती प्रवृत्ति को क़ानून के ज़रिये ही रोका जा सकता है.
'सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ ऑर्गेनाइज़्ड हेट' और रिपोर्ट का आधार
सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ ऑर्गेनाइज़्ड हेट (सीएसओएच) वॉशिंगटन डीसी में स्थित एक संस्था है.
इसकी वेबसाइट के मुताबिक़, यह एक ग़ैर-लाभकारी और ग़ैर-पक्षपातपूर्ण थिंक-टैंक है.
इसका मक़सद ऐसी हर तरह की संगठित नफ़रत को समझना, रोकना और उसका मुक़ाबला करना है, जो धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता, जाति, जातीय पहचान, लिंग, विकलांगता या यौन पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय के ख़िलाफ़ की जाती है.
सीएसओएच ख़ुद को शोध और नीति-निर्माण के बीच काम करने वाली संस्था बताती है. यानी यह सिर्फ़ अध्ययन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर अपने शोध को ज़मीनी और व्यावहारिक नीतियों में बदलने की कोशिश करती है.
सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर सीएसओएच के साथ काम भी करते हैं.
वह कहते हैं, ''नफ़रती भाषण तो 2014 से लगातार बढ़ते गए लेकिन 2024 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री ने अपनी सीमा या मर्यादा को एक तरफ़ कर जिस तरह से नफ़रती भाषण दिए, एक तरह से उनसे ही रास्ता खुला. उसके बाद से तो नफ़रती भाषण ऐसे बढ़े हैं जैसे बांध का दरवाज़ा ही खोल दिया गया हो.''
''इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि अब तक ईसाई समुदाय निशाने पर कम था लेकिन अब मुसलमानों के साथ ईसाइयों को लेकर भी नफ़रती भाषणों में बहुत वृद्धि हो गई है.''
वो कहते हैं, ''तीसरी बात यह है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों को फैलाने में हुआ है. या तो उन्होंने सीधे सोशल मीडिया पर ही ऐसे नफ़रती भाषण डाले हैं या फिर इनका इस्तेमाल उनके प्रसार के लिए किया है. वैसे तो सोशल मीडिया कंपनियां कहती हैं कि उनकी नीतियां इसके ख़िलाफ़ हैं लेकिन ऐसे नफ़रती, ध्रुवीकरण करने वाले भाषणों से उनके हिट्स बढ़ते ही हैं. इसलिए इन सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करना बहुत ज़रूरी है.''
वो कहते हैं, ''इसके साथ ही पुलिस, प्रशासन के अधिकारियों की भी ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए क्योंकि कानून के गंभीर उल्लंघन के बावजूद किसी पर उचित कार्रवाई नहीं होती.''
हर्ष मंदर कहते हैं, "लेकिन इस रिपोर्ट से इतर दिल्ली दंगों में भाजपा नेता कपिल मिश्रा और अन्य के नफ़रती भाषणों के खिलाफ़ केस में जस्टिस मुरलीधरन के सामने मेरे भी बयान हुए थे. जस्टिस मुरलीधरन ने इस केस में बहुत सख़्ती के साथ कार्रवाई करने को कहा था लेकिन उसी रात उन्हें हटा दिया गया."
उन्होंने कहा, "कोर्ट में पुलिस ने कहा था कि हम सही वक़्त पर इनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करेंगे. त्रासदी देखिए कि पांच साल हो गए हैं लेकिन वह सही वक़्त नहीं आया और अब कपिल मिश्रा कानून मंत्री हो गए हैं."
"इसका मतलब यह कि नफ़रती भाषण पर दंड देने के बजाए आप इसके लिए पुरस्कार दे रहे हैं."
सीएसओएच के कामकाज को वेबसाइट पर चार मुख्य हिस्सों में बताया गया है.
पहला, उच्च गुणवत्ता का शोधः जिसमें घृणा, हिंसा, उग्रवाद, कट्टरता और ऑनलाइन नुक़सान जैसे विषयों पर गहराई से अध्ययन किया जाता है.
दूसरा, नीति-निर्माणः जहां इन शोध निष्कर्षों को ठोस नीतियों और रणनीतियों में बदला जाता है.
तीसरा, जनता से संवाद, जिसका मक़सद संगठित नफ़रत और उग्रवाद से जुड़े मुद्दों पर लोगों को जागरूक और शिक्षित करना है.
और चौथा, सहयोग, जिसके तहत विभिन्न संस्थाओं और हितधारकों के साथ मिलकर नफ़रत, उग्रवाद और उभरते डिजिटल ख़तरों से निपटने की कोशिश की जाती है.
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल की गई पद्धति के बारे में रिपोर्ट में लिखा है कि किसी भाषण या रैली में दिए गए बयान को नफ़रत भरा भाषण मानने के लिए सीएसओएच ने संयुक्त राष्ट्र की रूपरेखा को आधार बनाया है. इसके अनुसार, किसी भी तरह का भाषण, लेखन या व्यवहार किसी व्यक्ति या समूह को उसके धर्म, जातीयता, राष्ट्रीयता, नस्ल, रंग, वंश, लिंग या किसी अन्य पहचान के आधार पर निशाना बनाता है, अपमानजनक होता है या भेदभाव को बढ़ावा देता है तो उसे हेट स्पीच माना जाएगा.
उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट इस रिपोर्ट को ही सिरे से ख़ारिज करते हैं. उनका कहना है कि अमेरिका या और कहीं की भी जो ऐसी विदेशी संस्थाएं हैं, वह देश में भ्रांति पैदा करने के लिए इस प्रकार की रिपोर्टों को सार्वजनिक करती हैं.
वह कहते हैं, "ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. देश के लोकतांत्रिक माहौल को ख़राब करने के लिए भ्रांति फैलाने का काम कुछ एजेंसियां करती हैं. हम इनको गंभीरता से लेते नहीं हैं और भारत का जनमानस, बुद्धिजीवी जानता है कि कोई रिपोर्ट अमेरिका में छपती है तो उसका कितना प्रभाव पड़ता है."
रिपोर्ट में क्या है?
'रिपोर्ट 2025, हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया' की शुरुआत में ही बताया गया है कि यह सीएसओएच के 'द इंडिया हेट लैब' प्रोजेक्ट का हिस्सा है.
रिपोर्ट के अनसार 2025 में प्रत्यक्ष नफ़रती भाषण के कुल 1,318 मामले दर्ज किए गए. ये 2024 की तुलना में 13 फ़ीसदी और 2023 की तुलना में 97 फ़ीसदी ज़्यादा हैं.
इनमें से 98 फ़ीसदी यानी 1,289 भाषणों में निशाने पर मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय थे.
मुस्लिम समुदाय को 1156 मामलों में विशेष रूप से निशाना बनाया गया. ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ 162 घटनाएं दर्ज हुईं, जो 41 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है.
राज्यवार देखें तो सबसे ज़्यादा घटनाएं उत्तर प्रदेश में 266, महाराष्ट्र में 193, मध्य प्रदेश में 172, उत्तराखंड में 155, दिल्ली में 76 दर्ज हुईं. 88 फ़ीसदी घटनाएं भाजपा शासित राज्यों/संघ शासित क्षेत्रों में हुईं.
सात विपक्ष शासित राज्यों में कुल 154 घटनाएं हुईं. 2024 के 234 मामलों की तुलना में ये 34 फ़ीसदी कम हैं.
अप्रैल में सबसे ज़्यादा 158 घटनाएं दर्ज की गईं. 22 से मई 7 के बीच 16 दिन में पहलगाम हमले और उसके बाद भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच 98 प्रत्यक्ष नफ़रती घटनाएं दर्ज की गईं.
656 भाषणों में 'लव जिहाद', 'लैंड जिहाद', 'थूक जिहाद', 'शिक्षा जिहाद', 'वोट जिहाद' शामिल थे.
308 भाषणों में हिंसा के लिए आह्वान किया गया, जिनमें 136 में हथियार उठाने को कहा गया.
276 भाषणों में उपासना स्थलों के विनाश की मांग की गई, ख़ासकर ज्ञानवापी और शाही ईदगाह मस्जिद के लिए.
141 भाषणों में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 71 नफ़रती भाषण के साथ सबसे ऊपर रहे.
उनके बाद प्रवीण तोगड़िया 46, और अश्विनी उपाध्याय 35 के साथ तीसरे नंबर पर रहे.
रिपोर्ट में दी गई 10 लोगों की सूची में योगी आदित्यनाथ 22 भाषणों के साथ नौवें और अक्सर चर्चाओं में रहने वाले यति नरसिंहानंद सरस्वती 20 भाषणों के साथ 10वें स्थान पर हैं
रिपोर्ट में सोशल मीडिया की भूमिका का ज़िक्र है. 1378 नफ़रती भाषणों में से 1278 के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए गए या उन्हें लाइव किया गया.
इनमें फ़ेसबुक सबसे बड़ा प्लेटफ़ॉर्म था जिस पर 942 वीडियो सबसे पहले अपलोड किए गए. इसके बाद यूट्यूब पर 246, इंस्टाग्राम पर 67 और एक्स पर 23 वीडियो शेयर किए गए.
'विपक्ष के राज्यों में इसलिए घटे नफ़रती भाषण'
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि ये रिपोर्ट चूंकि भारत से बाहर के एक संस्थान ने तैयार की है इसलिए इस पर उंगलियां उठाई जाएंगी लेकिन जो डेटा इसमें है वह सही लगता है.
वह कहते हैं कि दरअसल ऐसे मामले उन राज्यों में ज़्यादा हैं जहां संवेदनशील मुद्दों पर बेतुके और भड़काऊ बयान देने वालों को अघोषित सरकारी संरक्षण मिला हुआ है, और आप देखेंगे कि विपक्ष के शासन वाले राज्यों में इस तरह के मामले कम होते हैं क्योंकि वहां की पुलिस, प्रशासनिक तंत्र ऐसे तत्वों को बढ़ने नहीं देता.
रशीद किदवई कहते हैं, "बतौर पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मेरा अनुभव है कि वह 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या 2002 के गुजरात दंगे हों, जहां भी सांप्रदायिक भीड़ की तरफ़ पुलिस का रवैया नरम होता है वहां ऐसी घटनाएं ज़्यादा होती हैं. जहां पुलिस और प्रशासन चुस्त होता है वहां ऐसी घटनाएं कम होती हैं."
वह कहते हैं, "समाजशास्त्र के कई अध्ययनों में भीड़ की हिंसा को लेकर यह बताया गया है कि अगर क़ानून का डर न हो तो सीधे-साधे नज़र आने वाले लोग भी उग्र रूप ले लेते हैं."
इस सवाल के जवाब में किदवई कहते हैं, "लोकतंत्र में बहुत सी चीज़ें क़ानून के दायरे में नहीं आती हैं. वह मर्यादा, अनुशासन के तहत आती हैं. ब्रिटेन का संविधान लिखित नहीं है, वहां बहुत संवैधानिक मान्यताएं परंपरा पर आधारित हैं. हमारे देश में भी जो राजनीतिक संस्कृति, ख़ासतौर पर शिष्टाचार या सामाजिक सौहार्द का मामला है उसे क़ानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता. यह हज़ार साल से ऊपर के हमारे सामाजिक ढांचे के तहत आता है."
क़ानून से ही रुकेगा यह सिलसिला?
कर्नाटक ने पिछले साल के अंत में कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम (प्रिवेंशन) विधेयक पारित किया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी जुलाई, 2025 में केंद्र और सभी सरकारों को नफ़रती भाषणों पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे.
तो क्या इस बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए क़ानून बनाना ही एकमात्र उपाय है?
इस सवाल के जवाब में किदवई कहते हैं, "समाजशास्त्र के तहत पूरी दुनिया में अनेक अध्ययन हुए हैं जिनमें इस पर बात है. ये कहते हैं कि अमूमन इंसान से यह उम्मीद की जाती है कि वह सामाजिक मान्यताओं के दायरे मे रहेगा. लेकिन अगर वह यह लक्ष्मण रेखा पार करता है तो उसमें दंड या सज़ा का ख़ौफ़ होना ज़रूरी होता है ताकि वह अपनी हद में रहे."
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि ऐसे क़ानून मजबूरी में ही बनाए जाते हैं और अच्छा हो कि इनकी ज़रूरत न पड़े, किदवई कहते हैं, "लेकिन जब बार-बार मर्यादा का उल्लंघन हो रहा हो और नफ़रत फैलाई जा रही हो, वहां इस तरह के क़ानून कारगर सिद्ध होते हैं. आमतौर पर लोगों में पुलिस और कोर्ट-कचहरी का दबाव होता है. लेकिन जब लोगों को लगता है कि वह कुछ भी कह सकते हैं और कुछ नहीं होगा तब नफ़रत बढ़ती है. ऐसे क़ानूनों की वजह से अगर नफ़रती भाषणों के मामले 50 फ़ीसदी भी कम हो जाते हैं तो यह ठीक है."
'राजनीतिक असुरक्षा से बिगड़े धामी के बोल'
राजनीतिक और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले राज्य उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को इतने नफ़रती भाषण देने की ज़रूरत आख़िर क्यों पड़ रही है?
इस सवाल के जवाब में पत्रकार और एक्टिविस्ट त्रिलोचन भट्ट कहते हैं, "इसकी जड़ दरअसल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक असुरक्षा में छिपी है. वह जानते हैं कि उनकी कुर्सी सुरक्षित नहीं है और इसी असुरक्षा की वजह से उनके बोल बिगड़े हैं."
भट्ट कहते हैं, "दरअसल बतौर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास कोई काम दिखाने को नहीं है. बेरोज़गार आंदोलन और अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर भी वह लगातार दबाव में हैं और इसलिए इन मुद्दों को भटकाने के लिए वह कभी लैंड जिहाद, कभी मज़ार जिहाद, कभी थूक जिहाद, कभी लव जिहाद जैसे बयान देते हैं."
त्रिलोचन भट्ट याद दिलाते हैं कि बतौर मुख्यमंत्री चुनाव में उतरे धामी खटीमा की अपनी विधानसभा सीट हार गए थे. वह बीजेपी आलाकमान की कृपा से मुख्यमंत्री बने हैं और उन्हें लगता है कि ऐसी बयानबाज़ी या समान नागरिक संहिता जैसे कानून बनाकर वह पार्टी आलाकमान को ख़ुश रख सकते हैं.
इसके साथ ही भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड में इतनी नफ़रती बयानबाज़ी पुष्कर सिंह धामी के बनने के बाद ही हुई है, उससे पहले उन्हीं की पार्टी के त्रिवेंद्र सिंह रावत या अल्पकाल के लिए मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत के ज़माने में भी नहीं हुई थी.
वहीं बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट कहते हैं, "धामी जी ने ग़लत चीज़ों को रोकने का प्रयास किया है. देवभूमि के मूल स्वरूप को बनाए रखना उनकी प्राथमिकता में है और इसे वह छोड़ नहीं सकते हैं. जनादेश हमें इसीलिए मिला है. हमने यूसीसी लागू किया, जबरन धर्मांतरण क़ानून लागू किया और ये देश में नज़ीर बने हुए हैं."
वो कहते हैं, "कुछ षड्यंत्रकारी तत्वों ने देवभूमि में लैंड जिहाद शुरू किया. मज़ारों के नाम पर भूमि पर कब्ज़ा किया गया और यह देखिए कि जब उन मज़ारों को तोड़ा गया तो कोई आपत्ति करने तक सामने नहीं आया. इन्हीं चीज़ों के आधार पर मुख्यमंत्री जी ने कुछ बातें कही हैं और वह देवभूमि के देवतुल्य स्वरूप के लिए ज़रूरी थीं. इनको किसी धर्म के विरोध में मानना, उचित नहीं है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.